dahej mukt mithila

(एकमात्र संकल्‍प ध्‍यान मे-मिथिला राज्‍य हो संविधान मे) अप्पन गाम घरक ढंग ,अप्पन रहन - सहन के संग,अप्पन गाम-अप्पन बात में अपनेक सब के स्वागत अछि!अपन गाम -अपन घरअप्पन ज्ञान आ अप्पन संस्कारक सँग किछु कहबाक एकटा छोटछिन प्रयास अछि! हरेक मिथिला वाशी ईहा कहैत अछि... छी मैथिल मिथिला करे शंतान, जत्य रही ओ छी मिथिले धाम, याद रखु बस अप्पन गाम - अप्पन बात ,अप्पन मान " जय मैथिल जय मिथिला धाम" "स्वर्ग सं सुन्दर अपन गाम" E-mail: apangaamghar@gmail.com,madankumarthakur@gmail.com mo-9312460150

apani bhasha me dekhe / Translate

अभय दीपराज लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
अभय दीपराज लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 16 अप्रैल 2012

अभय कान्त झा दीपराज कृत -

अभय कान्त झा दीपराज कृत - मैथिली ग़ज़ल

                 मैथिली ग़ज़ल

हम अहाँ सँ मधुर मिलन के, सपना देखैत रहलौं ||
जखन अहाँ सँ भेंट होयत, की कहब सोचैत रहलौं ||


नहिं बूझल छल प्रेमक भाषा, परिभाषा की करू अब.?
नेहक पाती पर ओहिना किछु लिखैत - कटैत रहलौं ||


प्रेमक चन्दन, मोनक भीतर, गमकल - भाँग बनल,
जकर नशा हम मोने - मोने, पीबैत - बह्कैत रहलौं ||


मोनक मधुबन में, शैफाली, लुधकल प्रेमक फूल सँ,
जेहि के तेज सुगंधी में हम, रचल - गमकैत रहलौं ||


दीपक बनिकय इन्तिज़ार जे केलौं , से अब कहू कोना ?
घायल बनिकय कोना प्रेम में, मरैत - जीवैत रहलौं ||


आबि गेलों जे अहाँ आइ अब नहिं कोनो संताप रहल,
बिसरि गेलौं ओ दुःख जे पहिने भोगैत - सहैत रहलौं ||

                       रचनाकार - अभय दीपराज

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

अभय कान्त झा दीपराज कृत-

                                           ग़ज़ल


ज़िन्दगी में तुम्हें जब भी ठोकर लगे, याद रखना मेरा प्यार काम आयेगा |
मैं  करूँगा  दुआ जब किसी के लिए,  मेरे  होंठों  पे तेरा  भी  नाम  आयेगा ||

मेरी  हस्ती  बड़ी  तो  नहीं  है  मगर,  हाथ   थामूँगा   तेरा,   निभाऊँगा   मैं,
दोस्त तूफाँ में होगी जो कश्ती तेरी, बन के साहिल मेरा हर कलाम आयेगा ||

बात  हो  शाम  की  या  सुबह  की  किरण, तेरी राहों से काँटे चुनेगा ये दिल,
कोई तुझको निहारे, न चाहूँगा मैं, बन के चिलमन मेरा हर सलाम आयेगा ||

मुस्कुराकर किसी को जो देखोगे तुम, दिल जलेगा मगर मैं ये सह जाऊँगा,
दर्द भी तेरा सहने की खातिर कभी,  दोस्त  हाथों  में  मेरे  न  जाम आयेगा ||

कोशिशें  यूँ  न  कर  भूलने  की  मुझे, कोई  सपना  नहीं  हूँ  हकीकत  हूँ मैं,
आँख से जब भी छलकेंगे आँसू तेरे, बन के आँचल मेरा हर पयाम आयेगा ||

मेरा  रिश्ता  ये  तुझसे  नया  तो  नहीं,  हमसफ़र  खेल  है  ये  पुराना  बहुत,
देखना  एक  दिन  ये  बताने  तुझे,  खुद  ज़हां के खुदा का निजाम आयेगा ||
                                    
                                रचनाकार - अभय दीपराज

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

अभय कान्त झा दीपराज कृत - मैथिली ग़ज़ल

                         मैथिली ग़ज़ल 

सोचैत छथि किछु लोकनि अक्सर- हमर कप्पार जरल अछि |
उठावय  में  जे  भारी  अछि,  एहन  किछु  भार   परल   अछि ||

जखन  विश्वास  अपना  पर,   अहाँ   के   नहिं   रहत   बाँचल,
ओहू   शेरक   नज़र   सँ   मोन   घबरायत   जे   मरल   अछि ||

कोना   ओहि   आदमी  के  जीत  भेंटतै  वा  सफल  होयत ....?
जे बस हरदम  बनल  कोढ़ियाठ,  बिस्तर  ध  क  परल  अछि ||

पड़ोसी   भाई   के   कनियाँ,   अहाँ   के   साइर   और   भौजी,
लगैत  अछि  देह  हुनकर  माटि  नहि, कुन्दन सँ गढ़ल अछि ||

बहुत  किछु  ज्ञान  रहितो  हम,  बहुत  गलती  सँ  नहिं बचलौं,
तेना   लागल   जेना   दारु,   एखन  माथा   में   चढल   अछि ||

परीक्षा   के   जखन   हम   नाम   सुनैत   छी   त  कँपैत   छी,
लगैत  अछि-  सबटा  बिसरल  रहैत  छी,  जे  की पढल अछि ||

जों   राखब   मोन   में   संतोष,    थोरबो    में    खुशी    भेंटत,
ओ  गाछी  काल्हि  फेर  फरत,  जे  कम  एहि बेर फरल अछि ||

जे  करक  अछि  अहाँके  काज,   करब   जों,   त   भ   जायत,
जों  देहक  दर्द  के  अनुभव  करब,  लागत  जे   बढल   अछि ||

निराशा  मोन  में  जों  अछि,   त  रस्ता  नहिं  कटत  कखनों,
बुझायत  ई-   जेना  किछु  काँट  सन  तरवा  में  गड़ल अछि ||

भेंटल   जे   हैसियत,   ओहि   सँ,   करू   उपकार   दुर्बल  के,
ओ पोखरि कोन काजक ? जे भरल अछि किन्तु सड़ल अछि ||

                                रचनाकार - अभय दीपराज 

बुधवार, 5 अक्टूबर 2011

अभय कान्त झा दीपराज के मैथिली गीत -

        सिंह - पीठ पर बैसल अम्बा...............

सिंह - पीठ पर बैसल अम्बा, अयलथि मिथिला धाम |
मिथिलावासी, जगदम्बा के,  उठि-उठि करथि प्रणाम ||

जगजननी  के  सुन्दर  मुखड़ा,  सुन्दर   मोहक   रूप |
लागि  रहल छल,  जेना  बर्फ पर,  पसरल भोरक धूप ||
मुग्ध भेलौं और धन्य भेलौं हम, देखि  रूप  अभिराम |
सिंह - पीठ पर बैसल अम्बा, अयलथि मिथिला धाम ||१ ||

मैया  सब  के  आशिष  द  क,  सबके  देलखिन्ह  नेह |
और  कहलथि  जे-  आइ एलौं हम,  नैहर अप्पन गेह ||
अही माटि के बेटी छी हम,   इहय  हमर  अछि  गाम |
सिंह - पीठ पर बैसल अम्बा, अयलथि मिथिला धाम ||२||

दंग- दंग हम केलों निवेदन-  जननी  ई  उपकार  करू |
धर्मक  नैया  डोलि  रहल अछि,  मैया  बेड़ा  पार  करू ||
ओ कहलथि-  हटि  जाउ पाप सँ, नीक भेंटत परिणाम |
सिंह - पीठ पर बैसल अम्बा, अयलथि मिथिला धाम ||३||

एहि के बाद शक्ति ई भखलनि- हम अहाँ के माली छी |
लेकिन  हमहीं  सीता - गौरी,  हमहीं  दुर्गा-काली  छी ||
जेहन  कर्म  रहत  ओहने  फल,  करब अहाँ  के  नाम |
सिंह - पीठ पर बैसल अम्बा, अयलथि मिथिला धाम ||४||

आखिर में जगदम्बा-जननी, सीता-रामक रूप लेलाह |
और प्रकाशपुंज बनिकयओ हमरे सब में उतरि गेलाह ||
देलथि ज्ञान जे - एक शक्ति के, छी हम ललित-ललाम ||
सिंह - पीठ पर बैसल अम्बा,  अयलथि मिथिला धाम ||५||

बाबू !  अब  त  बिसरि  जाउ  ई-  भेद - भाव   के   राग |
बेटा - बेटी,   ऊँच- नीच   और   छल - प्रपंच   के  दाग ||
नहिं  त आखिर अपने  भुगतव,  अपन  पाप  के  दाम |
सिंह - पीठ पर बैसल अम्बा, अयलथि मिथिला धाम ||६||


सिंह - पीठ पर बैसल अम्बा, अयलथि मिथिला धाम |
मिथिलावासी, जगदम्बा के,  उठि-उठि करथि प्रणाम ||



                रचनाकार- अभय दीपराज 

गुरुवार, 29 सितंबर 2011

अभय कान्त झा दीपराज के मैथिली गीत -



बड़भागी हम मिथिलावासी.......


बड़भागी हम मिथिलावासी. एहि धरती सन माय कतय |
जेहि आँगन जगदम्बा बेटी, पाहुन राम जमाय जतय ||

पग - पग पोखरि, पान - मखानक और धानक भण्डार भरल |
गंगा - गंडक, कमला - कोसी, अमृत सन जलधार भरल ||
बुद्धि - विवेक, ज्ञान और बल के, परचम नित फहराय जतय |
जेहि आँगन जगदम्बा बेटी, पाहुन राम जमाय जतय ||१||

कालीदास, मदन, विद्यापति, मंडन और अयाचिक धाम | 
एहि आँगन में उगना भोला, एहि आँगन चाणक्य ललाम || 
गौतम-कपिल-जनक के तप बल, छाया बनिकय छाय जतय |
बड़भागी हम मिथिलावासी. एहि धरती सन माय कतय ||२|| 

सादा - सरल - सरस - शुचि भोजन, चूड़ा-दही, साग और भात |
मज्जन-पूजन, संध्या वंदन, नैतिक-चिंतन, सबहक बात ||
पावन और पवित्र मानवता, नित-प्रतिदिन अधिकाय जतय | 
जेहि आँगन जगदम्बा बेटी, पाहुन राम जमाय जतय ||३||

धर्मक - धुरी धरा मिथिला के, सभ्य समाजक ई सिरमौर |
करब प्रयास सदा हम सब ई- एहि के गौरव बढ़य और ||
धर्म नैं कहियो जाय एतय सँ, पाप नष्ट भय जाय जतय | 
बड़भागी हम मिथिलावासी. एहि धरती सन माय कतय ||४||

बड़भागी हम मिथिलावासी. एहि धरती सन माय कतय |
जेहि आँगन जगदम्बा बेटी, पाहुन राम जमाय जतय ||


               रचनाकार - अभय दीपराज

सोमवार, 28 मार्च 2011

Abhay Kant Jha Deepraaj ke hindi GHAZAL -

                    ग़ज़ल

आग  से  था  खेलने  का शौक पर हम  डर गये |
मौत  को  जब  सामने देखा तो खुद ही मर गये ||

उम्र  भर  जो  साथ  देने  के  लिए  घर  से  चले,
शाम ही जो होने आयी,  थक के अपने घर गये ||

रोज़  सुबहो-शाम  मिट्टी,  खून  से  भींगी  रही,
पर हुआ बलिदान जिनका, फालतू वो सर गये ||

बोलियाँ   देते  रहे  जो  हमको  लड़ने  के  लिए,
सामने  दुश्मन दिखा तो खुद किनारा कर गये ||

भाग्य ही शायद बुरा था,  आदमी की ज़ात का,
जो  भी  बोया  पेड़  उसने,  उसके पत्ते झड गये ||

             
              रचनाकार- अभय दीपराज

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

Abhay Kant Jha Deepraaj ke hindi Ghazal -

                          ग़ज़ल

हो   सकता  है  बात   हो   तेरी   या   मेरे  अफ़साने  होंगे |
मेरी  नज़रों  में  भी  शायद  कुछ   शम्मा - परवाने   होंगे ||

गैर अगर तुम मुझको समझो तो ये भी एक पागलपन है,
क्योंकि  मेरी  नज्मों  में  कुछ,   तेरे   भी   नजराने  होंगे ||

कहाँ ज़ुल्म है ?  मेरे  दिल  ने,  प्यार अगर माँगा तुझसे,
मुमकिन है कल एक बनें वो ,जो कल तक अनजाने  होंगे ||

अगर  रौशनी  की  हसरत  है,   इतना  तो करना ही होगा ,
नहीं   चिरागां  फिर  भी  राहों  में कुछ  दीप  जलाने  होंगे ||

खिजां  यहाँ जो कर गुजरी  है,  उन ज़ुल्मों का ये ही हल है,
चमन  खिला  कर  इन  राहों  में, हमको फूल सजाने होंगे ||


                                       रचनाकार - अभय दीपराज

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

अभय कान्त झा दीपराज के मैथिली गीत -

          बेटी   के   दहेज़  के भार..........

बनल   असह्य   संताप   समाजक,   बेटी   के   दहेज़  के भार |
भैया - बाबू   गोर   लगैत   छी,    बंद    करू    ई    अत्याचार ||

जे     बेटी     जननी    समाज    के,    मूल    प्रेम - स्नेह    के |
अपमानक   हम   पातक  
लैत  छी,   ओहि  बेटी  के  देह  के ||
अपन   मान   सँ  हम   अविवेकी,  अपने  कयलौं   दुर्व्यवहार |
भैया - बाबू   गोर   लगैत   छी,    बंद    करू    ई    अत्याचार || १ ||

बड़  ज्ञानी,  बड़  शिष्टाचारी,  मानव  बनि   हम   जन्म   लेलौं |
नीति - न्याय  के  परिभाषा  हम  कयलौं,  बड़  सद्कर्म केलों ||
सब   यश   पर   भारी   ई अपयश,  संतानक  कयलौं व्यापार |
भैया - बाबू   गोर   लगैत   छी,    बंद    करू    ई    अत्याचार || २ ||

जेहि   बेटी   में   दुर्गा - कमला   और   सीता   के   वास  अहि |
ओ   बेटी   अपना   नैहर   पर   बोझ   बनल,   उपहास   अहि ||
एहन  पातकी - पापी  छी  हम,  हाँ,  एहि पातक पर धिक्कार |
भैया - बाबू   गोर   लगैत   छी,    बंद    करू    ई    अत्याचार || ३ ||

बेटी   के   अपमानक   ई   विष,   उपटा   देलक   जों  ई  फूल |
हमर - अहाँ  के,  सबहक  आँगन  में  नाचत  विनाश के शूल ||
संकट  ई  गंभीर  भेल  अब,  करिऔ  एहि  पर  तुरत  विचार |
भैया - बाबू   गोर   लगैत   छी,    बंद    करू    ई    अत्याचार || ४ ||

आइ अगर ई व्यथा हमर अछि,  काल्हि अहाँ के  ई अभिशाप |
एक - एक कय पेरि रहल अछि,  सबके  एहि  ज्वाला के दाप ||
सबहक गर्दन, शान्ति और सुख, काटि रहल अछि ई तलवार |
भैया - बाबू   गोर   लगैत   छी,    बंद    करू    ई    अत्याचार || ५ ||

बनल   असह्य   संताप   समाजक,   बेटी   के   दहेज़  के भार |
भैया - बाबू   गोर   लगैत   छी,    बंद    करू    ई    अत्याचार ||

                          रचनाकार- अभय दीपराज 

Abhay Kant Jha Deepraaj ke hindi Ghazal -


                           ग़ज़ल

चक्र प्रगति का ऐसा घूमा जगत आज श्मशान   हुआ है |
ढूंढ - ढूंढ   कर   यहाँ   बसेरा  धर्म  आज हलकान   हुआ है ||

कहाँ न्याय का मंदिर, मंदिर ? सेवा भाव कहाँ अब सेवा ?
ख़ूनी   पंजों  के  नाखूनों  पर   हमको   अभिमान  हुआ  है ||

अब   विश्वास  विषैला  होकर,  बन विश्वास-घात मिलता है,
मानव   मन   ही,  मानवता के  भावों से अनजान हुआ है ||

धरती,  अम्बर   और   सागर   का   बंटवारा   करते - करते,
हवस  स्वार्थ  का  बढा और मन चिंतन से वीरान हुआ है ||

भूल  गए  कर्त्तव्य  आज  हम,  कुल   का   गौरव  बनने  का,
वो   संतान  बने  हम  जिनसे हर माँ का अपमान हुआ है || 



                        रचनाकार - अभय दीपराज





मंगलवार, 15 मार्च 2011

Abhay Kant Jha Deepraaj ke hindi Ghazal -

                         ग़ज़ल

मैं एक विद्रोही इन्सां हूँ क्योंकि मैं कमज़ोर नहीं हूँ |
ज्वाला है मेरी आँखों मैं क्योंकि मैं कोई चोर नहीं हूँ ||

मैंने जो  भी  कड़वा  मीठा  देखा  भोगा  कह डाला,
क्योंकि मैं एक जिंदा इन्सां हूँ कोई मुर्दा दौर नहीं हूँ ||

मैंने  ये  शिक्षा  पाई  है  सिद्धांतों  के  लिए  जिओ,
जो  बसंत  को  बहलाने को नाचे मैं वो मोर नहीं हूँ ||

मुझे  पाप  के  झंझावातों  से  टकराना  भाता  है,
आंधी-पानी जिसे मिटा दे मैं वो दुर्बल बौर नहीं हूँ ||

जब भी और जहाँ भी मुझको सच और न्याय पुकारेगा,
मुझे वहीँ पर पाओगे तुम क्योंकि मैं रणछोड़ नहीं हूँ ||

ईश्वर  जितनी  मुझे  रौशनी  देगा, मैं  सबमें  बांटूंगा,
कोई छाया जिस प्रकाश को ढक ले मैं वो भोर नहीं हूँ ||


                          रचनाकार - अभय दीपराज

सोमवार, 14 मार्च 2011

Abhay Kant Jha Deepraaj ke Maithilee GHazal -


                        ग़ज़ल 

कहू कोना ? जे, आम आदमी
बनि कय की - की भोगलौं हम |
खून - खुनामह भेल करेजा, कोना - कोना क ? जोगलौं हम  || 



बड़  उल्लास  भेल  बचपन  में,  हम बड़ सुन्दर, काबिल छी,
गौरव  छल  जे -  बाबू - बौआ  बनि,  कोरा  में  झुललौं हम ||

 
भेलौं  किशोर,  मोंन  बड़  हुलसल,  मुट्ठी  में संसार छलय,
धरती  सँ  आकाश  लोक  धरि,  लहरेलौं  और  बुललौं  हम ||

 
जखन  वयस्क  भेलौं  और  आयल कंधा पर दुनिया के भार,

यौवन  के  गौरव  में  डूबल,  अपन  शक्ति  के  खोजलौं हम ||
 
देश - समाजक  और  कुटुम्बक,  अनुभव  के  क
ड़वाहट में,
बेर - बेर  बनि कय अभिमन्यु ,  चक्र - व्यूह में फँसलौं  हम ||


जाहि घडी तक आन लोक सब दुश्मन छल, मदमस्त छलौं,
बज्र माथ पर बजरल लेकिन,  ओकरो सहि कय बचलौं  हम ||

 
अपन  खून  सँ  चोट जे लागल,  सब बुद्धि - बल बिसरायल,
सुनल  बात  छल  एक  बेर  के,  लाख  बेर  पर  मरलौं  हम ||

 
जीवन  सच  में  बड़  भारी  छल,  आदर्शक पथ और कठिन,
राम - नाम  अवलंब  रहल  त,  कुहरि -
कुहरि कटलौं हम ||


                    रचनाकार - अभय दीपराज

Hindi Ghazal - By Abhay Deepraaj

                            ग़ज़ल

आज  शान  से  इस  दुनिया  में, खोटा सिक्का ही चलता है |
आस्तीन  का  साँप  यहाँ  जो  बन  ले,  दुनिया में पलता है ||

गलत मुकद्दमा हो तो प्यारे, एक मिनिट में निपट जाएगा,
सच  की  होंगी  सौ  तारीखें,  यहाँ   फैसला   यूँ   टलता   है ||

बाग़  सुगन्धित  मीठे  फल  के,  सड़ा खाद पाकर फलते है,
साफ़-सफाई  से  तो  प्यारे,  बाग़  सूखता  और  जलता  है ||

क्या राजा, क्या प्रजा, सभी को, प्यार यहाँ है अपने हित से,
जो  मूरख  परहित की सोचे, व्यर्थ झुलसता और गलता है ||

दानव  जीते  यहाँ  शान  से,  मानवता  है  विकृति - गरीबी,
सीधा - सच्चा  बनकर  जीना,  दुनिया में सबको खलता है ||

स्त्रोत  प्यार  के  सूख  गए  है,  फूल  यहाँ  मसले  जाते  है,
आज  ज़माना  उसका  है  जो  पत्थर  बनकर के घलता है ||


दर्द  बना  जीवन  मानव  का,  आँसू  हैं  उसकी  आँखों  में,
युग  ने  ऐसी करवट ली है, कण-कण मानव को छलता है ||


                         रचनाकार - अभय दीपराज

रविवार, 27 फ़रवरी 2011

अभय कान्त झा दीपराज कृत - चक्रधर स्तुति

  









               चक्रधर स्तुति

राम बन कब ? आओगे, प्रभु कृष्ण बन कब ? आओगे |
अपने  भक्तों को भला प्रभु ,  कब  तलक ?  तरसाओगे ||

दस नहीं प्रभु ,  अनगिनत  हैं ,  शीश,  रावण  के  यहाँ |
कंस   भी   प्रभु  अनगिनत  हैं,  दृष्टि  जाती   है   जहाँ ||
क्षीर - सागर,   शेष - शैय्या,  छोड़ प्रभु कब ?  धाओगे |
अपने  भक्तों को भला प्रभु ,  कब  तलक ?  तरसाओगे ||१ ||

हर   तरफ   अंधेर   और   अन्याय   का   शासन  हुआ |
धर्म,    रानी   द्रोपदी    और    पाप,   दुःशासन   हुआ ||
चीर बन तुम दीन को प्रभु , फिर न क्या ? अपनाओगे |
राम बन कब ? आओगे, प्रभु कृष्ण बन कब ? आओगे ||२ ||

धेनु  -  धरती   और   गंगा,   कष्ट   से   सब   त्रस्त  हैं |
दुर्जनों   के   ज़ुल्म   से   प्रभु ,   भक्त   तेरे   पस्त   हैं ||
बन के सावन की घटा क्या ?  प्रभु न इन  पर छाओगे | 
अपने  भक्तों को भला प्रभु ,  कब  तलक ?  तरसाओगे || ३ ||

जिस  प्रकृति  के  और  कृति  के,  आप प्रभु आधार हों |
दुर्दशा  क्यों  उसकी ?   जिसके   आप   पालनहार  हों ||
क्या ?  हमें  प्रभु  गोद  में,  लेकर  न फिर समझाओगे |    
राम बन कब ? आओगे, प्रभु कृष्ण बन कब ? आओगे ||४ ||

चक्रधर,  फिर  चक्र  लेकर  आओ  प्रभु ,  अवतार  लो |
धर्म   की   रक्षा   करो   प्रभु ,   पाप   को   संहार   लो ||
वर्ना ,   कैसे ?   नाथ,   दीनानाथ,   तुम   कहलाओगे |
अपने  भक्तों को भला प्रभु ,  कब  तलक ?  तरसाओगे ||५ ||


राम बन कब ? आओगे, प्रभु कृष्ण बन कब ? आओगे |

अपने  भक्तों को भला प्रभु ,  कब  तलक ?  तरसाओगे ||


                रचनाकार - अभय दीपराज

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

अभय कान्त झा दीपराज के मैथिली गीत

अभय कान्त झा दीपराज के मैथिली गीत क्रमांक-

                भगवती के गीत
 
अवलम्ब  अहीं  हे  जगदम्बा,  माँ,  संतानक   दुःख  दूर    करू |
बल,  बुद्धि,  विवेक,  ज्ञान  और धन  सँ  कोष हमर भरपूर करू ||

अहाँ माता छी, हम शिशु अबोध, नहीं कोप अहाँ के, सहि पायब |
जौं   कष्ट   सतओत   मोन   हमर,   माँ,   अहीं   के   गोहरायब ||
रक्षक   बनि   रक्षा   करू   हमर,   नहिं   ऐना   कष्ट  सँ चूर करू |
अवलम्ब  अहीं   हे  जगदम्बा,  माँ,  संतानक   दुःख   दूर   करू ||१ ||

बनि   बेटी   आँगन   में   खेलाउ, बनि  पुत्र  बनू  कुल  के गौरव |
जों   हाथ   अहाँ   के   माथ   रहत, संसार   व्यूह  के  हम तोड़व ||
माता  बनि  क  हे  जगजननी, जीवन   में   सौम्य - सुरूर   भरू |
बल,  बुद्धि,  विवेक,  ज्ञान  और   धन  सँ  कोष हमर भरपूर करू ||२ ||

कर्त्तव्य   धर्म   निर्वाह   करी, बनि   पुत्र   अहाँ   के   चरण  गही |
छाया   में   अहीं   के  जीवन - धन  के  भोगी, अहींक शरण रही ||
एहि  तरहक  सौम्य  स्वभाव दिअ, अभिमान  सँ  ने मगरूर करू |
अवलम्ब   अहीं   हे  जगदम्बा,  माँ,  संतानक   दुःख   दूर   करू ||३ ||

संकट   सँ   हमर   उबार   करू,   दुर्गा    बनि   हमरो   दुर्ग   बनूँ |
जग के  अहाँ कारण - तारण  छी, अहीं नाव  के  अब पतवार बनूँ ||
अब  द्वार  कतय  हम  जाई  जतय, अहीं  हमरा  अब  मंजूर  करू |
बल,  बुद्धि,  विवेक,  ज्ञान   और   धन  सँ  कोष  हमर भरपूर करू ||४ ||

हम  थाकि  गेलौं, भटकैत- भटकैत,  जग के जंजाल - जाल में माँ |
नहिं   कोनो   साथी, संबंधी   अछि, हमर  अब  एहि हाल में, माँ ||
बड़  कष्ट  उठोलौं   हे  अम्बा, बस , और   ने   अब  मजबूर   करू |
अवलम्ब  अहीं   हे  जगदम्बा,  माँ,  संतानक   दुःख    दूर   करू ||५ ||

अवलम्ब  अहीं  हे जगदम्बा,  माँ,  संतानक   दुःख   दूर   करू |
बल,  बुद्धि,  विवेक,  ज्ञान  और धन  सँ  कोष हमर भरपूर करू ||



                       रचनाकार - अभय दीपराज
 

शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

अभय कान्त झा दीपराज कृत - प्रार्थना

                        प्रार्थना


मैं   विवेक  के  गंगा  जल से,  सारे जग  का  मल  धोऊँ |
हे प्रभु  मुझको  शक्ति  दे, मैं जग का स्वर्णिम कल होऊँ ||

प्रभु ,  मेरे  इस  तन  और मन से,  सारे  पाप  हटा दे  तू |
और  राहों  से  अन्धकार  को बनकर ज्योति मिटा दे  तू ||
जिस जग ने  रचना  की मेरी,  उस  पर  न्योछावर   होऊँ |
हे प्रभु मुझको शक्ति दे, मैं जगका  स्वर्णिम  कल होऊँ ||१  

बनूँ  पुण्य  का  प्रहरी  और  इस जग से पाप मिटा दूँ मैं |
दीनों  और   दुखियों   के   आँसू , पर  सर्वस्व लुटा दूँ मैं ||
दानवता  को  थर्रा   दूँ   मैं,   जब   जागूँ ,  चंचल  होऊँ |
मैं  विवेक  के  गंगाजल से, सारे  जग   का  मल  धोऊँ || २

प्रभु  मुझको  बल बुद्धि धैर्य का तू  अनुपम  सागर  कर दे |
पी  सकूँ   हलाहल  और  अमृत  उगलूँ  ऐसी गागर कर दे||
अभिमान नहो कुछ पाने का, हो गौरव जब खुदको खोऊँ|| 
हे  प्रभु  मुझको  शक्ति  दे, मैं जगका स्वर्णिम  कल होऊँ || ३||

दानवता को जीत सकूँ  मैं,  मानवता  का  मान  बढ़ा कर|
जग  को  मैं  आदर्श  बना  दूँ , सिद्धांतों का पाठ पढ़ा कर ||  
लक्ष्य न जबतक पालूँ अपना, थक कर कभी न मैंसोऊँ |
हे प्रभु  मुझको  शक्ति  दे, मैं जग का स्वर्णिम कल होऊँ|| ४||

चक्र मुझे प्रभु  दे अपना  तू ,  बस  कर  इस  अंतर्मन  में |
धर्म, न्याय,  सुख की वर्षा मैं कर दूँ  जग  के  आँगन  में||
फसल,  शांति  और  समृद्धि  की  प्रभु,  सारे जग में बोऊँ |
हे प्रभु  मुझको शक्ति दे, मैं जग का स्वर्णिम  कल होऊँ||५

मैं  विवेक  के  गंगा  जल से,  सारे जग  का  मल  धोऊँ |
हे  प्रभु  मुझको शक्ति  दे, मैं जग का स्वर्णिम कल होऊँ||
 
                रचनाकार - अभय दीपराज 


बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

भगवती के गीत (By Abhay Deepraaj)


अभय कान्त झा दीपराज के मैथिली गीत

               भगवती के गीत

जय  माँ  अम्बे ,  जय  जगदम्बे , हमरा  पर  उपकार  करू |
हम  बालक  भटकल - बौआयल  ,  जीवन  के  उद्धार  करू ||

हम   कामी ,  लोलुप   और   पापी ,  अपराधी   संसार   के |
शरण   अहाँ   के   अयलों   माता   आशा  ल  क   प्यार  के ||
चाहे   दण्डित    करू   हे  जननी ,  चाहे   बेड़ा   पार   करू |
जय  माँ  अम्बे ,  जय  जगदम्बे ,  हमरा  पर  उपकार  करू || १ 

माता  अंश  अहीं  के  हम सब  , अहीं  क  रूप  अनेक अछि |
हम   कपूत त दोष  अहीं  के ,  अहीं  क  देल  विवेक अछि ||
अब   चाहे   अहाँ   करू   तामश  ,  चाहे   हमरा  प्यार  करू |
हम  बालक  भटकल  -  बौआयल  , जीवन  के  उद्धार   करू || २

नेहक  आशा  ल   क   जननी ,  शरण  अहाँ   के  आयल  छी |
अहीं   उबारब त हम   उबरब  ,  अहीं   के  भटकायल   छी ||
अहीं   बनेलौं   मूरख    हमरा ,   अहीं    बुद्धि   आगार    करू |
जय   माँ  अम्बे ,  जय  जगदम्बे, हमरा  पर  उपकार  करू || ३ 

जग    में    हे     जगदम्बे     अहीं    स्नेहक     भण्डार    छी |
बुद्धि,  ज्ञान,  बल,  विद्या  के  अहाँ, सागर  छी ,   संसार   छी ||
हाथ   कृपा  के  राखि  माथ   पर , हमरो   नीक   कपार  करू |
हम   बालक   भटकल - बौआयल , जीवन  के  उद्धार  करू  || ४

स्वस्थ,  सुखी,  संपन्न,  धर्म - युत  जीवन  के  आशीष  दिअ |
परमारथ और पर सेवा में झुकल रहय ओ रहय ओ शीश दिअ||
बसि  क   हमर  आत्मा  में   माँ ,  पापक  अहाँ   संहार   करू |
जय  माँ  अम्बे, जय   जगदम्बे, हमरा   पर   उपकार  करू ||५ || 

                         रचनाकार - अभय दीपराज