यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करने का मुख्य मंत्र "ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं..." है। यह मंत्र शरीर को पवित्रता, बल और तेज प्रदान करने के लिए जनेऊ धारण करते समय पढ़ा जाता है। यह एक पवित्र सूत्र है, जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक के रूप में धारण किया जाता है।
यज्ञोपवीत मंत्र:
ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥
हिंदी अर्थ:
यज्ञोपवीत अत्यंत पवित्र है, जिसे प्रजापति (ईश्वर) ने स्वाभाविक रूप से सबसे पहले स्थापित किया था। यह आयु को बढ़ाने वाला, अग्रगण्य (श्रेष्ठ), शुभ्र (स्वच्छ) और पवित्र करने वाला है। हे यज्ञोपवीत, मुझमें बल (शक्ति) और तेज (ऊर्जा) प्रदान करो।
धारण करने की प्रक्रिया (संक्षेप में):
बाय कंधे के ऊपर से और दाएँ हाथ के नीचे से जनेऊ धारण किया जाता है।
इस प्रक्रिया के दौरान ऊपर दिए गए मंत्र का उच्चारण किया जाता है।
पुरानी जनेऊ उतारने का मंत्र:
ॐ यज्ञोपवीतं पुराणं जरजरं कश्यपोद्भवम्।
त्यजामि ब्रह्मनिर्मितं नित्यं सात्त्वगुणात्मकम्॥
अर्थ: मैं इस पुराने और जर्जर यज्ञोपवीत को त्याग करता हूँ।
यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार, जिसे उपनयन संस्कार भी कहते हैं, हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार है, जो बालक को ज्ञान, अनुशासन और द्विज (दूसरा जन्म) के रूप में प्रतिष्ठित करता है। यह अनुष्ठान ब्राह्मण (8 वर्ष), क्षत्रिय (11 वर्ष) और वैश्य (12 वर्ष) के लिए होता है, जिसमें गुरु गायत्री मंत्र की दीक्षा देते हैं।
यज्ञोपवीत संस्कार के प्रमुख बिंदु:
अर्थ और महत्व: 'उपनयन' का अर्थ है 'गुरु या ज्ञान के समीप ले जाना'। यह पवित्र धागा धारण करने के बाद ही बालक को वेदों और विद्या के अध्ययन का अधिकार मिलता था, जिससे उसे 'द्विज' यानी दूसरा जन्म मिला माना जाता है।
तीन सूत्र: जनेऊ में तीन धागे होते हैं, जो ऋषि ऋण, देव ऋण और पितृ ऋण के प्रतीक हैं, जिन्हें धारण करके मनुष्य अपने कर्तव्यों का स्मरण रखता है।
विधि: यह संस्कार एक विद्वान पंडित द्वारा किया जाता है। इसमें मुंडन, गणेश पूजन, हवन, और गायत्री मंत्र का उपदेश मुख्य हैं। जनेऊ को बाएं कंधे के ऊपर और दाईं बांह के नीचे धारण किया जाता है।
उद्देश्य: इस संस्कार के बाद बालक को ब्रह्मचर्य का पालन करना होता था और यह नैतिक जीवन, विद्या अध्ययन व आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है।
परंपरा: यह प्राचीन काल से चली आ रही एक महत्त्वपूर्ण परंपरा है, जो अब सामान्यतः विवाह के पूर्व या कम उम्र में की जाती है।
यह संस्कार व्यक्ति को अनुशासन, जिम्मेदारी और सात्विक जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है, जो सनातन संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है।



