ॐ यज्ञोपवीत धारण एवं विसर्जन: मंत्र, विधि आ महत्व
सनातन धर्म में १६ संस्कारक वर्णन भेटैत अछि, जकरा में 'उपनयन' यानी 'यज्ञोपवीत संस्कार' कए अत्यंत पवित्र आ अनिवार्य मानल गेल अछि। यज्ञोपवीत केवल सूतक ताग मात्र नहि अछि, बल्कि ई ज्ञान, कर्म, आ उपासना कए प्रतीक थिक। शास्त्रक अनुसार, वैदिक रीतिक संग यज्ञोपवीत धारण कएला सँ मनुष्य कए नव जन्म (द्विजत्व) भेटैत अछि।
आजुक एही आलेख में हम सब जानब वाजसनेयी आ छन्दोग पद्धति कए अनुसार यज्ञोपवीत धारण करबाक मंत्र, ओकर विधि, आ प्राचीन जनेऊ विसर्जन मंत्र कए बारे में।
यज्ञोपवीत धारण मंत्र
जनेऊ धारण करबाक काल अपन-अपन शाखा (वाजसनेयी वा छन्दोग) कए अनुसार मंत्रक जप करबाक विधान अछि।
वाजसनेयी पद्धति कए यज्ञोपवीत मंत्र
ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।
छन्दोग पद्धति कए यज्ञोपवीत मंत्र
ॐ यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वोपवीतेनोपनह्यामि।
यज्ञोपवीत धारणक शास्त्रीय विधि
जनेऊ बदलबाक समय वा धारण करबाक काल सर्वप्रथम अहि मंत्र सँ संकल्प कs विनियोग कएल जाइत अछि:
विनियोगः
प्रजापतिऋषिर्गायत्रीछन्दो विश्वदेवा देवता यज्ञोपवीत परिधाने विनियोगः।
मंत्र: ॐ यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्यत्वापवीते नोपनह्यामि।।
अभिमंत्रित करबाक विशेष विधि:
ऊपरोक्त मंत्र सँ अभिमंत्रित कएलाक पश्चात, हाथ में जल लs कs यज्ञोपवीत कए दुनू हाथक मध्य (बीच में) राखि, गायत्री आ सावित्री मंत्र सँ मंत्रित कए लेबाक चाही।
गायत्री मंत्र:
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॐ
सावित्री मंत्र:
ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः, ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम्। ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॐ आपो ज्योतिरसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम्।
नियम: एही दुनू मंत्र कए तीन-तीन बेर पढ़ि कs शुद्ध मन सँ जनेऊ धारण करी।
. प्राचीन यज्ञोपवीत विसर्जन मंत्र
जखन जनेऊ पुरान (जीर्ण) भऽ जाए, टूटि जाए वा सूतक-पातक कए बाद ओकरा बदलबाक हो, तखन पुरना जनेऊ कए उतारबाक काल एही मंत्रक जप कएल जाइत अछि:
यज्ञोपवीतं यदि जीर्णवन्तं विद्यादिवेद्यं परब्रह्मतत्त्वम्।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं विसृजन्तु तेजः।।
चारू युग में यज्ञोपवीत कए स्वरूप
शास्त्रक अनुसार, समय (युग) कए संग यज्ञोपवीत कए धातु आ स्वरूप में परिवर्तन भेल अछि, जकर वर्णन एही श्लोक में अछि:
कृते पद्ममयं सूत्रं त्रेतायां कनकोद्भवम्।
द्वापरे रजतं प्रोक्तं कलौ कार्प्पाससम्भवम्।।
सतयुग (कृतयुग): कमल के डंटी कए सूत सँ बनल यज्ञोपवीत।
त्रेतायुग: सोनाक (कनकोद्भवम्) यज्ञोपवीत।
द्वापरयुग: चांदीक (रजतं) यज्ञोपवीत।
कलियुग: कपासीक सूत (कार्प्पाससम्भवम्) सँ बनल यज्ञोपवीत।
निष्कर्ष
यज्ञोपवीत धारण कएनाइ केवल धार्मिक कर्मकांड नहि, बल्कि ई स्वास्थ्य, सदाचार आ अनुशासित जीवनक आधार थिक। मिथिलांचल आ सनातन संस्कृतिक ई अनमोल धरोहर हमरा सब कए संस्कारवान बनबैत अछि। आशा अछि जे ई मंत्र आ विधि अहाँक दैनिक पूजा-पाठ आ संस्कारक संवर्द्धन में सहायक सिद्ध हैत।
जय मिथिला,
अहि आलेख में शास्त्रीय आ पारंपरिक मान्यता आदि कए संकलन कएल गेल अछि। जँ अहाँ लोकनि कए कतहु कोनो त्रुटि बुझाय वा अहि विषय पर कोनो तर्कसंगत सुझाव हो, तँ कमेंट बॉक्स में अपन विचार अवश्य साझा करी ताकि एकरा आओर समृद्ध कएल जा सके।"




