dahej mukt mithila

(एकमात्र संकल्‍प ध्‍यान मे-मिथिला राज्‍य हो संविधान मे) अप्पन गाम घरक ढंग ,अप्पन रहन - सहन के संग,अप्पन गाम-अप्पन बात में अपनेक सब के स्वागत अछि!अपन गाम -अपन घरअप्पन ज्ञान आ अप्पन संस्कारक सँग किछु कहबाक एकटा छोटछिन प्रयास अछि! हरेक मिथिला वाशी ईहा कहैत अछि... छी मैथिल मिथिला करे शंतान, जत्य रही ओ छी मिथिले धाम, याद रखु बस अप्पन गाम - अप्पन बात ,अप्पन मान " जय मैथिल जय मिथिला धाम" "स्वर्ग सं सुन्दर अपन गाम" E-mail: apangaamghar@gmail.com,madankumarthakur@gmail.com mo-9312460150

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रविवार, 5 फ़रवरी 2012

माछ आ मिथिला




माछ, माछ, माछ! मिथिलाके माछो महान्‌!
मिथिला महान्‌ - मिथिला महिमा महान्‌,
माछो महान्‌ - मखान आ पानो महान्‌,
माछ..माछ..माछ! मिथिलाके माछो महान्‌!

इचना के झोरमें ललका मेर्चाइ,
मारा के झोरमें सुरसुर मेर्चाइ,
चाहे जलखैय या हो खाना... होऽऽऽ!
छूटबैय सर्दी जहान! :)
माछ, माछ, माछ...
मिथिलाके माछो महान्‌!

गैंचाके काँटो बीचहि टा में,
नेनी के काँटो सगरो पसरल,
सदिखन काँटो कऽ के निकालय... होऽऽऽ!
स्वादमें सभटा महान!
माछ, माछ, माछ,
मिथिलाके माछो महान्‌!

आउ चलू देखी पोखैर में मच्छड़...
आइ निकलतै भून्नो के पच्चड़...
रौह, भाकुर, नेनी कऽ के पूछतैय... होऽऽऽ...
महाजाल फंसतय सभ माछ...
माछ..माछ.. माछ..
मिथिलाके माछो महान्‌!

बंसीमें देखू पोठी बरसय,
गरचुन्नी आ सरबचबा फंसय,
बड़का बंसीमें आँटाके बोर यौ... होऽऽ
से फंसबैय रौह माछ,
माछ..माछ..माछ...
मिथिलाके माछो महान्‌!

जतय माछ होइ लोक ततय हुलकल
माछ हाट के रूप रहय लहकल
एम्हर तौलह ओम्हर तौलह ... होऽऽऽ
सरिसो रैंची संग जान...
माछ, माछ, माछ,
मिथिलाके माछो महान्‌!

मिथिलाके पोखैर कादो भोजन
ताहि माछो के सुधरल जीवन
खायवाला सभ पेटहि पाछू ... होऽऽऽऽ
काजक बेर उड़य प्राण...
माछ, माछ, माछ...
मिथिलाके माछो महान्‌!

सुरसुर काका के माछक मुड़ा...
प्रभुजी काका के पेटीके हुड़ा...
सभमिलि बैसल चूसि-चूसि मारैथ होऽऽ
सगरो माछ के मजान...
माछ, माछ, माछ...
मिथिलाके माछो महान्‌!

प्रयागमें छैक मैथिल पंडा
सभ के अपन-अपन धंधा
पहिचान वास्ते होइछै जे झंडा... होऽऽ
ताहू में छै मिथिला माछ...
माछ, माछ, माछ,
मिथिलाके माछो महान्‌!

गोलही काँटी छही आ सुहा
सिंघी मांगूर बामी टेंगरा
जानि हेरायल कतय ई मिथिला.. होऽऽ
आन्ध्रा के भेलय तूफान...
माछ, माछ, माछ...
मिथिलाके माछो महान्‌!

हरिः हरः!
रचना:-
प्रवीन नारायण चौधरी

शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

तोरा बिन सब सून!


तोरा बिन सब सून!

ऊपर निला अम्बर, आइ कारी तों बनि जो!
घुमि-घुमि पूरा दुनिया तों एतय बरिस जो!!

ऐ जोड़ा बरद नव फार लागल हरो जोति जो!
अंघौश-मंघौश फेंकि खेत में तों चौकियो चलो!

गे अनमोलिया! गामवाली बारी सँ बिहैनो अनो!
संगमें दुइ-चारि बोनिहरनी के रोपनी लेल बजो!

रोपे मोंन सँ मिलि गाबि-गाबि जे शीश बड़ फरो!
हर अन्नमें जीवन धनके ईश आशीष कूटि भरो!

गेल दिन दस तँ आबि फेरो खेतो कमो - कमठो!
अर्जाल-खर्जाल सँ खेत भरत तऽ अन्न कि फरो!

प्रिय मेघा तों बस समय-समय एतबी के बरसो!
जे धान हमर खेतक लहरय हरियाली से चमको!

हे शीतल शीत तों शीशमें शशि-अमृत रसके भरो!
जे चरित मोरा तोरा मीत सन दुनिया के सुधरो!

रवि दिन-दिन बल ज्योति सँ शक्ति शुभ रंग भरो!
निज नयन जुड़य इ हेरि-हेरि हरियर हरि हर करो!

हेमन्त आबि के आश धरी स्वच्छन्द नभमें तरो!
गम-गम गमकय उमंग सँ बस एहने आश बंधो!

जौँ तोँ नहि तऽ हम कि - कि दुनिया वा किछुओ!
बस तोरहि सँ सभ जीव अछि आ जान भी जियो!

बिन कृषि कोनो नहि काज के सुर ताल बने कहियो!
भले आन किछु के बाद में समुचित दरकार बनो!

हरिः हरः!

रचना:-
प्रवीन नारायण चौधरी

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

माथ झुकेने बाप ठाड़्ह छथि बेवश आ लाचार...

माथ झुकेने बाप ठाड़्ह छथि बेवश आ लाचार
माँगि रहल अछि बेटीके ससूर होण्डा सिटी कार
नगद सेहो देब संगहि ओकर देब अहाँ जेवरात
लऽ जायब नहि तऽ वापस अपनेक घरसँ बरियात!

पिता कहै छथि सुनू समधीजी, बुझू हमर हालात
सुन्दर अछि बेटी हमर, सुन्दर ओकर खयालात
घरके स्वर्ग बना के राखत खूब करत ओ सेवा
घरमें लक्ष्मी सदिखन बसती धन के भेटत मेवा!

गृहस्थीके समान में देब छै जै सब चीजक दरकार
नहि दय सकबै अपनेकेँ एखन होण्डा सिटी कार!

ससूर कहै छथि बियाहे तखन करब अछि बेकार
हमरा चाही हर हालतमें बियाह में एकटा कार!

तखनहि अन्दर सँ बेटी अपन बाप सँ कहय लगली
नहि भरियौ पूज्य पिताजी एहि भिखारी के झोली!
कतेक देबैक कहिया देबैक इ छथि भिखारी पक्के
दैत-दैत हाइरियो जायब एक दिन अहुँ थाइक के!
नहि करबैक बियाह एतय बरु करबै पूरा पढाई
कतेको लड़की जे पैढ के किस्मत अपन बनौली!
ठाड़्ह होयब पैरो पर अप्पन तखनहि करबै बियाह!
बिना बनल आत्मनिर्भर बियाह करब माने बर्बाद!

"दहेज़ मुक्त के लेल एक टा छोट कोसीसी
दहेज़ मुक्त मिथिला परिवार"
चन्दन झा "राधे"

गुरुवार, 26 जनवरी 2012

॥ वाणीकेँ बूझू महत्व ॥

वसंत पंचमी पर विशेष
॥ वाणीकेँ बूझू महत्व ॥
वाग्देवी सरस्वती माए वाणी , विद्या ,
ज्ञान-विज्ञान एवं कला-कौशल आदिकेँ
अधिष्ठात्री मानल जायत छथि । ई प्रतीक
छथि मानवमे निहित ओहेन चैतन्य केँ , जे मानुष्यकेँ
अंधकार सँ ज्ञान रूपी प्रकाश दिश अग्रसर
करबैयत छथि ।
सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेदमे सरस्वतीकेँ दू
रूपक दर्शन होइत अछि - प्रथम वाग्देवी आओर
द्वितीय सरस्वती । हिनका वुद्धि सँ सम्पन्न ,
प्रेरणादायिनी आ प्रतिभाकेँ तेज करय
वाली शक्ति कहल गेल अछि । ऋग्वेद संहिताकेँ
सूक्त संख्या 8/100 मे वाग्देवीक महिमा केँ
वर्णन अछि । ऋग्वेद संहिताकेँ दशम मंडलकेँ
125म सूक्त पूर्णतया वाक्(वाणी)केँ समर्पित
अछि । एहि सूक्तकेँ आठ ऋचाकेँ माध्यम सँ स्वयं
वाक्शक्ति अपन सामर्थ्य , प्रभाव , सर्वव्यपकता आओर महत्ताकेँ उद्घोष करैय छथि ।
@वाणीकेँ महत्व :-
बृहदारण्य उपनिषदमे राजा जनक महर्षि याज्ञवल्क्य सँ पूछैत छथि - जखन सूर्य
डूबि जाइत अछि , चन्दमाकेँ चाँदनी नहि रहैत
अछि आ आगि सेहो मिझा जायत अछि , एहन समय
मनुष्यकेँ प्रकाश देय वाली वस्तु की अछि ???
ऋषि उत्तर दैय छथि - ओ "वाक्(वाणी)"केँ
अधिष्ठात्री भगवती सरस्वती छथि । तखन वाक्
मानवकेँ प्रकाश दैयत अछि । मानवकेँ लेल परम
उपयोगी मार्ग देखाबैय वाली शक्ति "वाक
(वाणी)"केँ अधिष्ठात्री छथि भगवती सरस्वती । छांदोग्य उपनिष्दकेँ अनुसार , जौँ वाणीकेँ अस्तित्व
नहि रहैत तँ नीक-बेजायकेँ ज्ञान नहि होयत ,
सत्य-असत्यक ज्ञान नहि होयत अछि , सहृदय-
निष्ठुरमे भेदक पता नहि चलैत अछि । तैँ वाक्(वाणी)केँ उपासना करू । ज्ञानक एकमात्र अधिष्ठान वाक् अछि । प्राचीन
कालमे वेदादि समस्त शास्त्र कंठस्थ कयल जाइत
छल । गुरू द्वारा शिष्य सभकेँ शास्त्रक ज्ञान
वाणीक माध्यम सँ भेटैत छल । शिष्य सभकेँ गुरूमंत्र
वाणी माध्यम सँ भेटैत छल ।
वाग्देवी सरस्वती केँ आराधनाक प्रसांगिकता आधुनिक युगमे सेहो अछि । मोबाइल द्वारा वाणी(ध्वनि) केँ संप्रेषण एक स्थान सँ
दोसर स्थान होइत अछि । ई ध्वनि-तरंग "नाद-
ब्रह्म"क रूप छी ।
@वसंत पंचमी छी वागीश्वरी जयंती :-
जी खाली रसास्वादनक माध्यम नहि , बल्कि वाग्देवी केँ सिंहासन सेहो छी । "देवी भागवत"क अनुसार वाणीकेँ अधिष्ठात्री सरस्वती देवीक अविर्भाव
श्रीकृष्णक जिह्वाकेँ अग्रभाग सँ भेल अछि ।
परमेश्वरकेँ जिह्वा सँ प्रकट भेल वाग्वेदी सरस्वती कहबैत छथि । अर्थात वैदिक कालक वाग्देवी बादमे सरस्वतीकेँ नाम सँ
प्रसिद्ध भेली । ग्रन्थ सभमे माघ शुक्ल पंचमी (वसंत पंचमी)केँ वाग्देवीकेँ प्रकट होयके तिथि मानल जायत अछि । एहि कारण वसंत
पंचमीकेँ दिन "वागेश्वरी जयंती" मनाइल जाइत
अछि , जे सरस्वती-पुजाकेँ नाम सँ प्रचलित अछि ।
@वाणीकेँ महत्ता पहचानु :-
वाग्देवीकेँ आराधनामे निहित आध्यात्मिक संदेश
अछि कि अपना सभ जे किछु बाजी , सोचि-समैझकेँ
बाजू । मधुर वाणी सँ शत्रुओ केँ मित्र बना सकैत
छी , जखन कि कटु वाणी अपनोकेँ आन बना दैत
अछि । वाणीक बाण जिह्वाकेँ कमान सँ
निकलि गेल , तँ फेर वापस नहि होइत अछि ।
एहि द्वारे वाणीक संयम आओर सदुपयोग
वाग्देवीकेँ प्रसत्र करैयकेँ मूलमंत्र अछि । जखन
व्यक्ति मौन होइत रहैत छथि , तखन वाग्देवी अंतरात्माकेँ आवाज
बनि सत्प्रेरणा दैयत छथि ।
जय माँ सरस्वती

कृष्णानन्द चौधरी

लगमा , दरभंगा ,

मिथिला , भारत

शनिवार, 3 दिसंबर 2011

------------गीत----------

आँखिमे चित्र हो मैथिलि केर,हृदयमे हो माटिक ममता
माएक सेवामे जीवन बितादी, अछि बस इएह एकता सिहन्ता!
अछि करेजाक टुकड़ी हमर ई तिरंगा
धमनीमें हिमालय आ शोणितमें गंगा
अछि हमर ऐस्वर्यक कोनो चाह नै
बाट चलिते विपत्तिक परवाह नै
हम टूटी जा सकैछी, हम झुकी ने सकब
तुफनोक भय सँ हम रुकी ने सकब
हमर संग-संग बहय उनचासो पवन
बंधी देने छि तें माथमे हम कफ़न
हम रही ने रही ई तिरंगा रहय
फेर वनबास ने होइन्ह रामक, फेर जंगलमे कानथी ने सीता
माएक सेवामे जीवन बितादी, अछि बस इएह एकटा सिहन्ता !
.कल्पनामे करोडों नदी आ नहरि
भावनामे हो लाखो समुन्द्रक लहरी
चिंतनमें उठैत अछि तेहने लहास
जेना हाथ होथि ओरने भगत आ सुभाष
माटी चमकैए माथपर जन्मभूमि केर
हमर कर्मभूमि केर, हमर धर्मभूमि केर
जतs खल -खल जनकिक आँगन हंसय
आ चकमक सावित्रिक कंगन करय
विण अपनही बजैब हम भारतीक मित्र
मरितो दम तक सजाएब हम मैथिलिक चित्र
गीतमे राखी क्रांतिक ज्वाला, सरगममें विजय केर भनिता
माएक सेवो जीवन बितादी, अछि बस इएह एकटा सिहन्ता!


सोमवार, 28 नवंबर 2011

-----कनियाँ बनाम बाबा-----


ओ अपन अथबल मायक कोढ़
आ आन्हर बापक करेज बेचिक'
बेसाह' चाहैत अछि
सनकल कनियाँक लेल
एक रत्ती मुस्की!

तें पितामहक पिताहम केर किनल
माटिक तर में गाडल
संचित पितारिया तमघैल
बेचिक' कीन' चाहैत अछि
अपन 'मैरिज डे' पर
कनियाँ के देबाक लेल उपहार
लाइफ टाइम सिम आ मोबाइल

आ ओम्हर खाट पर पड़ल
खोखिआइत वृध्द्र पितामह
ओहि तमघैल कें बन्हकी राखि
किन लेब' चाहैत छथि
एक डिब्बा च्यवनप्राश
आ' काटि लेब' चाहैत छथि
हाड़ कंपबैत
एही बेरुक जाड़!

----------गीत----------





की हिन्दू आ की मुसलमान
एके शोणित, एके परान
मिथिलाक माटी पर रहनिहार
बस, एक बात हम मानै छि !

मंदिर पूजा, मस्जिद पूजी
प्रार्थना करी आ नमाज पढ़ी
गीता पढ़ी ली आ कुरान पढ़ी
अल्लाह कही, सियाराम कही
पोथी अनेक अछि सूत्र एक
बस, एक मन्त्र हम जाने छि
हम मिथिला केर छि, मैथिल छि!

सभकें भेटइ रोजी-रोटी
आ सभहक वाणी कें आदर
सभहक चलबा ले बाट रहय
नहीं बाट रहय एत्ते पातर
हम सभ सिनेह केर भूखल छि
हम एतबही सभदिन माँगै छि
हम मिथिला केर छि, मैथिल छि!

हम मैथिल छि,हम भारत केर
भारतक करेजा केर टुकड़ी
देसक माला केर एक फूल
ई बात ने कहियो हम बिसरी
आजादी दशक, प्राण हमर
से सभ दिन सँ हम मानै छि
हम मिथिला केर छि, मैथिल छि!


-------निर्वासन-----


कत' रहब
आ कोना रहब
धरती-गगन
आकी चान पर रहब?

जंगलक झोंझ!
पहाड़क खोह!!
वसुन्धराक सोन्हि!!!
आकी समुन्द्रक लहरी में रहब?

सगरो सँ खेहारल जाएब
लुक्का सँ झरकाओल जाएब
बिढनी सँ बिन्हाओल जाएब
फत्रा में बझाओल जाएब
पिजरा में बैसाओल जाएब

पूछबै से किएक यौ भाई?
तं अहींक डीह-डाबराक
बीत भरी जमीन
हडपी लेबक लेल
वा आड़ी काटी-कटी
डसैत रहबाक लेल
दसो दिगंत में
दियाद-बाद बनिक'
ठाढ़ रहत दुर्योधन!


शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

---------------गजल---------------

हमर आँखीमें अछि, नोर भरि गामक
हमर आँखीमें अछि , मोर भरि गामक!

हमर आँखीमें कतेक रौदी आ दाही
हमर आँखीमें अछि,चोर भरि गामक !

हमर आँखीमें हमर पाग आ मुरेठा
हमर आँखीमें अछि,जोर भरि गामक !

हमर आँखीमें अछि, बेगरताक अन्हड़
हमर आँखीमें अछि,सोर भरि गमक !

हमर आँखीमें अछि रहरी बाबक गाछी
हमर आँखीमें अछि, नोर भरि गमक!



मंगलवार, 22 नवंबर 2011

------------------गजल---------------

चारिटा दोकान चाहक, हमर गामक चौक पर
भीड़ भरी मेल लोकक, हमर गामक चौक पर!

की मोहालीमे भेलै आ की श्रीलंकोमे भेलै
लोक डफा लए नाचैए, हमर गामक चौक पर!

हमर गामक लोक कें बुझल ने छै हालो अपन
टूटी गेलए इसकुल गामक, हमर गामक चौक पर !
हमर गामक लोक कें की भ' गलें, सोचै छि हम
खुजी गेलए दारुक भट्टी,
हमर गामक चौक पर!

चल गेल बसुदेवजी रामायणाक पद बाँची क'
आब महाभारत मचेए, हमर गामक चौक पर !

शनिवार, 19 नवंबर 2011

भूख:-


फुटपाथक कतमे पड़ल
छाओ मासक नेनाके
भूखसँ बेहाल पथियामे राखल आम दिस लपकैत देखि
कात करैत ओकर माय कहै अछि -

पियास लागल छह?
आनि देत छियह
चापाकल सऽ ठंढा पानि
भरि मोन पीबी लिहs
आ पिब हमहूँ
शान्त करब अपन लहरित पटकें
आ तोहर सेहो!

एक आमक दाम
बुझल छह तोरा?
नहि ने!
मात्र पाँच टाका आ महाजन सुदी
एक संझाक खोराक
आधा सेर मोटका चाऊरक दाम
चलह बना देत छियs मरसटका
ओहिमे तकियs बेटा!
मालदह आमक स्वाद!

मंगलवार, 15 नवंबर 2011

आएल पानी गेल पानी..

आएल पानी गेल पानीबाटही बिलाएल पानी
मेघक अछि खेल इ

लेनही पडायल पानी !


धरती पियाशल आ
धिपल आकाश अछि
बुत्रक बाजार लुटी
बाटही शुखायल पानी !

घास पात सरकैत
बारकैए खेत खेत
नदी नाला पोखरी में
लागाए हेराएल पानी!

धरती केर कोखी सोखी
कयलहूँ पटौनी
भाफ बनल उडल सकल
घर घर बटायल पानी !

गंगा आ यामुनके
भरल गदौस स
कोशिक किछेर तोड़ी
भागल छेकयल पानी !
आएल पानी गेल पानीबाटही बिलाएल पानी

रविवार, 13 नवंबर 2011

परिवर्तन.....

बर्तन बदलल बसन बदलल
सत्ता बदलल शासन बदलल
फुलचानक दोकान बदलल
पुआ आ पकबान बदलल..

पोखरिक घाट बदलल
गामक बाट बदलल
खरौआ जौरक खाट बदलल
गमैया हाट बदलल....

गीतनादक बहस बदलल
रमुआ मायक आस बदलल
गेना फुलक सुवास बदलल
कनुआ सन खवास बदलल....

ढोल बदलल पिपही बदलल
ठाओ बदलल पिरही बदलल
चुरा बदलल मुरही बदलल
उँच-नीच लग शिरही बदलल...

शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

अपन गाम

गाम अपन गाम अछि
पुरखा केर नाम अच्छी
कर्मभूमि माटी थिक
जनकिक धाम अच्छी //

गाम अपन गाम अछि
पाहून सन राम अछि
सीता जी बेटी छथी
सबहक़ प्रणाम अछि //

गाम अपन गाम अछि
भैया बलराम अछि
माधब केर राधा
प्रेम हिनकर दाम अच्छी //

गाम अपन गाम अछि
घरमे आराम अछि
गौरिकेर शंकर छथि
उगना बेदाम अछि //

गाम अपन गाम अछि
आम संग लातम अछि
लीची आर केराक संग
पान आ मखान अछि //