dahej mukt mithila

(एकमात्र संकल्‍प ध्‍यान मे-मिथिला राज्‍य हो संविधान मे) अप्पन गाम घरक ढंग ,अप्पन रहन - सहन के संग,अप्पन गाम-अप्पन बात में अपनेक सब के स्वागत अछि!अपन गाम -अपन घरअप्पन ज्ञान आ अप्पन संस्कारक सँग किछु कहबाक एकटा छोटछिन प्रयास अछि! हरेक मिथिला वाशी ईहा कहैत अछि... छी मैथिल मिथिला करे शंतान, जत्य रही ओ छी मिथिले धाम, याद रखु बस अप्पन गाम - अप्पन बात ,अप्पन मान " जय मैथिल जय मिथिला धाम" "स्वर्ग सं सुन्दर अपन गाम" E-mail: apangaamghar@gmail.com,madankumarthakur@gmail.com mo-9312460150

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बुधवार, 16 मई 2012

की हौऊ तों कमजोर भ गेलह

की हौऊ तों कमजोर भ गेलह 
नांगरी कटा क गाम बिसरलह
अप्पन भाषा आ ठाम बिसरलह
मिथिला के पहिचान बिसरलह
बैमानी पोरी पोर भ गेलह
की ............................................

तिलकोर के पाठ बिसरलह
मिथिला के ठाठ बाट बिसरलह
पेंट शर्ट आ हेट फेट में
धोती कुरता पाग बिसरलह
बिन मुद्दा के शोर भ गेलह
की.....................................
अनका लेल भरी दिन खटई  छः
बाल आ बच्चा किहरी कटयी छः
बाबु छोरी क मोम आ पोप बजय छः
तों सुनी सुनी क खूब नचय छः 
बिन बुझने तूं चोर भ गेलह
की ..........................................
कनिया मनिया जॉब करय छः
अपना पर पेटो नै भरय छः
अपने हाथे करम कुटय छः
बात बात में झगरी परई छः
एहन कोना धकलोल भ गेलह
की ..........................................
गामक शान के कतय नुकेलह
बिन सोचने सब किछ हेरेलह
बाप माय के कोना बिसरी क
अपन "आनंद" में घोर भ गेलह
की हउ.........................आनंद
एही रचना के किओ व्यक्ति अपना जीवन स नहीं जोरी इ मात्र एक टा रचना थीक| एही रचना के रचना कार आनंद झा हम स्वं छी | बिना पूछने एकर उयोग नहीं करी
जय मिथिला जय मैथिलि   

बुधवार, 9 मई 2012

हे मिथिला तूं कानय नै

हे मिथिला तूं कानय नै
जानय छी तोरा बड़ दुःख होई छौ
लेकिन नोर खासबय नै
हे मिथिला ...........................
हमहूँ तोहर कर्जदार छी
अपने कर्मे शर्मसार छी
भागी गेल छी गाम छोरी क
एबऊ तूं घबराबई नै
हे मिथिला.......................
याद अबैये खेत पथार
एतय बनल छी हम लाचार
पेट के खातिर भटैक रहल हम
लग किओ बैसाबई नै
हे मिथिला तूं .....................
तू त में छे दुःख के बुझ्बें
अप्पन कस्ट के तू नै कहबे
जनई छी तोहर ममता गे में
मिथिला में फेर बजाबई ने
हे मिथिला तूं कानय नै
रचनाकार आनंद झा ....

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

अपन महिष कुरहैरिये नाथब हम्मर अपने ताल

धरती के आकास कहब , आ अकास के पाताल
अपन महिष कुरहैरिये नाथब हम्मर अपने ताल
धरती .......................................................
चिबा चिबा क बात बजई छी, मिथिला हम्मर गाम
टांग घिचय में माहिर छी, बस हम्मर अतबे काम
तोरब दिल के सदिखन सबहक, पुइछी पुइछी क हाल
अपन महिष ......................................
आदि काल स लोक कहई ये , छी हम बड़ विद्वान
झूठक खेती खूब कराइ छी, झूठे के अभिमान 
दोसर के बुरबक बुझई छी, क के हाल बेहाल
अपन महिष .......................................
इक्कर गलती ओक्कर गलती, गलती टा हम तकाई 
एकरा उलहन ओकरा उलहन, जत्तेक हम सकई छी
भेटत फेर "आनंद" कोना क बनब अगर कंगाल
अपन महिष ....................................................

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

चल रइ बौआ गाम पर

चल रइ बौआ गाम पर 


चढलें किये लताम पर 
कहबय चल कक्का के जा क 
बैसल छथिन्ह दालान पर 
चल ....................................
उम्हर एमहर कत तकई छें
लताम छलय ये थुर्री
खूब खेलो घुरमौरी
कानक निचा थापर लगतऊ
नै त चलय ने ठाम पर
चल .........................
केहन बेदर्दी भेलें रउ छौंरा
पतों के तू झट्लें
अखनो धरी नै हटलें
देखही देखही भैय्या एल्खिन
मार्थुन छौंकी टांग पर
चल ...........................
लेखक

आनंद झा

एही रचना के कोनो ता भाग के उपयोग हमरा स बिना पूछने नै करी

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शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

हिला दही सौंसे दुनियां के, उखरल खुट्टा गैर क


बरका बरका बात करइ सब  ,छोटका के के पुछतयी
सब परेलई छोरी छारी क ,मिथिला ले के सोचतयी
सुन  रऊ बुआ सुन गे बुच्ची ,करही किछ विचैर क 
हिला दही सौंसे दुनियां के, उखरल  खुट्टा गैर क 
हिला दही सौंसे दुनियां के..................................
अपने पेट भरई के खातिर , नगरी नगरी भटकई छें   
मात्री भूमि के काज नै एलें, तहि दुआरे तरसय छें
अप्पन मिथिला राज्य बना ले, मिलतौ छप्पर फाड़ी क 
हिला दही सौंसे .....................................................
अपने भाय  के टांग जं  घिचबें, कोना क आगा बढ्बें रऊ
अनका खातिर खैधि खुनई छें, ओही खैधि में खसबें रऊ
कदम बढा तों हाथ मिला क चल ने फेर सम्हारी क 
हिला दही सौंसे ..................................................
मिथला में जं जनम लेलौं आ , काज एकर जं  नै एलौं 
जीवन सुख  पिपासा में, नै जानि कत हम फसी गेलौं 
देख इ दुनियां कोना बैसल छौ मिथिला के उजारी क 
हिला दही सौंसे ....................................................
जनक भूमि  सीता के धरती , कनई छौ कोना तरपी तरपी  
तू बैसल छे रइ बौरह्बा दोसर लेलकौ संस्कार  हरपी 
जाग युवा आ जागय बहिना , सोच नै तों उचारी क 
हिला दही सौसे .................................................
एम्हर उम्हर नै तों तकई  बस मिथिला के बात करइ
अप्पन भाषा मैथिलि भाषा जत जायी छें ओतय बजय
एक दिन "आनंद" के पेंबे मिथिला में तो जाय क 
हिला दही सौंसे ..........................आनंद ..................

   
इ रचना  आनंद झा द्वारा लिखल गेल अछि यदि अपने एकर कोनो ता अंश या पूरा कविता के उपयोग कराय चाही त बिना हरा स पूछने नै करी :