dahej mukt mithila

(एकमात्र संकल्‍प ध्‍यान मे-मिथिला राज्‍य हो संविधान मे) अप्पन गाम घरक ढंग ,अप्पन रहन - सहन के संग,अप्पन गाम-अप्पन बात में अपनेक सब के स्वागत अछि!अपन गाम -अपन घरअप्पन ज्ञान आ अप्पन संस्कारक सँग किछु कहबाक एकटा छोटछिन प्रयास अछि! हरेक मिथिला वाशी ईहा कहैत अछि... छी मैथिल मिथिला करे शंतान, जत्य रही ओ छी मिथिले धाम, याद रखु बस अप्पन गाम - अप्पन बात ,अप्पन मान " जय मैथिल जय मिथिला धाम" "स्वर्ग सं सुन्दर अपन गाम" E-mail: apangaamghar@gmail.com,madankumarthakur@gmail.com mo-9312460150

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सोमवार, 7 जनवरी 2013

गजल- भास्करानन्द झा भास्कर


गाम- घरमें बड्ड कहबैका, सबके नीक लगैया
बाप हुनक छैथ ज्ञानी- दानी बेटा भीख मंगैया

लोकक लागल भीड़ घरमें निजस्व प्रयोजन संगे
सबहक घर निर्माणमें लागल हुनकर चार कनैया

सखा सहोदर नोरे डुबल, दहि गेल सगरो घरारी
शीत बसातमें कठुआयल, मन मोने मोन मरैया

भेल निठल्ला दलाने बैसल, पैसल बूढबा बीमारी
परिवारक झरि बहैत नोर पर सगरो गाम हसैया

खरहीक टूटल टाट कात बिना पगहा मरल बरद
नाइदक सान्ही खाली देखीकए बरदो आब लड़ैया 

-------------------------- भास्करानन्द झा भास्कर

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

मिथिला गीत- भास्करान्द झा भास्कर




मिथिला सत्य साहित्यक भूमि, छी गीत संगीतक उर्वर भूमि
हे विद्या-बुद्धि सपन्न मैथिल ! मिथिला-सांस्कृतिक श्रॄंगार करु।

मिथिला ज्ञान विज्ञानक भूमि, छी सिद्ध साधकक तपो भूमि
हे गौतम, वशिष्ठ, कणाद सपूत ! प्रगति-पथ आविष्कार करु।

मिथिला नीति राजनीतिक भूमि, छी स्वच्छ सुनेतृत्वक भूमि
हे सहॄदय स्वच्छ मानस मैथिल ! सतत सामाजिक सुधार करु।

मिथिला आत्म अध्यात्मिक भूमि, छी अनुपम, मनोहर भूमि
हे गहन अध्ययनरत जनकपुत्र ! निरन्तर आर्थिक सुधार करु।

मिथिला अमिट संस्कारक भूमि, छी चिन्तित चिता पर भूमि
हे चीर निन्द्रामें सूतल मैथिल ! जागृत मानसिक विचार करु।

मिथिला अन्न धन-धान्यक भूमि, छी महापुरुषक कर्म भूमि
हे मरुभूमिमें लोटल मैथिल ! महत मातॄभूमि पर उपकार करु ।

मिथिला मंडन अयाचीक भूमि, छी वाचस्पति विद्यापतिक भूमि
हे बिसरल अवचेतन मैथिल ! निज मैथिली चेतना संचार करु ।

------------------------------------- भास्कर झा, दिसंबर 2012

मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

मिथिलाक नोर- भास्करानन्द झा भास्कर

हहरि हहरि कए कानथि मिथिला
नुका नुका कए खसाबथि दुख नोर
राइतक अन्हरियामें छै भुतलायल
सम्मान-किरण युक्त सूरजक भोर।

मिथिला- सोईरीक जनमल बच्चा
ठमकि ठमकि भ गेलै वो सियान
नगर-नगरमें बनाबैथ महल अटारी
अप्पन धरतीक नहिं कोनो धियान।

मिथिला-मैथिलीके बिसरैत नवपीढी
सुन्न- सुबैक रहल छै गामक गाम
पोसनाहरक नोरक छै के पोछनाहर
कलपि रहल अछि विद्यापतिक धाम।

------ भास्कर झा 11 दिसंबर 2012

शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

फ़ेसबुकिया पति (कविता)


केहन मनुखसं पड़िगेल पल्ला
सगरो भए गेल छुच्छे हल्ला !

फ़ेसबुक पर दिन भरि बैसल
धड़ खसौने वो असगर बैसल
घरमें भेल मुंह फ़ुल्ली-फ़ुल्ला
केहन मनुखसं पड़िगेल पल्ला
सगरो भए गेल छुच्छे हल्ला !

मुंह मोड़ि, सब काज छोड़ि,
दिनचरजा के देलखिन तोड़ि
आब प्रियतम भेल निठल्ला
केहन मनुखसं पड़िगेल पल्ला
सगरो भए गेल छुच्छे हल्ला !

कनफ़ुकबामें मुंह-कान सटौने
मूस-पीठके सदिखन मूठियेने
सीन देखिकए फ़ूटे हंसगुल्ला
केहन मनुखसं पड़िगेल पल्ला
सगरो भए गेल छुच्छे हल्ला !

धिया पुता के भेल आजादी
सच पुछू त भविष्यक बरबादी
ककरो अलगे ने कोनो कल्ला
केहन मनुखसं पड़िगेल पल्ला
सगरो भए गेल छुच्छे हल्ला !

घरक कनिया तनिया मुनिया
नून, हरदि, दालि मूंग ,धनिया
भंसा घरक खाली भेल गल्ला
गृह-कलह जानल सब मोहल्ला
केहन मनुखसं पड़िगेल पल्ला
सगरो भए गेल छुच्छे हल्ला ।

- भास्कर झा 20 जुलाई 2012

भाई, हमहुं कवि छी (हास्य)


हमहुं किछु लिखलै छी
मनमें फ़ुटैत बात कहुना
किछु बिम्ब,किछु छंद संग
तुकबंदी, शब्दक अंग भंग
सुखद अभाव केर छवि छी ।
भाई, आब हमहुं कवि छी ।

हमहुं कहिं ऊड़ि जायत छी
कल्पनाक पांखि लगा कए
कखनो बहैत बसातक संग
मनमें चहकैत चिड़ै के संग
विचारक की आब कमी छी ?
भाई, आब हमहुं कवि छी ।

हमहुं घुसि जायत छी कहुना
पकड़ने आयोजकक ठाड़ टीकी
नित चलैत सब काव्य-गोष्ठी में
मिथिला– मैथिलीक संगोष्ठी में
किछु विशेष प्रतिभाक धनी छी
……..भाई, आब हमहुं कवि छी ।

हमहुं जोगाड़ कय लैत छी
आलेख-प्रलेख, काव्यक पेटी
किछु काटी -किछु छांटि कए
रचना -सर्जना सब बांटि कए
-----साहित्यक जे पुजारी छी
भाई, आब हमहुं कवि छी !!!!

-भास्कर झा 19 जुलाई 2012

हम भन्ने नहिं छी (हास्य)


हम भन्ने नहिं छी 
--------तथाकथित कवि
नईं त आई हमहुं रहितहुं
साहित्यक अन्हार कोना में
छल-बल लोकक कोनो खेमा में !

हम भन्ने नहिं छी 
-------कोनो साहित्यकार
नईं त आई हमहुं लड़ितहुं
पुरस्कार तुरस्कार के लेल
अहि संग देय टाका के लेल।

हम भन्ने नहिं छी
---------- कोनो कथाकार
नईं त आई हमहुं लिखतहुं
पुरस्कार लोलुपक खिस्सा
खएतहुं गायरक अप्पन हिस्सा !

हम भन्ने नहीं छी
प्रगतिशीलताक कोनो पुरोधा
नहिं त हमहुं पतीत होयतहुं
सब सर्वहारा वर्गक नाम पर
लोक पीठ थपथपी ईनाम पर ।

हम भन्ने नहीं छी
कोनो पत्रिकाक पाठक
नहिं त हमरो मन में रहैत
रचना छपबावक सेहन्ता
फ़ुसफ़ुसिया आ व्यर्थक चिन्ता !
---- भास्कर झा 17 जुलाई 2012