dahej mukt mithila

(एकमात्र संकल्‍प ध्‍यान मे-मिथिला राज्‍य हो संविधान मे) अप्पन गाम घरक ढंग ,अप्पन रहन - सहन के संग,अप्पन गाम-अप्पन बात में अपनेक सब के स्वागत अछि!अपन गाम -अपन घरअप्पन ज्ञान आ अप्पन संस्कारक सँग किछु कहबाक एकटा छोटछिन प्रयास अछि! हरेक मिथिला वाशी ईहा कहैत अछि... छी मैथिल मिथिला करे शंतान, जत्य रही ओ छी मिथिले धाम, याद रखु बस अप्पन गाम - अप्पन बात ,अप्पन मान " जय मैथिल जय मिथिला धाम" "स्वर्ग सं सुन्दर अपन गाम" E-mail: apangaamghar@gmail.com,madankumarthakur@gmail.com mo-9312460150

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गुरुवार, 5 नवंबर 2015

कविता

राति कारी बीत चुकल, भेल जगतमे उज्जर बिहान।
सूतबै कतेक काल धरि, आब जागि जाउ अहाँ श्रीमान।
चिड़ै चुनमुन नीड़सँ निकसल, गाबि रहल अछि मंगलगान।
लागि रहल अछि सगरो जगतमे आबि गेल जेना नब प्राण।
रंग रंग केर फूल फुलाएल, बढ़ि गेल फुलवारीक शान।
नब प्रकाशसँ दमकै धरनी, सब दिस इजोतक छै गुणगान।
चलू उठू आइ करू प्रतिज्ञा राखब हम मिथिलाक मान।
देशक विकासक संग चलब हम, भारतक माथक छी हम चान।

बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

अन्हार




हाँ सोचैत की रहैत छी ?
हऽम !
हम सोचैत नहि छी
हम देखैत छी
हम दुनीयाँकेँ बुझैक प्रयत्न कए रहल छी
कि हमहूँ एहि दुनीयाँक हिस्सा छी?
कि हम देशक हिस्सा छी ?
कि हम एहि राजक हिस्सा छी ?
कि हम एहि समाजक हिस्सा छी ?
कि हम अपन परिवारक हिस्सा छी ?
नहि ! नहि ! नहि ! नहि !
तँ फेर हमर अस्तित्व की अछि ?
हम एहिठाम किएक एलहुँ ?
हम एहिठाम किएक छी ?
हम एहिठाम की कए रहल छी?
किछु नहि
पत्ता नहि
नहि जनैत छी
किछु नहि
नहि ! नहि ! नहि ! नहि !
किछु नहि
किछु नहि अर्थात शून्य 
शून्य
अन्हार
नाकामयाबी
अलगाव ।

एहि जिनगीक कोन मोल
जकर किछु सार्थकता नहि
जन्म लेनाइ
अभाबमे पोसेनाइ
सपनाक गरदैन घोटनाइ
माथपर जिमेदारी आ चिन्ताक बोझ
असफलता
शून्यता
फेर एक दिन
सभ चिन्तासँ मुक्त भऽ
लुप्त भऽ जेनाइ
काल्हि
जाहिखन एकटा नव भोर होएत
केकरो मोनमे इआद नहि
केकरो मुँहमे नाम नहि
इतिहासक पन्नामे कथा नहि
फेर एकटा शून्य
घोर अन्हार
अपार अन्हारक साम्राज्य
जाहिठाम
आन कि अपनो सभ इआद नहि राखत ।

की इहे जिनगी छी ?
एकरे नाम जीवन अछि ?
इहे मनुक्खक जीवन पाबैक हेतु
चौरासी लाख योनी पार करए परैक छैक
एहिठाम की भेटल
खाली शून्य
घोर अपार अन्हार
यदि हाँ
इहे जीवन अछि
इहे जीवनक सार अछि
तँ, हे भगवती
हमरापर दया करू
हमरापर कृपा करू
हमरा अहाँक ई जीवन नहि चाही
हमरासँ नीक तँ कीड़ा मकोड़ा
मानलहुँ कि ओकरो लग बड्ड शून्य छैक 
घोर अन्हार छैक
मुदा
अभाब नहि छै
असफलता नहि छै
निराशा नहि छै
चिन्ता नहि छै
माथपर बोझ नहि छै
ओ अपनाकेँ तुक्ष नहि बुझै छै
आर
फेर ओकरा
एकटा नव उच्च जीवन पाबैक आशो तँ छैक ।

हमरा लग की अछि ?
किछु नहि
खाली आर खाली घोर अन्हार
हम जन्म लै छी
आ ओकरा तियाइग कए
एकटा अनन्तमे हरा जाइ छी
काल्हि
हमर नामो धरि नहि रहि जाइए
हे भगवती
कि हमरा सभकेँ
एहने जीवन भोगैक लेल
जीवन देने छी
तँ कृपा कऽ अपन जीवन लए लिअ
हमरा सभकेँ एहेन जीवन नहि चाही
कमसँ कम
हमरा तँ बिल्कुल नहि
हमरापर दया करू भगवती
अपन ई जीवन लऽ लिअ ।
@ जगदानन्द झा ‘मनु’

मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

गाम बदलि रहल अछि


गाम बदलि रहल अछि
समाँग बदलि रहल अछि
छ्नीक सुखक खातीर
लोक चाम बदलि रहल अछि।

गामक फूसक घर
पक्कामे बदलि रहल अछि
शहरक पक्का मकान
टावरमे बदलि रहल अछि।

टीभी रेडिओ
मोबाईलमे बदलि रहल अछि
ब्याहक पबित्र बंधन
लिव इन रिलेशनशिपमे बदलि रहल अछि।

अख़बार आबि गेल नेटपर
चूल्हा गेएशमे बदलि रहल अछि।

पाइ पाइकेँ फरिछोंतमे
भाइ भाइकेँ बदलि रहल अछि
रुपैया नहि आब चौब्बनी अठ्ठनीमे
सिनेह बदलि रहल अछि।

परिभाषा आब सम्बन्धकेँ
खर्चामे बदलि रहल अछि
पिता पुत्रक प्रेम सबहक सोंझा
सराधमे बदलि रहल अछि।

मुखिया बदलि रहल अछि
सरपन्च बदलि रहल अछि
नहि कोनो गामक
समस्या बदलि रहल अछि।

माए कनै छथि एखनो
आँचर तर मुँह नुका कए
अछैते बेटा पुतहु बिनु
नहि हुनक हाथ झरकेनाइ बदलि रहल अछि।

बापक आँखिक नोर
एखनो ताकि रहल अछि
आबि बनेए कियो लाठी
नहि हुनक सपना बदलि रहल अछि।  

@जगदानन्द झा ‘मनु’    

मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

उगैत सूरज पएर पसारि



उगैत सूरज पएर पसारि 
धरतीक आँगनमे एलै 
लाल रंगक ओढ़नी एकर 
हरीयर खेतमे छिरएलै 

कोंढ़ी सभ मूरी हिला कए 
पंखुड़ीकेँ फैलेलक 
नचि-नचि कए नैन्हेंटा भोंडा 
खुशीकेँ नाच दखेलक    

लए संग अपन साजि बरयाति 
खुशी ओ संग अनने अछि 
संग एकरे उठल चिड़ै सभ 
आर मनुख सभ जगैत अछि 

माए सभ आँचरमे भरि कए 
नेनापर अमृत बरसेलै 
उगैत सूरज पएर पसारि 
धरतीक आँगनमे एलै 

बरदकेँ संग लए हरबाहा 
कन्हापर लादि हर आएल 
गाए महीषकेँ रोमि चरबाहा  
धरतीक आँगनमे बहि आएल 

छोट छोट हाथसँ नेना 
डोड़ी पकैर बकरीकेँ अनलक 
माथ पर ल' क' ढाकी खुरपी 
घसबाहीन झुमति निकलल 

एहन सुन्नर मनभाबक 
दृश्य भोरका कएलक 
उगैत सूरजकेँ त' देखू 
केहएन सुन्नर दुनियाँ बनेलक ।

उगैत सूरज पएर पसारि 
धरतीक आँगनमे एलै ।
***** जगदानन्द झा 'मनु'

शनिवार, 7 जुलाई 2012

मिथिलाक गुणगान



सुनु मिथिला केँ गुणगान अहाँ, हम की कहु अपन मोनें सँ
सभ  किछु तँ   अहाँ जैनते छी मुदा, हम कहैत छी ओरे सँ

उदितमान ई अछि अती  प्राचीन, ज्ञानक  भंडार अछि
ऋषि-मुनि केँ पावन धरती,  महिमा एकर अपार अछि

ड्यौढ़ी-ड्यौढ़ी फूलबारी, आँगन में तुलसी सोभति
कोसी-कमला मध्य वसल ई, भारतकेँ  सुंदर मोती

भक्ती-रस सँ कण-कण डुबल, अछि महिमा एकर अपार
शिव जतए एला चाकर बनि कए, सुनी भक्तकेँ  करुण पुकार

काली विष्णु पूजल जाई छथि, मिथिलाक एके आँगन में
छैक कतौ आन ई सामर्थ कहु, होई जे आँखिक देखने में

एहि धरती सँ जानकी जनमली, श्रीष्टिक करै लेल कल्याण
श्रीराम संग व्याहल गेलि, पतिवर्ताक देलैन उदाहरण महान

आजुक-कईल्हुक बात जुनि पुछू, भ्रस्त बनल अछि दुनियाँ
मुदा मिथिला में एखनो देखूँ, सुरक्षित घर में छथि कनियाँ

माय-बापकेँ  आदर दय छथि, एखनो तक मिथिले वासी
पूज्य मानी पूजा करैत छथि, घर आबए जे कियो सन्यासी

आजुक युग में धर्म बचल अछि, जे  किछु एखनों मिथिले में
आँखिक पैन बचल अछि देखू, जे किछु एखनों मिथिले में

कि कहु आब मिथिलाक महिमा,समावल जाएत नै लेखनी में
हमरा में ओ सामर्थ नहि अछि, बांध सकी जे पाँति में

जगदानन्द झा 'मनु'

मंगलवार, 5 जून 2012

हम मनुख, मनुख छी


अहंकार इश्वर कए भोजन छैक
मनुख कए प्रविर्ती छैक
आ दानब कए पोषक छैक

इश्वर हम भय नहि सकै छी
दानब बनै कए तैयार नहि छी
मनुख बनै कए प्रयाश नहि करैत छी

हम मनुख, मनुख छी
मनुखता सँ खसलहुँ त दानव छी
ऊपर भएलहुँ त देबता छी

जगदानन्द झा 'मनु'  

रविवार, 13 मई 2012

कोना मदर डे हैप्पी ?


आब केहन जमाना आबि गेल
बर्ख में एक्के दिन
माय कए यादि करै छी,
'मदर डे' कए नाम पर
माय कए याद करै छी
की हुनक सुखएल घा कए
काठी कय क' जगाबै छी |

हम बिसैर गेलहुँ
अपन माय कए
मुदा ओ नहि बिसरली,
जाहिखन हुनका भेटलैन्ह
सुन्दर कार्ड 'हैप्पी मदर डे' लिखल
भेलैन्ह करेजा तार-तार
नोर टघैर क'
अपन स्पर्श सँ
गाल कए छुबैत
हुनक करेजा तक चलि गेल
आ करेजा में बंद
महामाय कए कोंढ़ सँ
सोनित में डुबल शव्द निकलल
आह!
की ई हमर ओहे लाल ?
जेकरा पोसलौं खून सँ
पाललहुँ  अपन दूध सँ
अपने सुतलहुँ भिजल में
ओकरा  लगेलहुँ करेज सँ |
आई
चारि बर्ख सँ भेटल नहि
रहि रहल अछि परदेश
अपन  कनियाँ सँग
बिसरि गेल बिधवा माय कए
आई अकस्मात माय यादि  एलैह
ई सुन्दर चिट्ठी (कार्ड) पठेलक
मुदा की लिखल ?
'हैप्पी मदर डे'
बड्ड पैघ शांस लैत
हुनक मन आगु बाजल
जखन मदरे नहि हैप्पी
त' कोना
मदर डे हैप्पी
त' कोना मदर डे हैप्पी ?

जगदानन्द झा 'मनु'


रविवार, 25 मार्च 2012

कविता

एक दिन हमहूँ मरब


एक दिन हमहूँ मरब
दुनियाँ कए सुख-दुख छोइर कए
निश्चिन्त हेवा हेतु
देखै हेतु दुनियाँ में अपन प्रतिमिम्ब
कए ख़ुशी होइए कए दुखी होइए
एक दिन हमहूँ मरब
देखै लेल समाज में
हमर की स्थान छल
देखै लेल किनका ह्रदय में
हमर की स्थान छल

एक दिन हमहूँ मरब
करए लेल अपन पापक हिसाब
हमर पाप सँ कए कुपित छल
कए क्रोधित छल
कए द्रविल-चिंतित छल
कए खुसी छल
कए दुखी-व्यथित छल

एक दिन हमहूँ मरब
परखै हेतु अपन ह्रदय
अपन स्नेही-स्वजनक ह्रदय
अपन मितक ह्रदय
अपन अमितक ह्रदय
*** जगदानंद झा 'मनु'
-------------------------------------------------------------

रविवार, 26 फ़रवरी 2012

कविता


मनुक्ख (कविता)
जिनगीक कैनभस पर,
अपन कर्मक कूची सँ,
चित्र बनेबा मे अपस्याँत मनुक्ख,
भरिसक आइयो अपन हेबाक
अर्थ खोजि रहल अछि।

हजारो-लाखो बरख सँ,
बहैत इ जिनगीक धार,
कतेक बिडरो केँ छाती मे नुकेने,
भरिसक आइयो अपन सृजनक
अर्थ खोजि रहल अछि।

राजतन्त्र सँ प्रजातन्त्र धरि,
ऊँच-नीचक गहीर खाधि,
सुरसाक मुँह जकाँ बढले अछि,
भरिसक आइयो इ तन्त्र सभक
अर्थ खोजि रहल अछि।

कखनो करेजक बरियारी,
कखनो मोनक राज सहैत,
बढले जाइ छै मनुक्खक जिनगी,
भरिसक आइयो मोन आ करेजक
अर्थ खोजि रहल अछि।

मंगलवार, 17 जनवरी 2012

की हमहूँ रहबै कुमार ?

यौ पाठक गण की कहू अपन मिथिला राज्य चौपट भ' गेल ( से कोना यौ ) एक त कमला कोशीक दहार आ दोसर दहेज़ प्रथाक व्यवहार ! कमला कोशी लेलक पेटक आहार त दहेज़ प्रथा केलक आर्थिक लाचार ! कन्यादान से कतेक पिता लोकनि सेहो भेला बीमार आ कतेको बर छथि ओही बाधा सँ सेहो कुमार आ बीमार ! ओही सभ बात के लs क' हम नब युबक संघक बाधा कs ल'क' पाठक गणक समक्ष अपन गाम अपन बात  पर हाजिर छी.......

की हमहूँ रहबै कुमार ?

जय गणेश मंगल गणेश, सदिखन रटलो मंत्र उचार !
सभ बाधाक हरय बाला, कतेय  गेलो अहाँ छोड़ि संसार !!
अपना लेल अगल - बगल मे, हमरा लेल किए दूर व्यवहार !
आब कहू यो गणपति महाराज, की हमहूँ रहबै कुमार...? !!

बरख बीत गेल देखते देखते, जन्म कुंडली मे थर्टी ! (३०)
दहेजक आस मे हम नै बैसब, हमरो उम्र भो जेत सिक्सटी !! (६०)
गाम - गाम मे जे के बाजब, बाबू हमर छथि दुराचार !
आब कहू यो बाबू - काका, की हमहूँ रहबै कुमार... ?!!


ब्रह्म बाबा के सभ दिन गछ्लो, लगाबू अहि लगन मे बेरापार !
ओही खुशी मे अहाँ के देब, हम अपन गाय के दूधक धार !!
हे कुसेश्वर हे सिंघेश्वर, अहाँक महिमा अछि अपरम पार !
अहि लगन मे पार लगाबू, हम आनब दूध दही आ केराक भार !!
आब कहू यो भोले दानी, की हमहूँ रहबै कुमार ....?...

सौराठ सभा मे जे के बैसलों, सातों दिन आ सातो राति !
कियो नै पुछलक नाम आ गाम, की भेल अपनेक गोत्र मूल बिधान !!
घर मे आबी के खाट पकरलो, नै भेल आब हमर कुनू जोगार !
आब कहू यो बाबा - नाना, की हमहूँ रहबै कुमार --?!!

दौर - दौर जे पंडित पुर्हित, सभ दिन पूछी राय बिचार !
पंडित जी के मुहँ से फुटलैन ई बकार ..........
जेठ अषाढ़ त बितैते अछि, अघन से परैत अछि अतिचार !!
आब कहू यो पंडित पुर्हित, की हमहूँ रहबै कुमार ....?.

नै पढ़लो हम आइये - बीए, छी हमहूँ यो मिडिल पास !
डॉक्टर भइया - मास्टर भइया, ओहो काटलैथ एक दिन घास !!
ओही खान्दानक छी यो हमहूँ, जून करू आब हमर धिकार !
आब कहू यो बाबू - भैया, की हमहूँ रहबै कुमार ?!!

गोर - कारी सभ के सब दिन रखबै, लुल्ही - लंगरी से घर के सजेबई !
बौकी पगली के दरभंगा में देखेबाई, कन्ही कोतरी से करब जिन्दगी साकार !!
आब कहू यो संगी - साथी, की हमहूँ रहबै कुमार ..?........

अघन के लगन देख हम झूमी उठलो, जेना करैत अछि नाग फुफकार !
लगन बीत गेल माघ फागुन के, गुजैर रहल अछि जेठ अषाढ़ !!
अंतिम लगन ओहिना बितत, नैया डूबत हमरो बिच धार !
आब कहू यो मैथिल आर मिथिलाक पाठक गन,
की हमहू रहबै कुमार --?-!!

नब युवक के बातक रखलो मान, शादी.कॉम में लिखेलो अपन नाम !
नै कुनू भेटल कतो से मेल, लागैत अछि जे ईहो भेल फैल !!
कतेक दिन करब मेलक इंतजार........
आब कहू यो कम्पूटर महाराज, की हमहूँ रहबै कुमार --?!!

भोरे उठी गेलो खेत खलिहान, उम्हरे से केना एलो कमला स्नान
देखलो दुई चैर आदमी के, बात करैत छल कन्यादान !
पीड़ी छुई हम भगवती के, पहुँच गेलो हम अपन दालान !!
हाथ जोरी हम सबके, विनती केलो बारम् बार !
आब कहूँ यो घटक महाराज, की हमहूँ रहबै कुमार --?

मदन कुमार ठाकुर,
पट्टीटोल, कोठिया (भैरव स्थान )
झंझारपुर (मधुबनी)बिहार - ८४७४०४।
मो-९३१२४६०१५०


शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

दहेजक आगि


        Kunal Jha
दहेजक आगि ............................
खाली घरक कोन कोन मे , मकड़ी जाल तैयार छै .

माई बिना छै आगना सुन, बाबा बिन दालान छै.
चिट्ठी अयले आई दैया कई, आफद मे पारल जान छै.

... रोज़ रोज़ तगेदा भेज़ई जे दैया के ससूरलाल छै.
भैया आहा छी परदेश मे बैसल, आब हमर के सुधि लैत छै.

ठक्कन बाबू के ख़ाता मे, लगाल गिरबी खेत छै.
कुर्की जब्ती सहो होयत, आबे बाला तेसर साल छै.

घरही मे सेबाटा पानी चुबै, कारी रातिक बरसात मे
शायद एही बेर टिक ना पाबत, साबन भादो के बरसात मे.
दादा दादी कई एक्टा निशानी, केकरा कहबाई ई हाल छै,
तैयो एक्टा दीप जरै छै सांझा मैया के नाम पर,

सदिखन बाट तकै छै दैया भैया कहिया एबैई गाम पर,
सादिखान मन रहै छै हमर, दैया कई ससुराल पर,

कोना के हमर दैया बाचत, एही दहेज रूपी असुर के बाप स
ग़रीबक धीया आब न बचाती दहेजक पसरल आगी छै .
केकरा कहबाई के सुनते,आनहार बहिर समाज़ छै
माई बिना छै आगन सुन, बाबा बिन दालान छै .......................

मिथिलाक़ दुख:




मिथिलाक़ बारे मे लोक सब सदिखन खुब सुनैत छथी और सुनाबैत छथी और जनीतो छथी .मुदा ओकर असली अनुभूति ओहीठाम गेला पर होयत छैक .एकटा समय छल जे मिथिलाक़ माटी मे अनजक भंडार छल.मुदा आब की हालत अछि ओ बतेबाक कोनो प्रयोजन नही , जे निरंतर ए...ही मे गिरावट आबी रहाल अछि .
हर जगह ग़रीबी, भुखमरी , और दरिद्रताक सागर बनी गेल अछि .मिथिलांचल्क धीया-पुता, सब अपन रोज़ी-रोटिक खोज मे देशक कोना कोना मे जा रहाल छथी ,जताई देखु , जताई खोजू मिथिला भाषा- भाषी लोकक
भरमार अच्छी, मुदा एकजुटता नही अछि . पहीने जेखन मिथिला भाषा- भाषी लोक सब झुंडक - झुंड
अपना गली मुहल्ला सा निकली कार्य- रोज़गार पर जायत छैलाह त हुनकर सभक अपन भाषा मे गॅप सुनी
अपार हर्षक अनुभूति होयत छल , मिथिला स एतेको दूर दूर एलाक उपरांतो अपन मातृभाषा स प्रेम करैयत छेलाह . मुदा एहीमे आब निरंतर अभाब भै रहल अछि , नही जानी ई कियाक भ रहल अछि ,तेकर की कारण ?
जेखन की दुनियाक सब स मधुर भाषा मैथिली अछि , दोसर स्थान पर बांग्ला अच्छी .आब जेखन की मैथिली भाषा के अष्टम सूची मे स्थान भेट गेल. .एही मे कतेको मिथिला पुत्र और मैथिल प्रेमी कई अपार योगदान रहल अछि . हुनका सब कई सादिखन मिथिला भाषा भाषी लोक सब आदरक संग याद करताःह .
हम सहो हुनका सब कई अपन माता टेकि नमन करैयत छी,
आई करीबन 5 करोर मैथिली भाषा भाषी छथी .तेख़नो एकर स्थिति दयनीए अछि .
मिथिलाक़ सब स् पैघ समस्या अछि बाढ़, प्राकृतिक आपदा, और एही पर स दहेजक दानबक
एही दारून दृश्य कई त. कतेको निक निक चैनेल पर देखाओल जायत अछि . और सब केओ देखैत छैथ , और इ देखी सभक आत्मा कई झकझोरी दैयत अछी ,परंतु ओकर समाधान, निराकरण दिशि किनको ध्यान नही जायत अछि.जेखन की जगत जननी माय मिथिला अपन कोख स अनेको कर्मठ सुयोग्य पढल लिखल होनहार पुत्र कई जन्म देलिह जे अपन देशे नही बिदेशो मे नाम रौशन केलाह और क रहल छथी .तकर उपरांतो माय मिथिला अपन दुख देखी कानी रहाल छैथ कतेको संस्था संगठनक निर्माण भेल. कतेको चली रहल अछि , कतेको दम तोरी चुकल अछि , कतेको दम तोरै बाला अछि , कारण किनको समुचित समर्थन त किनको धनक ब्यबस्था नही छल .
cont......................

शनिवार, 26 मार्च 2011

एकटा पत्र छोटका भाय के नाम.

सुने रे रानू लिखेय छौ भानु
हमर हाल छौ उत्तम,
तोहर हाल के हम नै जानी
भला करउ पुरुषोत्तम।

अपन गाम में छुटी गेलों ये,
हमर एकटा अंगा
ओ अंगा के कका लगाय के,
पठा दिए दरभंगा।

बड़की भौजी से तू कहिये
याद बहुत आबय ये,
हुनकर चक्का,सैजमन, आ तिलकौर
बड़ा भावय ये।

माय  से कहिये कानय ले नै
पूरा हेतय ईक्षा,
जल्दी हमहूँ बीडीओ बनबइ
पास करय दे परीक्षा।

मिरिया माय के हाल तू हमरा
सेहो अलग से बतहिये,
कनकिरबा कतबा टा बढलों
फोटो कोनो पठियेह।

कालेज के भए गेलों समय ये
समय के छो कनी तंगी,
माँ-बाबु ले गोर लगय छियो
घोर एबउ हम जल्दी।

बुधवार, 12 जनवरी 2011

हमारा स्कूल

हमारा  रेड रोज  स्कूल 
 
 
खिलती  है  यहाँ  नित दिन  शिक्षा का नया  फुल
सबसे  अच्छा  है  हमारा  रेड रोज  स्कूल 
 
सुबह - सुबह  होता यहाँ  माँ शारदा की बिन्ती
जिस से  मिलता  बच्चो को  मन  की शांति
 
न गंदगी ना कोई  शर्मंदिगी ना खी पर हैं धुल
सबसे  अच्छा  है  हमारा  रेड रोज  स्कूल 
 
मियती  है यहाँ  पर  प्रतिदिन  नयी  संस्कार
गरीब  हो या  आमिर  सब को है  पूरा अधिकार
 
स्नेह  और  प्यार  से भरा है  भरपूर
सबसे  अच्छा  है  हमारा  रेड रोज  स्कूल 
 
दूर - दूर  से शिक्षक  आकर  होंसला बढ़ाते  है
सिलेबस   के साथ - साथ कंप्यूटर  भी  सिखलाते है
 
 
जो न समझे  इनका  प्यार है  उनका ये सब भूल 
सबसे  अच्छा  है  हमारा  रेड रोज  स्कूल 
 
दूर - दूर से बच्चे  आकर  होंसला  बढ़ाते  है
अपने  माता - पिता  को  आज्ञा  का आश्रय करते हैं
 
छोटा सा  गाव में  मेरा  यह स्कूल 
सबसे  अच्छा  है  हमारा  रेड रोज  स्कूल 
 
 
लिखिका -
 
मनीषा कुमारी
ग्राम /पोस्ट  मेहथ
झांझरपुर , मधुबनी ,
बिहार