dahej mukt mithila

(एकमात्र संकल्‍प ध्‍यान मे-मिथिला राज्‍य हो संविधान मे) अप्पन गाम घरक ढंग ,अप्पन रहन - सहन के संग,अप्पन गाम-अप्पन बात में अपनेक सब के स्वागत अछि!अपन गाम -अपन घरअप्पन ज्ञान आ अप्पन संस्कारक सँग किछु कहबाक एकटा छोटछिन प्रयास अछि! हरेक मिथिला वाशी ईहा कहैत अछि... छी मैथिल मिथिला करे शंतान, जत्य रही ओ छी मिथिले धाम, याद रखु बस अप्पन गाम - अप्पन बात ,अप्पन मान " जय मैथिल जय मिथिला धाम" "स्वर्ग सं सुन्दर अपन गाम" E-mail: apangaamghar@gmail.com,madankumarthakur@gmail.com mo-9312460150

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सोमवार, 6 जुलाई 2015

विद्यापतिक साहित्यमे सामाजिक सन्देश



   
  संसारमे एहन बहुत कम कवि होएताह जे जीवनमे एक्कहुटा महाकाव्य लिखनहि विन महाकवि कहबैत होथि। एहन व्यक्तित्व मैथिल कवि कोकिल विद्यापतिए भेलाह। तत्कालीन समयमे विद्वता आ प्रज्ञा प्रकटीकरणक लेल भारतवर्षक एक मात्र माध्यम संस्कृत भाषामे पूर्ण अधिकार रखितहुँ जन–मन–रञ्जनक लेल ‘देसिल वयना सभजन मिट्ठा’ कहि लोकभाषामे रचना परम्पराक शुरुआत कऽ विद्यापति समस्त उत्तर भारतीय आर्यभाषाक प्रथम जनकविक रूपमे उदित भेलाह। जनभाषामे काव्य सृजन परम्पराक पहिल सशक्त डेग उठौनिहार व्यक्ति विद्यापतिए छलाह। हिनके पदचिह्नपर चलैत अवधी भाषामे तुलसीदास ‘रामचरितमानस’सन अमर काव्यक रचना करबामे सफल भेलाह। तहिना ब्रजभाषामे मीरा तथा सूरदास, भोजपुरीमे कबीरदाससन उद्भट कविसभक उदय भेल। तेँ प्रसिद्ध हिन्दी कवि डा. हरिवंश राय बच्चन महाकवि विद्यापतिक मादे लिखलनि अछि—

थे न कबीर, न सूर न तुलसी
और न थी जब बाबरि मीरा
तब तुमने ही मुखरित की थी
मानव के मानस की पीड़ा
      अपन काव्यपुस्तक ‘आरती और अंगारे’ मे विद्यापतिकेँ एहि तरहेँ सम्बोधित कएनिहार डा. बच्चन ‘टूटी–छूटी कड़ियाँ’ में विद्यापतिक महिमाकेँ विशिष्टीकृत करैत एहुना कहलनि अछि— ‘भाषाक क्षमताकेँ भलहि सरहपाद मानैत होथु, भाषाक ओज दऽ रासो कविसभ भलहि जनैत होथि, मुदा भाषाक असली सुआद सभसँ पहिने विद्यापतिए बुझलनि— देसिल वयना सबजन मिट्ठा। विद्यापति हमरालोकनिक सर्वप्रथम परिस्कृत गीतकार थिकाह। संस्कृतक ध्वनि–माधुर्यकेँ ओ पूर्णतया भाषामे उतारैत छथि। हुनका ‘अभिनव जयदेव’ सेहो कहल जाइत छनि। मार्मिकता आ भावक गहिराइमे ओ जयदेव आ रासो कालक शृङ्गारिक कविसभसँ बहुतो आगाँ छथि | 
     
        देसिल वयनाद्वारा मानवीय भावकेँ एते सूक्ष्मतापूर्वक पहिल बेर विद्यापतिए छूबि सकलाह।  साहित्याकाशक देदीप्यमान नक्षत्र महाकवि विद्यापति (ई.सन. १३६०—१४४८) मूलतः शृङ्गारिक एवं धार्मिक प्रवृत्तिक कवि मानल जाइत छथि। मुदा व्यापकतामे देखलापर हुनक रचनाद्वारा समाजमे अनेको सार्थक सन्देशसभक सम्प्रेषण सेहो प्रचुर मात्रामे भेल हमसभ पबैत छी। हुनक चामत्कारिक काव्यप्रतिभेक कारण अवसानक छ सय वर्षक बादहु ओ जन–मन ओ लोक–जीवनमे जीवित एवं परिव्याप्त छथि। सगरमाथापर फहराइत विद्यापतिक ख्याति, सुयश एवं प्रभावकेँ परवर्ती कालक कतेको साहित्यकार समाजमे सकारात्मक सन्देश प्रवाह करबाक लेल उपयोग करैत सेहो देखल गेल छथि। निश्चित रूपेँ एकटा आम व्यक्ति जखन कोनो बात कहैत अछि तँ ओ ओतेक प्रभावोत्पादक नहि होइत छैक जतेक एक प्रतिष्ठित तथा सामाजिक हैसियतप्राप्त व्यक्तिक कहलासँ होइछ। तेँ बादक किछु कवि जे सामाजिक कुरीतिसभकेँ हटएबादिस संवेदनशील छलथि, सेसभ विद्यापतिक नामकेँ भनिताक रूपमे प्रयोग कऽ ओहन सुसन्देशसभक प्रवाह करैतसन पाओल गेलाह अछि। मिथिलामे रहल अनमेल विवाह–प्रथाकेँ निरुत्साहित करबाक गूढार्थ अन्तर्निहित रहल निम्न गीतकेँ एही श्रेणीक एक उत्कृष्ट गीत मानल जा सकैत अछि, जाहिमे तरुणी स्त्रीक अल्प वयसक पुरुषक सङ्ग विवाह भऽ गेलाक बाद उत्पन्न परिस्थितिक वर्णन कएल गेल छैक—

पिया मोर बालक हम तरुणी गे,
कओन तप चुकलहुँ भेलहुँ जननी गे। 
तहिना प्रौढ पुरुषक सङ्ग नवयौवना स्त्रीक विवाह करबाएल जा रहल प्रसङ्गमे कन्याक माए अपन पति आ समाजकेँ उपराग दैत चेतावनीक भाषामे कहैत छथि—
हम नहि आजु रहब एहि आँगन
जौँ बूढ़ होएत जमाए  | 

 एहन अनमेल विवाहक लेल मिथिलाक लोकव्यवहार मोताबिक भाग्यकेँ दोष देबाक सङहि बेटीक पिता तथा घटककेँ सेहो दोषक भागी बतबैत आगाँ कहल गेल अछि—
एक तँ बैरी भेल बीधि–विधाता
दोसर धियाकेर बाप
तेसर बैरी भेल नारद बाभन
जे बुढ आनल जमाए
     यद्यपि उपर्युक्त गीतसभ मैथिल समाजमे विद्यापतिएक गीतक रूपमे समादृत एवं प्रचलित अछि। ओहुना एहन गीतसभक भनितामे ‘भनहि विद्यापति’ लिखल पाओल जाइत छैक। मुदा विभिन्न विद्वानसभक मतानुसार विद्यापतिक गीत कहि सैकड़ो एहनो गीत लोककण्ठमे व्याप्त अछि, जे यथार्थतः विद्यापति नहि लिखने छथि। उपर देल गेल गीतसभक भाषा आ विद्यापतिकालीन मैथिली भाषाक स्वरूपक तुलनात्मक अध्ययन–विश्लेषण कएलासँ सेहो ई बात स्पष्ट होइत अछि। ओना तँ जे गीतसभ विद्यापतिएद्वारा लिखल गेल बातपर कनेको शङ्का नहि छैक, ताहूमे भक्ति आ शृङ्गर रसक गीत मात्र नहि छैक, जीवनकेँ सुमार्गपर लऽ चलबाक लेल अनेको उद्देश्यपूर्ण गीतसभ विद्यापति स्वयं सेहो प्रचुर मात्रामे लिखने छथि।

विद्यापतिक शतप्रतिशत वास्तविक भक्ति आ शृङ्गार रसक गीतसभक सेहो खास उद्देश्य रहैत छलैक। मिथिलाक तत्कालीन अवस्थापर ध्यान देलापर देखल जाइत अछि जे यवनक आक्रमण तथा जल्दी–जल्दी होइत आएल नेतृत्व परिवर्तनक कारण मिथिलाक आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति दिनानुदिन गिरैत गेल छलैक। प्रायः यवन सेना जखन आक्रमण करैत छल तँ ओहिठामक सम्पूर्णप्रायः धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक पूर्वाधारकेँ लतखुर्दनि कऽ जनजीवनकेँ धङरचास कऽ दैत छल। महिलासभकेँ ओसभ अपन पहिल शिकार बनबैत छल। जबर्दस्ती इस्लाम धर्म कबूल करबएबाक काज सेहो ओतबए मात्रामे कएल जाइत छलैक। एहि सभ क्रियाकलापसँ गार्हस्थ्य जीवन छिन्न–भिन्न भऽ जाइत छलैक। लोक अकर्मण्य एवं किंकर्त्तव्यविमूढ होइत गेल छल। एहन अवस्थामे हतास एवं पलायनोन्मुख समाजकेँ पुनः लीकपर अनबाक उद्देश्यसँ तत्कालीन अवस्थामे जीवन गुजाराक मूल कर्मदिस लोककेँ आगाँ बढ़बाक लेल उत्साहित करऽ वला गीतसभ सेहो रचलनि—
बेरि–बेरि अरे सिव, मोञे तोहि बोलञो
किरिस करिअ मन लाए
बिनु सरमे रहिअ, भिखिए पए मङ्गिअ
गुन गउरब दुर जाए
खटङ्ग् काटि हर हर बन्धबिअ
तिरसिल तोड़िअ करु फारे
बसह धुरन्धर लए हर जोतिअ
पाटिअ सुरसरि धारे

        अत्यन्त प्रगतिशील एवं उत्साहवर्धक सन्देश देल गेल एहि गीतमे विद्यापति अपन आराध्य महादेवकेँ किसानक रूपमे ठाढ़ कऽ कहैत छथि— “हे शिव, अपन कर्त्तव्यक पालन नीकजकाँ करी। भीख माङब ने लाज वा शरमक बात छियैक, जे लोकक गुण आ गौरव दुनूकेँ हरि लैत छैक। मुदा अपन काज करबामे कथीक सङ्कोच? तेँ अपन खटङ्ग काटिकऽ हर बनाउ। त्रिशूलकेँ पीटिकऽ फार बनाउ। अपन बसहाकेँ हरमे जोतू। आ, फसलिक सिञ्चन लेल तँ अहाँक मस्तकसँ बहऽ वला गङ्गाक धार अछिए।

      तत्कालीन विषम परिस्थितिमे जनमानसकेँ कर्मशीलताक दिशामे उन्मुख कराएब समाज सचेतक व्यक्तिक सर्वाधिक महत्त्वक काज छलैक। एही समयमे हिन्दू धर्मावलम्बीसभक बीच सेहो शैव, वैष्णव आदि सम्प्रदायमे मानसिक विभाजनक अवस्था छल, जाहिसँ समाजमे विशृङ्खलता आओर बढ़ैत गेल रहैक। एहनमे समान धार्मिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमिक लोकक बीच वृहद एकताक आवश्यकतापर जोड़ दैत विद्यापति कहलनि जे शैव वा वैष्णव परस्पर विरोधी नहि, बल्कि एक्कहि सिक्काक दू पाट अछि। एकरा अपन पदमे विद्यापति एहि तरहेँ अभिव्यक्ति दैत देखल गेल छथि—

भल हर भल हरि भल तुअ कला
खन पित वसन खनहि बघछला

     एहि तरहेँ विभिन्न तरहक प्रहारसँ विशृङ्खलित जनजीवनकेँ सहज बनएबाक हेतु कर्मशीलताक सन्देश आ भक्तिमार्गक अनुसरण मात्र यथेष्ट नहि छलैक, लोक–जीवनमे आस्थाक रस सञ्चार कराएब सेहो ओतबए आवश्यक छलैक। विद्यापतिद्वारा प्रायः जीवनक आरम्भिक चरणमे लिखल गेल शृङ्गार रसक गीतसभ होइक वा तत्कालीन राजासभक आदेशमे लिखल गेल शृङ्गार रसक गीतसभ कतेक सार्थक, कतेक निरर्थक छलैक, से अलग विश्लेषणक विषय अछि। मुदा कालान्तरमे मिथिला राज्य छिन्न–भिन्न भऽ गेलाक बादो शृङ्गारिक गीतसभक रचनाक्रमकेँ ओ जाहि तरहेँ निरन्तरता देलनि, से पूर्णतः सोद्देश्य छल। ओहि समयक आकुल–व्याकुल परिस्थितिसँ आमजनकेँ मुक्त कऽ जीवनकेँ सरस बनएबादिस उन्मुख करएबाक लेल विद्यापति एकसँ एक शृङ्गारिक गीतसभक रचना कएलनि। मुदा कविक महिमा देखी जे हुनक लिखल कतिपय श्रैङ्गारिको गीत अपनामे एकटा इतिहास समटने अछि। महाकवि विद्यापतिक एखनधरि भेटल आ सार्वजनिक भेल करिब १,२०० गीतमेसँ २०० क करिब गीत बादक कविसभद्वारा लिखल आ मात्र भनितामे विद्यापतिक नाम लिखल गेल विश्लेषकसभक कथन छनि। मुदा एहन व्यक्तित्व कम्मे होएत, जकर अधिकांश गीत वा पदसभ कोनो ने कोनो इतिहासकेँ समटने होइक। इतिहासक एकटा घटनाक्रमकेँ बड़ सजीवताक सङ्ग प्रस्तुत कएल गेल विद्यापतिक ई गीत—

सजनि निहुर फुकू आगि।
तोहर कमल भ्रमर मोर देखल, मदन उठल जागि।।
जौँ तोहें भामिनी भवन जएबह, एबह कोनह बेला।
जौँ एहि सङ्कटसौँ जिव बाँचत होएत लोचन मेला।।
भन विद्यापति चाहथि जे विधि करथि से–से लीला।
राजा शिवसिंह बन्धन मोचन तखन सुकवि जीला।।

     कहल जाइत अछि जे उपर्युक्त शृङ्गार गीत विद्यापति अत्यन्त सङ्कटग्रस्त समयमे लिखने छलाह। यवन सेना हुनक प्रिय राजा शिवसिंहकेँ जखन बन्दी बना दिल्ली लऽ गेल तँ विद्यापति अपन कूटनीतिक कौशलक उपयोग कऽ शिवसिंहक बन्धनमोचन करबौने छलाह। एहि क्रममे बादशाहकेँ जखन ई बुझबामे अएलनि जे विद्यापति कवि छथि तँ हुनका अपन कवित्वक परिचय देबाक लेल कहलनि। ओ चूल्हि पजारैत एक सुन्दरीक कवितात्मक वर्णन करैत अपन कवित्वक उत्कृष्ट परिचय देलनि। किंवदन्ती तँ एहनो छैक जे विद्यापतिक आँखिमे पट्टी बान्हि देल गेलनि आ हुनका कहल गेलनि जे चूल्हि पजारैत सुन्दरीक वर्णन करू। केओ–केओ एहि प्रसङ्गमे विद्यापतिकेँ सन्दूकक भीतर बन्द कऽ सूखल इनारक भीतर राखिकऽ एहि स्थितिक वर्णन करबाक लेल कहल गेल बात सेहो कहैत छथि। अवस्था चाहे जे–जेहन रहल होइक, मुदा एतबाधरि निश्चित जे विद्यापतिद्वारा कएल गेल चित्रण अत्यन्त सजीव आ लोमहर्षक छैक। 

       गीतमे ओ कहैत छथि— “सुन्दरी, अहाँ जे निहुरिकऽ चूल्हि फुकैत छी, ताहिसँ अहाँक स्तनरूपी कमल हमर आँखिरूपी भमराक आगाँ देखार भऽ रहल अछि, जाहिसँ कामदेव जागि गेल छथि। आब कहू जे अहाँ भवनमे कखन घूरब ? जँ एखनुक सङ्टसँ बाँचि गेलहुँ तँ अपना दुनूगोटेक नजरिक परस्पर मिलान होएबे करत। विद्यापति कहैत छथि— विधाता सेहो नहि जानि केहन–केहन लीला करैत छथि। राजा शिवसिंह जँ बन्धनमुक्त होएताह, तखने बुझू जे मृततुल्य अवस्थामे पहुँचल एहि कविक प्राण घूरत।”
   
       विद्यापतिक एहन अनेको श्रैङ्गारिक गीत छनि, जाहिमेसँ कतेको अपनामे एकहकटा इतिहासक दस्तावेज अछि तँ कतिपय कविता जीवनकेँ रसमय आ रोमाञ्चक बनएबामे सहायक अछि। विद्यापतिक बहुतो शृङ्गारिक गीतकेँ कामकलाक पाठ सिखौनिहार विज्ञानसम्मत कलात्मक अभिव्यक्तिक रूपमे सेहो लेल जाइत अछि, जे आजुक समयमे सेहो सजीव आ सार्थक अछि। तेँ ई कहब अनर्गल हएत जे विद्यापतिक रचनाक उद्देश्य केवल रास–रङ्ग वा राजा–महाराजाकेँ मनोरञ्जन प्रदान करब छलनि। विद्यापति जन–मनक, लोकजीवनक महाकवि छलाह आ ओ प्रेम एवं आनन्दक मार्गपर चलैत कर्मशील जीवनक पक्षमे अपन लेखनीकेँ निरन्तर प्रवाहमय बनौने रहलाह।


– दुर्गेश झा'लव 
नरही , मधुबनी , 
मिथिला , भारत 

शनिवार, 4 जुलाई 2015

मैथिल'क मानसिकता

जुक समयमे युवा वर्गक व्यवहार आ संस्कारमे बहुत परिवर्तन आएल अछि। पाश्चात्य सभ्यताक करिया छाँह मैथिलक कर्मठ वर्तमान आ धवल भविष्य दुनुकें प्रभावित केलक अछि। आब बेसीतर युवा आ युवती बस अपने धरि सकुचल छथि। नीक डिग्री, नीक नौकरी, खूब रास आमद, पैघ सन कोठी, नमहर (चरिचकिया) गाड़ी, एकटा जीवन-संगी/संगिनी आ बहुत रास आधुनिक सुख-सुविधा; बस एतबे धरि हुनका लोकनिक जिनगी सिमटल छनि। आ तकर कारणो अछि, ओ लोकनि अपन अतीत बिसरि आ भविष्यसँ अनवगत अपन आइमे जीवैत छथि। कोन बाट चलि एतए तक आएल छलाह आ अपना पाछा की छोड़ि क' जेता तकर कोनो फिकिर नै।     

    समाज या सामाजिक गतिविधि सभसँ हिनका लोकनिकें कोनो लेना-देना नै। बस घरसँ-कार्यालय आ कार्यालयसँ-घर, एतबहिमे जीवन खतम। हाँ, एकटा गप्प त' छुटिए गेल - चाहे कतबो व्यस्त दिनचर्या होइन्ह, टाकाक कतबो तंगी होइन्ह, माए-बापक लेल समय आ टाका होइन्ह वा की नै होइन्ह मुदा सिनेमा-सर्कस, प्रीतिभोज (पार्टी) आ बाजार (माँल) घुमबा लेल समय आ टाका दुनुक ब्योंत कए लैत छथि। ऐ मामलामे ओ सभ बड्ड जोगारू आ बड्ड सचेत रहैत छथि। बस एक्के टा चिंता आ एक्के टा सपना रहैत छनि हिनका लोकनिकें - कोना बिनु मेहनति टाका अबैत रहए आ मौज-मस्तीमे कोनो त्रुटि नै हुवए।
ई सोच समाजक लेल बड्ड हानिप्रद अछि। एकरा दूर करब आ एकरासँ बाँचल रहब बहुत आवश्यक। समाजक सर्वांगीण प्रगतिक लेल युवा वर्गक योगदान अनिवार्य होइछ। समाज युवा वर्गक सकारात्मकता आ ऊर्जाक खगल अछि। तें नवतुरिया सभके सक्रिय होएबाक बेगरता अछि। हमरा लोकनि जाहि समाजमे रहैत छी तकरासँ छुच्छे लेबे टा नै अपितु ओकरा किछु देनाइ सेहो सीखी। ई बूझब जरूरी अछि जे समाजक प्रति अपन कर्त्तव्यसँ आंखि-कान मूनि कात भ' गेलासँ हम सभ अंतिम नोकसान अपने क' रहल छी। किएक त' चाहे कतबो पढ़ि ली, किछु बनि जाए, कतबो कमा ली मुदा रहबाक त' ओही समाजमे अछि।


दुर्गेश झा'लव 
नरही , मधुबनी , 

मिथिला , भारत
[ रोहतक ]

मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

मिथिला विभुति

मिथिला विभुति 
स्व. श्री हरिमोहन झा (१९०८-१९८४)

जन्म १८ सितम्बर १९०८ ई. ग्राम+पो.- कुमर बाजितपुर , जिला-
वैशाली, बिहार, भारत। पिता- स्वर्गीय पं.
जनार्दन झा “जनसीदन” मैथिलीक
अतिरिक्त हिन्दीक लब्धप्रतिष्ठ
द्विवेदीयुगीन कवि-साहित्यकार। शिक्षा-
दर्शनशास्त्रमे एम.ए.- १९३२, बिहार-उड़ीसामे
सर्वोच्च स्थान लेल स्वर्णपदक प्राप्त। सन् १९३३ सँ
बी.एन.कॉलेज पटनामे व्याख्याता, पटना कॉलेजमे
१९४८ ई.सँ प्राध्यापक, सन् १९५३ सँ पटना विश्वविद्यालयमे
प्रोफेसर तथा विभागाध्यक्ष आऽ सन् १९७० सँ १९७५
धरि यू.जी.सी. रिसर्च प्रोफेसर
रहलाह। हिनकर मैथिली कृति १९३३ मे
“कन्यादान” (उपन्यास), १९४३ मे “द्विरागमन”(उपन्यास),
१९४५ मे “प्रणम्य देवता” (कथा-संग्रह), १९४९ मे
“रंगशाला”(कथा-संग्रह), १९६० मे “चर्चरी”(कथा-
संग्रह) आऽ १९४८ ई. मे “खट्टर ककाक तरंग” (व्यंग्य)
अछि। “एकादशी” (कथा-संग्रह)क दोसर संस्करण
१९८७ ए. मे आयल जाहिमे ग्रेजुअट पुतोहुक बदलाने “द्वादश
निदान” सम्मिलित कएल गेल जे पहिने “मिथिला मिहिर”मे छपल
छल मुदा पहिलुका कोनो संग्रहमे नहि आएल छल।
श्री रमानथ झाक अनुरोधपर लिखल गेल “बाबाक
संस्कार” सेहो एहि संग्रहमे अछि। आऽ हुनकर “खट्टर
काका” हिन्दीमे सेहो १९७१ ई. मे पुस्तकाकार
आएल। एकर अतिरिक्त हिनकक स्फुट प्रकाशित-लिखित पद्यक
संग्रक “हरिमोहन झा रचनावली खण्ड ४ (कविता)”
एहि नामसँ १९९९ ई.मे छपल आऽ हिनकर आत्मचरित
“जीवन-यात्रा” १९८४ ई.मे छपल। हरिमोहन बाबूक
“जीवन यात्रा” एकमात्र पोथी छल जे
मैथिली अकादमी द्वारा प्रकाशित भेल छल
आऽ एहि ग्रंथपर हिनका साहित्य
अकादमी पुरस्कार १९८५ ई. मे मृत्योपरान्त देल
गेलन्हि। साहित्य अकादमीसँ १९९९ ई. मे
“बीछल कथा” नामसँ श्री राजमोहन
झा आऽ श्री सुभाष चन्द्र यादव द्वारा चयनित
हिनकर कथा सभक संग्रह प्रकाशित कएल गेल,
एहि संग्रहमे किछु कथा एहनो अछि जे हिनकर एखन धरिक
कोनो पुरान संग्रहमे सम्मिलित नहि छल। हिनकर अनेक
रचना हिन्दी, गुजराती, मराठी,
कन्नड़, तेलुगु आदि भाषामे अनुवादित भेल। हिन्दीमे
“न्याय दर्शन”, “वैशेषिक दर्शन”, “तर्कशास्त्र”(निगमन),
दत्त-चटर्जीक “भारतीय दर्शनक”
अंग्रेजीसँ हिन्दी अनुवादक संग हिनकर
सम्पादित “दार्शनिक विवेचनाएँ” आदि ग्रन्थ प्रकाशित अछि।
अंग्रेजीमे हिनकर शोध ग्रंथ अछि- “ट्रेन्ड्स ऑफ
लिंग्विस्टिक एनेलिसिस इन इंडियन फिलोसोफी”।
प्राचीन युगमे विद्यापति मैथिली काव्यकेँ
उत्कर्षक जाहि उच्च शिखरपर आसीन कएलनि,
हरिमोहन झा आधुनिक मैथिली गद्यकेँ ताहि स्थानपर
पहुँचा देलनि। हास्य व्यंग्यपूर्णशैलीमे सामाजिक-
धार्मिक रूढ़ि, अंधविश्वास आऽ पाखण्डपर चोट हिनकर लेखनक
अन्यतम वैशिष्ट्य रहलनि। मैथिलीमे
आइयो सर्वाधिक कीनल आऽ पढ़ल
जायबला पीथी सभ हिनकहि छनि।



 


मायानन्द मिश्र-
मायानन्द मिश्रक हिनक जन्म १७ अगस्त १९३४ ई. केँ सुपौल जिलाक बनैनियाँ गाममे भेलनि। तत्कालीन बनैनियाँ कोसीक प्रकोपसँ उजड़ि गेल। फलतः हिनक आरम्भिक शिक्षा अपन मामा स्व. रामकृष्ण झा “किसुन” क सान्निध्यमे सुपौलसँ भेलनि। उच्च शिक्षाक हेतु ई दरभंगा चलि गेलाह आऽ ओतएसँ बी.ए. कएल। पश्चात् बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुरसँ हिन्दी एवं मैथिलीमे एम.ए. कएलनि। 
१९५६ ई. मे आकाशवाणी पटनामे मैथिली कार्यक्रमक लेल नियुक्त भेलाह। एहि अवधिमे मायानन्द बाबू १० गोट रेडियो नाटक लिखलनि जे अत्यन्त प्रशंसनीय रहल। १९६१ ई.मे ओऽ व्याख्याता, मैथिली विभाग, सहरसा कॉलेज सहरसा, पदपर नियुक्त कएल गेलाह, जतए ई विश्वविद्यालय आचार्य एवं मैथिली विभागाध्यक्षक पदकेँ सुशोभित कएल तथा एक सफल शिक्षकक रूपमे अगस्त १९९४ मे एही विभागसँ अवकाश ग्रहण कएलनि।
छात्रजीवनसँ हिनक सुकोमल गेय गीतक रचना-
“नभ आंगनमे पवनक रथपर कारी कारी बादरि आयल।
देखितहि धरणीक बिषम पियास, सजल-सजल भए गेल आकाश
बिजुरी केर कोमल कोरामे डुबइत सुरुज किरण अलसायल।
झिहरि-झिहरि सुनि गगनक गान, धरणि अधर पर मृदु मुसुकान
आकुल कोमल दूबरि दूभिक मनमे नव-नव आशा उमड़ल।” 
मैथिली काव्य मंचक श्रोताक हृदयकेँ जीति चुकल छल। 

आचार्य रमानाथ झाक “कविता कुसुम” मे ई कविता स्थान पाबि विश्वविद्यालयक पाठ्यक्रममे अध्ययन-अध्यापनक हेतु स्वीकृत भेल। हिनक उद्घोषण-कला आऽ मंच-संचालन कौशलसँ मैथिलीक कोन मंच नहि लाभान्वित भेल होएत। तेँ हिनका मैथिली मंचक सम्राट कहल जाइत छल। १९६० ई.सँ २००० ई. धरि सफलतम मंच संचालन आऽ अपन चुम्बकीय वाणीसँ मैथिली जनमानसकेँ अपना दिस आकृष्ट कएलनि। 
भाषा आन्दोलनक सूत्रधारक रूपमे हिनक सहयोगकेँ मिथिला आऽ मैथिली सेहो सभदिन स्मरण राखत।
पहिने मायानन्द जी कविता लिखलन्हि,पछाति जा कय हिनक प्रतिभा आलोचनात्मक निबंध, उपन्यास आ’ कथामे सेहो प्रकट भेलन्हि। भाङ्क लोटा, आगि मोम आ’ पाथर आओर चन्द्र-बिन्दु- हिनकर कथा संग्रह सभ छन्हि। बिहाड़ि पात पाथर , मंत्र-पुत्र ,खोता आ’ चिडै आ’ सूर्यास्त हिनकर उपन्यास सभ अछि॥ दिशांतर हिनकर कविता संग्रह अछि।
एकर अतिरिक्त सोने की नैय्या माटी के लोग, प्रथमं शैल पुत्री च,मंत्रपुत्र, पुरोहित आ’ स्त्री-धन हिनकर हिन्दीक कृति अछि। मंत्रपुत्र हिन्दी आ’ मैथिली दुनू भाषामे प्रकाशित भेल आ’ एकर मैथिली संस्करणक हेतु हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित कएल गेलन्हि। श्री मायानन्द मिश्र प्रबोध सम्मानसँ सेहो पुरस्कृत छथि। पहिने मायानन्द जी कोमल पदावलीक रचना करैत छलाह , पाछाँ जा’ कय प्रयोगवादी कविता सभ सेहो रचलन्हि।



 



श्री डॉ. गंगेश गुंजन । (१९४२)

जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी। एम.ए. (हिन्दी), रेडियो नाटक पर पी.एच.डी.। कवि, कथाकार, नाटककार आ’ उपन्यासकार।
१९६४-६५ मे पाँच गोटे कवि-लेखक “काल पुरुष”(कालपुरुष अर्थात् आब स्वर्गीय प्रभास कुमार चौधरी, श्री गंगेश गुन्जन, श्री साकेतानन्द, आब स्वर्गीय श्री बालेश्वर तथा गौरीकान्त चौधरीकान्त, आब स्वर्गीय) नामसँ सम्पादित करैत मैथिलीक प्रथम नवलेखनक अनियमितकालीन पत्रिका “अनामा”-जकर ई नाम साकेतानन्दजी द्वारा देल गेल छल आऽ बाकी चारू गोटे द्वारा अभिहित भेल छल- छपल छल।
ओहि समयमे ई प्रयास ताहि समयक यथास्थितिवादी मैथिलीमे पैघ दुस्साहस मानल गेलैक। फणीश्वरनाथ “रेणु” जी अनामाक लोकार्पण करैत काल कहलन्हि, “ किछु छिनार छौरा सभक ई साहित्यिक प्रयास अनामा भावी मैथिली लेखनमे युगचेतनाक जरूरी अनुभवक बाट खोलत आऽ आधुनिक बनाओत”।
“किछु छिनार छौरा सभक” रेणुजीक अपन अन्दाज छलन्हि बजबाक, जे हुनकर सन्सर्गमे रहल आऽ सुनने अछि, तकरा एकर व्यञ्जना आऽ रस बूझल हेतैक। ओना “अनामा”क कालपुरुष लोकनि कोनो रूपमे साहित्यिक मान्य मर्यादाक प्रति अवहेलना वा तिरस्कार नहि कएने रहथि। एकाध टिप्पणीमे मैथिलीक पुरानपंथी काव्यरुचिक प्रति कतिपय मुखर आविष्कारक स्वर अवश्य रहैक, जे सभ युगमे नव-पीढ़ीक स्वाभाविक व्यवहार होइछ। आओर जे पुरान पीढ़ीक लेखककेँ प्रिय नहि लगैत छनि आऽ सेहो स्वभाविके।
मुदा अनामा केर तीन अंक मात्र निकलि सकलैक। सैह अनाम्मा बादमे “कथादिशा”क नामसँ स्व.श्री प्रभास कुमार चौधरी आऽ श्री गंगेश गुंजन दू गोटेक सम्पादनमे -तकनीकी-व्यवहारिक कारणसँ-छपैत रहल। कथा-दिशाक ऐतिहासिक कथा विशेषांक लोकक मानसमे एखनो ओहिना छन्हि।
श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आऽ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित।
हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)। 




 

डॉ. प्रेमशंकर सिंह (१९४२) 
   ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा। मैथिलीक वरिष्ठ सृजनशील, मननशील आऽ अध्ययनशील प्रतिभाक धनी साहित्य-चिन्तक, दिशा-बोधक, समालोचक, नाटक ओ रंगमंचक निष्णात गवेषक, मैथिली गद्यकेँ नव-स्वरूप देनिहार, कुशल अनुवादक, प्रवीण सम्पादक, मैथिली, हिन्दी, संस्कृत साहित्यक प्रखर विद्वान् तथा बाङला एवं अंग्रेजी साहित्यक अध्ययन-अन्वेषणमे निरत प्रोफेसर डॉ. प्रेमशंकर सिंह ( २० जनवरी १९४२ )क विलक्षण लेखनीसँ एकपर एक अक्षय कृति भेल अछि निःसृत। 
हिनक बहुमूल्य गवेषणात्मक, मौलिक, अनूदित आऽ सम्पादित कृति रहल अछि अविरल चर्चित-अर्चित। ओऽ अदम्य उत्साह, धैर्य, लगन आऽ संघर्ष कऽ तन्मयताक संग मैथिलीक बहुमूल्य धरोरादिक अन्वेषण कऽ देलनि पुस्तकाकार रूप। हिनक अन्वेषण पूर्ण ग्रन्थ आऽ प्रबन्धकार आलेखादि व्यापक, चिन्तन, मनन, मैथिल संस्कृतिक आऽ परम्पराक थिक धरोहर। हिनक सृजनशीलतासँ अनुप्राणित भऽ चेतना समिति, पटना मिथिला विभूति सम्मान (ताम्र-पत्र) एवं मिथिला-दर्पण, मुम्बई वरिष्ठ लेखक सम्मानसँ कयलक अछि अलंकृत।
सम्प्रति चारि दशक धरि भागलपुर विश्वविद्यालयक प्रोफेसर एवं मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ अभिवर्द्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि, स्वतन्त्र सारस्वत-साधनामे। 

कृति-    लिप्यान्तरण-१. अङ्कीयानाट, मनोज प्रकाशन, भागलपुर, १९६७।
सम्पादन- १. गद्यवल्लरी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६६, २. नव एकांकी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६७, ३.पत्र-पुष्प, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९७०, ४.पदलतिका, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९८७, ५. अनमिल आखर, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००० ६.मणिकण, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ७.हुनकासँ भेट भेल छल, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००४, ८. मैथिली लोकगाथाक इतिहास, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, 

९. भारतीक बिलाड़ि, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, १०.चित्रा-विचित्रा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ११. साहित्यकारक दिन, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता, २००७. १२. वुआड़िभक्तितरङ्गिणी, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८, 

१३.मैथिली लोकोक्ति कोश, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, २००८, १४.रूपा सोना हीरा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००८।
पत्रिका सम्पादन- भूमिजा २००२
मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ 

६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८
मौलिक हिन्दी: १.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, प्रथमखण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७१ २.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, द्वितीय खण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७२, ३.हिन्दी नाटक कोश, नेशनल पब्लिकेशन हाउस, दिल्ली १९७६.

अनुवाद: हिन्दी एवं मैथिली- १.श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली १९८८, २.अरण्य फसिल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१ ३.पागल दुनिया, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१, ४.गोविन्ददास, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००७ ५.रक्तानल, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८. 


   

  डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’ (१९३८) 


    ग्राम+पोस्ट- हसनपुर, जिला-समस्तीपुर। पिता स्व. वीरेन्द्र नारायण सिँह, माता स्व. रामकली देवी। जन्मतिथि- २० जनवरी १९३८. एम.ए., डिप.एड., विद्या-वारिधि(डि.लिट)। सेवाक्रम: नेपाल आऽ भारतमे प्राध्यापन।
१.म.मो.कॉलेज, विराटनगर, नेपाल, १९६३-७३ ई.। 
२. प्रधानाचार्य, रा.प्र. सिंह कॉलेज, महनार (वैशाली), १९७३-९१ ई.। ३. महाविद्यालय निरीक्षक, बी.आर. अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर, १९९१-९८.
मैथिलीक अतिरिक्त नेपाली अंग्रेजी आऽ हिन्दीक ज्ञाता।
मैथिलीमे १.नेपालक मैथिली साहित्यक इतिहास(विराटनगर,१९७२ई.), २.ब्रह्मग्राम(रिपोर्ताज दरभंगा १९७२ ई.), ३.’मैथिली’ त्रैमासिकक सम्पादन (विराटनगर,नेपाल १९७०-७३ई.), ४.मैथिलीक नेनागीत (पटना, १९८८ ई.),
५.नेपालक आधुनिक मैथिली साहित्य (पटना, १९९८ ई.), ६. प्रेमचन्द चयनित कथा, भाग- १ आऽ २ (अनुवाद), ७. वाल्मीकिक देशमे (महनार, २००५ ई.)।
प्रकाशनाधीन: “विदापत” (लोकधर्मी नाट्य) एवं “मिथिलाक लोकसंस्कृति”।
भूमिका लेखन: १. नेपालक शिलोत्कीर्ण मैथिली गीत (डॉ रामदेव झा), २.धर्मराज युधिष्ठिर (महाकाव्य प्रो. लक्ष्मण शास्त्री), ३.अनंग कुसुमा (महाकाव्य डॉ मणिपद्म), ४.जट-जटिन/ सामा-चकेबा/ अनिल पतंग), ५.जट-जटिन (रामभरोस कापड़ि भ्रमर)।
अकादमिक अवदान: परामर्शी, साहित्य अकादमी, दिल्ली। कार्यकारिणी सदस्य, भारतीय नृत्य कला मन्दिर, पटना। सदस्य, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर। भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली। कार्यकारिणी सदस्य, जनकपुर ललित कला प्रतिष्ठान, जनकपुरधाम, नेपाल।
सम्मान: मौन जीकेँ साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार, २००४ ई., मिथिला विभूति सम्मान, दरभंगा, रेणु सम्मान, विराटनगर, नेपाल, मैथिली इतिहास सम्मान, वीरगंज, नेपाल, लोक-संस्कृति सम्मान, जनकपुरधाम,नेपाल, सलहेस शिखर सम्मान, सिरहा नेपाल, पूर्वोत्तर मैथिल सम्मान, गौहाटी, सरहपाद शिखर सम्मान, रानी, बेगूसराय आऽ चेतना समिति, पटनाक सम्मान भेटल छन्हि।
राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठीमे सहभागिता- इम्फाल (मणिपुर), गोहाटी (असम), कोलकाता (प. बंगाल), भोपाल (मध्यप्रदेश), आगरा (उ.प्र.), भागलपुर, हजारीबाग, (झारखण्ड), सहरसा, मधुबनी, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, वैशाली, पटना, काठमाण्डू (नेपाल), जनकपुर (नेपाल)।
मीडिया: भारत एवं नेपालक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे सहस्राधिक रचना प्रकाशित। आकाशवाणी एवं दूरदर्शनसँ प्रायः साठ-सत्तर वार्तादि प्रसारित।
अप्रकाशित कृति सभ: १. मिथिलाक लोकसंस्कृति, २. बिहरैत बनजारा मन (रिपोर्ताज), ३.मैथिलीक गाथा-नायक, ४.कथा-लघु-कथा, ५.शोध-बोध (अनुसन्धान परक आलेख)।
व्यक्तित्व-कृतित्व मूल्यांकन: प्रो. प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन: साधना और साहित्य, सम्पादक डॉ.रामप्रवेश सिंह, डॉ. शेखर शंकर (मुजफ्फरपुर, १९९८ई.)।
चर्चित हिन्दी पुस्तक सभ: थारू लोकगीत (१९६८ ई.), सुनसरी (रिपोर्ताज, १९७७), बिहार के बौद्ध संदर्भ (१९९२), हमारे लोक देवी-देवता (१९९९ ई.), बिहार की जैन संस्कृति (२००४ ई.), मेरे रेडियो नाटक (१९९१ ई.), सम्पादित- बुद्ध, विदेह और मिथिला (१९८५), बुद्ध और विहार (१९८४ ई.), बुद्ध और अम्बपाली (१९८७ ई.), राजा सलहेस: साहित्य और संस्कृति (२००२ ई.), मिथिला की लोक संस्कृति (२००६ ई.)।
वर्तमानमे मौनजी अपन गाममे साहित्य शोध आऽ रचनामे लीन छथि।

रामाश्रय झा “रामरंग” (१९२८-२००९ ) 

विद्वान, वागयकार, शिक्षक आऽ मंच सम्पादक छथि।
भारतीय शास्त्रीय संगीतक समर्पित आऽ विलक्षण ओऽ विख्यात संगीतज्ञ पं रामाश्रय झा ’रामरंग’ केर जन्म ११ अगस्त १९२८ ई. तदनुसारभाद्र कृष्णपक्ष एकादशी तिथिकेँ मधुबनी जिलान्तर्गत खजुरा नामक गाममे भेलन्हि।

हिनकर पिताक नाम पं सुखदेव झा आऽ काकाक नाम पं मधुसदन झा छन्हि। रामाश्रयजीक संगीत शिक्षा हिनका दुनू गोटेसँ हारमोनियम आऽ गायनक रूपमे मात्र ५ वर्षक आयुमे शुरू भए गेलन्हि। तकरा बाद श्री अवध पाठकजीसँ गायनक शिक्षा भेटलन्हि।

१५ वर्ष धरि बनारसक एकटा प्रसिद्ध नाटक कम्पनीमे रामाश्रय झा जी कम्पोजरक रूपमे कार्य कएलन्हि। पं भोलानाथ भट्ट जी सँ २५ वर्ष धरि ध्रुवपद, धमार, खयाल, ठुमरी, दादरा, टप्पा शैली सभक विधिवत शिक्षा लेलन्हि।
पं भट्ट जीक अतिरिक्त्त रामाश्रय झा जी पं बी.एन. ठकार (प्रयाग), उस्ताद हबीब खाँ (किराना), पं बी.एस. पाठक (प्रयाग) सँ सेहो संगीतक शिक्षा प्राप्त कएलन्हि।
पं झा १९५४ सँ प्रयागमे स्थाई रूपसँ रहि रहल छथि।

१९५५ ई.मे हिनकर नियुक्त्ति लूकरगंज संगीत विद्यालयमे संगीत अध्यापक रूपमे भेलन्हि। १९६० ई.मे हिनकर नियुक्त्ति प्रयाग संगीत समितिमे भेलन्हि, जतए १९७० धरि प्रभाकर आऽ संगीत प्रवीण कक्षाक शिक्षक रहलाह। १९७०मे इलाहाबाद विश्वविद्यालयक संगीत विभागाध्यक्ष श्री प्रो. उदयशंकर कोचकजी पं झाक संगीत क्षेत्रक सेवासँ प्रभावित भए विश्वविद्यालयमे हिनकर नियुक्त्ति कएलन्हि। पं झा उत्कृष्ट शिक्षक, गायक आऽ आकाशवाणीक प्रथम श्रेणीक कलाकार छथि। हिनकर अनेक शिष्य-शिष्या आकाशवाणीक प्रथम श्रेणीक कलाकार आऽ उत्तम शिक्षक छथि, जेना-
डॉ. गीता बनर्जी, श्रीमति कमला बोस, श्रीमति शुभा मुद्गल, श्रीकान्त वैश्य,श्री शान्ता राम कशालकर, श्री शान्ता राम कशालकर, श्री कामता खन्ना, श्रीमति सत्या दास, डॉ. रूपाली रानी झा, डॉ इला मालवीय, श्री अनिल कुमार शर्मा, श्री रामशंकर सिंह, श्रीमति संगीता सक्सेना, श्री राजन पर्रिकर, श्रीमति रचना उपाध्याय, श्री नरसिंह भट्त, श्री भूपेन्द्र शुक्ला, श्री जगबन्धु इत्यादि।

पं झा संगीत शास्त्र केर श्रेष्ठ लेखक छथि आऽ हिनकर लिखल अभिनव गीतांजलि केर पांचू भाग प्रकाशित भए चुकल अछि, जाहिमे २००सँ ऊपर रागक व्याख्या अछि आऽ दू हजारक आसपास बंदिश अछि।
मिथिलावासी श्री रामरंग राग तीरभुक्त्ति, राग वैदेही भैरव, आऽ राग विद्यापति कल्याण केर रचना सेहो कएने छथि आऽ मैथिली भाषामे हिनकर खयाल ’रंजयति इति रागः’ केर अनुरूप अछि।

अभिनव गीतांजलि, हुनकर उच्चकोटिक शास्त्र रचना अछि, जे पाँच भागमे अछि। अपन साहित्यिक वाणी, शाब्दिक रूप जे होइत अछि कोनो संगीत रचनाक, आऽ धातु जे अछि स्वरक लयक रचना आऽ एहि सभ गुणसँ युक्त्त छथि “रामरंग”। रामरंगक बंदिश वा रचनामे अहाँकेँ भेटत स्वर, शब्द आऽ मात्राक लयबद्ध बंधन। पुरान ध्रुपद जेकाँ पद्य आऽ स्वरकेँ ओऽ तेनाकेँ बान्हि दैत छथि, जे दुनू एक दोसरमे मिलि जाइत अछि।
हुनकर रचना हुनकर उच्चारणसँ मिलि कए मौलिक तात्त्विक स्थायी भरण, सभ बितैत दिन एकटा नव आत्मनिरीक्षण एकटा नव स्थायी।
रामरंगमे संगीतक लाक्षणिक तत्त्व प्रखर होइत छन्हि। संगीतक व्याकरणक सम्पूर्ण पकड़ छन्हि, जाहिसँ उचित शब्दक प्रयोगक निर्णय ओऽ कए पबैत छथि। 

छन्द शास्त्रक, कोषक, अलंकारक, भावक आऽ रसक वृहत् ज्ञान छन्हि रामरंगकेँ। संगहि स्थानीय संस्कृतिक, विभिन्न भाषाक आऽ ललित कलाक सिद्धान्तक सेहो गहन अध्ययन छन्हि रामाश्रय झा जीकेँ। वादन, गाय आऽ नृत्यक, साधल-कण्ठ, लय-ताल-काल, देशी राग, दोसराक मनसमे जाऽ कए बुझनिहार, नव लय आऽ अभ्व्यक्त्ति, प्रबन्धक समस्त ज्ञान, कम समयमे गीत रचना, विभिन्न मौखिक संरचना निर्माण, आलापक प्रदर्शन आऽ गमक एहि सभटामे पारंगत छथि रामरंग।
 
स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” (१९११-१९९८)
स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” केर जन्म १९११ ई. मे अपन मामागाम सतलखामे भेलन्हि, जे हुनकर गाम तरौनीक समीपहिमे अछि। यात्री जी अपन गामक संस्कृत पाठशालामे पढ़ए लगलाह, फेर ओऽ पढ़बाक लेल वाराणसी आऽ कलकत्ता सेहो गेलाह आऽ संस्कृतमे “साहित्य आचार्य” केर उपाधि प्राप्त कएलन्हि।

तकर बाद ओऽ कोलम्बो लग कलनिआ स्थान गेलाह पाली आऽ बुद्ध धर्मक अध्ययनक लेल। ओतए ओऽ बुद्धधर्ममे दीक्षित भए गेलाह आऽ हुनकर नाम पड़लन्हि नागार्जुन। यात्रीजी मार्क्सवादसँ प्रभावित छलाह। १९२९ ई. क अन्तिम मासमेमे मैथिली भाषामे पद्य लिखब शुरू कएलन्हि यात्री जी। १९३५ ई.सँ हिन्दीमे सेहो लिखए लगलाह। 

स्वामी सहजानन्द सरस्वती आऽ राहुल सांकृत्यायनक संग ओऽ किसान आन्दोलनमे संलग्न रहलाह आऽ १९३९ सँ १९४१ धरि एहि क्रममे विभिन्न
जेलक यात्रा कएलन्हि। हुनकर बहुत रास रचना जे महात्मा गाँधीक मृत्युक बाद लिखल गेल छल, प्रतिबन्धित कए देल गेल।

भारत-चीन युद्धमे कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा चीनकेँ देल समर्थनक बाद यात्रीजीक मतभेद कम्युनिस्ट पार्टीसँ भए गेलन्हि। जे.पी. अन्न्दोलनमे भाग लेबाक कारण आपात्कालमे हिनका जेलमे ठूसि देल गेल। यात्रीजी हिन्दीमे बाल साहित्य सेहो लिखलन्हि। हिन्दी आऽ मैथिलीक अतिरिक्त बांग्ला आऽ संस्कृतमे
सेहो हिनकर लेखन आएल। मैथिलीक दोसर साहित्य अकादमी पुरस्कार १९६९ ई. मे यात्रीजीकेँ हुनकर कविता संग्रह “पत्रहीन नग्न गाछ”पर भेटलन्हि।

१९९४ ई.मे हिनका साहित्य अकादमीक फेलो नियुक्त कएल गेल।
यात्रीजी जखन २० वर्षक छलाह तखन १२ वर्षक कान्यासँ हिनकर विवाह भेल। हिनकर पिता गोकुल मिश्र अपन समाजमे अशिक्षितक गिनतीमे छलाह, मुदा चरित्रहीन छलाह। यात्रीजीक बच्चाक स्मृति छन्हि, जे हुनकर पिता कोना हुनकर अस्वस्थ आऽ ओछाओन धेने मायपर कुरहड़ि लए मारबाक लेल उठल छलाह, जखन ओऽ बेचारी हुनकासँ अपन चरित्रहीनता छोड़बाक गुहारि कए रहल छलीह। 

यात्रीजी मात्र छ वर्षक छलाह जखन हुनकर माए हुनका छोड़ि प्रयाण कए गेलीह। यात्रीजीकेँ अपन पिताक ओऽ चित्र सेहो रहि-रहि सतबैत रहलन्हि जाहिमे हुनकासँ मातृवत प्रेम करएबाली हुनकर विधवा काकीक, हुनकर पिताक अवैध सन्तानक गर्भपातमे, लगभग मृत्यु भए गेल छलन्हि। के एहन पाठक होएत जे यात्रीजीक हिन्दीमे लिखल “रतिनाथ की चाची” पढ़बाक काल बेर-बेर नहि कानल होएताह। पिता-पुत्रक ई घमासान एहन बढ़ल जे पुत्र अपन बाल-पत्नीकेँ पिता लग छोड़ि वाराणसी प्रयाण कए गेलाह। 

कर्मक फल भोगथु बूढ़ बाप हम टा संतति, से हुनक पाप ई जानि ह्वैन्हि जनु मनस्ताप अनको बिसरक थिक हमर नाम माँ मिथिले, ई अंतिम प्रणाम! (काशी/ नवंबर १९३६) काशीसँ श्रीलंका प्रयाण “कर्मक फल भोगथु बूढ़ बाप” ई कहि यात्रीजी अपन पिताक प्रति सभ उद्गार बाहर कए दैत छथि। १९४१ ई. मे यात्रीजी पत्नी, अपराजिता, लग आबि गेलथि।
१९४१ ई. मे यात्रीजी दू टा मैथिली कविता लिखलन्हि- “बूढ़ वर” आऽ विलाप आऽ एकरा पाम्फलेट रूपमे छपबाए ट्रेनक यात्री लोकनिकेँ बेचलन्हि।जीविकाक ताकिमे सौँसे भारत दुनू प्राणी घुमलाह। पत्नीक जोर देलापर बीच- बीचमे तरौनी सेहो घुमि कए आबथि। आऽ फेर अएल १९४९ ई. अपना संग लेने यात्रीजीक पहिल मैथिली कविता-संग्रह “चित्रा”। 

१९५२ ई. धरि पत्नी संगमे घुमैत रहलथिन्ह, फेर तरौनीमे रहए लगलीह। यात्रीजी बीच- बीचमे आबथि। अपराजितासँ यात्रीजीकेँ छह टा सन्तान भेलन्हि, आऽ सभक सभ भार ओऽ अपना कान्हपर लेने रहलीह। यात्रीजी दमासँ परेशान रहैत छलथि। हम जखन दरभंगामे पढ़ैत रही तँ यात्रीजी ख्वाजा सरायमे रहैत छलाह। हमरा मोन अछि जे मैथिलीक कोनो कार्यक्रममे यात्रीजी आएल छलाह आऽ कम्युनिस्ट पार्टीबला सभ एजेन्डा छीनि लेने छल। 

अगिले दिन यात्रीजी अपनाकेँ ओहि धोधा- धोखीमे गेल सभाक कार्यवाहीसँ हटा लेलन्हि। एमर्जेन्सीमे जेल गेलाह तँ आर.एस.एस. केर कार्यकर्ता लोकनिसँ जेलमे भेँट भेलन्हि। आऽ जे.पी.क सम्पूर्ण क्रान्तिक विरुद्ध सेहो जेलसँ बाहर अएलाक बाद लिखलन्हि यात्रीजी। 

यात्रीजी मैथिलीमे बैद्यनाथ मिश्र "यात्री" आऽ हिन्दीमे नागार्जुन केर नामसँ रचना लिखलन्हि। “पृथ्वी ते पात्रं” १९५४ ई. मे “वैदेही”मे प्रकाशित भेल छल, हमरा सभक मैट्रिकक सिलेबसमे छल। यात्रीजी लिखैत छथि- “आन पाबनि तिहार तँ जे से। मुदा नबान निर्भूमि परिवारकेँ देखार कए दैत छैक। से कातिक अबैत देरी अपराजिता देवीक घोघ लटकि जाइन्हि। कचोटेँ पपनियो नहि उठा होइन्ह ककरो दिश! बेसाहल अन्नसँ कतउ नबान भेलइए”?

आऽ अन्तमे यात्रीजीक संस्कृत
पद्य:- वासन्ती कनकप्रभा प्रगुणिता
पीतारुर्णेः पल्लवैः
हेमाम्भोजविलासविभ्रमरता
दूरे द्विरेफाः स्ता
यैशसण्डलकेलिकानन कथा
विस्मरिता भूतले
छायाविभ्रमतारतम्यतरलाः
तेऽमी “चिनार” द्रुमाः॥
बसंतक स्वर्णिम आभा द्विगुणित भऽ गेल
अछि पीयर-लाल कोपड़सँ। स्वर्णकाल भ्रममे
भौरा सभ एकरासँ दूर-दूर रहैत अछि। नन्दनवनक विहार जे
पृथ्वीपर बिसारि दैत छथि, छाह झिलमिल घटैत-बढ़ैत
जिनक डोलब अछि चंचल आ तरल। ओही चिनारकेँ
हम देखने छी अडिग भेल ठाढ़।

        तारानन्द वियोगी (१९६६)

महिषी, सहरसामे जन्म। मैथिलीक समर्थ कवि, कथाकार आऽ समालोचक। पिता श्री बद्री महतो, माता श्रीमति बदामी देवी।
संस्कृत साहित्यमे आचार्य, एम.ए., पी.एच.डी. आदि कयलाक बाद केन्द्रीय विद्यालयमे अध्यापक भेलाह। सम्प्रति बिहार प्राशासनिक सेवामे छथि। १९७९ ई.मे पहिल रचना “मिथिला मिहिर”मे प्रकाशित भेलन्हि। ताहिसँ पहिने संगी लोकनि हिनकर एकटा कविता संग्रह छापि चुकल छलाह।
पहिल पोथी अपन युद्धक साक्ष्य (गजल संग्रह) १९९१ मे प्रकाशित। अन्य पुस्तक हस्तक्षेप (कविता-संग्रह), अतिक्रमण (कथा-संग्रह), शिलालेख(लघुकथा संग्रह), कर्मधारय। रमेशक संग राजकमल चौधरीक कथाकृति एकटा चंपाकली एकटा विषधर कऽ संपादन कयलनि।
स्वातन्त्र्योत्तर मैथिली कथा संग्रह देसिल बयनाक संपादन। कहियो काल हिन्दीमे लिखैत छथि। अपन हिन्दी कविताक लेल वर्ष १९९५ मे “मुक्तिबोध पुरस्कार”सँ सम्मानित। मैथिलीक श्रेष्ठ साहित्यकेँ राष्ट्रीय धरातलपर अनूदित-प्रसारित करबामे विशेष रुचि। पं. गोविन्द झाक महत्वपूर्ण उपन्यास भनहि विद्यापति तथा मैथिली की प्रतिनिधि कहानियाँ अनूदित-संपादित।
एक संपादित कृति राजकमल चौधरी: सृजन के आयाम। समय-समयपर मैथिली हिन्दीमे कैक गोट पत्रिका/ संकलनक संपादन कयलनि। किछु रचना बंगला, तेलुगु, अंग्रेजीमे अनूदित भेलनि अछि।




   


भालचन्द्र झा
ए.टी.डी., बी.ए., (अर्थशास्त्र), मुम्बईसँ थिएटर कलामे डिप्लोमा। मैथिलीक अतिरिक्त हिन्दी, मराठी, अग्रेजी आऽ गुजरातीमे निष्णात।
१९७४ ई.सँ मराठी आऽ हिन्दी थिएटरमे निदेशक। महाराष्ट्र राज्य उपाधि १९८६ आऽ १९९९ मे। थिएटर वर्कशॉप पर अतिथीय भाषण आऽ नामी संस्थानक नाटक प्रतियोगिताक हेतु न्यायाधीश।
आइ.एन.टी. केर लेल नाटक “सीता” केर निर्देशन। “वासुदेव संगति” आइ.एन.टी.क लोक कलाक शोध आऽ प्रदर्शनसँ जुड़ल छथि आऽ नाट्यशालासँ जुड़ल छथि विकलांग बाल लेल थिएटरसँ।
निम्न टी.वी. मीडियामे रचनात्मक निदेशक रूपेँ कार्य- आभलमया (मराठी दैनिक धारावाहिक ६० एपीसोड), आकाश (हिन्दी, जी.टी.वी.), जीवन संध्या (मराठी), सफलता (रजस्थानी), पोलिसनामा (महाराष्ट्र शासनक लेल), मुन्गी उदाली आकाशी (मराठी), जय गणेश (मराठी), कच्ची-सौन्धी (हिन्दी डी.डी.), यात्रा (मराठी), धनाजी नाना चौधरी (महाराष्ट्र शासनक लेल), श्री पी.के अना पाटिल (मराठी), स्वयम्बर (मराठी), फिर नहीं कभी नहीं( नशा-सुधारपर), आहट (एड्सपर), बैंगन राजा (बच्चाक लेल कठपुतली शो), मेरा देश महान (बच्चाक लेल कठपुतली शो), झूठा पालतू(बच्चाक लेल कठपुतली शो),
टी.वी. नाटक- बन्दी (लेखक- राजीव जोशी), शतकवली (लेखक- स्व. उत्पल दत्त), चित्रकाठी (लेखक- स्व. मनोहर वाकोडे), हृदयची गोस्ता (लेखक- राजीव जोशी), हद्दापार (लेखक- एह.एम.मराठे), वालन (लेखक- अज्ञात)।
लेखन-
बीछल बेरायल मराठी एकांकी, सिंहावलोकन (मराठी साहित्यक १५० वर्ष), आकाश (जी.टी.वी.क धारावाहिकक ३० एपीसोड), जीवन सन्ध्या( मराठी साप्ताहिक, डी.डी, मुम्बई), धनाजी नाना चौधरी (मराठी), स्वयम्बर (मराठी), फिर नहीं कभी नहीं( हिन्दी), आहट (हिन्दी), यात्रा ( मराठी सीरयल), मयूरपन्ख ( मराठी बाल-धारावाहिक), हेल्थकेअर इन २०० ए.डी.) (डी.डी.)।
थिएटर वर्कशॉप- कला विभाग, महाराष्ट्र सरकार, अखिल भारतीय मराठी नाट्य परिषद, दक्षिण-मध्य क्षेत्र कला केन्द्र, नागपुर, स्व. गजानन जहागीरदारक प्राध्यापकत्वमे चन्द्राक फिल्मक लेल अभिनय स्कूल, उस्ताद अमजद अली खानक दू टा संगीत प्रदर्शन।
श्री भालचन्द्र झा एखन फ़्री-लान्स लेखक-निदेशकक रूपमे कार्यरत छथि।

   


श्री रामभरोस कापड़ि “भ्रमर” (१९५१) 



जन्म-बघचौरा, जिला धनुषाटी (नेपाल)। सम्प्रति-जनकपुरधाम, नेपाल। त्रिभुवन विश्वविद्यालयसँ एम.ए., पी.एच.डी. (मानद)।


हाल: प्रधान सम्पादक: गामघर साप्ताहिक, जनकपुर एक्सप्रेस दैनिक, आंजुर मासिक, आंगन अर्द्धवार्षिक (प्रकाशक नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान, कमलादी)।
मौलिक कृति: बन्नकोठरी: औनाइत धुँआ (कविता संग्रह), नहि, आब नहि (दीर्घ कविता), तोरा संगे जएबौ रे कुजबा (कथा संग्रह, मैथिली अकादमी पटना, १९८४), मोमक पघलैत अधर (गीत, गजल संग्रह, १९८३), अप्पन अनचिन्हार (कविता संग्रह, १९९० ई.), रानी चन्द्रावती (नाटक), एकटा आओर बसन्त (नाटक), महिषासुर मुर्दाबाद एवं अन्य नाटक (नाटक संग्रह), अन्ततः (कथा-संग्रह), मैथिली संस्कृति बीच रमाउंदा (सांस्कृतिक निबन्ध सभक संग्रह), बिसरल-बिसरल सन (कविता-संग्रह), जनकपुर लोक चित्र (मिथिला पेंटिङ्गस), लोक नाट्य: जट-जटिन (अनुसन्धान)।


नेपाली कृति: आजको धनुषा, जनकपुरधाम र यस क्षेत्रका सांस्कृतिक सम्पदाहरु (आलेख-संग्रह), भ्रमरका उत्कृष्ट नाटकहरु (अनुवाद)।
सम्पादन: मैथिली पद्य संग्रह (नेपाल राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठान), लाबाक धान (कविता संग्रह), माथुरजीक “त्रिशुली” खण्डकाव्य (कवि स्व. मथुरानन्द चौधरी “माथुर”), नेपालमे मैथिली पत्रकारिता, मैथिली लोक नृत्य: भाव, भंगिमा एवं स्वरूप (आलेख संग्रह)। गामघर साप्ताहिकक २६ वर्षसँ सम्पादन-प्रकाशन, “अर्चना” साहित्यिक संग्रहक १५ वर्ष धरि सम्पादन-प्रकाशन। “आँजुर” मैथिली मासिकक सम्पादन प्रकाशन, “अंजुली” नेपाली मासिक/ पाक्षिकक सम्पादन प्रकाशन।


अनुवाद: भयो, अब भयो (“नहि आब नहि”क मनु ब्राजाकीद्वारा कयल नेपाली अनुवाद)


सम्मान: नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान द्वारा पहिल बेर १९९५ ई.मे घोषित ५० हजार टाकाक मायादेवी प्रज्ञा पुरस्कारक पहिल प्राप्तकर्ता। प्रधानमंत्रीद्वारा प्रशस्तिपत्र एवं पुरस्कार प्रदान। 


विद्यापति सेवा संस्थान दरिभङ्गाद्वारा सम्मानित, मैथिली साहित्य परिषद, वीरगंजद्वारा सम्मानित, “आकृति” जनकपुर द्वारा सम्मानित, दीर्घ पत्रकारिता सेवाक लेल नेपाल पत्रकार महासंघ धनुषाद्वारा सम्मानित, जिल्ला विकास समिति धनुषा द्वारा दीर्घ पत्रकारिता सेवाक लेल पुरस्कृत एवं सम्मानित, नेपाली मैथिली साहित्य परिषद द्वारा २०५९ सालक अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन मुम्वई द्वारा “मिथिला रत्न” द्वारा सम्मानित, शेखर प्रकाशन “पटना” द्वारा “शेखर सम्मान”, मधुरिमा नेपाल (काठमाण्डौ) द्वारा २०६३ सालक मधुरिमा सम्मान प्राप्त। काठमाण्डूमे आयोजित सार्कस्तरीय कवि गोष्ठीमे मैथिली भाषाक प्रतिनिधित्व।


सामाजिक सेवा : अध्यक्ष-तराई जनजाति अध्ययन प्रतिष्ठान, जनकपुर, अध्यक्ष- जनकपुर ललित कला प्रतिष्ठान, जनकपुर, उपाध्यक्ष- मैथिली प्रज्ञा प्रतिष्ठान, जनकपुर, उपकुलपति- मैथिली अकादमी, नेपाल, उपाध्यक्ष- नेपाल मैथिली थाई सांस्कृतिक परिषद, सचिव- दीनानाथ भगवती समाज कल्याण गुठी, जनकपुर, सदस्य- जिल्ला वाल कल्याण समिति, धनुषा, सदस्य- मैथिली विकास कोष, धनुषा, राष्ट्रीय पार्षद- नेपाल पत्रकार महासंघ, धनुषा।





प्रोफेसर उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’
जन्म-१९५१ ई. कलकत्तामे।
शिक्षा- बी. ए. (सम्मान) भाषाविज्ञान (प्रथम ईशान स्कॉलर) कलकत्ता विश्वविद्यालय, कलकत्ता
एम.ए. भाषाविज्ञान, पी-एचडी. भाषाविज्ञान, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली ।
रचना संसार- मैथिली साहित्य मध्य छद्म नाम ‘नचितकेता’क नामे, मैथिली आ बंगला साहित्यक कवि आ नाटककारक रूपमे प्रख्यात श्री सिंह एखन धरि चारि कविता संग्रह, एगारह गोट नाटक (मैथिलीमे), छओ साहित्यिक निबंध आ दू टा कविता संग्रह (बांग्लामे), एकर अतिरिक्त एहि दुनू भाषामे आ अंग्रेजीमे कतोक पुस्तकक अनुवाद क’ चुकल छथि।
१९६६ मे १५ वर्षक उम्रमे पहिल काव्य संग्रह ‘कवयो वदन्ति’। १९७१ ‘अमृतस्य पुत्राः’ (कविता संकलन) आऽ ‘नायकक नाम जीवन’ (नाटक)| १९७४ मे ‘एक छल राजा’/ ’नाटकक लेल’ (नाटक)। १९७६-७७ ‘प्रत्यावर्त्तन’/ ’रामलीला’(नाटक)। १९७८मे जनक आऽ अन्य एकांकी। १९८१ ‘अनुत्तरण’(कविता-संकलन)। १९८८ ‘प्रियंवदा’ (नाटिका)।
१९९७-‘रवीन्द्रनाथक बाल-साहित्य’(अनुवाद)। १९९८ ‘अनुकृति’- आधुनिक मैथिली कविताक बंगलामे अनुवाद, संगहि बंगलामे दूटा कविता संकलन। १९९९ ‘अश्रु ओ परिहास’। २००२ ‘खाम खेयाली’। २००६मे ‘मध्यमपुरुष एकवचन’(कविता संग्रह। २००८ ई. मे नाटक “नो एण्ट्री: मा प्रविश” सम्पूर्ण रूपेँ “विदेह” ई- पत्रिकामे धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित भए एकटा कीर्तिमान बनेलक। भाषा-विज्ञानक क्षेत्रमे दसटा पोथी आऽ दू सयसँ बेशी शोध-पत्र प्रकाशित। १४ टा पी.एच.डी. आऽ २९ टा एम.फिल. शोध-कर्मक दिशा निर्देश।
आन साहित्यिक गतिविधि- प्रो. सिंह बांगलादेश, कॅरबियन आयलैंड, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नेपाल, पाकिस्तान, रूस, सिंगापुर, स्वीडन, थायलैंड आर अमेरिकामे विविध विषय पर अपन व्याख्यान देने छथि।
इंडो-इटैलियन कल्चरल एक्सचेंज फॉर क्रिएटिव रायटर्सक सदस्य(1999), त्रिनिदाद आर टॉबेगो मे कार्यालयी प्रतिनिधिक सदस्य (2002), आ मॉरीशस (2005), फ्रैंकफर्ट पुस्तक मेलामे आमंत्रित कवि, जतय ‘इंडिया गेस्ट ऑफ ऑनर’ सँ सम्मानित भेलाह (2006), हालहिमे चीन मे संपन्न एगारह लेखकक सांस्कृतिक प्रतिनिधिक प्रमुखक रूपमे भाग नेने छलाह।
कार्यक्षेत्र- महाराजा सियाजी राव विश्वविद्यालय,बड़ौदा,(1979-81), दक्षिणी गुजरात विश्वविद्यालय (1981-85), दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली (1985-87), हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद,(1987-2000) मे भाषाविज्ञानक प्रोफेसर, ओ अतिथि प्रोफेसरक रूपमे इंडियन इन्स्टीच्यूट ऑफ एडवांस स्टडी, शिमला (1989) मे काज करैत वर्तमानमे केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर मे निदेशकक पद पर आसीन छथि।