dahej mukt mithila

(एकमात्र संकल्‍प ध्‍यान मे-मिथिला राज्‍य हो संविधान मे) अप्पन गाम घरक ढंग ,अप्पन रहन - सहन के संग,अप्पन गाम-अप्पन बात में अपनेक सब के स्वागत अछि!अपन गाम -अपन घरअप्पन ज्ञान आ अप्पन संस्कारक सँग किछु कहबाक एकटा छोटछिन प्रयास अछि! हरेक मिथिला वाशी ईहा कहैत अछि... छी मैथिल मिथिला करे शंतान, जत्य रही ओ छी मिथिले धाम, याद रखु बस अप्पन गाम - अप्पन बात ,अप्पन मान " जय मैथिल जय मिथिला धाम" "स्वर्ग सं सुन्दर अपन गाम" E-mail: apangaamghar@gmail.com,madankumarthakur@gmail.com mo-9312460150

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शुक्रवार, 26 मार्च 2021

अजी हाँ! बिहार हूँ मैं

चाणक्य की नीति हूँ , आर्यभट्ट का आविष्कार हूँ मैं ।

महावीर की तपस्या हूँ , बुद्ध का अवतार हूँ मैं।

अजी हाँ! बिहार हूँ मैं।।

सीता की भूमि हूँ , विद्यापति का संसार हूँ मैं।

जनक की नगरी हूँ, माँ गंगा का श्रंगार हूँ मैं।

अजी हाँ! बिहार हूँ मैं।।

चंद्रगुप्त का साहस हूँ , अशोक की तलवार हूँ मैं।

बिंदुसार का शासन हूँ , मगध का आकार हूँ मैं।

अजी हाँ! बिहार हूँ मैं।।

दिनकर की कविता हूँ, रेणु का सार हूँ मैं।

नालंदा का ज्ञान हूँ, पर्वत मन्धार हूँ मैं।

अजी हाँ! बिहार हूँ मैं।

वाल्मिकी की रामायण हूँ, मिथिला का संस्कार हूँ मैं पाणिनी का व्याकरण हूँ , ज्ञान का भण्डार हूँ मैं।

अजी हाँ! बिहार हूँ मैं।

राजेन्द्र का सपना हूँ, गांधी की हुंकार हूँ मैं।

गोविंद सिंह का तेज हूँ , कुंवर सिंह की ललकार हूँ मैं।

अजी हाँ! बिहार हूँ मैं।।

जय बिहार जय मिथला

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

भिक्षुक ✍️ दीपिका झा

 


तपती सूरज की गर्मी में, 

कुदरत की थोरी नर्मी में, 

वृक्षों की छाँव तले बैठा, 

एक भिक्षुक राह निहार रहा.....। 

इस राह में राही दिखता था, 

जिनसे जीने का रिश्ता था, 

अब वो भी घर में है बैठा, 

कुदरत ने ऐसा प्रहार किया......। 

नऽ चाह मेरी थी महलों की, 

उत्तम परिधान नऽ गहनो की, 

बस भूख की उठती ज्वाला को, 

कुछ मिला तो उससे शांत किया.....।

उसमें भी तुझको हे भगवन,

क्या नऽ पिघला कभी तेरा मन, 

क्या सोच समझ कर तूने प्रभु, 

मुझ निर्धन को ये संताप दिया.....।

इस रुठी सी सूनी नगरी में, 

जहाँ थे सब अफरा-तफरी में, 

बेजान से सब हैं बन बैठे, 

किस शत्रु ने ऐसा आघात किया... ? 

वैसे भी कम क्या दूरी थी, 

ढेरों सबकी मजबूरी थी, 

ये कैसा ग्रहण लगाया प्रभु, 

किस घात का ये प्रतिघात किया......?

हमसे मुंह मोड़ के थे बैठे,

नऽ जाने कब से थे रुठे,

पर,और तो तेरा था प्यारा, 

जिनसे हम आश लगाए थे......। 

जीने की अब तू राह दिखा, 

हे हम निर्धन के कृष्ण सखा, 

कर इस धरती को फिर वैसे, 

जिस कृपा की हम साये में थे........।।

_✍️ दीपिका झा

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

दीपिका झा - ✍️

 चाहे सहस्त्रों वर्ष है बीत गए,

पर राजनीति वैसी ही है।

पुत्र मोह में अंधा बना है सब,

राष्ट्रमोह की ऐसी-तैसी है।

अब न कुछ अंतर है बचा यहां,

इस कलयुग और धृतराष्ट्र युग में।

बस,तब का मंत्री शुभचिंतक था,

अब चाटुकार भरें हैं इस युग में।

तब नेत्रहीन नृप देखता था,

हर पाशा जिसको वह फेकता था।

किस क़दम का क्या प्रतिफल होगा,

बंद नेत्रों से सब देखता था।

अब नेत्रवान नृप अंधा है,

जो सेवा को समझा धंधा है।

तब तो एक विदुर ने चेता दिया,

राष्ट्र हित क्या है वो बता गया,

अपने कर्तव्य को करते हुए,

नृप के कर्तव्य को बता गया।

अब ना वो विदुर ना द्वापर है,

ना शुभचिंतक यहां, बस चाकर है।

सच से यहां समुचित दूरी है,

जो कर्तव्य है वो,मजबूरी है।

सत्ता, पुत्र मोह बस ज़रूरी है,

जनता की आश अधूरी है।

वह विदुर तो परम धर्मात्मा था,

मानव के रूप परमात्मा था।

जो ज्ञानी था, राजनीतिज्ञ था,

दूरदर्शी था,देशभक्त भी था।

वह बोला,मुंह भी खोला,

पर मृतात्मा की तब भरमार थी।

सब त्याग के रण को छोड़ चला,

जब चंहुओर भयंकर हाहाकार थी।

जहां विदुर जैसे शुभचिंतक से,

महाविनाश, संग्राम न रुक पाया।

किसी चुप्पी का प्रतिफल था शायद वो,

जहां ज्ञानी का ज्ञान न रंग लाया।

यह सीख लो कलयुग के विदुरों,

न अन्याय को देख आंखें मूंदो।

द्रौपदी चीरहरण हो या द्युद भवन,

अन्याय को यथाशीघ्र रौंदो।

उठती चिंगारी को न सुलगने दो,

विकराल रूप न पकड़ने दो।

द्वापर के विदुर से सीख के,

न किसी डर से आंखें मूंदो।

हो कड़वी बातें पर सच्ची हो,

जनहित के लिए पर अच्छी हो।

करो विरोध उस देशद्रोही नृप का,

अधर्मी और पुत्र मोही नृप का।

जो लिए रूप धृतराष्ट्र, द्रोण,कृप का।

यदि विरोध नहीं अब करोगे तो,

रणभूमि फिर से तैयार होगा।

जिसमें दुराचारी तन का विनाश होगा ही,

पर सदाचारी आत्मा पे भी प्रहार होगा।

नाम :- दीपिका झा

नैहर (जन्मस्थान) :- पोखरौनी (मधुबनी)

सासुर:- बसौली (मधुबनी) 

नानीगांव :- नवगांव (दरभंगा)

विगत पंद्रह साल सं पुणे (महाराष्ट्र) में रहि रहल छी।

गुरुवार, 7 जनवरी 2021

अपने प्रभु श्रीराम जी के मंदिर के लिए अंशदान अवश्य करें


 अगले कुछ दिनों में कोई न कोई राम सेवक श्री रामजन्म भूमि समर्पण निधि संग्रह हेतु   आपकें दरवाजे तक ज़रूर आएगा,आपसे करबद्ध प्रार्थना कि दिल खोलकर इस परम धार्मिक कार्य में तन,मन,धन से स्वयम तो सहयोग करें ही साथ ही साथ अपने इष्ट मित्रों तथा सगे सम्बन्धियों को भी इस पुनीत कार्य हेतु प्रेरित करें!*

*हम सभी का ये परम सौभाग्य है कि हमे अपने आराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम भगवाम राम के मंदिर निर्माण हेतु अंशदान करने का अवसर मिला है इसलिए इसमें खूब बढ़ चढ़कर सहयोग कर पुण्यलाभ के भागी बनें!*

*हमारी कितनी पीढ़ियां जिसके लिए प्रतीक्षा कर कर के स्वर्गवासी हो गईं उनकी संतत होने के कारण हमारा ये कर्तब्य बनता है कि हम उनके भी हिस्से का अंशदान अपनी सामर्थ्य अनुसार करके उन्हें गौरवान्वित करें औऱ उनका आशीर्वाद प्राप्त करें! क्यूंकि ऐसा शुभ अवसर जीवन में दुबारा नहीं प्राप्त हो सकता हैl*


*अपने प्रभु श्रीराम जी के मंदिर के लिए अंशदान अवश्य करेंl*  

*जय श्री राम 

गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

वेद-ज्ञान



प्र.1-  वेद किसे कहते है ?

उत्तर-  ईश्वरीय ज्ञान की पुस्तक को वेद कहते है।

प्र.2-  वेद-ज्ञान किसने दिया ?

उत्तर-  ईश्वर ने दिया।

प्र.3-  ईश्वर ने वेद-ज्ञान कब दिया ?

उत्तर-  ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ में वेद-ज्ञान दिया।

प्र.4-  ईश्वर ने वेद ज्ञान क्यों दिया ?

उत्तर- मनुष्य-मात्र के कल्याण   के लिए।

प्र.5-  वेद कितने है ?

उत्तर- चार ।                                                  

1-ऋग्वेद 

2-यजुर्वेद  

3-सामवेद

4-अथर्ववेद

प्र.6-  वेदों के ब्राह्मण ।

        वेद          -     ब्राह्मण

1 - ऋग्वेद      -     ऐतरेय

2 - यजुर्वेद      -    शतपथ

3 - सामवेद     -    तांड्य

4 - अथर्ववेद   -   गोपथ

प्र.7-  वेदों के उपवेद कितने है।

उत्तर -  चार।

      वेद                 -    उपवेद

    1- ऋग्वेद        -    आयुर्वेद

    2- यजुर्वेद       -    धनुर्वेद

    3 -सामवेद      -     गंधर्ववेद

    4- अथर्ववेद    -     अर्थवेद

प्र 8-  वेदों के अंग हैं ।

उत्तर -  छः ।

1 - शिक्षा

2 - कल्प

3 - निरूक्त

4 - व्याकरण

5 - छंद

6 - ज्योतिष

प्र.9- वेदों का ज्ञान ईश्वर ने किन किन ऋषियो को दिया ?

उत्तर- चार ऋषियों को।

         वेद           -      ऋषि

1- ऋग्वेद         -      अग्नि

2 - यजुर्वेद       -       वायु

3 - सामवेद      -      आदित्य

4 - अथर्ववेद    -     अंगिरा

प्र.10-  वेदों का ज्ञान ईश्वर ने ऋषियों को कैसे दिया ?

उत्तर- समाधि की अवस्था में।

प्र.11-  वेदों में कैसे ज्ञान है ?

उत्तर-  सब सत्य विद्याओं का ज्ञान-विज्ञान।

प्र.12-  वेदो के विषय कौन-कौन से हैं ?

उत्तर-   चार ।

        ऋषि        विषय

1-  ऋग्वेद    -    ज्ञान

2-  यजुर्वेद    -    कर्म

3-  सामवे     -    उपासना

4-  अथर्ववेद -    विज्ञान

प्र.13-  वेदों में।

ऋग्वेद में।

1-  मंडल      -  10

2 - अष्टक     -   08

3 - सूक्त        -  1028

4 - अनुवाक  -   85 

5 - ऋचाएं     -  10589

यजुर्वेद में।

1- अध्याय    -  40

2- मंत्र           - 1975

सामवेद में।

1-  आरचिक   -  06

2 - अध्याय     -   06

3-  ऋचाएं       -  1875

अथर्ववेद में।

1- कांड      -    20

2- सूक्त      -   731

3 - मंत्र       -   5977

प्र.14-  वेद पढ़ने का अधिकार किसको है ?                                                                                                                   उत्तर-  मनुष्य-मात्र को वेद पढ़ने का अधिकार है।

प्र.15-  क्या वेदों में मूर्तिपूजा का विधान है ?

उत्तर-  बिलकुल भी नहीं।

प्र.16-  क्या वेदों में अवतारवाद का प्रमाण है ?

उत्तर-  नहीं।

प्र.17-  सबसे बड़ा वेद कौन-सा है ?

उत्तर-  ऋग्वेद।

प्र.18-  वेदों की उत्पत्ति कब हुई ?

उत्तर-  वेदो की उत्पत्ति सृष्टि के आदि से परमात्मा द्वारा हुई । अर्थात 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 43 हजार वर्ष पूर्व । 

प्र.19-  वेद-ज्ञान के सहायक दर्शन-शास्त्र ( उपअंग ) कितने हैं और उनके लेखकों का क्या नाम है ?

उत्तर- 

1-  न्याय दर्शन  - गौतम मुनि।

2- वैशेषिक दर्शन  - कणाद मुनि।

3- योगदर्शन  - पतंजलि मुनि।

4- मीमांसा दर्शन  - जैमिनी मुनि।

5- सांख्य दर्शन  - कपिल मुनि।

6- वेदांत दर्शन  - व्यास मुनि।

प्र.20-  शास्त्रों के विषय क्या है ?

उत्तर-  आत्मा,  परमात्मा, प्रकृति,  जगत की उत्पत्ति,  मुक्ति अर्थात सब प्रकार का भौतिक व आध्यात्मिक  ज्ञान-विज्ञान आदि।

प्र.21-  प्रामाणिक उपनिषदे कितनी है ?

उत्तर-  केवल ग्यारह।

प्र.22-  उपनिषदों के नाम बतावे ?

उत्तर-  

01-ईश ( ईशावास्य )  

02-केन  

03-कठ  

04-प्रश्न  

05-मुंडक  

06-मांडू  

07-ऐतरेय  

08-तैत्तिरीय 

09-छांदोग्य 

10-वृहदारण्यक 

11-श्वेताश्वतर 

प्र.23-  उपनिषदों के विषय कहाँ से लिए गए है ?

उत्तर- वेदों से।

प्र.24- चार वर्ण।

उत्तर- 

1- ब्राह्मण

2- क्षत्रिय

3- वैश्य

4- शूद्र

प्र.25- चार युग।

1- सतयुग - 17,28000  वर्षों का नाम ( सतयुग ) रखा है।

2- त्रेतायुग- 12,96000  वर्षों का नाम ( त्रेतायुग ) रखा है।

3- द्वापरयुग- 8,64000  वर्षों का नाम है।

4- कलयुग- 4,32000  वर्षों का नाम है।

कलयुग के  4,976  वर्षों का भोग हो चुका है अभी तक।

4,27024 वर्षों का भोग होना है। 

पंच महायज्ञ

       1- ब्रह्मयज्ञ   

       2- देवयज्ञ

       3- पितृयज्ञ

       4- बलिवैश्वदेवयज्ञ

       5- अतिथियज्ञ

   

स्वर्ग  -  जहाँ सुख है।

नरक  -  जहाँ दुःख है।.