dahej mukt mithila

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सोमवार, 26 मई 2025

आइये हिन्दू समाज की ओर।

 जो लोग डोनाल्ड ट्रम्प को नायक मानते हुए ईरान पर अमेरिका द्वारा किए गए परमाणु प्रतिष्ठानों पर आक्रमण से आनंदित हो उठे, वे एक मौलिक सत्य को विस्मृत कर बैठे हैं—अमेरिका एक आब्राह्मिक ईसाई मत का अनुयायी राष्ट्र है, जबकि ईरान उसी आब्राह्मिक परम्परा की तीसरी शाखा, इस्लाम के शिया सम्प्रदाय का प्रतिनिधि है। इस्लाम के सुन्नी अनुयायी भी ईरान के प्रति शत्रुता रखते हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह संघर्ष किसी 'न्याय' या 'धर्म' की रक्षा हेतु नहीं, अपितु परस्पर आब्राह्मिक सत्ता-प्रवृत्तियों की टकराहट है।

ये तीनों—यहूदी, ईसाई और मुस्लिम सम्प्रदाय—परस्पर विरोधी होते हुए भी एक-दूसरे की सामर्थ्य, दुर्बलता तथा 'नस' को भलीभाँति पहचानते हैं। इतिहास साक्षी है कि ईसाइयत और इस्लाम के मध्य 'क्रूसेड्स' नामक छः भीषण युद्ध हो चुके हैं। अतः जब इनकी आपसी हिंसा पर हमें आनन्द की अनुभूति होती है, तो यह हमारी वैचारिक अपरिपक्वता का द्योतक है।

यदि हम निरन्तर पश्चिमी अवधारणाओं जैसे—समाजवाद, पूँजीवाद, राष्ट्रवाद, साम्यवाद, तथा तथाकथित दाएँ-बाएँ (Right-Left) पंथों को अपने समाज में आयात करते रहेंगे, तो वह दिन दूर नहीं जब वैश्विक शक्तियाँ हमारे ऊपर भी आर्थिक और सामरिक आघात करेंगी। जिस प्रकार अमेरिका ने रूस के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) को जब्त किया, उसी प्रकार वह भारत की सम्पत्ति को भी अपनी शक्ति से नष्ट अथवा अपहृत कर सकता है।

1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब अधिकांश भारतीयों की आँखों में एक नया राष्ट्र गढ़ने का स्वप्न था — एक ऐसा राष्ट्र जो सहिष्णुता, विविधता और सांस्कृतिक गौरव का प्रतिनिधि हो। परंतु बहुत कम लोगों ने यह समझा कि ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने जाते-जाते केवल एक राजनीतिक विभाजन नहीं किया, बल्कि उन्होंने भारत की सभ्यतागत निरंतरता को तोड़ने के लिए “पाकिस्तान” नामक एक स्थायी संकट को जन्म दिया।

ब्रिटिशों ने यह बात भलीभाँति समझी थी कि भारतवर्ष में यदि कोई शक्ति हज़ार वर्षों तक उनकी चुनौती बनी रही, तो वह थी हिन्दू समाज की सांस्कृतिक जीवटता। और यह भी कि इस हिन्दू समाज को स्थायी रूप से कमज़ोर करना है तो उसके पड़ोस में एक ऐसा राष्ट्र खड़ा करना होगा जो सदैव इस्लामी उन्माद से प्रेरित होकर भारत को अस्थिर करता रहे — और यही था पाकिस्तान का निर्माण। यह केवल मुसलमानों के लिए एक मातृभूमि का गठन नहीं था, बल्कि भारत के भीतर एक अंतहीन अस्थिरता का बीज बोना था।

लेकिन उससे भी अधिक गंभीर भूल थी पं. नेहरू और तत्कालीन नेतृत्व द्वारा सम्पूर्ण जनसंख्या स्थानांतरण को न होने देना। जब पाकिस्तान अपने हिस्से में आए करोड़ों हिन्दुओं और सिखों को या तो जबरन धर्मांतरित कर रहा था या हत्याओं द्वारा खदेड़ रहा था, उस समय भारत में यह आशा की जा रही थी कि मुस्लिम अल्पसंख्यक शांतिपूर्वक रहेंगे — एक ऐसी आशा जो इतिहास और व्यवहार दोनों के विपरीत थी।

उस समय जिन्ना और मुस्लिम लीग स्पष्ट कर चुके थे कि वे धर्म के आधार पर अलग राष्ट्र चाहते हैं। पाकिस्तान बनने का अर्थ था कि भारत हिन्दुओं का राष्ट्र हो — सांस्कृतिक नहीं तो कम से कम राजनीतिक दृष्टि से। किंतु नेहरूवादी नेतृत्व ने “धर्मनिरपेक्षता” की आदर्शवादी सोच के नाम पर यह अवसर गँवा दिया। और आज, उसी ऐतिहासिक भूल का परिणाम है कि भारत के लगभग हर प्रमुख नगर में एक “मिनी पाकिस्तान” जैसी स्थिति उत्पन्न हो चुकी है — जहाँ न केवल जनसंख्या घनत्व का असंतुलन है, अपितु धार्मिक कट्टरता, अलगाववादी मानसिकता और जिहादी राजनीति का प्रसार भी है।

दिल्ली का शाहीन बाग़, मुंबई की भायखला और मुम्ब्रा, बंगलौर का शिवाजीनगर, हैदराबाद का याकूतपुरा, लखनऊ का हुसैनाबाद, कोलकाता का गार्डन रीच — ये केवल भौगोलिक नाम नहीं हैं, ये उन क्षेत्रों के प्रतीक बन चुके हैं जहाँ भारतीय संविधान का नहीं, बल्कि मज़हबी फतवों का शासन चलता है।

यही नहीं, जनसंख्या संतुलन की दृष्टि से देखें तो अनेक जिलों में मुस्लिम बहुलता के कारण प्रशासनिक और सांस्कृतिक दबाव भी बनते जा रहे हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत के 100 से अधिक जिले ऐसे हैं जहाँ मुस्लिम आबादी 25% से अधिक है, और इनमें से कई जिलों में वह 40–50% तक पहुँच चुकी है।

इतिहास इसका साक्षी है कि जहाँ भी किसी मज़हब की जनसंख्या 30% से ऊपर पहुँची है, वहाँ वे क्षेत्र सांप्रदायिक रूप से अस्थिर हुए हैं, और अंततः पाकिस्तान या बांग्लादेश जैसे इस्लामी राष्ट्रों में परिवर्तित हुए हैं।

आज जो "मिनी पाकिस्तान" कहे जाते हैं, वे सिर्फ भीड़-भरे इलाके नहीं हैं — वे भविष्य के संभावित शरिया प्रभुत्व वाले क्षेत्र हैं। वहाँ पुलिस, प्रशासन और राजनीति — तीनों पर मज़हबी दबाव दिखाई देता है। यही कारण है कि पश्चिम बंगाल के कई जिलों में दुर्गा पूजा की अनुमति नहीं मिलती, लेकिन मुहर्रम और ईद पर सड़कों का अतिक्रमण सामान्य माना जाता है।

और जब इन सब तथ्यों के विरुद्ध कोई चेतावनी देता है, तो उसे "घृणा फैलाने वाला", "धर्मांध", या "फ़ासीवादी" करार दिया जाता है — जबकि सच्चाई यह है कि यह चेतावनी देना अब राष्ट्रधर्म बन चुका है।

जब हम किसी मंदिर में आरती करते हैं, जब हम अपने पूर्वजों का श्राद्ध करते हैं, जब कोई कन्या विवाह के बाद ससुराल जाती है, जब कोई साधक जनेऊ धारण करता है — तब शायद ही कोई सोचता हो कि यही वे जीवन-निष्ठाएँ हैं, जिन्हें आज वैश्विक वैचारिक शक्तियाँ “पुरातनपंथी”, “पितृसत्तात्मक” और “प्रतिगामी” घोषित करने में लगी हैं। यह केवल शब्दों का खेल नहीं है — यह एक पूरी सभ्यता को “असहज और अपराधबोध से भरा” बनाने की रणनीति है। और इस रणनीति का नाम है — कल्चरल मार्क्सवाद।

कल्चरल मार्क्सवाद कार्ल मार्क्स के आर्थिक सिद्धांतों से नहीं, बल्कि एंटोनियो ग्राम्शी, थियोडोर अडोर्नो, हर्बर्ट मार्कूज़े जैसे विचारकों से प्रेरित है, जिन्होंने समझा कि किसी भी समाज को केवल क्रांति या हिंसा से नहीं तोड़ा जा सकता — उसके लिए संस्कृति को बदलना पड़ेगा, सोच को उलट देना पड़ेगा, और परंपरा को शर्म का प्रतीक बना देना होगा।

इसी सोच के तहत पश्चिमी विश्वविद्यालयों और मीडिया संस्थानों में Resist – Rebel – Reject (विरोध करो – विद्रोह करो – त्याग दो) का 3R सूत्र तैयार हुआ। यह सूत्र अब भारत के भीतर एक वैचारिक शस्त्र बन चुका है।


Resist (विरोध करो): बच्चों को सिखाओ कि परिवार, धर्म, गुरु-शिष्य परंपरा, त्याग, सतीत्व — ये सब दमनकारी व्यवस्थाएँ हैं।

Rebel (विद्रोह करो): स्त्रियों को अपने परिवार, धर्म और मातृत्व के विरुद्ध खड़ा करो; युवाओं को विवाह संस्था, ब्रह्मचर्य और संयम का उपहास करना सिखाओ।

Reject (त्याग दो): त्याग दो अपनी भाषा, अपनी पूजा-पद्धति, अपने धार्मिक चिह्न, अपने आचार-विचार — और अपना राष्ट्रधर्म।

आज यही “तीन मंत्र” फिल्म, वेब सीरीज़, शिक्षा संस्थानों और सोशल मीडिया के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाए जा रहे हैं। इस प्रक्रिया को "वोकिज़्म" भी कहा जाता है, जहाँ आप अगर अपनी संस्कृति से प्रेम करते हैं तो "रूढ़िवादी", अगर आप अपने धर्म का पालन करते हैं तो "सांप्रदायिक", और अगर आप सनातन मूल्यों की बात करते हैं तो "अंधभक्त" बना दिए जाते हैं।

यही कारण है कि जो हिन्दू युवक अपने धर्म की बात करता है, वह अक्सर आत्मरक्षा की मुद्रा में बोलता है — क्योंकि उसे बचपन से यह सिखाया गया कि “धर्म की बात करना संकीर्णता है”। यह मानसिक गुलामी, मानसिक पराजय का सूक्ष्म रूप है।

हिन्दू समाज को तोड़ने का यह अभियान केवल वैचारिक नहीं, सामाजिक भी है। इस अभियान में वामपंथी शिक्षक, चर्च प्रायोजित एनजीओ, तथाकथित सामाजिक न्यायवादी, और मुस्लिम संगठन एक-दूसरे के पूरक बन चुके हैं। इनका मुख्य लक्ष्य है — हिन्दू समाज को उसकी जाति, लिंग, क्षेत्र और भाषा के आधार पर इतना विभाजित कर देना कि वह कभी भी एक सभ्यता-संगठित शक्ति के रूप में उभर ही न सके।

इस विभाजन की रणनीति साफ़ है:

ब्राह्मणों को ‘शोषक’ घोषित करो, ताकि ज्ञान परंपरा ही नष्ट हो जाए।

क्षत्रियों को सामंती कहकर बहिष्कृत करो, ताकि शौर्य और धर्मरक्षा निषिद्ध बन जाए।

वैश्य वर्ग को पूंजीवादी कहकर दोषी ठहराओ, ताकि आर्थिक शक्ति टूट जाए।

शूद्रों को उकसाकर पूरे धर्म के विरुद्ध खड़ा करो, ताकि समाज में स्थायी विद्वेष बना रहे।

यह वही "वर्ग संघर्ष का मार्क्सवादी मॉडल" है जिसे अब "जातिगत संघर्ष" के रूप में भारत में लागू किया जा रहा है। अंतर बस इतना है कि वर्ग के स्थान पर जाति और पहचान आ गई है, और हथियार की जगह नैरेटिव।

आप यदि ध्यान से देखें तो पायेंगे — भारत में कोई राजनीतिक दल, कोई प्रगतिशील संस्था या कोई वामपंथी बुद्धिजीवी कभी भी ईसाई चर्च या इस्लामी मौलानाओं के पितृसत्तात्मक या रूढ़िवादी रवैये की आलोचना नहीं करता। केवल हिन्दू रीति-रिवाज़ ही उनका निशाना होते हैं। क्यों?

क्योंकि अंतिम लक्ष्य हिन्दू धर्म नहीं, हिन्दू समाज है — और हिन्दू समाज को तोड़ना हो, तो सबसे पहले उसके धर्म को "गिल्टी" बना दो।

सभ्यता तब तक जीवित रहती है, जब तक उसके भीतर संरक्षण की चेतना और प्रतिक्रिया की क्षमता बनी रहती है। और यही दो बातें हैं जो आज भारत और इज़रायल के बीच की सामरिक प्रतिक्रियाओं में एक स्पष्ट अंतर को उजागर करती हैं।

कुछ ही दिन पूर्व कश्मीर की घाटी में आतंकियों ने 26 हिन्दू यात्रियों की निर्मम हत्या की। यह कोई आकस्मिक घटना नहीं थी — यात्रियों से धर्म पूछकर उन्हें गोली मारी गई, जो इस बात का संकेत है कि यह आतंक नहीं, मज़हबी युद्ध था। भारत ने इस पर प्रतिक्रिया दी — लेकिन उस मात्रा और प्रभाव में नहीं, जो एक जागरूक सभ्यता देती है। प्रतिक्रिया सीमित थी, नियंत्रित थी — और प्रतीकात्मक भी।

अब तुलना कीजिए इज़रायल की प्रतिक्रिया से।

2023 में जब हमास आतंकियों ने गाज़ा से हमला किया, सैकड़ों यहूदियों की हत्या की, महिलाओं को अपहृत कर बलात्कार किया और बच्चों को बंधक बना लिया — तो इज़रायल ने पूरे गाज़ा पर जबरदस्त सैन्य प्रहार किया। उन्होंने सिर्फ “बदला” नहीं लिया, बल्कि एक संदेश दिया — कि यहूदी रक्त सस्ता नहीं है, कि हम सभ्यता हैं, और हम अपने हर नागरिक के जीवन के लिए अंतिम साँस तक लड़ सकते हैं।

उन्होंने 13 सौ आतंकियों की हत्या की, 52,000 से अधिक आतंकवादियों को समाप्त किया, और उसके बाद भी ईरान के अंदर घुसकर फोर्डो, नतांज़ और इस्फ़हान जैसे परमाणु केंद्रों को तबाह कर दिया। और आश्चर्य नहीं कि इस सैन्य कार्रवाई में अमेरिका खुलकर इज़रायल के साथ खड़ा रहा, और पाकिस्तान ने भी छुपकर ईरान-विरोधी रणनीति में भागीदारी की, क्योंकि रणनीति केवल वीरता नहीं, चतुराई भी माँगती है।

अब लौटिए भारत की ओर।

जब हमने पुलवामा और उरी के बाद आतंकी ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक की — तो वह वीरता थी, साहस था। परंतु जब पाकिस्तान जवाबी हमला करता है, और भारत रणनीतिक रूप से ऊपर होते हुए भी "युद्धविराम" स्वीकार कर लेता है — तब सवाल उठता है: क्या हम अपने सभ्यता-संघर्ष को इज़रायल जितनी गंभीरता से लेते हैं?

क्या हमारे लिए हिन्दू रक्त का मूल्य कम हो गया है?

क्या हमारे वीरगति प्राप्त सैनिक केवल समाचार की सुर्खियों तक सीमित रह गये हैं?

क्या हमारे शत्रु हमें इतना पढ़ चुके हैं कि जानते हैं — हम दो दिन गुस्सा करेंगे, फिर चुप हो जायेंगे?

असल में समस्या यह नहीं है कि हमारे पास सैन्य शक्ति नहीं है — समस्या यह है कि हम मानसिक और वैचारिक रूप से संगठित नहीं हैं।

इज़रायल का हर नागरिक जानता है कि वह एक यहूदी राष्ट्र की सभ्यता का रक्षक है — भारत का नागरिक आज भी यह तय नहीं कर पाया कि वह हिन्दू है या केवल भारतीय?

हम यह समझ ही नहीं पा रहे कि धर्मनिरपेक्षता की आत्मघाती परिभाषाएँ, और नैतिकतावादी निष्क्रियता — सभ्यता की रक्षा नहीं करतीं, उसे कमजोर करती हैं।

और इस संकोच में हम भूल रहे हैं कि —

> “सभ्यता उन्हीं की रहती है, जो उसे जीते हैं, बचाते हैं और ज़रूरत पड़े तो उसके लिए लड़ते हैं।”

हमारी दुविधा यह है कि हम राजनीतिक रूप से आक्रामक बनने से डरते हैं, कि कहीं हमें असहिष्णु न कह दिया जाए। जबकि सभ्यता का संरक्षण “टॉलरेंस” से नहीं होता, “ट्राइब्स” बनाकर होता है — जैसे यहूदी बने हैं, जैसे मुस्लिम बनते हैं।

इज़रायल की आक्रामकता और भारत की उदारता के बीच यह अंतर केवल भूगोल का नहीं है — यह हमारी मानसिक स्थिति का प्रतिबिम्ब है। और जब तक हम इस अंतर को नहीं समझेंगे, तब तक हम न तो अपने तीर्थयात्रियों की रक्षा कर पाएँगे, न अपने धर्म की, न अपनी संतानों के भविष्य की है 

विश्व इतिहास हमें यह सिखाता है कि जो मज़हब या संस्कृति स्वयं के भीतर एकजुट होती है, वही दीर्घकाल तक टिकती है, और सामर्थ्यशाली बनती है। आज जब हम अब्राह्मिक परंपराओं को देखते हैं — चाहे वह ईसाई हों, यहूदी हों, या मुस्लिम — तो यह बात अत्यंत स्पष्ट रूप से दिखाई देती है कि विविधता के बावजूद उनका मूल चिंतन, लक्ष्य और अस्तित्व-चेतना एक रहती है।

ईसाई विश्व — कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट, ऑर्थोडॉक्स के भेद के बावजूद — "क्रिश्चियन नेशन" की अवधारणा को समर्थन देता है।

इस्लाम — शिया, सुन्नी, वहाबी, देवबंदी जैसे अंतर होने के बावजूद — “उम्मा” की एकता में विश्वास करता है।

यहूदी समाज — लिबरल, हसीदिक, रूढ़िवादी भिन्नताओं के बावजूद — इज़रायल की एकता के लिए समर्पित रहता है।

अब आइये हिन्दू समाज की ओर।

यहाँ हमने "विविधता" को इतना महिमामंडित कर दिया है कि वह विखंडन बन चुकी है।

यहाँ ब्राह्मण और श्रमण, आर्य और अनार्य, वैष्णव और शैव, बौद्ध, जैन, सिख, दलित, पिछड़े, लिंगायत, आर्यसमाजी, सनातनी — सब अपनी अलग पहचान लेकर खड़े हैं, लेकिन "हिन्दू" नाम से कोई एक बौद्धिक, वैचारिक या राजनीतिक चेतना खड़ी नहीं हो पाई है।

सनातन धर्म को यदि किसी प्रतीक में रूपांतरित करना हो, तो उसके लिए वटवृक्ष से अधिक उपयुक्त कुछ नहीं हो सकता। यह वटवृक्ष केवल एक पेड़ नहीं, अपितु भारत की आत्मा का मूर्त रूप है — जिसकी जड़ें अत्यंत गहरी हैं, शाखाएँ असंख्य हैं, और प्रत्येक पत्ता एक परंपरा, एक जीवन दृष्टि, एक साधना का प्रतीक है। यह वटवृक्ष काल के झंझावातों में भी अडिग खड़ा रहा है क्योंकि उसकी जड़ें उस चित्त में धँसी हुई हैं जहाँ वेदों का अनादि स्वर गूँजता है, उपनिषदों का आत्मज्ञान प्रकाशित होता है और लोक की मिट्टी में रची-बसी परंपराएँ जीवित रहती हैं।

यह सनातन वटवृक्ष कोई एक मत नहीं, कोई एक सम्प्रदाय नहीं — वह एक जीता-जागता चेतन तंत्र है, जिसमें ब्राह्मण की वैदिक यज्ञीय परंपरा भी है, और श्रमण की ध्यानशील मौन साधना भी। कहीं शंकराचार्य का अद्वैत है, तो कहीं महावीर का अपरिग्रह। कहीं गीता का कर्मयोग है, तो कहीं बुद्ध का क्षणवाद। यह वैदिक और अवैदिक, शास्त्रीय और लोक, मूर्त और अमूर्त, सगुण और निर्गुण — सबको एकसूत्र में बाँधने वाली वह जीवनदृष्टि है, जिसमें विरोध नहीं, केवल विस्तार है।

किंतु आज एक योजनाबद्ध प्रयास के अंतर्गत इस वटवृक्ष की शाखाओं को एक-दूसरे से काटने का षड्यंत्र चल रहा है। बौद्ध को ब्राह्मण-विरोध का प्रतीक बना दिया गया, जैन को हिन्दू धर्म से पृथक ठहराया गया, सिखों के भीतर अलगाव की आग भड़काई गई, और आदिवासियों को बताया गया कि वे हिन्दू कभी थे ही नहीं। इस सबके पीछे वही विचारधारा सक्रिय है जो हिन्दू समाज को आत्मविस्मृति की ओर ले जाकर उसे सभ्यता विहीन भीड़ में बदल देना चाहती है।

परंतु यह स्मरण रहे — यह सब शाखाएँ उसी सनातन वटवृक्ष की उपज हैं। महावीर, बुद्ध, नाथ, संत, कबीर, गुरु नानक, लिंगायत, सिद्ध — ये सब भारत की आत्मा से जन्मे हैं। इनकी जड़ें इसी भूमि में हैं, इन्हें पोषक तत्व इसी सनातन चेतना से प्राप्त होते हैं। इन्हें जब इस मूल से काटा जाएगा, तो वे भी निर्जीव हो जाएँगे और भारत भी।

यह समय का आह्वान है कि हम अपनी विविधता को पुनः एकता में बदलें। हमें यह समझना होगा कि बौद्ध, जैन, सिख, लिंगायत, सरना, वैष्णव, शैव, शक्त, वेदांती, तांत्रिक — ये सभी हिन्दू हैं, क्योंकि ये सभी इस वटवृक्ष की ही शाखाएँ हैं। इन सबको एक वैचारिक छतरी के नीचे लाना, केवल रणनीतिक आवश्यकता नहीं है — यह सनातन धर्म की आत्मरक्षा का अनिवार्य पथ है।

जिन्होंने मजहब के नाम पर एक किताब, एक पैगंबर और एक पंथ के अनुशासन से वैश्विक सामर्थ्य खड़ी कर ली, उनके सामने भारत जैसी जीवंत और बहुआयामी संस्कृति तब तक टिक नहीं सकती, जब तक वह स्वयं को टुकड़ों में बाँटती रहे। हमें यह स्वीकार करना होगा कि संघर्ष अब केवल बाह्य नहीं, आंतरिक है — आत्म-चेतना बनाम आत्म-त्याग का, स्मृति बनाम विस्मृति का, धर्म बनाम मत का।

यह विखंडन अचानक नहीं हुआ — यह एक सुव्यवस्थित योजना के अंतर्गत पनपा।

पहचान की राजनीति: विभाजन का औज़ार

1960 के दशक से भारत में एक नई राजनीति जन्मी — पहचान की राजनीति, जिसमें व्यक्ति की धार्मिक, जातीय, भाषायी, क्षेत्रीय और लैंगिक पहचान को राष्ट्र, संस्कृति और सनातन से ऊपर रखा गया। इसमें मुख्य भूमिका निभाई वामपंथी विचारकों और चर्च समर्थित संगठनों ने।

इनका उद्देश्य यह था कि हिन्दू समाज को केवल तोड़ा नहीं जाए, बल्कि उसे खुद ही अपनी पहचान से घृणा करने के लिए तैयार किया जाए।

ब्राह्मण को "दमनकारी" बताया गया, ताकि वह धर्मशास्त्र और संस्कृति से दूरी बनाए।

शूद्रों को यह बताया गया कि धर्म ने उन्हें उत्पीड़ित किया, इसलिए धर्म त्याग दो।

आदिवासियों को कहा गया कि तुम हिन्दू हो ही नहीं — "तुम तो प्रकृति पूजक हो, अलग सरना कोड माँगो।"

बौद्ध, जैन और सिख समुदायों को यह सिखाया गया कि उन्हें ब्राह्मणों ने ग्रंथों से मिटा दिया — इसलिए “हिन्दू धर्म तुम्हारा शत्रु है”।

सरना कोड, लिंगायत आंदोलन और चर्च की भूमिका

आज झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में आदिवासी समाज के भीतर “सरना धर्म” को अलग मान्यता दिलाने का आंदोलन चल रहा है। यह कोई आत्मनिर्भर सांस्कृतिक प्रयास नहीं, बल्कि चर्च समर्थित रणनीति है — जिसका उद्देश्य है आदिवासी समाज को हिन्दू धर्म से कानूनी और भावनात्मक रूप से काट देना।

इसी प्रकार कर्नाटक में लिंगायत समुदाय को “हिन्दू नहीं” बल्कि “एक स्वतंत्र धर्म” घोषित करने का षड्यंत्र किया गया। इसके पीछे भी चर्च और कांग्रेस समर्थित बुद्धिजीवी तंत्र सक्रिय था।

बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर ने दलितों को बौद्ध बनाया, परंतु उन्होंने कभी हिन्दू धर्म को विधर्मी या शत्रु नहीं कहा। किंतु आज "दलित बौद्ध विमर्श" के नाम पर युवाओं को ब्राह्मण-विरोधी घृणा सिखाई जा रही है, और यह बताया जा रहा है कि “हिन्दू धर्म उन्हें मानसिक गुलामी में रखता है।” इस विचार को प्रचारित करने के लिए पैसे, मीडिया, फिल्म और अकादमिक जगत में योजनाबद्ध कार्य हो रहा है।

वामपंथी "वर्ग संघर्ष" का नया संस्करण: जातिगत विद्वेष

मार्क्सवाद में "बुर्जुआ बनाम सर्वहारा" का संघर्ष था, परंतु भारत में यह "ब्राह्मण बनाम दलित", "ऊँच-नीच बनाम आरक्षण", "मंदिर बनाम अंधविश्वास" में बदल दिया गया। और ये सब कुछ हुआ — "सामाजिक न्याय", "मानवाधिकार", और "समता" के नाम पर।

आप देखेंगे कि जब-जब कोई सनातन मूल्यों की बात करता है — उसे “मनुवादी”, “ब्राह्मणवादी”, “सामंती” कहकर खारिज किया जाता है। लेकिन यही लोग इस्लामिक कट्टरपंथ या ईसाई मतांतरण पर मौन रहते हैं।

क्यों?

क्योंकि इस पूरे विमर्श का उद्देश्य हिन्दू समाज को आत्मग्लानि में डुबो देना है। ताकि वह न तो अपनी पहचान पर गर्व करे, न अपने धर्म का साहस से पालन करे, और न ही अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए खड़ा हो।

  वामपंथप्रेरित शिक्षण संस्थान अपने पाठ्यक्रमों में नवीन कथानकों की रचना करते हैं, जिनका लक्ष्य हिन्दू समाज को पितृसत्तात्मक एवं ब्राह्मणवादी ठहराकर उसके सांस्कृतिक स्वरूप का विघटन करना होता है। दुर्भाग्यवश, हम स्वयं ब्राह्मण एवं श्रमण परंपराओं, वैदिक एवं अवैदिक दर्शनों को सनातन धर्मरूपी विराट वटवृक्ष की शाखाओं के रूप में स्वीकारने के स्थान पर, उन्हें खण्डित करने का प्रयास करते हैं। हम भिन्नता के बाह्य स्वरूप को देखकर मूल की एकता को नकारते हैं। जबकि सत्य यह है कि समस्त वैदिक, अवैदिक, लोकपरंपराएँ, दार्शनिक दृष्टियाँ – सभी सनातन वटवृक्ष की अभिन्न शाखाएँ हैं।

भाषा, प्रांत, जाति, नस्ल आदि के नाम पर जो संघर्ष और विभाजन खड़े किए जा रहे हैं, उनके मूल में भी अब्राह्मिक मत और उनके पोषक वामपंथी विचारधाराएँ ही हैं। हम एक लक्ष्यविहीन, दिशाहीन समाज की भाँति व्यवहार कर रहे हैं क्योंकि हमें अपने धर्म, उद्देश्य, और कर्तव्यों का बोध ही नहीं है। इसी अज्ञानवश हम अपने शास्त्रों – वेद, उपनिषद, स्मृतियाँ, पुराण और आचारपरंपरा को त्याग कर, आयातित विचारधाराओं का अनुकरण करने लगे हैं।

इस आत्मविस्मृति के कारण हम प्रत्येक युद्ध हारते जा रहे हैं। हमें न स्वधर्म का बोध है, न शत्रुबोध, न ही परिस्थिति की सम्यक् समझ। हम दीर्घकालिक दृष्टि से सोचने की अपेक्षा क्षणिक प्रतिक्रियाओं में उलझे रहते हैं। इसी कारण जब अमेरिका ईरान के परमाणु ठिकानों पर आक्रमण करता है, तब हम हर्षित होते हैं, यह विस्मृत कर कि यदि यही कृत्य भारत के विरुद्ध हो जाए तो क्या होगा?

वस्तुतः हम पिछले पंद्रह शताब्दियों से एक सतत् सभ्यता युद्ध में संलग्न हैं। परन्तु विडम्बना यह है कि हम इस युद्ध को अल्पकालिक राजनैतिक विमर्श के चश्मे से देखते हैं, जबकि इसकी आवश्यकता है एक दूरदर्शी, संगठित, और समर्पित सांस्कृतिक योजना की।

शांति की स्थापना के लिए शक्ति आवश्यक है। यदि हम 'विश्वगुरु' बनने का स्वप्न संजोते हैं, तो हमें आर्थिक, सैन्य, सामाजिक, एवं राजनैतिक शक्तियों में समर्थ होना ही पड़ेगा। हमारे शास्त्रों में वर्णित चार पुरुषार्थ – धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष – को अपने जीवन और समाज के संचालन का आधार बनाना होगा। इन्हीं की आधारभूमि पर हम इस दीर्घकालिक सभ्यता संघर्ष में विजय प्राप्त कर सकते हैं और भारतमाता को परम वैभव के शिखर पर प्रतिष्ठित कर सकते हैं।

Deepak Kumar Dwivedi

मंगलवार, 6 मई 2025

न्यूक्लियर अटैक के दौरान क्या करें पहले से तैयारी कैसे करें ?

 


 भारत सरकार के द्वारा कल 7 मई को देश के सभी राज्यों में मॉकड्रिल करने के निर्देश दिये गये हैं। इसी संदर्भ में न्यूक्लियर अटैक (परमाणु हमले) की स्थिति में जान और स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए त्वरित और सही कदम उठाना अत्यंत आवश्यक है।  यहाँ कुछ महत्वपूर्ण प्रिकॉशन दिए गए हैं जो आपकी और आपके परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद् कर सकते हैं।

 *(1)☢️ न्यूक्लियर अटैक के दौरान क्या करें-* 

➡️ तुरंत सुरक्षित स्थान पर जाएं।

➡️ किसी मजबूत इमारत के अंदर जाएं। ईंट,पत्थर या कंक्रीट से बनी इमारतें रेडिएशन से बेहतर सुरक्षा प्रदान करती हैं।

➡️ खिड़कियों से दूर रहें। खिड़कियों से दूर रहना ब्लास्ट वेव और कांच के टुकड़ों से बचाव करता है। 

 *(2) अंदर जाकर शरण लें (Shelter-in-Place)* 

➡️ तुरंत अंदर जाएं, जितनी जल्दी हो सके किसी इमारत के अंदर चले जाएं।

➡️ बेसमेंट या मध्य भाग में रहें। इमारत के बेसमेंट या मध्य भाग में रहना रेडिएशन से अधिक सुरक्षा प्रदान करता है।

➡️ कम से कम 24 घंटे तक अंदर रहें। रेडियोएक्टिव फॉलआउट के प्रभाव को कम करने के लिए कम से कम 24 घंटे तक अंदर रहें।  

 *(3) रेडिएशन से बचाव के उपाय-* 

➡️ कपड़े बदलें और स्नान करें। यदि आप बाहर थे,तो अंदर आने के बाद तुरंत अपने कपड़े बदलें और बिना कंडीशनर के स्नान करें।

➡️ संक्रमित कपड़ों को सील करें। संक्रमित कपड़ों को प्लास्टिक बैग में सील करके दूसरों से दूर रखें।

➡️ आँख,नाक और मुँह को छूने से बचें। रेडिएशन के संपर्क से बचने के लिए अपने चेहरे को छूने से बचें।  

 *(4)📢☎️ सूचना और संचार* 

➡️ रेडियो या विश्वसनीय स्रोतों से अपडेट प्राप्त करें। सरकारी निर्देशों और आपातकालीन सूचनाओं के लिए बैटरी से चलने वाले रेडियो या अन्य विश्वसनीय स्रोतों का उपयोग करें।

➡️ इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क पर निर्भर न रहें। आपातकालीन स्थिति में ये सेवाएं बाधित हो सकती हैं। 

*🧰पहले से तैयारी कैसे करें* 

➡️ आपातकालीन किट तैयार रखें। जिसमें कम से कम दो सप्ताह का नॉन-पेरिशेबल भोजन, प्रति व्यक्ति प्रतिदिन एक गैलन पानी, फ्लैशलाइट, बैटरियाँ, प्राथमिक चिकित्सा किट, और आवश्यक दवाएँ शामिल हों।

➡️ परिवार के लिए आपातकालीन योजना बनाएं, सुरक्षित स्थानों की पहचान करें, बैठक बिंदु निर्धारित करें, और संचार के वैकल्पिक तरीकों की योजना बनाएं।  

 *⚠️ क्या न करें* 

➡️ बाहर न निकलें, जब तक आधिकारिक रूप से सुरक्षित घोषित न किया जाए, तब तक बाहर न निकलें।

➡️ रेडिएशन से संक्रमित वस्तुओं को न छुएं, संक्रमित वस्तुओं को छूने से बचें और उन्हें सुरक्षित रूप से निप

मंगलवार, 29 अप्रैल 2025

मैंने गांधी को क्यों मारा

सुप्रीम कोर्ट से अनुमति मिलने पर प्रकाशित किया गया 

60 साल तक भारत में प्रतिबंधित रहा नाथूराम गोडसे 

का अंतिम भाषण -     


    #मैंने_गांधी_को_क्यों_मारा !

30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोड़से ने महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी थी लेकिन नाथूराम गोड़से घटना स्थल से फरार नही हुए बल्कि उसने आत्मसमर्पण कर दिया 

नाथूराम गोड़से समेत 17 देशभक्तों पर गांधी की हत्या का मुकदमा चलाया गया इस मुकदमे की सुनवाई के दरम्यान #न्यायमूर्ति_खोसला से नाथूराम जी ने अपना वक्तव्य स्वयं पढ़ कर जनता को सुनाने की अनुमति माँगी थी जिसे न्यायमूर्ति ने स्वीकार कर लिया था पर यह कोर्ट परिसर तक ही सिमित रह गयी क्योकि सरकार ने नाथूराम के इस वक्तव्य पर प्रतिबन्ध लगा दिया था लेकिन नाथूराम के छोटे भाई और गांधी की हत्या के सह-अभियोगी गोपाल गोड़से ने 60 साल की लम्बी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद सुप्रीम कोर्ट में विजय प्राप्त की और नाथूराम का वक्तव्य प्रकाशित किया गया l

                     *मैंने गांधी को क्यों मारा*

नाथूराम गोड़से ने गांधी हत्या के पक्ष में अपनी 

150 दलीलें न्यायलय के समक्ष प्रस्तुति की

नाथूराम गोड़से के वक्तव्य के कुछ मुख्य अंश....

नाथूराम जी का विचार था कि गांधी की अहिंसा हिन्दुओं 

को कायर बना देगी कानपुर में गणेश शंकर विद्यार्थी को मुसलमानों ने निर्दयता से मार दिया था महात्मा गांधी सभी हिन्दुओं से गणेश शंकर विद्यार्थी की तरह अहिंसा के मार्ग पर चलकर बलिदान करने की बात करते थे नाथूराम गोड़से को भय था गांधी की ये अहिंसा वाली नीति हिन्दुओं को 

कमजोर बना देगी और वो अपना अधिकार कभी 

प्राप्त नहीं कर पायेंगे...

1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ गोलीकांड 

के बाद से पुरे देश में ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ 

आक्रोश उफ़ान पे था...

भारतीय जनता इस नरसंहार के #खलनायक_जनरल_डायर 

पर अभियोग चलाने की मंशा लेकर गांधी के पास गयी 

लेकिन गांधी ने भारतवासियों के इस आग्रह को समर्थन 

देने से साफ़ मना कर दिया 

महात्मा गांधी ने खिलाफ़त आन्दोलन का समर्थन करके भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिकता का जहर घोल दिया  महात्मा गांधी खुद को मुसलमानों का हितैषी की तरह पेश करते थे वो #केरल_के_मोपला_मुसलमानों द्वारा वहाँ के 

1500 हिन्दूओं को मारने और 2000 से अधिक हिन्दुओं 

को मुसलमान बनाये जाने की घटना का विरोध 

तक नहीं कर सके 

कांग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में #नेताजी_सुभाष_चन्द्रबोस 

को बहुमत से काँग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गांधी ने #अपने_प्रिय_सीतारमय्या का समर्थन कर रहे थे गांधी ने सुभाष चन्द्र बोस से जोर जबरदस्ती करके इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर कर दिया...

23 मार्च 1931 को भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी गयी पूरा देश इन वीर बालकों की फांसी को 

टालने के लिए महात्मा गांधी से प्रार्थना कर रहा था लेकिन गांधी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए देशवासियों की इस उचित माँग को अस्वीकार कर दिया 

गांधी #कश्मीर_के_हिन्दू_राजा_हरि_सिंह से कहा कि 

#कश्मीर_मुस्लिम_बहुल_क्षेत्र_है_अत:वहां का शासक 

कोई मुसलमान होना चाहिए अतएव राजा हरिसिंह को 

शासन छोड़ कर काशी जाकर प्रायश्चित करने जबकि  हैदराबाद के निज़ाम के शासन का गांधी जी ने समर्थन किया था जबकि हैदराबाद हिन्दू बहुल क्षेत्र था गांधी जी की नीतियाँ 

धर्म के साथ बदलती रहती थी उनकी मृत्यु के पश्चात 

सरदार पटेल ने सशक्त बलों के सहयोग से हैदराबाद को 

भारत में मिलाने का कार्य किया गांधी के रहते ऐसा करना संभव नहीं होता 

पाकिस्तान में हो रहे भीषण रक्तपात से किसी तरह से अपनी जान बचाकर भारत आने वाले विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में जब अस्थाई शरण ली मुसलमानों ने मस्जिद में रहने वाले हिन्दुओं का विरोध किया जिसके आगे गांधी नतमस्तक हो गये और गांधी ने उन विस्थापित हिन्दुओं को जिनमें वृद्ध स्त्रियाँ व बालक अधिक थे मस्जिदों से खदेड़ बाहर ठिठुरते शीत में रात बिताने पर मजबूर किया गया 

महात्मा गांधी ने दिल्ली स्थित मंदिर में अपनी प्रार्थना सभा 

के दौरान नमाज पढ़ी जिसका मंदिर के पुजारी से लेकर 

तमाम हिन्दुओं ने विरोध किया लेकिन गांधी ने इस विरोध को दरकिनार कर दिया लेकिन महात्मा गांधी एक बार भी किसी मस्जिद में जाकर गीता का पाठ नहीं कर सके 

लाहौर कांग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से विजय 

प्राप्त हुयी किन्तु गान्धी अपनी जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया गांधी अपनी मांग 

को मनवाने के लिए अनशन-धरना-रूठना किसी से बात 

न करने जैसी युक्तियों को अपनाकर अपना काम 

निकलवाने में माहिर थे इसके लिए वो नीति-अनीति का लेशमात्र विचार भी नहीं करते थे

14 जून 1947 को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था लेकिन गांधी ने वहाँ पहुँच कर 

प्रस्ताव का समर्थन करवाया यह भी तब जबकि गांधी  

ने स्वयं ही यह कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश 

पर होगा न सिर्फ देश का विभाजन हुआ बल्कि लाखों 

निर्दोष लोगों का कत्लेआम भी हुआ लेकिन गांधी 

ने कुछ नहीं किया....

धर्म-निरपेक्षता के नाम पर मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति के जन्मदाता महात्मा गाँधी ही थे जब मुसलमानों ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाये जाने का विरोध किया तो महात्मा गांधी ने सहर्ष ही इसे स्वीकार कर लिया और हिंदी की जगह हिन्दुस्तानी (हिंदी+उर्दू की खिचड़ी) को बढ़ावा देने लगे  बादशाह राम और बेगम सीता जैसे शब्दों का 

चलन शुरू हुआ...

कुछ एक मुसलमान द्वारा वंदेमातरम् गाने का विरोध करने 

पर महात्मा गांधी झुक गये और इस पावन गीत को भारत 

का राष्ट्र गान नहीं बनने दिया 

गांधी ने अनेक अवसरों पर शिवाजी महाराणा प्रताप व 

गुरू गोबिन्द सिंह को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा वही दूसरी 

ओर गांधी मोहम्मद अली जिन्ना को क़ायदे-आजम 

कहकर पुकारते था

कांग्रेस ने 1931 में स्वतंत्र भारत के राष्ट्र ध्वज बनाने के 

लिए एक समिति का गठन किया था इस समिति ने 

सर्वसम्मति से चरखा अंकित भगवा वस्त्र को भारत का 

राष्ट्र ध्वज के डिजाइन को मान्यता दी किन्तु गांधी जी 

की जिद के कारण उसे बदल कर तिरंगा कर दिया गया 

जब सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में सोमनाथ 

मन्दिर का सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित किया गया तब गांधी जी जो कि मन्त्रीमण्डल के सदस्य 

भी नहीं थे ने सोमनाथ मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव 

को निरस्त करवाया और 13 जनवरी 1948 को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली की मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला 

भारत को स्वतंत्रता के बाद पाकिस्तान को एक समझौते के तहत 75 करोड़ रूपये देने थे भारत ने 20 करोड़ रूपये 

दे भी दिए थे लेकिन इसी बीच 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल ने आक्रमण से क्षुब्ध होकर 55 करोड़ की 

राशि न देने का निर्णय लिया | जिसका महात्मा गांधी ने 

विरोध किया और आमरण अनशन शुरू कर दिया जिसके परिणामस्वरूप 55 करोड़ की राशि भारत ने पाकिस्तान 

को दे दी महात्मा गांधी भारत के नहीं अपितु पाकिस्तान 

के राष्ट्रपिता थे जो हर कदम पर पाकिस्तान के पक्ष में 

खड़े रहे फिर चाहे पाकिस्तान की मांग जायज हो या 

नाजायज गांधी ने कदाचित इसकी परवाह नहीं की 

उपरोक्त घटनाओं को देशविरोधी मानते हुए नाथूराम 

गोड़से जी ने महात्मा गांधी की हत्या को न्यायोचित 

ठहराने का प्रयास किया...

नाथूराम ने न्यायालय में स्वीकार किया कि माहात्मा गांधी बहुत बड़े देशभक्त थे उन्होंने निस्वार्थ भाव से देश सेवा की  

मैं उनका बहुत आदर करता हूँ लेकिन किसी भी देशभक्त 

को देश के टुकड़े करने के एक समप्रदाय के साथ पक्षपात करने की अनुमति नहीं दे सकता हूँ गांधी की हत्या के 

सिवा मेरे पास कोई दूसरा उपाय नहीं था...!!

#नाथूराम_गोड़सेजी द्वारा अदालत में 

दिए बयान के मुख्य अंश...

मैने गांधी को नहीं मारा

मैने गांधी का वध किया है..

वो मेरे दुश्मन नहीं थे परन्तु उनके निर्णय राष्ट्र के 

लिए घातक साबित हो रहे थे...

जब व्यक्ति के पास कोई रास्ता न बचे तब वह मज़बूरी 

में सही कार्य के लिए गलत रास्ता अपनाता है...

मुस्लिम लीग और पाकिस्तान निर्माण की गलत निति 

के प्रति गांधी की सकारात्मक प्रतिक्रिया ने ही मुझे 

मजबूर किया...

पाकिस्तान को 55 करोड़ का भुगतान करने की 

गैरवाजिब मांग को लेकर गांधी अनशन पर बैठे..

बटवारे में पाकिस्तान से आ रहे हिन्दुओ की आपबीती 

और दुर्दशा ने मुझे हिला के रख दिया था...

अखंड हिन्दू राष्ट्र गांधी के कारण मुस्लिम लीग 

के आगे घुटने टेक रहा था...

बेटो के सामने माँ का खंडित होकर टुकड़ो में बटना 

विभाजित होना असहनीय था...

अपनी ही धरती पर हम परदेशी बन गए थे..

मुस्लिम लीग की सारी गलत मांगो को 

गांधी मानते जा रहे थे..

मैने ये निर्णय किया कि भारत माँ को अब और 

विखंडित और दयनीय स्थिति में नहीं होने देना है 

तो मुझे गांधी को मारना ही होगा

और मैने इसलिए गांधी को मारा...!!

मुझे पता है इसके लिए मुझे फाँसी ही होगी 

और मैं इसके लिए भी तैयार हूं...

और हां यदि मातृभूमि की रक्षा करना अपराध हे 

तो मै यह अपराध बार बार करूँगा हर बार करूँगा ...

और जब तक सिन्ध नदी पुनः अखंड हिन्द में न बहने 

लगे तब तक मेरी अस्थियो का विसर्जन नहीं करना...!!

मुझे  फाँसी देते वक्त मेरे एक हाथ में केसरिया ध्वज 

और दूसरे हाथ में #अखंड_भारत का नक्शा हो...

मै फाँसी चढ़ते वक्त अखंड भारत की जय 

जयकार बोलना चाहूँगा...!!

हे भारत माँ मुझे दुःख है मै तेरी इतनी 

ही सेवा कर पाया....!!

#नाथूराम_गोडसे

🙏 

शनिवार, 19 अप्रैल 2025

जानिए क्या है आर्टिकल 142, उपराष्ट्रपति ने क्यों बताया ‘न्यूक्लियर मिसाइल’.

   


लोकसभा स्पीकर के बराबर हैं CJI, फिर राष्ट्रपति को आदेश दे सकता है सुप्रीम कोर्ट.? जानिए क्या है आर्टिकल 142, उपराष्ट्रपति ने क्यों बताया ‘न्यूक्लियर मिसाइल’...*

*केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा बनाए गए वक्फ संशोधन अधिनियम-2025 की संवैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति को भी समय सीमा देते हुए निर्देश जारी किया था। अब उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने न्यायपालिका पर फिर से निशाना साधा है और कहा कि वह अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर विधायिका के मामले में हस्तक्षेप कर रही है।*

*उपराष्ट्रपति धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गंभीर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 142 लोकतांत्रिक ताकतों के खिलाफ एक ‘परमाणु मिसाइल’ बन गया है, जो न्यायपालिका के पास 24 घंटे उपलब्ध होता है।। उपराष्ट्रपति का बयान ऐसे समय में आया है, जब संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित वक्फ अधिनियम के कुछ प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट ने आपत्ति जताई और उसे रोकने की बात कही।

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा, “हाल ही में एक निर्णय के माध्यम से राष्ट्रपति को निर्देश दिया गया है। हम कहाँ जा रहे हैं? देश में क्या हो रहा है? हमने लोकतंत्र के लिए इस दिन की कभी उम्मीद नहीं की थी। हमारे पास ऐसे न्यायाधीश हैं जो कानून बनाएँगे, कार्यकारी कार्य करेंगे, सुपर-संसद के रूप में कार्य करेंगे और उनकी कोई जवाबदेही नहीं होगी, क्योंकि देश का कानून उन पर लागू नहीं होता है।”

उपराष्ट्रपति ने कहा, “हम ऐसी स्थिति नहीं बना सकते, जहाँ आप (सुप्रीम कोर्ट) भारत के राष्ट्रपति को निर्देश दें। वह भी किस आधार पर? संविधान के तहत आपके पास एकमात्र अधिकार अनुच्छेद 145(3) के तहत संविधान की व्याख्या करना है।” उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 145(3) के अनुसार किसी महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दे पर कम-से-कम 5 न्यायाधीशों वाली पीठ द्वारा निर्णय लिया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जब पाँच न्यायाधीशों वाली पीठों का निर्णय निर्धारित किया गया था, तब सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या आठ थी। धनखड़ ने बिल के संबंधित मामले को लेकर कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति के खिलाफ निर्णय दो न्यायाधीशों वाली पीठ द्वारा दिया गया था। अब सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या बढ़कर 31 हो गई है।

उन्होंने यहाँ तक कहा कि संविधान पीठ में न्यायाधीशों की न्यूनतम संख्या बढ़ाने के लिए अनुच्छेद 145(3) में संशोधन करने की आवश्यकता है। उपराष्ट्रपति ने राज्यसभा के प्रशिक्षुओं के छठे बैच को संबोधित करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति को बिल पर तीन महीने में निर्णय लेने का निर्देश दिया गया है। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो संबंधित राज्यपाल द्वारा भेजा गया विधेयक कानून बन जाता है।

न्यायपालिका की वर्तमान हालात पर बात करते हुए उपराष्ट्रपति ने न्यायाधीश यशवंत वर्मा का भी जिक्र किया। ये वही जज हैं, जिनके घर पर इस साल होली के दिन नोटों से भरे बोरों में आग लग गई थी। मामले में भारी विवाद के बाद भी सुप्रीम कोर्ट उन्हें दिल्ली से इलाहाबाद हाई कोर्ट स्थानांतरित कर दिया गया और मामले की जाँच के लिए आंतरिक कमिटी बना दी गई।

धनखड़ ने कहा, “14 और 15 मार्च की रात को नई दिल्ली में एक न्यायाधीश के निवास पर एक घटना घटी। सात दिनों तक किसी को इसके बारे में पता नहीं चला। हमें खुद से सवाल पूछने होंगे। इसमें हुई देरी को क्या समझा जा सकता है? क्या यह क्षमा योग्य है? क्या इससे कुछ बुनियादी सवाल नहीं उठते? किसी भी सामान्य स्थिति में और सामान्य परिस्थितियाँ कानून के शासन को परिभाषित करती हैं।”

अनुच्छेद 142, जिसे उपराष्ट्रपति ने परमाणु मिसाइल कहा

संविधान के अनुच्छेद 142 में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और डिक्री को देने का अधिकार और उसे लागू करने आदि से संबंधित से संबंधित है। अनुच्छेद 142 के उपबंध-1 सुप्रीम कोर्ट को ये अधिकार देता है कि उसके पास आए किसी भी मामले में वह न्याय के लिए डिक्री या आदेश पारित कर सकेगा। यह डिक्री या आदेश पूरे भारत में लागू होगा।

इसके उपबंध-2 में कहा गया है कि इस संंबंध में संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून के अधीन रहते हुए सुप्रीम कोर्ट पूरे भारत के किसी भी क्षेत्र के किसी व्यक्ति को हाजिर होने, दस्तावेज प्रस्तुत करने, अवमानना की जाँच करने या दंड देने का समस्त अधिकार उसके पास होगा। इस तरह अनुच्छेद 142 में स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट को संसद द्वारा पारित कानून के दायरे में ही काम करना है।

हालाँकि, बात यहीं खत्म नहीं होती। कॉलेजियम के तर्ज पर सुप्रीम कोर्ट ने इसकी भी काट निकाली है। पिछले कुछ वर्षों में अनुच्छेद 142 की व्याख्या और उसके प्रयोग के विभिन्न उदाहरण पेश किए गए। हाल ही में भारत के सुप्रीम कोर्ट के पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में निर्णय देकर एक कानूनी ढाँचा विकसित किया।

यह ढाँचा संविधान के अनुच्छेद 142 की व्याख्या और उसके प्रयोग से संबंधित था। इस निर्णय ‘एशियन रीसर्फेसिंग ऑफ रोड एजेंसी प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य बनाम सीबीआई के पिछले निर्णय से बिल्कुल उलट था। सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट बार के फैसले में एशियन रीसर्फेसिंग के निर्णय को पलट दिया था। इसमें अनुच्छेद 142 के तहत नए दिशा-निर्देश जारी करने के अलावा अंतरिम आदेशों से संबंधित पहलुओं को भी शामिल किया।

इसमें विचार किया गया कि अंतरिम आदेश को रद्द करने या संशोधित करने का हाई कोर्ट का अधिकार क्या है और क्या अंतरिम आदेश किसी विशेष समय की समाप्ति पर खुद ही समाप्त हो सकता है। एशियन रिसर्फेसिंग के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसी मुद्दे पर विचार किया था। उस दौरान शीर्ष न्यायालय ने माना था कि जब तक अंतरिम आदेश का समय ना बढ़ाया न जाए, वह आदेश की तारीख से 6 महीने बाद स्वतः समाप्त हो जाता है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने उस फैसले को उलट दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एशियन रीसर्फेसिंग मामले में निर्धारित समय बीत जाने पर अंतरिम आदेशों की स्वतः समाप्ति की शर्त लागू रहने योग्य नहीं थी और इसलिए इसे खारिज कर दिया। इसके बाद अनुच्छेद 142 में दिए गए अधिकारों के तहत उसने नए दिशा-निर्देश जारी किए।

इसके तहत सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि क्या कोई न्यायालय अंतरिम आदेश पारित करते समय कोई समय सीमा तय कर सकता है। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि अनुच्छेद 142 के तहत शक्ति का उपयोग प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को दबाने या वादियों के मूल अधिकारों को दबाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 142 के तहत अधिकार क्षेत्र का उपयोग विवेक से और केवल असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए, ताकि विवादों का निष्पक्ष और न्यायपूर्ण समाधान निकाला जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने जोर दिया कि अनुच्छेद 142 द्वारा दी गई शक्तियों का उद्देश्यपूर्ण न्याय सुनिश्चित करना है।

सुप्रीम कोर्ट ने एशियन रीसर्फेसिंग में पहले दिए गए निर्णय को खारिज करते हुए कहा कि अनुच्छेद 226(3) के तहत पारित स्थगन आदेश को रद्द करने के लिए अनिवार्य शर्त स्थगन आदेश हटाने के लिए आवेदन दाखिल करना और न्यायालय द्वारा न्यायिक विवेक का प्रयोग करना है। इस आवेदन पर दो सप्ताह के भीतर निर्णय नहीं लिया जाता है तो स्थगन आदेश स्वतः समाप्त नहीं होता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्थगन आदेश तब तक प्रभावी रहता है, जब तक कि इसके रद्द करने के लिए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए आवेदन का कारणों के साथ निपटारा नहीं हो जाता। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अदालतों को मामलों के निपटान के लिए कठोर समय-सीमा नहीं लगानी चाहिए, जब तक कि कोई असाधारण परिस्थिति न हो।

*अपने इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने जो नया गाइडलाइन तय किया उसके अनुसार, अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों का प्रयोग न्यायालय द्वारा अपने समक्ष पक्षकारों के लिए पूर्ण न्याय करने के लिए किया जा सकता है, लेकिन ऐसा करने में न्यायालय अन्य अधिकार क्षेत्रों में अन्य वादियों के पक्ष में पारित वैध न्यायिक आदेशों को रद्द नहीं करेगा।*

*राष्ट्रपति को निर्देश देने के लिए उपराष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट पर क्यों भड़के???

हमने अपने पिछले आर्टिकल में बताया था कि क्या सुप्रीम कोर्ट भारत के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति को निर्देश सकते हैं या नहीं। इस आर्टिकल में हमने कई कानून पहलुओं पर विचार किया था। कई लोगों के मन में सवाल उठता होगा कि भारत में पदों की वरीयता क्रम क्या है। इससे भी साफ हो जाएगा कि सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति को निर्देश दे सकता है या नहीं।

अगर वरीयता क्रम की बात की जाए तो राष्ट्रपति को देश का सर्वोच्च पद है। राष्ट्रपति को भारत का पहला नागरिक कहा जाता है। इतना ही नहीं, राष्ट्रपति और संसद को मिलाकर ही भारत बनता है और वह संघ के प्रशासन का प्रमुख होता है। इसी प्रशासन का एक अंग न्यायपालिका भी है। इस तरह देश का सर्वोच्च राष्ट्रपति का होता है।

भारत में राष्ट्रपति और राज्यपाल ही ऐसे दो पद हैं, जिनके खिलाफ अदालती कार्रवाई नहीं की जा सकती है। भारत के संविधान ने अनुच्छेद 361 के तहत इसका प्रावधान किया है। यह अनुच्छेद राष्ट्रपति और राज्यपालों के खिलाफ अदालती कार्यवाही से सुरक्षा प्रदान करता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ना ही इन दोनों को किसी मामले में नोटिस जारी कर सकता है और ना ही निर्देश दे सकता है।

राष्ट्रपति के बाद देश में दूसरा सर्वोच्च पद उपराष्ट्रपति का होता है। इसके बाद तीसरे नंबर पर प्रधानमंत्री आते हैं। देश का चौथा सर्वोच्च पद राज्यपाल का होता है, जो उनके कार्य वाले राज्यों में होता है। इसके बाद वरीयता क्रम में पाँचवें स्थान पर पूर्व राष्ट्रपति आते हैं। इसके बाद भारत के उपप्रधानमंत्री का पद वरीयता क्रम में 5A स्थान पर आता है।

*केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और लोकसभा स्पीकर का पद एक समान होता है। दोनों वरीयता क्रम में छठे नंबर पर आते हैं। इसके बाद सातवें नंबर पर केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्री अपने राज्यों में होते हैं। योजना आयोग के उपाध्यक्ष, पूर्व प्रधानमंत्री, राज्यसभा और लोकसभा में विपक्ष के नेता भी सातवें क्रम पर ही आते हैं।*

भारत रत्न से सम्मानित व्यक्ति का क्रम 7A होता है। आठवें क्रम में राजदूत, भारत द्वारा मान्यता प्राप्त राष्ट्रमंडल देशों के आयुक्त, अपने राज्य के बाहर मुख्यमंत्री एवं राज्यपाल होते हैं। नौंवें क्रम पर सुप्रीम कोर्ट के आते हैं। इसके बाद 9A पर संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष, मुख्य चुनाव आयुक्त और भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) आते हैं।

*वरीयता क्रम मेें 10वें स्थान पर राज्यसभा के उपसभापति, राज्यों के उपमुख्यमंत्री, लोकसभा के उपसभापति, योजना आयोग (वर्तमान में नीति आयोग) के सदस्य और केंद्र सरकार के राज्यमंत्री आते हैं। वहीं, 11वें स्थान पर भारत के अटॉर्नी जनरल, कैबिनेट सचिव और अपने-अपने केंद्रशासित प्रदेशों के भीतर लेफ्टिनेंट गवर्नर (उपराज्यपाल) तक शामिल हैं। वरीयता क्रम में 12वें स्थान पर पूर्ण जनरल या समकक्ष रैंक के पद पर कार्यरत चीफ ऑफ स्टाफ।*

Devender Singh जी ✍️✍️

साभार!!

कैसी संसद और उसके द्वारा बनाया क़ानून?

*कौन राज्यपाल?*

*कौन राष्ट्रपति ?*

*कौन प्रधानमंत्री ?*

*कैसी संसद और उसके द्वारा बनाया क़ानून?

*पार्थ*

आँखें खोलो और मेरा विराट रूप देखो. 

मैं ही हूँ जो खुद को नियुक्त करता हूँ. 

मैं ही हूँ जो खुद का प्रमोशन करता हूँ. 

मेरे ही भाई बंधू हैं जो अधोवस्त्र उतार कर महिला वकील को जज बना सकते हैं. 

मेरे ही घर से करोड़ों के जले नोट निकलते हैं. 

मैं ही हूँ जो आधी रात पाजामे में आतंकवादी का केस सुनता हूँ 

मैं ही हूँ जो आम जनता के मुकदमो को दसियों साल लटकाता हूँ 

हे पार्थ 

मेरी ही उपासना करो. 

मैं ही हूँ ब्रह्माण्ड का निर्माता और उसको चलाने वाला. 

मैं स्वयं साक्षात प्रभु हूँ.