चतुर्थी चंद्र पूजा - CHOURCHAN POOJA

कतेक जिबैए मैथिली -
*जय मां मैथिली*
मैथिली भाषामे किछु एहन शब्द सब अछि जे प्राय: आन कोनो भाषा मे नहि भेटैछ।
जेना :--
हकासल-पियासल, हुकरब, हॉक देब, हकार देब, रोमब, हहायल-फुफुआयल, अपसियाँत, कपड़ा खीचब, अधहन, हकमब, तितब, अपैत, ऐंठार, असगनी,
चिनबार, पनपथिया, ओरिका, सजमैन, गाँती , सरबा ,घैलसीरी, पिठार, घाइट, जाईठ, दौनी तौनी, सरिपहुँ, कछमछ, लिलोह, अगरजित्त, अरिपन, ओगरब, कोकनब, सिहकब, निहोरा, उफाँट, उचक्का, उकासी, उबेर, बपजेठ, लगही, अगरजीत, मुन्हाईर, अलक्ष , खापैर, लाडैन, लाड़ूबातू, अपसियाँत, हकासल, तीतल, बितपैन, पाकल परोड़, ओरिआओन, दुधकट्टू, मेजन, चीकस, चिकनै, अन्ठिया, अलगटेंट, उलौंच, गलमोचनी, अखियास, अधलाह, हिस्सक, बिसबिस्सी, बुझनुक, बेकछायब, बिधुआयल, अकान, आकाशकांकोड़़, घिनाओन, अगत्ती, खोंखी, सरियेनाय (संवारना), भुसकौल, छिलमिल्ली, तावड़ी, अंगैठीमोर, बदियल, अकच्छ, डालना (भोजक रसगर तरकारी), बटुक, अबंड, थापर, सटकन, पेना, ढ़ेलफोरा, लंक लऽ कऽ पड़ेनाइ, जुबताकऽ, मरौत काढ़नाई, पजेबा, चोपतनाई, बयस, दुइर, मैऽ, जाउत, जैधी, कनटीर, मुदा, बलौसँ, मुझौंसा, दबारनाइ, भोकासी, गाछ, नीक, लियौन, उठौना, बिदागरी, सराय, चटुआ, ऐँठ, अरिपन-पुरहर, नगहर, पातैर, खैक, तौनका, मौहक, हकार, अफ्स्याँत, बिढ़नी-पचहिया, लोहारि, घोरन, जोरन, चिल्हकौर, छागर, मरर, डम्हैल, बोनाएल, भिनसर, नोंकसी, पसाही, उपैत, धिप्पल, अनेरे, ओगरनाइ, अजबारल, भतबरी सगबरी, झरकल, अइहब, पवनौट, बेसाहनाइ, अलरलरैनी, अझक्के, बैलेनाइ, अनरनेबा, बिरार, पालो, गरदामी, लागैन, ठोकरा, परसन, पारस, समधौत, मठट, बिलैया, धरैन, कमठौनी, खौंझी, अनठेनाइ, नाइद, सोइरी, गुनामुना, बुकनी, नरेंटी, अधक्की, असगन्नी, ओरिका, अपसियांत, छाबा, रिबरिब, कबकब, असगनी, ओरियानी, ओरिका , डिबिया, दियठि , चिनबार , जाबी , अचौना कड़ाम ,सनटिटही, खपटा-खुपटी , दबिया , खुर , चट्टी , समार, परिकट, चिनवार, जोनपिट्ठा, बरहन जटुआ, कइला, परचट्टा, मिसमिसैल, निरैठ, अछिंजल, निखनात, अधहन, दाउन, सिधहा, सीक-पटइ, हकार, नाैत, अरिपन, पिठार, मुज, गाेनैर, सेज, खाँच, माटिक चक्का, कुरहरि, काेदारि, खुरपी, हाँसु, टेंगारी, हर, पगहा, जाैरी, रही, सुप, चालनि, छाैंकब, चाैकिठ, केबार, पटिया, झुल, झाेर, झाेरा, अंगा, असगनि, काठके बिलैया(झिटकिली), फटकी, बाध, टाेक, भुसनी, मिसिया, डिविया, गुराँभुस्सा, कुट्टी, लैह, लहठी, पटमासि, धाँसा, काेबर, सपरतिव, छुच्छे, कलौ, इछाइन, अढौनाय, सोहारी, बारहैन, अकान, बथान, धिया, अपैत, उसना, तिमन, तरूआ, जलखय, पारस, बिझोउ, नरेंटी, अधक्की, असगन्नी, ओरिका, अपसियांत, छाबा, रिबरिब, कबकब, हकार, नाैत, अरिपन, पिठार, मुज, गाेनैर, सेज, खाँच, माटिक चक्का, टेंगारी, हर, पगहा, जाैरी, रही, सुप, चालनि, छाैंकब, खरकट्टब, आ उकट्ठी, पैनसोखा, अहियबक फड़, कुलबोड़ना, जनपिट्टा, हेहर,
तीमन,तीतल, चिनवार, कन्नैल,सोहारी,सिरूआ, माइनजन, ढेकी,उखड़ि समाठ, हरवाही, हड़सठा, हेंगा,जाइठ, सेर,अढैया,पसेरी,कनमा, छटांक, सवैया, पौना, ओठगन, बिरार, हिलोरा, मचकी, खुरचन, खरिहान, दलान, ओलती, दाऊन, जाबी, जोखब, कोड़ब, खरोड़, खर, नमहा, सग तोड़नी, अल्हुआ, सामा, कोदो, डोका, कांकोड़,पनिसोखा, खाट, हाट, बाट, टाट, इनार
रकटले जिनगी बितलौ रे सरधुआ कोढ़ी futta । छिछियाइत रहू । हेहरा , लबरा कहीं के, खरकटल l
हमरा बूझने उकट्ठी शब्द अद्भुत शब्द मैथिली भाषा छोड़ि कुनु भाषामे एहन शब्द नहि।
अपने सबसं सादर निहोरा जे अप्पन मातृभाषा मैथिली के समृद्धशाली शब्दकोश सं आओर शब्द जोड़िकय कृतार्थ करवाक अनुग्रह अवस्से करी।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कभी व्यक्ति प्रधान को प्राथमिकता नहीं देता है क्योंकि व्यक्ति में कही न कही छल-कपट, लाभ-हानि की प्रवृत्ति होती ही हैं. संघ के संस्थापक परम् पूजनीय डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार जब 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना कर रहे थे तो उनके मन में ये प्रशन उठा था. कुछ स्वयंसेवक ने उन्हें ही गुरु बनने की सलाह भी दे दिया था. लेकिन राष्ट्र के प्रति समर्पित डॉ. केशवराव बलिराम ने भगवा ध्वज को गुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया। इसके पीछे मूल भाव यह था कि व्यक्ति पतित हो सकता है पर विचार और पावन प्रतीक नहीं। विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन गुरु रूप में इसी भगवा ध्वज को नमन करता है।पर्वों, त्योहारों और संस्कारों की भारतभूमि पर गुरु का परम महत्व माना गया है। गुरु शिष्य की ऊर्जा को पहचानकर उसके संपूर्ण सामर्थ्य को विकसित करने में सहायक होता है। गुरु नश्वर सत्ता का नहीं, चैतन्य विचारों का प्रतिरूप होता है। रा. स्व. संघ के आरम्भ से ही भगवा ध्वज गुरु के रूप में प्रतिष्ठित है।
भारतभूमि के कण-कण में चैतन्य स्पंदन विद्यमान है। पर्वों, त्योहारों और संस्कारों की जीवंत परम्पराएं इसको प्राणवान बनाती हैं। तत्वदर्शी ऋषियों की इस जागृत धरा का ऐसा ही एक पावन पर्व है गुरु पूर्णिमा। हमारे यहां ‘अखंड मंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरं…तस्मै श्री गुरुवे नम:’ कह कर गुरु की अभ्यर्थना एक चिरंतन सत्ता के रूप में की गई है। भारत की सनातन संस्कृति में गुरु को परम भाव माना गया है जो कभी नष्ट नहीं हो सकता, इसीलिए गुरु को व्यक्ति नहीं अपितु विचार की संज्ञा दी गई है। इसी दिव्य भाव ने हमारे राष्ट्र को जगद्गुरु की पदवी से विभूषित किया। गुरु को नमन का ही पावन पर्व है गुरु पूर्णिमा (आषाढ़ पूर्णिमा)।
ज्ञान दीप है सद्गुरु
गुरु’ स्वयं में पूर्ण है और जो खुद पूरा है वही तो दूसरों को पूर्णता का बोध करवा सकता है। हमारे अंतस में संस्कारों का परिशोधन, गुणों का संवर्द्धन एवं दुर्भावनाओं का विनाश करके गुरु हमारे जीवन को सन्मार्ग पर ले जाता है। गुरु कौन व कैसा हो, इस विषय में श्रुति बहुत सुंदर व्याख्या करती है-‘विशारदं ब्रह्मनिष्ठं श्रोत्रियं…’ अर्थात् जो ज्ञानी हो, शब्द ब्रह्म का ज्ञाता हो, आचरण से श्रेष्ठ ब्राह्मण जैसा और ब्रह्म में निवास करने वाला हो तथा अपनी शरण में आये शिष्य को स्वयं के समान सामर्थ्यवान बनाने की क्षमता रखता हो। वही गुरु है। जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य की ‘श्तश्लोकी’ के पहले श्लोक में सद्गुुरु की परिभाषा है-तीनों लोकों में सद्गुरु की उपमा किसी से नहीं दी जा सकती।
बौद्ध ग्रंथों के अनुसार भगवान बुद्ध ने सारनाथ में आषाढ़ पूर्णिमा के दिन अपने प्रथम पांच शिष्यों को उपदेश दिया था। इसीलिए बौद्ध धर्म के अनुयायी भी पूरी श्रद्धा से गुरु पूर्णिमा उत्सव मनाते हैं। सिख इतिहास में गुरुओं का विशेष स्थान रहा है। जरूरी नहीं कि किसी देहधारी को ही गुरु माना जाये। मन में सच्ची लगन एवं श्रद्धा हो तो गुरु को किसी भी रूप में पाया जा सकता है। एकलव्य ने मिट्टी की प्रतिमा में गुरु को ढूंढा और महान धनुर्धर बना। दत्तात्रेय महाराज ने 24 गुरु बनाये थे।
भगवा ध्वज है भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक
चाणक्य जैसे गुरु ने चन्द्रगुप्त को चक्रवर्ती सम्राट बनाया और समर्थ गुरु रामदास ने छत्रपति शिवाजी के भीतर बर्बर मुस्लिम आक्रमणकारियों से राष्ट्र रक्षा की सामर्थ्य विकसित की। मगर इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि बीती सदी में हमारी गौरवशाली गुरु-शिष्य परंपरा में कई विसंगतियां आ गयीं। इस परिवर्तन को लक्षित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के समय भगवा ध्वज को गुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया। इसके पीछे मूल भाव यह था कि व्यक्ति पतित हो सकता है पर विचार और पावन प्रतीक नहीं। विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन गुरु रूप में इसी भगवा ध्वज को नमन करता है। गुरु पूर्णिमा के दिन संघ के स्वयंसेवक गुरु दक्षिणा के रूप में इसी भगवा ध्वज के समक्ष राष्ट्र के प्रति अपना समर्पण व श्रद्धा निवेदित करते हैं। उल्लेखनीय है कि इस भगवा ध्वज को गुरु की मान्यता यूं ही नहीं मिली है। यह ध्वज तपोमय व ज्ञाननिष्ठ भारतीय संस्कृति का सर्वाधिक सशक्त व पुरातन प्रतीक है। उगते हुये सूर्य के समान इसका भगवा रंग भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिक ऊर्जा, पराक्रमी परंपरा एवं विजय भाव का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक है। संघ ने उसी परम पवित्र भगवा ध्वज को गुरु के प्रतीक रूप में स्वीकार किया है जो कि हजारों वर्षों से राष्ट्र और धर्म का ध्वज था।
गुरु शब्द का महत्व इसके अक्षरों में ही निहित है। देववाणी संस्कृत में ‘गु’ का अर्थ होता है अंधकार (अज्ञान) और ‘रु’ का अर्थ हटाने वाला। यानी जो अज्ञान के अंधकार से मुक्ति दिलाये वह ही गुरु है। माता-पिता हमारे जीवन के प्रथम गुरु होते हैं। प्राचीनकाल में शिक्षा प्राप्ति के लिए गुरुकुलों की व्यवस्था थी। आज उनके स्थान पर स्कूल-कॉलेज हैं।
अनुपम धरोहर: गुरु-शिष्य परम्परा
गुरु-शिष्य परम्परा भारतीय संस्कृति की ऐसी अनुपम धरोहर है जिसकी मिसाल दुनियाभर में दी जाती है। यही परम्परा आदिकाल से ज्ञान संपदा का संरक्षण कर उसे श्रुति के रूप में क्रमबद्ध संरक्षित करती आयी है। गुरु-शिष्य के महान संबंधों एवं समर्पण भाव से अपने अहंकार को गलाकर गुरु कृपा प्राप्त करने के तमाम विवरण हमारे शास्त्रों में हैं। कठोपनिषद् में पंचाग्नि विद्या के रूप में व्याख्यायित यम-नचिकेता का पारस्परिक संवाद गुरु-शिष्य परम्परा का विलक्षण उदाहरण है। जरा विचार कीजिए! पिता के अन्याय का विरोध करने पर एक पांच साल के बालक नचिकेता को क्रोध में भरे अहंकारी पिता द्वारा घर से निकाल दिया जाता है। पर वह झुकता नहीं और अपने प्रश्नों की जिज्ञासा शांत करने के लिए मृत्यु के देवता यमराज के दरवाजे पर जा खड़ा होता है। तीन दिन तक भूखा-प्यासा रहता है। अंतत: यमराज उसकी जिज्ञासा, पात्रता और दृढ़ता को परख कर गुरु रूप में उसे जीवन तत्व का मूल ज्ञान देते हैं। यम-नचिकेता का यह वार्तालाप भारतीय ज्ञान सम्पदा की अमूल्य निधि है। हमारे समक्ष ऐसे अनेक पौराणिक व ऐतिहासिक उदाहरण उपलब्ध हैं जो इस गौरवशाली परम्परा का गुणगान करते हैं। गुरुकृपा शिष्य का परम सौभाग्य है। गुरुकृपा से कायाकल्प के अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं।
: आपको जानकर हैरानी होगी कि 1965 तक मुस्लिम रेजीमेंट थी। दो बड़ी घटनाएं हैं जिन्होंने सेना को उन्हें हटाने पर मजबूर कर दिया।
1. 15/अक्टूबर/1947 को जब पाकिस्तान और अफगानिस्तान के पठानों ने भारत पर हमला किया, तो पूरी सोई हुई बहादुर गोरखा कंपनी को अपनी ही बटालियन के साथी मुस्लिम भाई सैनिकों ने मार डाला। कंपनी कमांडर प्रेम सिंह सबसे पहले शिकार बने। 2 गोरखा जेसीओ 30 के साथ अगले दिन मेजर नसरुल्ला खान मुस्लिम सैनिकों को थारोछी किले में ले गए, जहां गैरीसन ने आनंदपूर्वक उन्हें प्राप्त किया। रात के विकास से अनजान और जल्द ही उन पर क्या होने वाला था। रात में, एक भयानक दोहराव वाले प्रदर्शन में सभी गोरखाओं की हत्या कर दी गई थी। उनके कमांडर कप्तान रघुबीर सिंह थापा को "मौत की आग में जला दिया गया था। पीएम नेहरू ने मामले को दबा दिया। यह सब "पाकिस्तान की सैन्य दुर्दशा" पुस्तक में वर्णित है।
2. पाकिस्तान के साथ 1947 के युद्ध के दौरान नेहरू ने एक और बड़ी बात छिपाई थी कि कई मुसलमानों ने अपने हथियार डाल दिए और भारतीयों से लड़ने के लिए ब्रिटिश प्रमुख जॉन बर्ड के तहत पाकिस्तान में शामिल हो गए, लेकिन बाद के चरण में ब्रिटिश मेजर को निलंबित कर दिया गया। और अगले जहाज पर तुरंत इंग्लैंड ले जाया गया।स्वर्गीय सरदार पटेल इसे सार्वजनिक करना चाहते थे लेकिन गांधी द्वारा ऐसा नहीं करने का आदेश दिया गया था।
3. 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान 30,000 भारतीय सैनिकों की मुस्लिम रेजिमेंट ने न केवल पाकिस्तान के साथ लड़ने से इनकार किया बल्कि उनका समर्थन करने के लिए हथियारों के साथ पाकिस्तान चली गई। इसने भारत को बड़ी मुसीबत में डाल दिया क्योंकि उन्होंने उन पर भरोसा किया। लाल बहादुर शास्त्री को जहर देने से पहले मुस्लिम रेजिमेंट को समाप्त कर दिया।
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