रविवार, 30 दिसंबर 2018
शनिवार, 29 दिसंबर 2018
मैला - आँचल ।। रचनाकार - रेवती रमण झा "रमण"
|| मैला - आँचल ||
एक बाग के तरुअर से
हम एक डाल के फूल ।
री मैया,क्यो करती तू भूल ।।
मैला - आँचल अपना करती
क्यो ममता पर कालिख भरती
क्यो विधाता की बगिया में
उगा रही तू शूल ।। री मैया.....
कभी नही ममता दिखलाती
हरदम मुझको डाँट पिलाती
मै भी गुड़िया तितली सी हूँ
मेरे साथ भी झूल ।। री मैया....
मै नारी, सब कर सकती हूँ
गुण विधा सब भर सकती हूँ
मै मर्दों से कदम मिलाकर
चल सकती अनुकूल ।। री मैया...
सुख सुबिधा से मै खाली हूँ
बस , पर घर जाने वाली हूँ
कितना दिल का पत्थर हो तुम
री ममता का भूल ।। री मैया.....
अपनी नीयत को बिगार कर
मानव जीवन से तू हार कर
जो ज्योती दी,उसी आँख में
झोंक रही तू धूल ।। री मैया......
रचनाकार
रेवती रमण झा "रमण"
शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018
हाय रे इज्जत मेरी ।। रचनाकार - रेवती रमण झा "रमण"
|| हाय रे इज्जत मेरी ||
मुझ विधवा का व्याह होना
क्या ? बड़ा दुश्कर्म है ।
रे ! वेद-पाखण्डी बता फिर
क्या ? तुम्हारा धर्म है ।।
कट गई अरे नाक तेरी
और तुमको क्षोभ है ? ।
रे क्रूर क्यो न तुम बताते
जो तुम्हारा लोभ है ।।
यहाँ, चाहते हो भूख से
रोती बिलखती मै रहूँ ।
तेरी ही टुकड़े पर पलूँ
रे और तुझसे ये कहूँ ।।
हे भाग्य दाता अन्न दाता
दुःख मेरा तू दूर कर ।
तेरे चितवन की चहेती
तू ही मेरा जानेजिगर ।।
यह मेरी चढ़ती जवानी
जिन्दगी तेरे लिए ।
तेरी दया की दृष्टि - भिक्षा
भाग्य में मेरे लिए ।।
तो मै पावन धर्म मय,यहां
कुल - वधू विधवा तेरी ।
मेरा हाय पाखण्डी - धरम
हाय रे इज्जत मेरी ।।
रचनाकार
रेवती रमण झा "रमण"
मुझ विधवा का व्याह होना
क्या ? बड़ा दुश्कर्म है ।
रे ! वेद-पाखण्डी बता फिर
क्या ? तुम्हारा धर्म है ।।
कट गई अरे नाक तेरी
और तुमको क्षोभ है ? ।
रे क्रूर क्यो न तुम बताते
जो तुम्हारा लोभ है ।।
यहाँ, चाहते हो भूख से
रोती बिलखती मै रहूँ ।
तेरी ही टुकड़े पर पलूँ
रे और तुझसे ये कहूँ ।।
हे भाग्य दाता अन्न दाता
दुःख मेरा तू दूर कर ।
तेरे चितवन की चहेती
तू ही मेरा जानेजिगर ।।
यह मेरी चढ़ती जवानी
जिन्दगी तेरे लिए ।
तेरी दया की दृष्टि - भिक्षा
भाग्य में मेरे लिए ।।
तो मै पावन धर्म मय,यहां
कुल - वधू विधवा तेरी ।
मेरा हाय पाखण्डी - धरम
हाय रे इज्जत मेरी ।।
रचनाकार
रेवती रमण झा "रमण"
गुरुवार, 27 दिसंबर 2018
एक दूजे को पहचानो तुम ।। रचनाकार - रेवती रमण झा "रमण"
|| एक दूजे को पहचानो तुम ||
|| नर - नारी ||
नारी तू स्वर, है नर गीत ।
तुम दोनों के मधुर मिलने से
है बनता संगीत ।। नारी तू...
दिव्य लता का एक कुसुम तू
एक रेशम की डोरी
नील क्षितिज का धवल चन्द्र एक
अवनी एक चकोरी
एक घटा , छिटके एक दामिनि
नभ मंडल सुपुनीत ।। नारी तू....
एक सुधा रस , कणक कलश एक
एक सीप , एक मोती
एक तेल , एक वाती जगमग
जलती जीवन ज्योती
प्यारी जीवन - चक्की चलती
दो पाटन का प्रीत ।। नारी तू....
एक बुन्द स्वाती बन बर्षे
एक चातक तू प्यासा
एक काम की मोहिनी मूरत
एक मोहित अभिलाषा
मानसरोवर के अनुपम
रे युगल हंस, जगजीत ।। नारी तू...
एक मारुति, एक चंदन मलयज
एक उपवन तू सुफला
बट जीवन, बह कलित ललित
एक अविरल शीतल सुजला
एक सुहाग तू एक सुहागन
एक सजनी , एक साजन
क्यो नर जीवन बना अभागा
क्यो तू नारी अभागन
एक दूजे को पहचानो तुम
क्यो तुम हो भयभीत ।। नारी तू...
रचनाकार
रेवती रमण झा " रमण"
बुधवार, 26 दिसंबर 2018
है मुरली धर की माया ।। रचनाकार - रेवती रमण झा "रमण"
|| है मुरली धर की माया ||
काली रात कृष्ण की छँट कर
शुक्ल सलोना शशि ले आया ।
नव हरितिम परिधान धरा
श्रावण श्वेत - क्षीर वर्षाया ।।
राजित घन,चिकुर कच कुँचित
बड़ वारिज मुख मंड़ल पे ।
नीलाम्बर - पट जड़ित रत्न
तारावलि चन्द्र धवल पे ।।
किंशुक-कुण्डल कलित केवड़ा
कचनार - हार , नथ - बेली ।
बेगन बेली , बेणी - बिछिया
गेंदाएँ चारु चमेली ।।
हरसिंगार पैर की पैजनि
बिन्दिया रात की रानी ।
रच सोलह - श्रृंगार वत्तिसो
अभरण ललित सयानी ।।
गुलमोहर सुख - सेज सजी
चहुँ जुगनू जगमगवाती ।
आ प्रियतम , रजनीवाला
सजकर जो तुम्हे बुलाती ।।
कुसुमवाण निज पूर्ण कला -
युत अनुपम रूप किशोरी ।
आँखे अपलक खुली , धुली
आंसू बह नींद - निगोड़ी ।।
अश्रु बिंदु बड़ बह मन्दाकिनि
जो अगनित नदियाँ सारी ।
अंतरमन बड़ छिपी वेदना
लगती छवि कितनी न्यारी ।।
विरहानल का सुलग ताप
फैला सारे तन मन में ।
सात स्वर्ग अपवर्ग अतुल
सुख व्यर्थ धरा जीवन में ।।
घटे न पल - युग विभावरी
यहाँ सन्मुख शैल अचल है ।
प्राणान्त की पीड़ाएँ
रे ! हर छन हर प्रतिपल है ।।
मार्तण्ड का शुभागमन पर
जो पावन धरा धुली है ।
जल थल नभचर जीव जन्तु
की,स्वप्निल आँखे खुली है ।।
अलि गुंजन मधु खग कलख
बन कर्कश श्वान की बोली ।
मनमोहक मृदुलता कुसुम
कर प्रतिपल व्यंग ठिठोली ।।
ऐसी कितनी विरहिन सज
नित सुनी सेज पे रोती ।
कोमलाग्डी तन कामातुर
मन अश्रुपात से धोती ।।
व्यथित विछोही का स्वर्णिम
सब स्वप्न तिमिर ले जाता ।
निर्झर निर्मल जल तरंग
उस मन की पीर बताता ।।
अश्रु ओस दल अम्बुज बिखरा
है विरह व्यथा की पाती ।
उस प्रभात अरुणिम आभा-
में जो आकर जलजाती ।।
इस विछोही की पीड़ाएँ
कह ! कौन इसे लिख पाया ।
तड़प रही राधा - प्यारी
है मुरली धर की माया।।
रचनाकार
रेवती रमण झा "रमण"
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