dahej mukt mithila

(एकमात्र संकल्‍प ध्‍यान मे-मिथिला राज्‍य हो संविधान मे) अप्पन गाम घरक ढंग ,अप्पन रहन - सहन के संग,अप्पन गाम-अप्पन बात में अपनेक सब के स्वागत अछि!अपन गाम -अपन घरअप्पन ज्ञान आ अप्पन संस्कारक सँग किछु कहबाक एकटा छोटछिन प्रयास अछि! हरेक मिथिला वाशी ईहा कहैत अछि... छी मैथिल मिथिला करे शंतान, जत्य रही ओ छी मिथिले धाम, याद रखु बस अप्पन गाम - अप्पन बात ,अप्पन मान " जय मैथिल जय मिथिला धाम" "स्वर्ग सं सुन्दर अपन गाम" E-mail: apangaamghar@gmail.com,madankumarthakur@gmail.com mo-9312460150

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गुरुवार, 2 जून 2011

मातृभाषा@प्रभात राय भट्ट

मिथिलावासी बोल बोलू मेची स: महाकाली,
हिंदी उर्दू इंग्लिस चाहे बोलू आऔर नेपाली,
मुदा सब स अनमोल रत्न अछि अपने मातृभाषा,
किया तुलल छि कर पैर मातृभाषा के दुर्दशा,
जन्म लैत कान स:सुनलौ मैथिलि स्वर मधुर,
मैथिलि स्वर मधुर सुनीक नाईच उठैय मयूर ,
सरस सरल ममता सा भरल अछि माएक बोली,
जेना आमक गाछी में कु कु कु कुह्कैय कोयली,
मथिली भाषा आ मिथिलाक जीवनशैली स:
उत्तपन भेल अछि मिथिलाक विराट संस्कृति,
मनमोहक आ मनोरम अछि मिथिलाक प्रकृति,
गंगा हिमालय कोशी गण्डकी के मध्य्भूमि,
हराभरा जंगल एतिहासिक नदी के संगम,
अछि प्रेम प्राग सुन्दर अनमोल अनुपम,
हिंदी उर्दू इंग्लिस बोली चाहे अओर बोलू नेपाली,
माए के माथक टिकुली अछि मैथिलि बोली,
टिकुली बिनु सुन्दर नै लागत माएक सृंगार,
अपने हाथे किये करैत छि माएके सृंगारक ऊजार,

रचनाकार:प्रभात राय भट्ट

रविवार, 29 मई 2011

अंदाज ए मेरा: आत्‍मसमर्पित नक्‍सली की कहानी........ उसी की जुबान...

अंदाज ए मेरा: आत्‍मसमर्पित नक्‍सली की कहानी........ उसी की जुबान...: "उसकी उमर कोई 21 साल है। वैसे तो 21 साल की उमर कोई बडी उमर नहीं होती लेकिन इस कम उम्र में उसने काफी कुछ झेला है। उसका नाम संध्‍या है। आज..."

गुरुवार, 26 मई 2011

आब लीअ लिच्ची से बनल रसगुल्ला के मज़ा..

लिच्ची के दीवाना आ शौक़ीन के लेल एकटा नीक खबर अछि। आब ओ साल भैर लिच्ची के मज़ा लए सकय ये कियाकि आब लिच्ची से बनत रसगुल्ला जकरा दू बरस तक अहाँ आराम से राखि सकय छिये। एही प्रोडक्ट के उत्पादन मुजफ्फरपुर के बेला के अवस्थित लीची के इंटरनेशनल यूनिट में मंगल दिन से शुरू भए गेल ये। एही बरस लिच्ची के २० दिनक सीजन में करीब तीन लाख रसगुल्ला बनाबै के लक्ष्य ये। जकरा तीन दिन के भीतर देश आ विदेश के बाज़ार में उतारि देल जाएत। पिछलो बरस लिचिका इंटरनेशनल लिच्ची के पचास हज़ार डिब्बा बाज़ार में उतारलक रहे मुदा एही बेर के सीजन में एकर मांग बीस लाख डिब्बा के अछि। एही रसगुल्ला के मांग एतय जबरदस्त ये की बनय से पहिने एकर बुकिंग भए जाय रहल ये। एही बेर एकर बाज़ार दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, के संगे स्विट्जर्लैंड, इंगलैंड आ जर्मनी बाज़ार में भी खूब ये। एकर डिमांड के देखय के बाद बिहार के अलावा आऔर राज्य भी एकर ऊपर ध्यान दए रहल ये मुदा मुजफ्फरपुर के लीची के ते बाते जुदा अछि, पाहिले लिचिका इंटरनेशनल के जूस, आ प्लप के स्वाद ते लेते रही आब लीअ लिच्ची के रसगुल्ला के मज़ा.

शनिवार, 21 मई 2011

सजना हमर मनमोहना@प्रभात राय भट्ट

हे ययो दुलरुवा सजना हमर मनमोहना,
अहाँ बिनु दिन राईत हम काटैछी कहुना,
बितल अषाढ़ एलई देखू सावन के महिना,
संगीसहेली सभक आबिगेलय प्रियतम पहुना,

मिलल नजैर अहाँ संग  हमर जहिया स:,
अहाँ बिनु दिल लगैया नए हमर तहियाँ स:,
बड़ मुश्किल स: हम दिन राईत काटैछी,
सद्खैन सजना अहाँक बाट तकैत छि,

टुनिया मुनिया चुटकुनिया के भेलई वियाह,
पुनिया ललमुनिया के द्वार  एलई बराती,
मुदा हम बनल छि संगी सभक सराती,
नीन्द स: उठी उठी गबैछी हम पराती,

यी सभ देखिक मोन कटैय हमर अहुरिया,
हम कहिया बनब अहाँक घर क बहुरिया,
हे ययो दुलरुवा सजना हमर मनमोहना,
अहाँ बिनु दिन राईत हम काटैछी कहुना,

एसगर राईतमें नुका नुका श्रृंगार करैछी,
लाल लाल चुनरी ओढ़ी हम पेटार करैछी,
मोने  मोन हम सोचलौ यी बेकार करैछी,
फेर अपने हाथे श्रृंगारक उज्जार करैछी,

हम तडपैछी जेना ज़ल बिनु तडपैय मीन,
जाईगजाईग प्रात: करैछी उडीगेल आईखक निन,
सजना निरमोहिया राखु हमर स्नेहक लाज ,
जल्दी स: लक आऊ बराती संग शाज बाज , 

रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

मुह किया फुलौनेछी@प्रभात राय भट्ट

मुह किया फुलौनेछी@प्रभात राय भट्ट

मुह किया फुलौनेछी नोर किया बहौनेछी,
किछ बाजु नए सजनी हमर प्राण प्रिया,
मोन कुह्कैया सजनी फटईय हमर हिया,
भूल करबै नए कहियो  देब  दगा प्रियतम,
अहाँक पबैला लेब हम  बेर हजार बेर जन्म,

संग देब अहाँ केर  जाधैर चलतै  हमर साँस,
अहूँ संग नए छोड़ब यी अछि हमर आस,
अहाँ छि अनमोल रत्न रखाब हम जतन,
अहिं पैर निछावर केनु प्रिया अपन तनमन,

अहाँक स्नेह स: मोनमे हमरा उमरल उमंग,
प्रेमक  डगैर पैर हम चलब अहाँक संग संग,
कियो तोईर नए सकैत अछि यी प्रेम बंधन,
आई नए त काईलह हेतई अपन प्रेम मिलन,

लाख बैरी हेतई दुनिया चाहे अओर जमाना,
प्रियतम जौं अहाँ संग दी त मिलजेतै ठेगाना ,
प्रेम स: उपजैय जिनगीमें रंगविरंगक बहार,
प्रेमक जे दुश्मन ओकर जिनगी अछि बेकार,

रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट