dahej mukt mithila

(एकमात्र संकल्‍प ध्‍यान मे-मिथिला राज्‍य हो संविधान मे) अप्पन गाम घरक ढंग ,अप्पन रहन - सहन के संग,अप्पन गाम-अप्पन बात में अपनेक सब के स्वागत अछि!अपन गाम -अपन घरअप्पन ज्ञान आ अप्पन संस्कारक सँग किछु कहबाक एकटा छोटछिन प्रयास अछि! हरेक मिथिला वाशी ईहा कहैत अछि... छी मैथिल मिथिला करे शंतान, जत्य रही ओ छी मिथिले धाम, याद रखु बस अप्पन गाम - अप्पन बात ,अप्पन मान " जय मैथिल जय मिथिला धाम" "स्वर्ग सं सुन्दर अपन गाम" E-mail: apangaamghar@gmail.com,madankumarthakur@gmail.com mo-9312460150

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बुधवार, 29 जनवरी 2020

!!बजाकS बीणा हे शारदे !! गीतकार - निशान्त झा "रमण"


   !! बजाकS बीणा हे शारदे !!




 
 करू इजोर अइ दास के जिनगी
 बजाकs  बीणा  हे  शारदे ।
 काटैत अहुरिया बयस बीत गेल
 आबो सुने हमर पुकार गे ।।
                               करू इजोर अइ ......
 तोरे महिमा ऋषी  मुनी गाबैत
 भेल अलंकृत वेदक सार गे ।
 सेवलउ सदिखन द्वार तोहर माँ
 हमरा ने दोसर कियो आर गे ।
                                 करू इजोर अइ ......
 जरबियो एकबेर ज्ञानक बाती
 माँ चहुंदिश भेल अन्हार गे ।
 बेटा फसल अइ बीच भवसागर
 सम्हार हमर आब पतवार गे ।।
                                  करू इजोर अइ ......

 गीतकार -
 निशान्त झा "रमण"

मंगलवार, 21 जनवरी 2020

हेरबरी वियाह कनपटी सिंदूर ।। रचना - कविता झा



    Date : १९,०१,२०२०
( हेरबरी वियाह कनपटी सिंदूर)
स्नेही एक शिक्षित आ
गुणी महिला छलाथी एक दिन हुनकर पुत्र एक सुंदर आ किमती जुता अनलखिन आ कहला
मां आहां लेल अनालाहू, जार छैक। मां पुछलखिन कतेके अछी बेटा बजलाह ५०००
अरे एते क महग जुता के हमरा कोन प्रयोजन
अच्छी। बेस, एक दिन हुनका अपना भाई के
बर्थडे में जायिके छल सोचलिह आई नीक दिन
अच्छी नबके जुता पहिर लैत छी। ओ पहीर ओढ़ी
भाई घर पहुंच लिह।दिन भरी खूब रमन_चमन भेल सांझ में दोसराक संगे बिदा भेलिह हरबर में
दोसर जुता जे सामने भेटलनी बिना देखने पाहिर
लेली। जखन रास्ता में रहथी त हूनका बुझायाल
जे जुता कनि dhil अच्छी, सोचलीह जे ओकर
फिता खियिल गेल हेताई।घर पहुंच स पहिने जखन ओ फीता बनहलेल पैर दिस तकैत छैथ त
जा ई त हुनाकर ओ जूते नहि जे बेटा अनिक देने
छलखिन। बहुत आश्चर्य भेलनी मुदा एखन केना
किछु बजतिह संग में दोसर कियो छलाह। घर आबि सब स पही ने जुता नुकाक रखालिह फेर
भाभी के फोन केली। भाभी हिनकर जुता के ओरिया क रखलिह आ जीनकर जुता रहनी हुनाका अपन सैंडिल दय राजस्थान बिदा केलिह
 एकरे कहैत अछी हरबरी बियाह कनपटी सिंदूर।
                            कविता झा।🙏

शनिवार, 18 जनवरी 2020

अंतर्मन ।। रचना - कविता झा



              !! अंतर्मन !!


 
                (अंतर्मन)
बनि दिया के ज्योति,
तिमिर के आउ भगाबी।
पथ के करि स्वच्छ झार सँ,
जौं अशोक के गाछ लगाबी।।
          रंग-मंच अछि सजी चुकल,
          करु भूमिका तय पर्दा उठाबि।
         साक्ष्य अछि दर्शक मूक हेताह,
         मुदा,किछुओ त संज्ञान लेता।।
नकारत्मक सोच स भरल छि त,
कहु कोना सुख चैन भेटत।
सगर घरा ज सुरा भरल हो,
अमृत कोना सहेज सकत।।
          स्वयं के गाथा,स्वयं ही अर्पण
          परहित के ने  जानी।
          सुखी जीवन के सार वैह थिक,
          रहलहुँ हरपल बनि अज्ञानी।।
ज्ञान-विज्ञान के युग मे देखु,
केहन ओझरायल नेना।
अपन चैन के त्यागी सदतिखन,
रुपिया अर्जये सुखलय।।
                कविता झा

शुक्रवार, 17 जनवरी 2020

कने सुनु श्रीमान ।। रचनाकार - बद्रीनाथ राय "अमात्य"

              !! कने सुनु श्रीमान !!


मैथिली ज्ञान आऔर शिक्षा-साहित्य आई भेला अछि हरियर घास
   साढ़े मात्र चरईए जिनका दुर भेल छथि मैथिल खास
   मैथिली-मिथिला केर सपूत सभ फाँकी रहल छथि घूरा,
   सम्मानित होइ छथि ओ - बेसी जे छथि लोक बेलुरा
   विद्यापति जी भेला खेलौना किछु मैथिल छथि बेचनिहार ।
   माँ मैथिली के बेटा देखू माएयक चीर हरण केनिहार ।।
   पुरष्कार साकार होइत अछि ऊँच हवेली राज निवाश
   माईट-पानि छोरि पुष्पित अछि किछु मैथिल के कुल आकाश
   अक्षर के है ज्ञान ने कनिऔ ओकरे झण्डा छइ फरराइत
   लात सँ लत खुरदईन होइ छथि ठाढ़ भेल जे शिष्ट पछाइत
   महा मदारी बजा रहल अछि डमरू ओ झुन-झुन्ना
   आगि में ऐइठल जरा रहल अछि दुष्ट शिरोमणि जुन्ना
मैथिली-मिथिला अछि अपियारी सभ दिन फ़सलेई रोहु-बुआरी
   मुदा आब सभ जागि गेल अछि सभ के चाही माछ-बुआरी
   महा-महत्व अछि पान-मखानक उत्पादक के की स्थान
   झनु-झुन्ना जे-बाजि रहल अछि तेकरो कने सुनु श्रीमान ।।।

   रचनाकार-
   बद्रीनाथ राय "अमात्य"
   गाम - करमोली "बिहार"

शनिवार, 11 जनवरी 2020

देखब हम सासुर केर भाड़....।। रचनाकार - बद्रीनाथ राय "अमात्य"

                                            !! सासुर कै भाड़ !!
                         
           

     देखब हम नौआ , कुचरै छल कौआ
     तपन  बुझायब  नयन  जरै  छल ।
     नौआ    संग    के      देवर    बौआ
     केहेन     पालकी     केहेन    कहार ।।
                      देखब हम सासुर केर भाड़....
    दिन  बितै  छल      युग  सन  सजनी
    काल समान छल दिन आओर रजनी
    भेल    बलाय    छल    यौवन   भाड़
                       देखब हम सासुर केर भाड़....
    कञ्चन नुपुर नव वस्त्र पहिरब देख पहुँ केs नयन जुराईव
    छल प्रतिक्षा बहुँत दिन सँ मन मे सोचने छलौ से पाइव,
    हृदय बहै छल गर्म वयार ।।
                        देखब हम सासुर केर भाड़....
    मन छल विकल नयन छल पियासल
    नञि   कs   सकै   छलौ   हरिबासल
    विष बढै छल बेसुमार ।।
                        देखब हम सासुर केर भाड़....
    प्रियतम  भेल   छला   सम   द्वितिया
    प्यासल  मन  छल  आयल  सेवतिया
    जीवन   मे   नञि   छल   किछु  सार
                        देखब हम सासुर केर भाड़....
    देह   जरै   छल   विरहानल  में
    अस्य  पीड़ छल मर्म स्थल में
     हृदय  सूखै  छल  जेना  पथार
                        देखब हम सासुर केर भाड़....
    मन भयभित रहै छल, सदखन आँगन में,आओर भीतर-बाहर
    नित मंजन करैत छलौ हम,कटि कs दँतमनि भाँटी आओर साहर
    नञि भावै छल वादय सितार ।।
                         देखब हम सासुर केर भाड़....
    कमल सदृग तारुण्य कोमल,छल वेश भेल छल कुसुम समान
    मारि रहल छला युवकगण सब,बाट धाट  में नयन कै बाण
    नञि कs सकै छलौ प्रतिकार ।।
                          देखब हम सासुर केर भाड़....
    भैया - भौजी देखवैत छला, हरदम हमरा अपन गुमान
    हम सोचैत छलौ कहिया आओत हमरा जीवन मे नव विहान
    पिता करै छला , वचन प्रहार ।।
                          देखब हम सासुर केर भाड़....
    परसब हम अपना टोल - परोस में,खीर मिष्ठान आओर पकमान
    हृदय करै छनि स्वागत हुनकर पहिरब हम नव - नव परिधान
    तुकि  लेबs  बाजs  कहार ।।
                          देखब हम सासुर केर भाड़....
     रंग विरंग तरकारी तरि कs ,करबनि हुनक खतिरमान
     छत्तीस व्यंजन सजा देवनि हम, कते खेता अतिरिक्त मेहमान
     मंगल गावि रहल अछि मनुआ हृदय भेल अछि जेना पहाड़ ।।
                           देखब हम सासुर केर भाड़....
     शास्त्र पुरानक उक्ति कहै छथि, पहुँ होइय परमेश्वर
     हमरा नञि चाही अलस्कारे ओ स्वयं छथि रत्नेश्वर
     आँचर स हुनक डगर बहारब, रचि रचि सोलह श्रृंगार
                              देखब हम सासुर केर भाड़....
     मन - वीणा केर तार टूटल छल, गरमी में लागै छल जाड़
     बेली पुष्प सँ सेज सजायब, आँजू पहुँ संग करब विहार ।।
                               देखब हम सासुर केर भाड़....

     लेखक - बद्री नाथ राय "अमात्य"
      ग्राo +  पो0 - करमोली
     भाया - कलुआही
     जिला - मधुबनी
        ( बिहार )