dahej mukt mithila

(एकमात्र संकल्‍प ध्‍यान मे-मिथिला राज्‍य हो संविधान मे) अप्पन गाम घरक ढंग ,अप्पन रहन - सहन के संग,अप्पन गाम-अप्पन बात में अपनेक सब के स्वागत अछि!अपन गाम -अपन घरअप्पन ज्ञान आ अप्पन संस्कारक सँग किछु कहबाक एकटा छोटछिन प्रयास अछि! हरेक मिथिला वाशी ईहा कहैत अछि... छी मैथिल मिथिला करे शंतान, जत्य रही ओ छी मिथिले धाम, याद रखु बस अप्पन गाम - अप्पन बात ,अप्पन मान " जय मैथिल जय मिथिला धाम" "स्वर्ग सं सुन्दर अपन गाम" E-mail: apangaamghar@gmail.com,madankumarthakur@gmail.com mo-9312460150

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शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

नाटक: "जागु"
दृश्य: चारिम
समय: दिन

(खेत में नारायण खेत तमैत)
(अकबर कें प्रवेश)

अकबर: प्रणाम, नारायण भाई!

नारायण: खूब निकें रहू !

अकबर: बुझि परैया खेतक खूब सेवा करैत छी !

नारायण: की सेवा करबै ?  माएक दूधक कर्ज कियो चुका सकैत अछि ? तहन  जतेक पार लगैया करैत छी !

अकबर: ...ठीक कहलौं ! माए आ खेत में कनेकों भेद नै । लोक माएक दूध पीब आ खेतक अन्न खाए पैघ होइत अछि , मुदा, देखबा में अबैत अछि जेँ मनुष्य पैघ भेला' बाद  माए आ खेत दुनु  कें बिसैर  भदेस  में जा ' बैस जाइत अछि  ।

नारायण: हम की कही ? ...कहबा लेल हमरा माए कें पांचटा  बेटा , मुदा, केकरो सँ कोनो सुख नै ! चारिटा भदेस रहैत अछि आ हम एकटा गाम पर रहैत छी , जतेक पार लगैत अछि सेवा करबाक प्रयत्न करैत छी ! ओकरा चारू कें त' पांच-छ: वर्ष गाम एलाह  भ' गेलहि ....

अकबर:..पांच-छ: वर्ष !! धन्य छथि महाप्रभु सभ ! की हुनका लोकन कें अपन जननी -जन्मभूमि कें याद नै अबैत छन्हि ??

नारायण:.. फोन केने छलाह --छुट्टी नै भेटहिया ! माए हेतु खर्चा हम सभ भाई मिल क' भेज देब ।

अकबर: तौबा!तौबा!! ई पापी पेट जे नै कराबाए  ! एक बिताक उदर भड़बाक  हेतु जननी-जन्मभूमिक परित्याग ! -भाई , की मिथिलांचल एतेक निर्धन थिक?  की माएक छातीक ढूध सुइख गेलहि  --जे एकर धिया-पुता कें दोसरक छातीक दूध पीबअ लेल विवश होबअ पइड़ रहल छै  ?

नारायण: नै भाई, नै ! हम एहि गप के नै मानैत छी , जे माए मैथिलिक छातीक दूध सुखा गेलाए ! ओकर दूध त' बहि क' क्षति भ' रहल छै ! कारण, धिया -पुता सभ 'सभ्य आ संस्कारी ' दूध पिबहे नै चाहैत अछि ! ओकरा त' भदेसी डिब्बा बंद दूध पिबाक  हीस्सक लागि गेल छै ।

अकबर: ठीक कहलौं ! धान कटेबाक अछि , एकटा ज'न नै भेट रहल अछि । सब दोसर जगह जा' गाहिर -बात सुनि गधहा जेना खटैत अछि, मुदा, अपन गाम आ अपन खेत में काज करबा' में लाज होइत छै ! भदेस में रिक्शा-ठेला सब चलाएत , मुदा, अपना गाम में मजदूरी नै करत ! आ भदेस में अनेरो अपन जननी-जन्मभूमि के अपनों आ दोसरो सँ गरियायत..

नारायण: अरे, हम त' कहैत छि--किछु दिन जँ जी-जान सँ एहि धरती पर मेहनत काएल जाए त' ई धरती फेर हँसत-लहलहाएत । कोनो धिया-पुता कें माएक ममताक आँचर सँ दूर नै रहए  पड़तै ।

अकबर: मुदा, ई होएत कोना ? कोना सुतल आत्मा कें जगाओल जाए?

नारायण:एहि हेतु सभ सँ पहिने हमरा लोकन कें जाइत-पाइत सँ ऊपर उठि एक होबअ पड़त ! हमरा सभ कें बुझअ पड़त  जे हम सभ मिथिलावाशी छी  अओर हमर मात्र एक भाषा थिक 'मिथिली' , हमर मात्र एक उद्देश्य थिक सम्पूर्ण मिथिलाक विकाश ।

अकबर: (खेत सँ माइट उठबैत ) हाँ  भाई, हाँ ! हम सभ एक छी --"मिथिलावाशी" । एहि माइट में ओ सुगंध अछि जकर महक अपना धिया-पुता कें जरुर खिंच लाएत ।(कविता पाठ)
        "हम छी मैथिल मिथिलावाशी, मैथिली मधुरभाषी ।
      मातृभूमि अछि मिथिला हमर, हम मिथिला केर संतान ।
     सीता सन बहिन हमर , पिता जनक समान ।
    नै कोनो अछि भेद-भाव , नै जाइत-पाइत कें अछि निशान ।
आउ एक स्वर में एक संग , हम मिथिला कें करी गुण-गान ---जय मिथिला , जय मैथिली ।
  पर्दा खसैत अछि
तेसर दृश्यक समाप्ति 
 
          

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

नाटक: "जागु"
दृश्य:तेसर
समय:भोर
(विष्णुदेव दालान में कुर्सी पर बैस अख़बार पढैत छथि, तहने अकबर मियां के प्रवेश )
अकबर:: राम! राम !! विष्णुदेव भाई ....

विष्णुदेव::(ध्यान तोडैत )...ओ अकबर भाई ! अस्सलाम  अलैकुम ! अरे , अहाँ  त' दुतिया के चाँद भ' गेल छी ! कतअ नुका रहल छलौं ? आऊ, बैसू-बैसू (अकबर कुर्सी पर बैसइत छथि )...अओर हाल-समाचार सुनाऊ |  कनियाँ आ धिया -पुता सभ ठीक छथि ने ?

अकबर:: हाँ ....! (चिंतित मुद्रा में ) एखन तइक त' ठीक छथि , मुदा.....

विष्णुदेव:: ....मुदा की ? कोनो विशेष गप ??

अकबर:: भाई ! हम रोजी -रोटी कें जुगार में अपन मातृभूमि छोइड़ मुंबई गेल छलौं , मुदा, ओतअ त' साम्प्रदयिक्ताक आगि में समूचा शहर धू-धू  क ' जरि रहल छै ! लोक सभ रक्त पिशाचू बनल अछि ! कतेकों लोक अकाल काल कें गाल में समां गेल ! कतेकों घर सँ  बेघर भ' गेल ! कतेकों बच्चा अनाथ भ' गेल ! कतेकों नारी विधवा भ' गेली !....भाई ! हमरा त' डर लागि रहल अछि --कहीं ई आगि मिथिलांचल के सेहो ने जराए दाए ?

विष्णुदेव:: (भावुक आ संवेदनशील भाव )..नै भाई, नै ! हम मिथिलावाशी  एतेक निष्ठुर आ निर्दयी नै छी ! जेहन हमर बोली मीठ अछि , तेहने कोमल आ स्नेहमयी ह्रदय  अछि !...हाँ , कहिओ -काल भाई-भाई में टना-मनी भ' जाइत अछि , मुदा, एहि कें अर्थ  इ नै जेँ हम एक -दोसरक घर फूँकि देब !!

अकबर:: से त' ठीके कहै छी भाई | हम मिथिलावाशी सदा सँ 'शांति आ प्रेम ' कें पूजारी रहलौंहाँए | एतअ सीता सन बेटी जन्म लेली , जेँ नारी हेतु आदर्श थिक | राजा जनक 'विदेह' कहबैत छलाह अर्थात राजा होइतो ' माया सँ मुक्त छलाह ' | प्रजा हेतु स्वयं ह'र जोतलाह | एतअ कें अन्न-पानि ततेक पोष्टिदायक आ बुद्धिवर्धक छल,  जेँ विद्वानक भरमार छल | मुदा,  |आब लागि रहल अछि जेँ एतौ राक्षस आ अमानुष प्रवृति कें लोक जन्म ल' रहल अछि !!

विष्णुदेव:: इ सत्य थिक जेँ किछु लोक आगि लगा अपन हाथ सेकबा में लागल रहैत अछि ....

अकबर:: ...त' भाई ! एहन लोक सँ समाज कें कोना बचाएल जाए ? कारण ! अशिक्षा आ गरीबी  कें अन्हार चारू दिश पसरल अछि ! एहि कें लाभ उठा समाजक दुष्ट व्यक्ति भाई-भाई कें लड़ा दैत अछि !!

विष्णुदेव:: याह त' सभ सँ पैघ समस्या थिक ! यावत लोक शिक्षित  नै होएत तावत एकर पूर्ण रूपेण समाधान संभव नै |

अकबर:: भाई ! की मात्र पढि-लिख लेला सँ व्यक्ति शिक्षित भ' जाइत अछि ?

विष्णुदेव:: नै, कदापि नै ! शिक्षाक अर्थ थिक प्रेम, सहयोग  , ज्ञान आ अनुशासन
   | जँ  एही  में  सँ   एकौटाक  आभाव होएत त' शिक्षा  पूर्ण  नै  भ'  सकैत अछि ।  जेना  आहि -काहिल देखबा में अबैत अछि --बहुतों डॉक्टर , वकील , कलेक्टर आदि बहुते पढ़ल -लिखल छथि, मुदा , अनेकों  असामाजिक क्रिया -कलाप में लिप्त रहैत छथि , जाहि सँ समाज के अनेको हानी होइत छै ।

अकबर:: ....अर्थात लोक के जागरूक होएबाक जरुरत अछि । लोक के इ बुझअ पड़तै  कि जँ  एक भाई के घर जरतै  त' दोसरों के घर में आगि लगतहि  । जँ एक कें नैन्ना  भूखे कनतै  त' दोसर कें कोना नींद हेतहि  !!

विष्णुदेव:: बिल्कुल सच कहलौं ! हम पूछै  छी ---जँ  गाम में आगि लागैत अछि, केओ बीमार पडैत अछि , बाहिर अबैत अछि ---तखन के काज अबैया ? अपने भाई आ समाजक लोक ने ! त' फेर कियाक हम कोनो नेता आ असामाजिक व्यक्ति कें बहकाव में आबि अपन ' वर्तमान आ भविष्य ' दूनू  ख़राब क' लैत छी ?

अकबर:: हाँ भाई ! यावत लोकक बिच सामंजस नै होएत , तावत व्यक्ति आ समाज कें पूर्ण विकास संभव नै अछि !! (लम्बा सांस लैत )...ओना हम जाहि काज सँ आएल छलौं गप करबा में बीसैरे गेलौं ! ..भाई , काहिल ''ईद''  थिक , अपने सपरिवार सादर  आमंत्रित छी ...जरुर आएब ।

विष्णुदेव:: अवश्ये! अवश्ये!!
अकबर:: (कल जोइर )...तखन आब आज्ञा दियअ ...।
प्रस्थान (पर्दा खसैत अछि )
  दृश्य: तेसर (समाप्ति)
:गणेश कुमार झा "बावरा"
गुवाहाटी 
नाटक:  "जागु"
पात्र परिचय :
१. नारायण : एक गृहस्थ , उम्र ४५ वर्ष
२. लक्ष्मी:नारायण के पत्नी , उम्र ४० वर्ष
३.लाल काकी:नारायण के माए, उम्र ६५ वर्ष
४. विष्णुदेव: एक समाज सेवक , उम्र ४० वर्ष
५.अकबर:एक साधारण बुद्धिजीबी व्यक्ति , उम्र ३५ वर्ष
६.गीता :नारायण के ज्येष्ठ कन्या,उम्र १५ वर्ष
७.बिल्टू:बी.ए.पास एक बेरोजगार युवक ,उम्र २३ वर्ष
८. नन्हकू काका:एक बुजुर्ग ,उम्र ६० वर्ष
९. रहीम: १५ वर्षक अनपढ़ बालक
१०.सोहन:१३ वर्षक अनपढ़ बालक
११.मोहीत: १६ वर्षक अनपढ़ बालक
 
अंक प्रथम:    दृश्य:प्रथम      समय: राइत
(दलानक दृश्य , अषाड़क अन्हरिया राइत, लालटेन जरैत, दलान पर चिंतित मुद्रा मे नारायण टहलैत| नेपथ्य मे प्रसूति पीड़ा सँ लक्ष्मी कराहैत , थोड़े देर बाद बच्चाक जन्म आ कनबाक ध्वनि )
लाल काकी : (रुदन करैत प्रवेश ) रे नारायनमा ! रे नारायनमा !!
नारायण : की भेलई माए? की भेलई ??
लाल काकी: तोहर कर्म फुटि गेलौ रौ ! ई कुलक्षणी नामक लक्ष्मी चारीम बेटी कें जन्म देलकौया रौ ! अरे देव रौ देव !! कओन मुखे एकर पाएर हमर घर मे पड़ल रौ देव ! बेटी के बाहिड़ लगा देलकौ रौ देव !!
कोना क' चारिटा बेटी के विआहबाए रौ नारायणमा  ? देहो बिकीन लेबा' तइयो नै पार लगतौ रौ ! तोड़ा कहने छलिऔ दोसर विआह क' ले' --एहि मौगिया सँ तोड़ा बेटा नै हेतौ , मुदा , तू नै मानलाए हमर बात ! आब वंश कओना चलतौ रौ नारायणमा ?(जोड़ जोड़ सँ छाती पिटैत)
नारायण :(माए के बुझबैत ) माए! माए!! ई अहाँ किदौन कहाँ दून कियाक बजैत छी ?--एहि मे लक्ष्मी कें कोन दोष थिक ? ई त' भगवतिक कृपा ! एखन लक्ष्मी प्रसूति पीड़ा मे छथि , हुनका ऊपर एहन असहनीय  दुर्वचनक बाण नै चलाऊ !!
लाल काकी:(खौझा' क बजैत ) त' तोहर की मुन ? फूल-पान ल' आरती उतारीयनि!!
नारायण: हँ माए हँ ! लक्ष्मी आई फेर एक लक्ष्मी कें जन्म देलिहाए | माए! अहाँ जनैत छी --कन्यादान सभ सँ पैघ यज्ञ थिक | सौभाग्यवश: भगवतिक कृपा सँ हमरा चारिटा यज्ञक फल भेटबाक अवसर भेटलाए | अहाँ जुनि व्यर्थ चिंतित हौ |
      (विष्णुदेवक प्रवेश )
विष्णुदेव :लाल काकी , एना कियाक खौंझाएल छी ?
लाल काकी: ई लक्ष्मी रानी फेर बेटी बिएलिहाए !!
विष्णुदेव: ई त' हर्षक गप थिक ! बेटी के जन्म --बुझू साक्षात् लक्ष्मी के जन्म !! एहि मे एतेक खौंझेबाक कोन .....
लाल काकी:(बीचे मे टोकैत) हाँ ...हाँ ...., 'दोसरक घर जरैत छै त' तमाशा देखबाअ मे बड्ड नीक लगैत छै ...मुदा ,जखन अपन घर जरैत छै त' आगिक दाह बुझि पड़ैत छै |' अपना बेटी नै अछि ने , दूटा बेटे अछि --ताँए एहन गप निकलैया....
नारायण: माए....! अहाँ चुप रहब की नै ? (विष्णुदेव के)-- भाई , क्षमा करब ! माएक गप के जुनि .....
विष्णुदेव: .....भाई ! ई की करै छी ? अहाँक माए हमरो माए | हम काकी कें दुःख बुझि सकैत छीयनि ! मुदा मनुष्य की क' सकैत अछि .....??
 (लाल काकी के बुझबैत ) काकी जुनि खौंझाऊ ! कने सोचू !  पहिल- जे अहूँ  त' बेटी छी ! जौं बेटी नै  हेती त' बेटा-बेटी के जन्म के देत ?? दोसर स्त्री भ' स्त्री के प्रति दुर्यव्यव्हार , इ उचित नै थिक !
तेसर- बेटा-बेटी कें जन्म स्त्री द्वारा निर्धारित नै होइत अछि | विज्ञानं बतबैया कि बेटी-बेटा कें निर्धारण पुरुष दवारा होइत अछि |--ताँए जँ  नारायण भाई कें चारिटा बेटी भेलनि त' एहि मे लक्ष्मी भौजी कें कोनो दोष नै | ...ओ त' साक्षात् लक्ष्मी छथि |.....काकी !अहाँ के त' पाँच टा पुतौहु छथि --काएटा  लग मे रहि सेवा करै छथि ? एक लक्ष्मी भौजी छथि जेँ तन-मन-धन सँ अहाँक सेवा मे समर्पित रहैत छथि |....चलु ,एहि समय हुनका अहाँक जरुरत छन्हि | सास आ माए मे कोनो अन्तर नै होइत छै |
(लाल काकी अन्दर जाईत छथि )
    पर्दा खसैत अछि ......प्रथम दृश्य के समाप्ति |||

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

मैथिलि--काव्य: Natak:"JAGU"----Patra Parichay

मैथिलि--काव्य: Natak:"JAGU"----Patra Parichay: नाटक:  "जागु" पात्र परिचय : १. नारायण : एक गृहस्थ , उम्र ४५ वर्ष २. लक्ष्मी:नारायण के पत्नी , उम्र ४० वर्ष ३.लाल काकी:नारायण के माए, उम्र ...
नाटक:  "जागु"
पात्र परिचय :
१. नारायण : एक गृहस्थ , उम्र ४५ वर्ष
२. लक्ष्मी:नारायण के पत्नी , उम्र ४० वर्ष
३.लाल काकी:नारायण के माए, उम्र ६५ वर्ष
४. विष्णुदेव: एक समाज सेवक , उम्र ४० वर्ष
५.अकबर:एक साधारण बुद्धिजीबी व्यक्ति , उम्र ३५ वर्ष
६.गीता :नारायण के ज्येष्ठ कन्या,उम्र १५ वर्ष
७.बिल्टू:बी.ए.पास एक बेरोजगार युवक ,उम्र २३ वर्ष
८. नन्हकू काका:एक बुजुर्ग ,उम्र ६० वर्ष
९. रहीम: १५ वर्षक अनपढ़ बालक
१०.सोहन:१३ वर्षक अनपढ़ बालक 

मैथिलि--काव्य: Natak:"JAGU"---Ank-1, Drishya-1

मैथिलि--काव्य: Natak:"JAGU"---Ank-1, Drishya-1:
अंक प्रथम:    दृश्य:प्रथम      समय: राइत
(दलानक दृश्य , अषाड़क अन्हरिया राइत, लालटेन जरैत, दलान पर चिंतित मुद्रा मे नारायण टहलैत| नेपथ्य मे प्रसूति पीड़ा सँ लक्ष्मी कराहैत , थोड़े देर बाद बच्चाक जन्म आ कनबाक ध्वनि )
लाल काकी : (रुदन करैत प्रवेश ) रे नारायनमा ! रे नारायनमा !!
नारायण : की भेलई माए? की भेलई ??
लाल काकी: तोहर कर्म फुटि गेलौ रौ ! ई कुलक्षणी नामक लक्ष्मी चारीम बेटी कें जन्म देलकौया रौ ! अरे देव रौ देव !! कओन मुखे एकर पाएर हमर घर मे पड़ल रौ देव ! बेटी के बाहिड़ लगा देलकौ रौ देव !!
कोना क' चारिटा बेटी के विआहबाए रौ नारायणमा  ? देहो बिकीन लेबा' तइयो नै पार लगतौ रौ ! तोड़ा कहने छलिऔ दोसर विआह क' ले' --एहि मौगिया सँ तोड़ा बेटा नै हेतौ , मुदा , तू नै मानलाए हमर बात ! आब वंश कओना चलतौ रौ नारायणमा ?(जोड़ जोड़ सँ छाती पिटैत)
नारायण :(माए के बुझबैत ) माए! माए!! ई अहाँ किदौन कहाँ दून कियाक बजैत छी ?--एहि मे लक्ष्मी कें कोन दोष थिक ? ई त' भगवतिक कृपा ! एखन लक्ष्मी प्रसूति पीड़ा मे छथि , हुनका ऊपर एहन असहनीय  दुर्वचनक बाण नै चलाऊ !!
लाल काकी:(खौझा' क बजैत ) त' तोहर की मुन ? फूल-पान ल' आरती उतारीयनि!!
नारायण: हँ माए हँ ! लक्ष्मी आई फेर एक लक्ष्मी कें जन्म देलिहाए | माए! अहाँ जनैत छी --कन्यादान सभ सँ पैघ यज्ञ थिक | सौभाग्यवश: भगवतिक कृपा सँ हमरा चारिटा यज्ञक फल भेटबाक अवसर भेटलाए | अहाँ जुनि व्यर्थ चिंतित हौ |
      (विष्णुदेवक प्रवेश )
विष्णुदेव :लाल काकी , एना कियाक खौंझाएल छी ?
लाल काकी: ई लक्ष्मी रानी फेर बेटी बिएलिहाए !!
विष्णुदेव: ई त' हर्षक गप थिक ! बेटी के जन्म --बुझू साक्षात् लक्ष्मी के जन्म !! एहि मे एतेक खौंझेबाक कोन .....
लाल काकी:(बीचे मे टोकैत) हाँ ...हाँ ...., 'दोसरक घर जरैत छै त' तमाशा देखबाअ मे बड्ड नीक लगैत छै ...मुदा ,जखन अपन घर जरैत छै त' आगिक दाह बुझि पड़ैत छै |' अपना बेटी नै अछि ने , दूटा बेटे अछि --ताँए एहन गप निकलैया....
नारायण: माए....! अहाँ चुप रहब की नै ? (विष्णुदेव के)-- भाई , क्षमा करब ! माएक गप के जुनि .....
विष्णुदेव: .....भाई ! ई की करै छी ? अहाँक माए हमरो माए | हम काकी कें दुःख बुझि सकैत छीयनि ! मुदा मनुष्य की क' सकैत अछि .....??
 (लाल काकी के बुझबैत ) काकी जुनि खौंझाऊ ! कने सोचू !  पहिल- जे अहूँ  त' बेटी छी ! जौं बेटी नै  हेती त' बेटा-बेटी के जन्म के देत ?? दोसर स्त्री भ' स्त्री के प्रति दुर्यव्यव्हार , इ उचित नै थिक !
तेसर- बेटा-बेटी कें जन्म स्त्री द्वारा निर्धारित नै होइत अछि | विज्ञानं बतबैया कि बेटी-बेटा कें निर्धारण पुरुष दवारा होइत अछि |--ताँए जँ  नारायण भाई कें चारिटा बेटी भेलनि त' एहि मे लक्ष्मी भौजी कें कोनो दोष नै | ...ओ त' साक्षात् लक्ष्मी छथि |.....काकी !अहाँ के त' पाँच टा पुतौहु छथि --काएटा  लग मे रहि सेवा करै छथि ? एक लक्ष्मी भौजी छथि जेँ तन-मन-धन सँ अहाँक सेवा मे समर्पित रहैत छथि |....चलु ,एहि समय हुनका अहाँक जरुरत छन्हि | सास आ माए मे कोनो अन्तर नै होइत छै |
(लाल काकी अन्दर जाईत छथि )
    पर्दा खसैत अछि ......प्रथम दृश्य के समाप्ति |||

मंगलवार, 27 मार्च 2012

मैथिलि--काव्य: Kavita--Maithili

मैथिलि--काव्य: Kavita--Maithili: भोरूकवा मे सुति उठल छलौं तखने छोटकुन बाजि उठल-- 'आब मैथिली रानी समर्थ भेली पाबि संविधान मे स्थान मैथिली रानी धन्य भेली | ' कोयल...

सोमवार, 5 मार्च 2012

मैथिलि--काव्य: GAJAL

मैथिलि--काव्य: GAJAL: जोइड़ अपन ह्रदय अहाँ सँ तोइड़ देलहूँ सम्बन्ध जहाँ सँ रहब सदिखन संगे खेलहूँ शपति छोइड़ देलहूँ जखने पड़ल विपति मनक आश हमर मने रहिग...

रविवार, 4 मार्च 2012

"विआह"


सुनि गप्प विआह कें

मन अध्हर्षित अध्दुखित भेल |


सुझाए लागल ब्रह्माण्ड हमरा

तन-मन आकुल-व्याकुल भेल ||



क्षणिक सोइच आनन्द विआह कें

हम कुदअ लगलौं चाईर-चाईर हाथ |


द' चौबनियाँ मुस्कान

हम गुद्गुदाए लगलौं भईर-भईर राइत ||



नै छलौं देखने हुनका

नै छल हुनकर कोनो ज्ञान |


नै जानि तइयौ हुनके

कियाक बुझैत छलौं अपन प्राण ||



अचानक केखनो क' हमरा

मन मे भ' जाइत छल  साइत --

नै जानि ओ केहन हेती

अनाड़ी हेती या व्यावहारिक हेती !

बुझल छल हमरा एतबाए

हुनक व्यस(उम्र) छनि सोलह साल |


तांए डेराइत छलौं हम

कोना करब "प्रेमक' बात ||



बुझल छल हमरा एतबाए

ओ नैन्ना हम स्यान |

तांए डेराइत छलौं हम

कोना करब एकहि घाट हम स्नान ||



मुदा मन के बुझअलौं- की करबअ ?

मिथिला कें छै इहाए विधान

"कनियाँ नैन्ना " आ "वर स्यान " ||



:गणेश कुमार झा "बावरा"

गुवाहाटी

शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

पद-चिन्ह

 
" पद-चिन्ह "
नै कान तूँ! नै कान तूँ !
एक दिन करबाए नाम तूँ
आई कष्ट काटि रहल छें तूँ
एक दिन करबाए नाम तूँ
नै कान तूँ ! नै कान तूँ !
शिव धनुष तोड़बा लेल
बनि जो आई राम तूँ
परुशरामक क्रोध खाइयो कें
मुदा नै हार मान तूँ
नै कान तूँ ! नै कान तूँ !
सूरज डूबि फेर उगई छै
नदी सूइख फेर भड़ई छै
गाछो मे पतझड़ होइत छै
फेर किएक छें उदास तूँ
नै कान तूँ !नै कान तूँ !
की केयो मनुष कह्तौ तोड़ा
जँ मात्र खा-पी मईर जेबें तूँ ?
जँ जन्म लेलें एहि धरती पर
त किछु नव- पथ करै निर्माण तूँ
नै कान तूँ ! नै कान तूँ !
कह! तोरा-ओकरा मे कुन अन्तर
जँ एकहि पथ कें राही तूँ
जँ छोड़बाक छौ किछु पद-चिन्ह
त चल भीड़-भाड़ सँ बाहर तूँ
कान तूँ ! नै कान तूँ !!!!!!

:गणेश कुमार झा "बावरा"

गुवाहाटी


MAITHILI KAVYA: KAVITA

मंगलवार, 31 जनवरी 2012

बाजू-बाजू कनियाँ,

बाजू-बाजू कनियाँ, 
लेब कुन गहना
लेब कानक बाली वा पएरक पैजनियाँ ....?
नै लेब सजना हम कुनू गहना 
हमरा त' चाही आहाँक दुलार  यो सजना ...
बाजू-बाजू सजना---
की देब इ गहना ...?
न्योछावर अहाँ पर हमर प्राण कनियाँ 
ज' द दीअ अहाँ एक मुस्कान चौबनियाँ....
बाजू-बाजू कनियाँ ,----
 लेब कुन गहना.....?
अहीं हमर छी श्रृंगार सजना 
बनब सातों जन्म अहीं हमर सजना....
बाजू-बाजू सजना--
की देब इ गहना ...?
हम बनल अहीं लेल छी कनियाँ 
ई जानैथ विधाता आ सगरो दुनियाँ....
बाजू-बाजू कनियाँ , लेब कुन गहना ....?

:गणेश कुमार झा "बावरा":

गुवाहाटी 


MAITHILI KAVYA: GEET

गुरुवार, 26 जनवरी 2012

BETI.....KAVITA

" बेटी "
बेटी के जुनि बुझू अभिषाप
बेटीए छैथ सृष्टिक आधार |
अपन मिथ्या प्रदर्शनक कारण
नै छिनियो ओकरा सँ ओकर
जीवक जन्म- सिद्ध अधिकार |
हटा फेंकू मिथ्या अहँग
बेटी नै छैथ बौक-बहीर-अपँग
बढ़अ दिऔ ओकरा आगाँ
हर एक डेंग पर दिऔ संग |
सीता के अछि बहिन ओ
बनूँ पिता जनक समान
बना ओकरा घरक गुड़िया
नै करियो
ओकर इच्छा -आकाँक्षा के बलिदान ....||||

:गणेश कुमार झा "बावरा"