dahej mukt mithila

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गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

जुड़-शीतल-गीत

 जुड़-शीतल

जुड़-शीतलमे जीवन जुड़ा लिअ यौ

जुड़-शीतलमे जीवन॥

साल नव मैथिलीक शुभागमन भेलै

नूतन नवल रुप  सगरो जहान भेलै

स्वागत सम्मान मान राखि लिअ यौ

पूत मिथिलाक नन्दन॥

तरुवरमे द्रुमदल  सेहो जुआन भेलै

नव अन्न दलहन आँगन-दलान एलै

शीतल सातुकेँ शर्बत बना लिअ यौ

खूब तिरपित रहत मन ॥

ताजा-बसियाकेँ भोजन विधान भेलै

बेसनकेँ फेँटि  बड़-बड़ी  बनौल गेलै

आम टिकुलाक चटनी बना लिअ यौ

भोग स्वादिष्ट भोजन॥

गाम-घर पोखैर, इनारो सफाई भेलै

तुरियाक संग थाल-कादो लेपाइ भेलै

प्रेम चासैत-समारैत-गजारि लिअ यौ

गीत गाबय मगन मन॥

बाँसक दू खुट्टा पर बल्ली लगौल गेलै

तुलसीचौड़ामे पानिसल्ला बनौल गेलै

देव-पितरकेँ अछिंजल चढ़ा लिअ यौ

रहब सानन्द जीवन॥

जुड़-शीतलमे जीवन जुड़ा लिअ यौ

जुड़-शीतलमे जीवन॥

           *****

जुड़-शीतलक हार्दिक शुभकामनाक संग विनय कुमार ठाकुर (ठाकुर परिवार )

मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

हिन्दू नववर्ष की शुभकामनायें

 प्रथम महीना चैत से गिन

राम जनम का जिसमें दिन।।

द्वितीय माह आया वैशाख।

वैसाखी पंचनद की साख।।

ज्येष्ठ मास को जान तीसरा।

अब तो जाड़ा सबको बिसरा।।

चौथा मास आया आषाढ़।

नदियों में आती है बाढ़।। 

पांचवें सावन घेरे बदरी।

झूला झूलो गाओ कजरी।।

भादौ मास को जानो छठा।

कृष्ण जन्म की सुन्दर छटा।। 

मास सातवां लगा कुंआर।

दुर्गा पूजा की आई बहार।। 

कार्तिक मास आठवां आए।

दीवाली के दीप जलाए।।

नवां महीना आया अगहन।

सीता बनीं राम की दुल्हन।। 

पूस मास है क्रम में दस।

पीओ सब गन्ने का रस।।

ग्यारहवां मास माघ को गाओ।

समरसता का भाव जगाओ।। 

मास बारहवां फाल्गुन आया।

साथ में होली के रंग लाया।। 

बारह मास हुए अब पूरे।

छोड़ो न कोई काम अधूरे।।

जय श्री  रामजी

*हिन्दू नववर्ष की शुभकामनायें*

गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

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शुक्रवार, 26 मार्च 2021

अजी हाँ! बिहार हूँ मैं

चाणक्य की नीति हूँ , आर्यभट्ट का आविष्कार हूँ मैं ।

महावीर की तपस्या हूँ , बुद्ध का अवतार हूँ मैं।

अजी हाँ! बिहार हूँ मैं।।

सीता की भूमि हूँ , विद्यापति का संसार हूँ मैं।

जनक की नगरी हूँ, माँ गंगा का श्रंगार हूँ मैं।

अजी हाँ! बिहार हूँ मैं।।

चंद्रगुप्त का साहस हूँ , अशोक की तलवार हूँ मैं।

बिंदुसार का शासन हूँ , मगध का आकार हूँ मैं।

अजी हाँ! बिहार हूँ मैं।।

दिनकर की कविता हूँ, रेणु का सार हूँ मैं।

नालंदा का ज्ञान हूँ, पर्वत मन्धार हूँ मैं।

अजी हाँ! बिहार हूँ मैं।

वाल्मिकी की रामायण हूँ, मिथिला का संस्कार हूँ मैं पाणिनी का व्याकरण हूँ , ज्ञान का भण्डार हूँ मैं।

अजी हाँ! बिहार हूँ मैं।

राजेन्द्र का सपना हूँ, गांधी की हुंकार हूँ मैं।

गोविंद सिंह का तेज हूँ , कुंवर सिंह की ललकार हूँ मैं।

अजी हाँ! बिहार हूँ मैं।।

जय बिहार जय मिथला

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

भिक्षुक ✍️ दीपिका झा

 


तपती सूरज की गर्मी में, 

कुदरत की थोरी नर्मी में, 

वृक्षों की छाँव तले बैठा, 

एक भिक्षुक राह निहार रहा.....। 

इस राह में राही दिखता था, 

जिनसे जीने का रिश्ता था, 

अब वो भी घर में है बैठा, 

कुदरत ने ऐसा प्रहार किया......। 

नऽ चाह मेरी थी महलों की, 

उत्तम परिधान नऽ गहनो की, 

बस भूख की उठती ज्वाला को, 

कुछ मिला तो उससे शांत किया.....।

उसमें भी तुझको हे भगवन,

क्या नऽ पिघला कभी तेरा मन, 

क्या सोच समझ कर तूने प्रभु, 

मुझ निर्धन को ये संताप दिया.....।

इस रुठी सी सूनी नगरी में, 

जहाँ थे सब अफरा-तफरी में, 

बेजान से सब हैं बन बैठे, 

किस शत्रु ने ऐसा आघात किया... ? 

वैसे भी कम क्या दूरी थी, 

ढेरों सबकी मजबूरी थी, 

ये कैसा ग्रहण लगाया प्रभु, 

किस घात का ये प्रतिघात किया......?

हमसे मुंह मोड़ के थे बैठे,

नऽ जाने कब से थे रुठे,

पर,और तो तेरा था प्यारा, 

जिनसे हम आश लगाए थे......। 

जीने की अब तू राह दिखा, 

हे हम निर्धन के कृष्ण सखा, 

कर इस धरती को फिर वैसे, 

जिस कृपा की हम साये में थे........।।

_✍️ दीपिका झा

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

दीपिका झा - ✍️

 चाहे सहस्त्रों वर्ष है बीत गए,

पर राजनीति वैसी ही है।

पुत्र मोह में अंधा बना है सब,

राष्ट्रमोह की ऐसी-तैसी है।

अब न कुछ अंतर है बचा यहां,

इस कलयुग और धृतराष्ट्र युग में।

बस,तब का मंत्री शुभचिंतक था,

अब चाटुकार भरें हैं इस युग में।

तब नेत्रहीन नृप देखता था,

हर पाशा जिसको वह फेकता था।

किस क़दम का क्या प्रतिफल होगा,

बंद नेत्रों से सब देखता था।

अब नेत्रवान नृप अंधा है,

जो सेवा को समझा धंधा है।

तब तो एक विदुर ने चेता दिया,

राष्ट्र हित क्या है वो बता गया,

अपने कर्तव्य को करते हुए,

नृप के कर्तव्य को बता गया।

अब ना वो विदुर ना द्वापर है,

ना शुभचिंतक यहां, बस चाकर है।

सच से यहां समुचित दूरी है,

जो कर्तव्य है वो,मजबूरी है।

सत्ता, पुत्र मोह बस ज़रूरी है,

जनता की आश अधूरी है।

वह विदुर तो परम धर्मात्मा था,

मानव के रूप परमात्मा था।

जो ज्ञानी था, राजनीतिज्ञ था,

दूरदर्शी था,देशभक्त भी था।

वह बोला,मुंह भी खोला,

पर मृतात्मा की तब भरमार थी।

सब त्याग के रण को छोड़ चला,

जब चंहुओर भयंकर हाहाकार थी।

जहां विदुर जैसे शुभचिंतक से,

महाविनाश, संग्राम न रुक पाया।

किसी चुप्पी का प्रतिफल था शायद वो,

जहां ज्ञानी का ज्ञान न रंग लाया।

यह सीख लो कलयुग के विदुरों,

न अन्याय को देख आंखें मूंदो।

द्रौपदी चीरहरण हो या द्युद भवन,

अन्याय को यथाशीघ्र रौंदो।

उठती चिंगारी को न सुलगने दो,

विकराल रूप न पकड़ने दो।

द्वापर के विदुर से सीख के,

न किसी डर से आंखें मूंदो।

हो कड़वी बातें पर सच्ची हो,

जनहित के लिए पर अच्छी हो।

करो विरोध उस देशद्रोही नृप का,

अधर्मी और पुत्र मोही नृप का।

जो लिए रूप धृतराष्ट्र, द्रोण,कृप का।

यदि विरोध नहीं अब करोगे तो,

रणभूमि फिर से तैयार होगा।

जिसमें दुराचारी तन का विनाश होगा ही,

पर सदाचारी आत्मा पे भी प्रहार होगा।

नाम :- दीपिका झा

नैहर (जन्मस्थान) :- पोखरौनी (मधुबनी)

सासुर:- बसौली (मधुबनी) 

नानीगांव :- नवगांव (दरभंगा)

विगत पंद्रह साल सं पुणे (महाराष्ट्र) में रहि रहल छी।

गुरुवार, 7 जनवरी 2021

अपने प्रभु श्रीराम जी के मंदिर के लिए अंशदान अवश्य करें


 अगले कुछ दिनों में कोई न कोई राम सेवक श्री रामजन्म भूमि समर्पण निधि संग्रह हेतु   आपकें दरवाजे तक ज़रूर आएगा,आपसे करबद्ध प्रार्थना कि दिल खोलकर इस परम धार्मिक कार्य में तन,मन,धन से स्वयम तो सहयोग करें ही साथ ही साथ अपने इष्ट मित्रों तथा सगे सम्बन्धियों को भी इस पुनीत कार्य हेतु प्रेरित करें!*

*हम सभी का ये परम सौभाग्य है कि हमे अपने आराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम भगवाम राम के मंदिर निर्माण हेतु अंशदान करने का अवसर मिला है इसलिए इसमें खूब बढ़ चढ़कर सहयोग कर पुण्यलाभ के भागी बनें!*

*हमारी कितनी पीढ़ियां जिसके लिए प्रतीक्षा कर कर के स्वर्गवासी हो गईं उनकी संतत होने के कारण हमारा ये कर्तब्य बनता है कि हम उनके भी हिस्से का अंशदान अपनी सामर्थ्य अनुसार करके उन्हें गौरवान्वित करें औऱ उनका आशीर्वाद प्राप्त करें! क्यूंकि ऐसा शुभ अवसर जीवन में दुबारा नहीं प्राप्त हो सकता हैl*


*अपने प्रभु श्रीराम जी के मंदिर के लिए अंशदान अवश्य करेंl*  

*जय श्री राम