dahej mukt mithila

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शुक्रवार, 22 मई 2026

आप रामायण पढ़ते हो न? राम जी तो किसी को नहीं मारते थे बिना वजह।

 जेल में बंद कैदी रोज़ रामायण पढ़ता था… एक दिन जेलर को पता चला कि उसने अपराध क्यों किया था।

1. सीतापुर जेल की बैरक नंबर 7  

सीतापुर जिला जेल। ऊँची दीवारें, लोहे की सलाखें और सन्नाटा। बैरक नंबर 7 में 42 कैदी थे। उन्हीं में एक था कैदी नंबर 2911 — राघव शुक्ला। उम्र 38 साल, दुबला-पतला, दाढ़ी बढ़ी हुई, आँखें हमेशा नीचे।  

राघव की पहचान थी रामायण। सुबह 4 बजे उठता, नहाकर जेल के मंदिर वाले कोने में बैठ जाता। फटी-पुरानी रामायण खोलता और पाठ करता। आवाज़ धीमी पर साफ। "मंगल भवन अमंगल हारी, द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी।"  

दूसरे कैदी हँसते। "पंडित, रामायण पढ़ने से सजा कम नहीं होगी। 20 साल काटने हैं तुझे।"  

राघव जवाब नहीं देता। पाठ खत्म करके वो रामायण को माथे से लगाता और वापस बैरक में।  

जेलर थे अविनाश सिंह। 50 साल के, कड़क अफसर। 25 साल की नौकरी में हर तरह के कैदी देखे थे। पर राघव अजीब था। न लड़ाई, न गाली, न भागने की कोशिश। बस रामायण।  

2. अपराध क्या था?  

राघव की फाइल में लिखा था — "धारा 302, हत्या। 2019 में लखनऊ के गोमतीनगर में बिल्डर विजय अग्रवाल की हत्या। पत्नी और 2 साल की बेटी के सामने गोली मारी। कोर्ट ने उम्रकैद दी।"  

जेलर अविनाश को हैरानी होती। जो आदमी रामायण पढ़ता है, वो एक परिवार के सामने खून कैसे कर सकता है? उन्होंने पुराने सिपाही शिवराम से पूछा।  

"साहब, ये आदमी कोर्ट में भी चुप था। वकील नहीं किया। खुद कहा — हाँ, मैंने मारा। बस।"  

"क्यों मारा, ये नहीं बताया?"  

"ना साहब। जज ने भी पूछा। बोला — वजह मत पूछिए। सजा दे दीजिए।"  

अविनाश की उलझन बढ़ गई।  

3. जेल में रामराज  

राघव 3 साल से जेल में था। धीरे-धीरे उसने बैरक का माहौल बदल दिया। जो कैदी गाली देते थे, वो अब धीरे बोलते। रामायण के बाद राघव सबको एक चौपाई का मतलब समझाता।  

"कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करहि सो तस फल चाखा।"  

"मतलब, भाई, जो करोगे वही भरोगे। गाली दोगे तो गाली मिलेगी। प्रेम दोगे तो प्रेम।"  

छोटू नाम का 19 साल का लड़का चोरी में आया था। राघव ने उसे अक्षर सिखाए। अब छोटू रामायण पढ़ लेता था।  

जेल में लड़ाई हो जाती तो वार्डन बुलाते — "पंडित को बुलाओ।" राघव दो लाइन बोलता, और मारपीट रुक जाती।  

जेलर अविनाश देखते रहते। सोचते, "अगर ये आदमी बाहर होता तो कितने घर बचा लेता। पर इसने एक घर उजाड़ दिया। क्यों?"  

4. बेटी की चिट्ठी  

2025 की मार्च। होली का दिन। जेल में कैदियों को घर से चिट्ठी मिलती है। राघव को कभी चिट्ठी नहीं आई थी।  

पर उस दिन एक लिफाफा आया। भेजने वाली — "अनन्या अग्रवाल, क्लास 6, सेंट मैरी स्कूल, लखनऊ।"  

जेलर चौंक गए। अग्रवाल... वही विजय अग्रवाल की बेटी?  

नियम था, जेलर चिट्ठी पढ़कर देते हैं। अविनाश ने लिफाफा खोला।  

*अंकल,  

आप मुझे जानते नहीं। मैं अनन्या हूँ। पापा विजय अग्रवाल की बेटी।  

मम्मा कहती हैं आपने मेरे पापा को मार दिया। पुलिस अंकल ने भी यही कहा।  

पर मैं आपसे नफरत नहीं करती।  

क्योंकि मम्मा रात को रोती हैं। वो कहती हैं, "तेरे पापा अच्छे आदमी नहीं थे।"  

नानी कहती हैं, "राघव अंकल ने तेरी जिंदगी बचाई थी।"  

मैं बहुत कन्फ्यूज हूँ।  

आप सच बताओगे? आपने पापा को क्यों मारा?  

आप रामायण पढ़ते हो न? राम जी तो किसी को नहीं मारते थे बिना वजह।  

प्लीज जवाब देना।  

अनन्या*  

अविनाश का हाथ काँप गया। उन्होंने चिट्ठी राघव को दी।  

राघव ने चिट्ठी पढ़ी। पहली बार उसकी आँखें भर आईं। उसने चिट्ठी को माथे से लगाया और जेलर से बोला, "साहब, क्या मैं इसे जवाब दे सकता हूँ?"  

"हाँ। पर पहले मुझे बताओ, सच क्या है?"  

राघव चुप रहा। फिर बोला, "साहब, कल सुंदरकांड का पाठ पूरा होगा। उसके बाद बताऊँगा। 7 साल से इस दिन का इंतज़ार कर रहा था।"  

5. सुंदरकांड और खुलासा  

अगली सुबह। जेल के मंदिर में सुंदरकांड। राघव ने पाठ किया। जेलर अविनाश भी बैठे।  

पाठ खत्म हुआ। राघव जेलर के कमरे में आया। "साहब, बैठ जाऊँ?"  

"हाँ राघव। अब बताओ।"  

राघव ने लंबी साँस ली। "साहब, मैं लखनऊ में ड्राइवर था। विजय अग्रवाल के यहाँ। 8 साल काम किया। वो बिल्डर था, पर आदमी नहीं था।"  

"मतलब?"  

"साहब, विजय अग्रवाल की बीवी यानी मिसेज कविता बहुत शरीफ थीं। बेटी अनन्या तब 2 साल की थी। पर विजय शराब पीकर दोनों को मारता था। कई बार मैंने बीच-बचाव किया। नौकरी जाने का डर था, पर चुप नहीं रह पाया।"  

"फिर एक दिन?"  

"5 मार्च 2019। होली का दिन था। विजय नशे में था। कविता मैडम ने तलाक माँगा। विजय ने कहा — 'तलाक दे दूँगा, पर पहले तुझे और तेरी बेटी को जान से मारूँगा। इंश्योरेंस का पैसा मिलेगा।'"  

राघव की आवाज भर्रा गई। "उसने पिस्तौल निकाली। मैडम डरकर कमरे में भागीं। अनन्या पालने में सो रही थी। विजय पालने की तरफ बढ़ा। बोला — 'पहले इसे निपटाता हूँ।'"  

"मैं किचन में था। सब सुन रहा था। मेरे पास कुछ नहीं था। विजय ने ट्रिगर पर उंगली रखी। साहब, उस वक्त मुझे रामायण की वो लाइन याद आई — 'परहित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।'"  

"दूसरों की भलाई से बड़ा धर्म नहीं। और दूसरों को दुख देने से बड़ा पाप नहीं।"  

"मैं दौड़ा। गेट के पास विजय की लाइसेंसी रिवॉल्वर पड़ी थी। मैंने उठाई। वार्निंग दी — 'साहब, रुक जाओ। बच्ची को मत मारो।' वो हँसा — 'तू ड्राइवर, मुझे रोकेगा?' उसने पालने पर गोली चला दी।"  

राघव चुप हो गया।  

"फिर?" जेलर ने पूछा।  

"फिर मैंने गोली चला दी साहब। एक गोली। सीधे छाती में। विजय वहीं गिर गया।"  

"अनन्या बच गई?"  

"हाँ साहब। गोली पालने के बगल से निकली। मैं दौड़कर अनन्या को उठाया। कविता मैडम बेहोश थीं। मैंने पुलिस को फोन किया। कहा — 'मैंने मारा है। आ जाओ।'"  

6. कोर्ट में चुप्पी क्यों?  

"राघव, तुमने कोर्ट में ये सब क्यों नहीं बताया? सेल्फ डिफेंस था। सजा कम हो जाती।"  

राघव हँसा, फीकी हँसी। "साहब, कविता मैडम की हालत खराब थी। पुलिस ने उनसे पूछा तो वो डर गईं। विजय का परिवार बहुत पावरफुल था। उन्होंने कहा — 'अगर मैं गवाही दूँगी तो ये लोग मेरी बेटी को मार देंगे।'"  

"मैंने मैडम से कहा — 'आप चुप रहो। अनन्या को बड़ा करना है। मैं संभाल लूँगा।' साहब, एक माँ को अपनी बच्ची के लिए झूठ बोलना पड़े, इससे बड़ा पाप नहीं। मैंने वो पाप अपने सिर ले लिया।"  

"पर तुम तो 20 साल के लिए अंदर हो गए।"  

"साहब, बाहर रहकर भी मैं कौन सा आजाद था? हर रात सोचता — काश 2 सेकंड पहले पहुँच जाता, तो गोली ही न चलती। जेल में कम से कम राम जी के पास हूँ।"  

7. जेलर का धर्मसंकट  

अविनाश सन्न रह गए। फाइल में "हत्या" लिखा था। पर असल में ये "रक्षा" थी।  

उन्होंने SP साहब को फोन किया। "सर, केस री-ओपन हो सकता है क्या?"  

"अविनाश, 7 साल हो गए। कोर्ट का फैसला है। अब क्या कर सकते हैं?"  

"सर, नई गवाही है। बच्ची की चिट्ठी है।"  

SP चुप। "देखता हूँ। पर उम्मीद मत रखना।"  

उधर राघव ने अनन्या को जवाब लिखा।  

*बेटी अनन्या,  

तुम्हारे पापा को मैंने मारा, ये सच है। पर क्यों मारा, ये भी सच है।  

उस दिन होली थी। रंग की जगह खून बह जाता अगर मैं न रोकता।  

तुम पालने में थी। तुम्हारे पापा नशे में थे। वो तुम्हें मारने वाले थे।  

मैंने राम जी से पूछा — क्या करूँ? उन्होंने कहा — 'बच्ची को बचा।'  

बस मैंने वही किया।  

मुझे सजा मिली। पर तुम्हें जिंदगी मिली। मुझे कोई पछतावा नहीं।  

तुम अपनी मम्मा का ख्याल रखना। खूब पढ़ना। और हाँ, रामायण जरूर पढ़ना। उसमें हर सवाल का जवाब है।  

तुम्हारा,  

राघव अंकल*  

8. कविता का आना  

चिट्ठी के 15 दिन बाद सीतापुर जेल के गेट पर एक औरत आई। साड़ी, आँखों में चश्मा, साथ में 9 साल की बच्ची।  

गेट पर एंट्री — "कविता अग्रवाल, अनन्या अग्रवाल। कैदी 2911 से मुलाकात।"  

जेलर अविनाश ने स्पेशल इजाजत दी। मुलाकात वाले कमरे में राघव आया। सामने कविता और अनन्या।  

कविता फूट पड़ी। "राघव भैया... मुझे माफ कर दो। मैंने कायरता की। आपकी जिंदगी खराब कर दी।"  

राघव ने हाथ जोड़े। "मैडम, आप माँ हो। माँ से बड़ा कोई धर्म नहीं। आपने सही किया।"  

अनन्या दौड़कर राघव के पैरों में गिर गई। "अंकल, थैंक यू। आपने मुझे बचाया।"  

राघव ने उसे उठाया, सिर पर हाथ फेरा। "बेटा, थैंक यू मत कहो। तुम खुश रहो, यही मेरी सजा काट देगा।"  

कविता ने एक फाइल निकाली। "साहब, ये मेरा बयान है। 7 साल बाद ही सही, पर अब सच बोलूँगी। कोर्ट में दूँगी। राघव भैया बेकसूर हैं।"  

9. केस री-ओपन  

कविता के बयान से हड़कंप मच गया। मीडिया में खबर — "ड्राइवर ने मालिक को क्यों मारा? 7 साल बाद खुला राज।"  

हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया। री-ट्रायल का आदेश। अनन्या भी कोर्ट में बोली, "अंकल ने मुझे बचाया। मैंने देखा था।"  

पुराने नौकरों ने भी गवाही दी — "साहब बीवी-बच्ची को मारते थे।"  

बैलिस्टिक रिपोर्ट से साबित हुआ कि पहली गोली विजय ने चलाई थी, पालने की तरफ।  

6 महीने केस चला। 2026 की जनवरी। जज ने फैसला सुनाया   

"राघव शुक्ला ने अपराध नहीं, कर्तव्य किया। सेल्फ डिफेंस और नाबालिग की रक्षा। कोर्ट इन्हें बाइज्जत बरी करती है। 7 साल की सजा के लिए राज्य सरकार मुआवजा दे।"  

कोर्ट में तालियाँ बज गईं। राघव चुप था। उसकी आँखों में आँसू थे।  

10. आजादी और रामायण  

26 जनवरी 2026। सीतापुर जेल का गेट। राघव बाहर आया। हाथ में वही फटी रामायण। सामने अनन्या, कविता, जेलर अविनाश, और पूरी बैरक नंबर 7।  

छोटू दौड़कर आया। "पंडित जी, अब कौन रामायण पढ़ाएगा?"  

राघव हँसा। "तू पढ़ाएगा। मैंने तुझे सिखाया न?"  

जेलर अविनाश ने सैल्यूट किया। "राघव, माफ करना। मैंने तुम्हें कैदी समझा। तुम तो असली जेलर हो — जिसने सबको बुराई की जेल से आजाद किया।"  

राघव ने पैर छुए। "साहब, आपने मुझे बेटी की चिट्ठी दी। वरना मैं सच लेकर मर जाता।"  

11. नया जीवन  

राघव अब लखनऊ में कविता के घर के पास ही रहता है। अनन्या उसे "बड़े पापा" बुलाती है।  

उसने "रामायण सेवा ट्रस्ट" खोला है। जेल में बंद कैदियों को रामायण बाँटता है। कानून की क्लास देता है — "सेल्फ डिफेंस क्या है, चुप रहने से क्या नुकसान है।"  

हर मंगलवार सीतापुर जेल जाता है। बैरक नंबर 7 में सुंदरकांड होता है। अब पाठ छोटू करता है।  

कविता ने कहा, "भैया, आप हमारे साथ रह लो।"  

राघव मना कर देता। "नहीं मैडम। मैं पास रहूँगा, पर साथ नहीं। दुनिया को लगना चाहिए कि आपने एहसान चुकाया। पर मैंने तो धर्म निभाया था, एहसान नहीं।"  

12. जेलर की डायरी  

अविनाश सिंह अब DIG हैं। उनकी टेबल पर एक रामायण रखी रहती है। उस पर राघव ने लिखा है —  

"साहब, वर्दी का रंग खाकी है, पर काम राम जी वाला है। सही को सही कहने से मत डरना।"  

अविनाश नए जेलरों को ट्रेनिंग देते हैं। पहला लेसन — "हर कैदी अपराधी नहीं होता। कभी-कभी वो राम होता है, जिसे सीता बचाने के लिए रावण मारना पड़ा। फर्क बस इतना है कि त्रेता में राम को राज मिला, कलयुग में जेल।"  

आखिरी चौपाई  

राघव अब भी रोज रामायण पढ़ता है। अनन्या पास बैठकर सुनती है। जब वो चौपाई आती है — "परहित सरिस धर्म नहिं भाई", अनन्या पूछती है, "बड़े पापा, इसका मतलब क्या है?"  

राघव उसकी सिर पर हाथ फेरता है। "बेटा, मतलब ये कि अगर किसी की जान बचाने के लिए तुम्हें सजा भी मिले, तो वो सजा नहीं, पूजा है।"  

अनन्या मुस्कुराती है। खिड़की से सूरज की रोशनी राघव की रामायण पर पड़ती है। 7 साल जेल की दीवारों ने जो सोना छिपा रखा था, वो अब दुनिया के सामने चमक रहा था।  

क्योंकि अपराध वो नहीं जो कानून की किताब में लिखा हो। अपराध वो है जो इंसानियत की किताब के खिलाफ हो। और राघव ने इंसानियत की किताब कभी बंद नहीं की।  


रविवार, 10 मई 2026

ॐ यज्ञोपवीत धारण एवं विसर्जन: मंत्र, विधि आ महत्व

 ॐ यज्ञोपवीत धारण एवं विसर्जन: मंत्र, विधि आ महत्व 


सनातन धर्म में १६ संस्कारक वर्णन भेटैत अछि, जकरा में 'उपनयन' यानी 'यज्ञोपवीत संस्कार' कए अत्यंत पवित्र आ अनिवार्य मानल गेल अछि। यज्ञोपवीत केवल सूतक ताग मात्र नहि अछि, बल्कि ई ज्ञान, कर्म, आ उपासना कए प्रतीक थिक। शास्त्रक अनुसार, वैदिक रीतिक संग यज्ञोपवीत धारण कएला सँ मनुष्य कए नव जन्म (द्विजत्व) भेटैत अछि।

आजुक एही आलेख में हम सब जानब वाजसनेयी आ छन्दोग पद्धति कए अनुसार यज्ञोपवीत धारण करबाक मंत्र, ओकर विधि, आ प्राचीन जनेऊ विसर्जन मंत्र कए बारे में।

 यज्ञोपवीत धारण मंत्र

जनेऊ धारण करबाक काल अपन-अपन शाखा (वाजसनेयी वा छन्दोग) कए अनुसार मंत्रक जप करबाक विधान अछि।

 वाजसनेयी पद्धति कए यज्ञोपवीत मंत्र

 ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।

आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।


 छन्दोग पद्धति कए यज्ञोपवीत मंत्र

ॐ यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वोपवीतेनोपनह्यामि।

 यज्ञोपवीत धारणक शास्त्रीय विधि

जनेऊ बदलबाक समय वा धारण करबाक काल सर्वप्रथम अहि मंत्र सँ संकल्प कs विनियोग कएल जाइत अछि:

 विनियोगः

प्रजापतिऋषिर्गायत्रीछन्दो विश्वदेवा देवता यज्ञोपवीत परिधाने विनियोगः।

मंत्र: ॐ यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्यत्वापवीते नोपनह्यामि।।

अभिमंत्रित करबाक विशेष विधि:

ऊपरोक्त मंत्र सँ अभिमंत्रित कएलाक पश्चात, हाथ में जल लs कs यज्ञोपवीत कए दुनू हाथक मध्य (बीच में) राखि, गायत्री आ सावित्री मंत्र सँ मंत्रित कए लेबाक चाही।

गायत्री मंत्र:

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॐ

सावित्री मंत्र:

ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः, ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम्। ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॐ आपो ज्योतिरसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम्।

नियम: एही दुनू मंत्र कए तीन-तीन बेर पढ़ि कs शुद्ध मन सँ जनेऊ धारण करी।

. प्राचीन यज्ञोपवीत विसर्जन मंत्र

जखन जनेऊ पुरान (जीर्ण) भऽ जाए, टूटि जाए वा सूतक-पातक कए बाद ओकरा बदलबाक हो, तखन पुरना जनेऊ कए उतारबाक काल एही मंत्रक जप कएल जाइत अछि:

यज्ञोपवीतं यदि जीर्णवन्तं विद्यादिवेद्यं परब्रह्मतत्त्वम्।

आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं विसृजन्तु तेजः।।

चारू युग में यज्ञोपवीत कए स्वरूप

शास्त्रक अनुसार, समय (युग) कए संग यज्ञोपवीत कए धातु आ स्वरूप में परिवर्तन भेल अछि, जकर वर्णन एही श्लोक में अछि:

कृते पद्ममयं सूत्रं त्रेतायां कनकोद्भवम्।

द्वापरे रजतं प्रोक्तं कलौ कार्प्पाससम्भवम्।।

सतयुग (कृतयुग): कमल के डंटी कए सूत सँ बनल यज्ञोपवीत।

त्रेतायुग: सोनाक (कनकोद्भवम्) यज्ञोपवीत।

द्वापरयुग: चांदीक (रजतं) यज्ञोपवीत।

कलियुग: कपासीक सूत (कार्प्पाससम्भवम्) सँ बनल यज्ञोपवीत।

निष्कर्ष

यज्ञोपवीत धारण कएनाइ केवल धार्मिक कर्मकांड नहि, बल्कि ई स्वास्थ्य, सदाचार आ अनुशासित जीवनक आधार थिक। मिथिलांचल आ सनातन संस्कृतिक ई अनमोल धरोहर हमरा सब कए संस्कारवान बनबैत अछि। आशा अछि जे ई मंत्र आ विधि अहाँक दैनिक पूजा-पाठ आ संस्कारक संवर्द्धन में सहायक सिद्ध हैत।

जय मिथिला, 

अहि आलेख में शास्त्रीय आ पारंपरिक मान्यता आदि कए संकलन कएल गेल अछि। जँ अहाँ लोकनि कए कतहु कोनो त्रुटि बुझाय वा अहि विषय पर कोनो तर्कसंगत सुझाव हो, तँ कमेंट बॉक्स में अपन विचार अवश्य साझा करी ताकि एकरा आओर समृद्ध कएल जा सके।"

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

बिहारी एकता ज़िंदाबाद, JusticeForPandavKumar

 


Justice for Pandav Kumar 🙏

#JusticeForPandavKumar

देश के किसी भी कोने में हादसा हो, सबसे पहले जान गंवाने वाला अक्सर मेहनतकश बिहार का बेटा होता है। लेकिन दिल्ली में हुई हालिया घटना कोई साधारण अपराध नहीं—यह एक जघन्य हेट क्राइम है।

पांडव कुमार की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गई क्योंकि वे अपनी मातृभाषा में बात कर रहे थे।

यह सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं,

👉 हमारी पहचान पर हमला है

👉 हमारी भाषा पर हमला है

👉 हमारे सम्मान और अधिकारों पर हमला है

अब समय आ गया है कि बिहार का हर व्यक्ति एकजुट हो!

✊ अपनी आवाज उठाइए

✊ न्याय की मांग कीजिए

✊ ऐसी घटनाओं के खिलाफ खुलकर खड़े होइए

अगर आज हम चुप रहे, तो कल किसी और पांडव कुमार की बारी होगी।

बिहारियों, जागो! अपनी पहचान और सम्मान की रक्षा के लिए एकजुट हो जाओ।

🙏 न्याय के लिए आवाज बनो, डर के लिए नहीं।

#JusticeForPandavKumar

#StopHateCrime

#BihariEkta

#DelhiPolice

#DelhiGovernment

शनिवार, 7 मार्च 2026

मिथिलावासी जागू, नहिं त देर भ' जायत। सम्पूर्ण मिथिला राज्य लेल संघर्ष के बिगुल बजाऊ।

 बिहार संग साजिश 


मिथिला के फेर दू फाङ करबाक केन्द्रक कुचक्र 

बिहार सँ मिथिला आ' मैथिली विरोधी नीतीश कुमार राज्य सभा जा रहल छथि। मुदा जावत बीजेपी आ' जदयू के तलाक नहिं हएत तावत मिथिला राज्य बननाय सपना रहत।

एम्हर केन्द्र सरकार बिहार आ' बंगाल के राज्यपाल एहेन शख्स के बना रहल अछि जकरा राजनीति सँ कम मतलब।  एडमिनिस्ट्रेशन आ' खुफिया विभागक गठजोङ मिथिला सँ अलग " सीमांचल " राज्य बनबय चाहैत अछि, जे केन्द्र शासित राज्य रहत।एहि राज्य मे बिहार आ' बंगाल सँ किछु किछु हिस्सा काटि कय बनायल जाइत। मतलब बिहार के 3 टुकड़ी मे बाँटल जाइत, सीमांचल, मिथिला आ' मगध।

सीमांचल सबसँ पहिने बनत । सीमांचल आ' मिथिला क्षेत्र के घोर विरोध आ' संघर्ष के कारण टूटल-फूटल मिथिला राज्य बनत। बचल हिस्सा मगध बनि के रहि जायत।

         बीजेपी आ' आर एस एस चिकेन नेक कोरिडोर के डर देखा ई कुकृत्य करय जा रहल अछि।

हमरा सम्पूर्ण मिथिला चाही, विभाजित नहिं।

       ई भनक त हमरा 2022-23 मे लागि गेल रहय जखन गृहमंत्री अमित शाह  एहि इलाका आबि सभा मे सीमांचल शब्द के महिमामंडन केने रहथि। यएह कारण छल जे अखिल भारतीय मिथिला राज्य  संघर्ष समिति के संकल्प मिथिला राज्य पदयात्रा-2023 जे दरभंगा सँ शुरू होय वाला छल ओकरा हम ( एहि पदयात्राक संयोजक ) आ' प्रो० अमरेन्द्र झा सहमति बना किशनगंज के छोट सनक गाम " करूआमणि " सँ शुरू केने रही।दरभंगा सँ शुरू होयवाला पदयात्रा नेपाल, भारत आ' बंगलादेश सँ सटल गाम करूआमणि सँ शुरू भेल। हमरा आ' हमरा पदयात्री दल के उत्साहवर्धन लेल डा० बैद्यनाथ चौधरी  बैजू, मित्र प्रो० उदय शंकर मिश्र, पं० विनोद झा दरभंगा सँ हमरा सब संग करूआमणि( जिला-किशनगंज ) आयल रहथि।एतय रात्रि विश्राम कय एहि गाम के सैकङों स्त्री-पुरुष आ' युवा संग पदयात्राक साक्षी रहथि। एहि पदयात्राक दौरान एकोटा मैथिल एहेन नहिं भेटला जे मिथिला राज्य विरोधी होइथ, अपितु हुनका ह्रदय मे दरभंगा-मधुबनी के मैथिल  सँ बेसी मिथिला आ' मैथिली बसल अछि।

      मिथिलावासी जागू, नहिं त देर भ' जायत। सम्पूर्ण मिथिला राज्य लेल संघर्ष के बिगुल बजाऊ।

"एकहिं संकल्प अछि ध्यान मे,

मिथिला राज्य हो संविधान  मे।".                                                                                                                     @Shishir Kumar Jha 

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

यज्ञोपवीत संस्कार के प्रमुख बिंदु:

 


 यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करने का मुख्य मंत्र "ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं..." है। यह मंत्र शरीर को पवित्रता, बल और तेज प्रदान करने के लिए जनेऊ धारण करते समय पढ़ा जाता है। यह एक पवित्र सूत्र है, जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक के रूप में धारण किया जाता है। 

यज्ञोपवीत मंत्र:

ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।

आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥

हिंदी अर्थ:

यज्ञोपवीत अत्यंत पवित्र है, जिसे प्रजापति (ईश्वर) ने स्वाभाविक रूप से सबसे पहले स्थापित किया था। यह आयु को बढ़ाने वाला, अग्रगण्य (श्रेष्ठ), शुभ्र (स्वच्छ) और पवित्र करने वाला है। हे यज्ञोपवीत, मुझमें बल (शक्ति) और तेज (ऊर्जा) प्रदान करो। 

धारण करने की प्रक्रिया (संक्षेप में):

बाय कंधे के ऊपर से और दाएँ हाथ के नीचे से जनेऊ धारण किया जाता है।

इस प्रक्रिया के दौरान ऊपर दिए गए मंत्र का उच्चारण किया जाता है। 

पुरानी जनेऊ उतारने का मंत्र:

ॐ यज्ञोपवीतं पुराणं जरजरं कश्यपोद्भवम्।

त्यजामि ब्रह्मनिर्मितं नित्यं सात्त्वगुणात्मकम्॥

अर्थ: मैं इस पुराने और जर्जर यज्ञोपवीत को त्याग करता हूँ। 

यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार, जिसे उपनयन संस्कार भी कहते हैं, हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार है, जो बालक को ज्ञान, अनुशासन और द्विज (दूसरा जन्म) के रूप में प्रतिष्ठित करता है। यह अनुष्ठान ब्राह्मण (8 वर्ष), क्षत्रिय (11 वर्ष) और वैश्य (12 वर्ष) के लिए होता है, जिसमें गुरु गायत्री मंत्र की दीक्षा देते हैं। 

यज्ञोपवीत संस्कार के प्रमुख बिंदु:

अर्थ और महत्व: 'उपनयन' का अर्थ है 'गुरु या ज्ञान के समीप ले जाना'। यह पवित्र धागा धारण करने के बाद ही बालक को वेदों और विद्या के अध्ययन का अधिकार मिलता था, जिससे उसे 'द्विज' यानी दूसरा जन्म मिला माना जाता है।

तीन सूत्र: जनेऊ में तीन धागे होते हैं, जो ऋषि ऋण, देव ऋण और पितृ ऋण के प्रतीक हैं, जिन्हें धारण करके मनुष्य अपने कर्तव्यों का स्मरण रखता है।

विधि: यह संस्कार एक विद्वान पंडित द्वारा किया जाता है। इसमें मुंडन, गणेश पूजन, हवन, और गायत्री मंत्र का उपदेश मुख्य हैं। जनेऊ को बाएं कंधे के ऊपर और दाईं बांह के नीचे धारण किया जाता है।

उद्देश्य: इस संस्कार के बाद बालक को ब्रह्मचर्य का पालन करना होता था और यह नैतिक जीवन, विद्या अध्ययन व आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है।

परंपरा: यह प्राचीन काल से चली आ रही एक महत्त्वपूर्ण परंपरा है, जो अब सामान्यतः विवाह के पूर्व या कम उम्र में की जाती है। 

यह संस्कार व्यक्ति को अनुशासन, जिम्मेदारी और सात्विक जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है, जो सनातन संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है।

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

शादियों में एक नई रस्म का जन्म हुआ है हल्दी रस्म।

     


 विवाह में हल्दी रस्म या फिजूल खर्ची अमीरों के चक्कर में बेचारा गरीब पीs रहा है  आज कल ग्रामीण परिवेश में होने वाली शादियों में एक नई रस्म का जन्म हुआ है हल्दी रस्म। हल्दी रस्म के दौरान हजारों रूपये खर्च कर के विशेष डेकोरेशन किया जाता है, उस दिन दूल्हा या दुल्हन विशेष पीत (पीले) वस्त्र धारण करते हैं कुछ पूर्व इस हल्दी रस्म का प्रचलन  के ग्रामीण क्षेत्रों में कहीं पर भी देखने को नहीं मिलता था, लेकिन पिछले दो-तीन साल से इसका प्रचलन बहुत तेजी से ग्रामीण क्षेत्र में बढ़ा है। पहले हल्दी की रस्म के पीछे कोई दिखावा नहीं होता था, बल्कि तार्किकता होती थी। पहले ग्रामीण क्षेत्रों में आज की तरह साबुन व शैम्पू नहीं थे और ना ही ब्यूटी पार्लर था।  इसलिए हल्दी के उबटन से घिसघिस कर दूल्हे-दुल्हन के चेहरे व शरीर से मृt चमड़ी और मेल को हटाने, चेहरे को मुलायम और चमकदार बनाने के लिए हल्दी, चंदन, आटा, दूध से तैयार उबटन का प्रयोग करते थे। ताकि दूल्हा-दुल्हन सुंदर लगे। इस काम की जिम्मेदारी घर-परिवार की महिलाओं की थी। लेकिन आजकल की हल्दी रस्म मोडिफाइड, दिखावटी और मंहगी हो गई है। जिसमें हजारों रूपये खर्च कर डेकोरेशन किया जाता है। महंगे पीले वस्त्र पहने जाते है। दूल्हा दुल्हन के घर जाता है और पूरे वातावरण, कार्यक्रम को पीताम्बरी बनाने के भरसक प्रयास किये जाते हैं। यह पीला ड्रामा घर के मुखिया के माथे पर तनाव की लकीरें खींचता है जिससे चिंतामय पसीना टपकता है।

    पुराने समय में जहां कच्ची छतों के नीचे पक्के इरादों के साथ दूल्हा-दुल्हन बिना किसी दिखावे के फेरे लेकर अपना जीवन आनंद के साथ शुरू करते थे, लेकिन आज पक्के इरादे कम और दिखावा और बनावटीपन ज्यादा होने लगा है। 

       आजकल देखने में आ रहा है कि ग्रामीण क्षेत्र में आर्थिक रूप से असक्षम परिवार के लड़के भी इस शहरी बनावटीपन में शामिल होकर परिवार पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ा रहे है। क्योंकि उन्हें अपने छुट भईए नेताओं, वन साइड हेयर कटिंग वाले या लम्बे बालों वाले सिगरेट का धुंआ उड़ाते दोस्तों को अपना ठरका दिखाना होता है। इंस्टाग्राम, फेसबुक आदि के लिए रील बनानी है। बेटे के रील बनाने के चक्कर में बाप की कर्ज़ उतरने में ही रेल बन जाती है।

        ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे घरों में फिजूल खर्ची में पैसा पानी की तरह बहाया जाता है जिनके मां-बाप ने हाड़-तोड़ मेहनत और पसीने की कमाई से पाई-पाई जोड़ कर मकान का ढांचा खड़ा किया लेकिन ये नवयौवन लड़के-लड़कियां बिना समझे अपने मां-बाप की हैसियत से विपरीत जाकर अनावश्यक खर्चा करते हैं। 

        जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं हो उन परिवारों के बच्चों को मां-बाप से जिद्द करके इस तरह की फिजूल खर्ची नहीं करवानी चाहिए। आजकल काफी जगह यह भी देखने को मिलता है कि बच्चे (जिनकी शादी है) मां-बाप से कहते है आप कुछ नहीं जानते, आपको समझ नहीं है, आपकी सोच वही पुरानी अनपढ़ों वाली रहेगी, यह कहते हुए अपने माता-पिता को गंवारू, पिछड़ा, थे तो बौझ्अ बरगा हो कहते हैं। मैं जब भी यह सुनता हूं सोचने को विवश हो जाता हूं, पांव अस्थिर हो जाते हैं। बड़ी चिंता होती हैं कि आज युवा किस दिशा में जा रहे हैं।

      आज किसी को चींटी के पैरों के घूंघरू की आवाज सुनने की फुर्सत नहीं है क्योंकि सब-के-सब फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर पर खुद को बढ़ा-चढ़ाकर कर परोसते हैं, दिखावटीपन की चासनी में आकंठ डूबे हैं 

इस तरह की फिजूलखर्ची वाली रस्म को रोकने का प्रयास करें....!!!

मंगलवार, 27 जनवरी 2026

सामान्य वर्ग (General Category) कौन हैं ?

 *कौन है सामान्यवर्ग?* 

आओ बताता - हूँ ... .     


      प्रधानमंत्री जी या मुख्यमंत्री  जी ध्यान से सुनिएगा...

सामान्य वर्ग (General Category) कौन हैं ?

*सामान्य वर्ग ( भूमिहार, लाला(कायस्थ) जैन , ब्राह्मण , राजपूत , बनिया )*

जिस व्यक्ति पर एट्रोसिटी_एक्ट 89 के तहत बिना इन्क्वारी के भी कार्यवाई की जा सकती है, वो सामान्य वर्ग है‼️

जिसको जाति सूचक शब्द इस्तेमाल करके बेखौफ गाली दी जा सकती है, वो सामान्य वर्ग है‼️

देश में आरक्षित 131 लोकसभा सीटो और 1225 विधानसभा सीटो पर चुनाव नही लड़ सकता है, लेकिन वोट दे सकता है, वो सामान्य वर्ग है‼️

जिसके हित के लिए आज तक कोई आयोग नही बना, वो सामान्य वर्ग है‼️

जिसके लिए कोई सरकारी योजना न बनी हो,

वो  सामान्य वर्ग है‼️

जिसके साथ देश का संविधान भेदभाव करता है, वो सामान्य वर्ग है‼️

मात्र जिसको सजा देने के लिए NCSC और NCST का गठन किया गया वो सामान्य वर्ग है‼️

मात्र जिसे सजा देने के लिए हर जिले में विशेष SC-ST न्यायालय खोले गए हैं, वो अभागा सामान्य वर्ग है‼️

जो स्कूल में अन्य वर्गों के मुकाबले चार गुनी फीस दे कर अपने बच्चों को पढाता है, वो बेसहारा सामान्य वर्ग है‼️

नौकरी, प्रमोशन, घर allotment आदि में जिसके साथ कानूनन भेदभाव वैध है वो बेचारा सामान्य वर्ग है‼️

सरकारों व सविधान द्वारा सबसे ज्यादा प्रताड़ित किया जाने वाला वो सामान्य वर्ग है‼️

सबसे ज्यादा वोट देकर भी खुद को लुटापिटा ठगा सा महसूस करने वाला वो सामान्य वर्ग है‼️

सभाओं में फर्श तक बिछा कर एक अच्छी सरकार की चाह में आपको सत्ता सौंपने वाला वो सामान्य वर्ग है ‼️

देश हित मे आपका तन मन धन से साथ देने वाला वो सामान्य वर्ग है‼️

इतने भेदभाव के बावजूद भी,

धर्म की जय हो,अधर्म का नाश हो प्राणियों में सद्भावना हो,विश्व का कल्याण हो की भावना जो रखता है,वो सामान्य वर्ग है‼️

सबका साथ सबका विकास में हमारी स्थिती क्या है ? विचार अवश्य करें‼️

समस्त सामान्य वर्ग परिवारों की तरफ से भारत सरकार को समर्पित ...

अगर आपको उपरोक्त बातें सही लगी हो तो कम से कम 5 सामान्य वर्ग के लोगों को शेयर करें । 

ये बात माननीय प्रधानमंत्री जी ,राष्ट्रपति जी व मुख्यमंत्री जी तक अवश्य पहुँचनी चाहिए....

इस पोस्ट को लिखने व बनाने मे बहुत ही ज्यादा मेहनत (परिश्रम) लगा है, शेयर अवश्य करें। 🚩🙏🙏🙏

Jay Siya Ram 

शनिवार, 24 जनवरी 2026

जतिन दा


शरीर से मांस का एक-एक कतरा गल चुका था। पसलियां बाहर आ गई थीं। हिलने-डुलने तक की ताकत नहीं बची थी।

जब अंग्रेजों ने देखा कि यह 25 साल का लड़का टूट नहीं रहा, तो उन्होंने जबरदस्ती नाक में नली ठूंसकर दूध पिलाने की कोशिश की। वह नली खाने की नली की जगह फेफड़ों में चली गई।

दूध फेफड़ों में भर गया। वो तड़पते रहे, खून की उल्टियां करते रहे, लेकिन अनशन नहीं तोड़ा।

13 सितंबर 1929 को लाहौर जेल में एक क्रांतिकारी ने अपने प्राण त्याग दिए। 63 दिन... जी हाँ, 63 दिन तक बिना अन्न का एक दाना खाए।

इतिहास के पन्नों में अक्सर हम भगत सिंह की फांसी की बात करते हैं, लेकिन उस साथी को भूल जाते हैं जिसने भगत सिंह की बाहों में दम तोड़ा था।

आज हम बात कर रहे हैं *'यतींद्र नाथ दास' की, जिन्हें दुनिय जतिन दा*' के नाम से जानती थी।

पेशे से वो बम बनाने में माहिर थे, लेकिन उनका हथियार बना उनका अपना शरीर।

वो चाहते तो माफी मांग सकते थे, खाना खा सकते थे। लेकिन मांग सिर्फ एक थी - "भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ जानवरों जैसा सलूक बंद करो।"

अंग्रेजों को लगा कि भूख इसे तोड़ देगी। लेकिन उन्हें नहीं पता था कि यह शरीर मिट्टी का नहीं, फौलाद का बना है।

जब *जतिन दा* की हालत बिगड़ने लगी, तो अंग्रेजों ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। जेल के डॉक्टर और सिपाहियों ने उन्हें दबोच लिया। नाक से नली डाली। दर्द से वो चीखते रहे, लेकिन उनका संकल्प नहीं डिगा।

उनकी शहादत की खबर जब बाहर आई, तो पूरा देश रो पड़ा था। कहा जाता है कि जब उनका शव लाहौर से कलकत्ता ले जाया जा रहा था, तो हर स्टेशन पर हजारों लोग फूल लेकर खड़े थे। कलकत्ता में उनकी अंतिम यात्रा में 6 लाख से ज्यादा लोग शामिल हुए।

सुभाष चंद्र बोस ने खुद उनके पार्थिव शरीर को कंधा दिया था।

लेकिन आज? आज कितने लोग उस 63 दिन की तपस्या को याद करते हैं?

मरते वक्त जतिन दा ने कहा था, "मैं कोई साधु नहीं हूँ, मैं बस एक साधारण इंसान हूँ जो अपने देश की गरिमा के लिए मरना चाहता है।"

आजादी चरखे से आई या बिना खड्ग-ढाल के, यह बहस का विषय हो सकता है। लेकिन यह सच है कि आजादी की नींव में जतिन दा जैसे नौजवानों की गल चुकी हड्डियां गड़ी हैं।

हमें यह आजादी खैरात में नहीं मिली, इसके लिए किसी ने अपनी जवानी के 63 दिन भूखे रहकर कुर्बान किए हैं।

हर भारतीय का कर्तव्य है कि वो जाने कि जिस हवा में वो सांस ले रहा है, उसकी कीमत क्या थी।

इस जानकारी को साझा करें ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि असली 'हीरो' कौन थे।

यह पोस्ट केवल उन भूले-बिसरे नायकों को नमन करने के लिए है, Vande Mataram, Bharat Mata ki Jai 

गुरुवार, 22 जनवरी 2026

बुरा मत मानना ।

    अरिजीत सिंह को सलमान खान ने अपनी फ़िल्म सुल्तान के गाने "जग घुमेया" से निकाल दिया था। सोनू निगम जैसे दिग्गज को काफ़ी समय तक काम नहीं मिला। विवेक ओबेरॉय इंडस्ट्री से गायब कर दिए गए। मगर इन्होंने कभी नहीं कहा होगा कि -" मैं हिन्दू हूँ, इसलिए मुझे काम नहीं मिल रहा। "

और एक ये जज़्बाती क़ौम है । ......

मुसलमानों, बुरा मत मानना । एहसान-फ़रामोशी को आपमें से ज़्यादातर ने अपनी पहचान बना लिया है।

उधर उस्मान ख़्वाजा ऑस्ट्रेलिया से माल निचोड़ कर कह रहा है कि ऑस्ट्रेलिया में मेरे साथ भेदभाव हुआ।

अजहरुद्दीन मैच फ़िक्सिंग की सज़ा होने पर कहता है कि मैं मुस्लिम हूँ, इसलिए मुझे फँसाया गया है। एक हामिद अंसारी भी है। ताऊ को उपराष्ट्रपति बना दिया गया था। जीवन भर नाम-शोहरत कमाई, अंत में कह दिया—भारत हमारे लिए unsafe मुल्क है।

इसी कड़ी में अब A. R. रहमान भी जुड़ गए हैं। कहते हैं कि मैं मुसलमान हूँ, इसलिए मुझे इस मुल्क में काम नहीं मिल रहा है। 

ग्रो अप यार। तुम्हारे गाने सुन-सुन कर हम बड़े हुए हैं। एक दौर सबका आता है। कल तुम्हारा था, आज किसी और का है। कल किसी और का होगा। सलमान, शाहरुख, आमिर भी तो मुसलमान हैं.... ! बिना धर्म देखे इनको स्टार बनाया है इस देश के लोगों ने। 

अपनी वर्थ प्रूव करो, मेहनत संघर्ष करो। जहाँ से खा रहे हो उस जगह को विक्टिम कार्ड खेल कर बदनाम मत करो।

ऐसी लोगों को शायरी की भाषा में एहसास फरामोश कहते हैं। और देसी भाषा में कहते हैं - गद्दार।