dahej mukt mithila

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बुधवार, 14 फ़रवरी 2024

जे नै पढ़ब हुनकर सातो विदिया नाश - Ishanath Jha

वसंतोत्सव प्रारंभ भ' चुकल अछि। प्राकृतिक छटा, नैसर्गिक सौंदर्य, अप्रतिम प्रेम, अलौकिक कामक अनुभूतिक दिन आबि चुकल अछि। वसंतक अवतरण आम्रवृक्षक मादक मंजरी आ अशोकवृक्षक रक्त किसलय ओ पुष्पक संग वसंत पंचमी कें प्रकृति आ' मानवीय प्रेमक सजीवन स्नानार्थ महाकुम्भ बना रहल अछि। प्रकृति चारू कात सकारात्मक ऊर्जा कें चरमोत्कर्ष पर पहुँचा देने अछि। विभिन्न कला आ प्रेम प्रकृतिक पीत पुष्प सँ नयनाभिराम सौंदर्य मे पीयर साड़ीमे नवयौवना जकाँ खिलि उठल अछि। तात्पर्य जे चतुर्दिक् प्रसन्नता पसरल अछि।

मुदा, वसंत ऋतुक देवता भगवान मन्मथ मुरझायल सन अशोथकित उदास मुद्रामे अपन महल मे विरहा गाबि रहल छथि। पत्नी श्रीमती रति अपन प्रिय पति श्री कामदेवक एहि क्लांत छविक कारण पुछैत छथि, " प्रियवर ई तऽ अहाँक मास आयल अछि, एखन तँ अहाँक समय थिक  तखन म्लानमुख कियैक ?"

"हे मानिनि देवि रति, हमर प्रभाव प्रतिदिन क्षीण भेल जा रहल अछि, हमर काममयी तीर निस्तेज भेल जा रहल अछि, भोथ भ' गेल अछि लगैए, पृथ्वी परहक मनुष्य पर कोनो असरि नहि करैत अछि। तीव्र वैज्ञानिक प्रगति आ आधुनिकताक अंधानुकरणक फलस्वरूप वासंती मासक प्रकृति प्रदत्त सुषमा शनै:-शनै: क्षीण भेल जा रहल अछि, प्रिये", मिझायल स्वरमे उत्तर देलनि कामदेव।

"स्वामी, पर्यावरण प्रदूषण सँ तs सहमत छी जे भारतवर्षक पृथ्वी पर ओ नैसर्गिक सौंदर्य नहि रहल, मुदा ई मोन नहि मानि रहल अछि जे अहाँक मदनवाण अप्रभावी भ' गेल अछि ! के के नै शिकार भेल छथि ओहि वाण सँ, जे देव, दानव, यक्ष, गंधर्व, किन्नड़ कें नहि छोड़लक से मनुष्य लग केना विफल होएत प्रभु ?"

एवंप्रकारेण दुनू परानी घमर्थन करैत रहलाह मुदा कामदेवक मुखाकृति पर कोनो तरहक ऊर्जाक संचार नहि भेटलनि। "चलू तखन पृथ्वी पर अपन जम्बूद्वीपक वास्तविकताक दर्शन करब, प्रिये !"

ऋतुराज आ रति --- वसुधा पर पदार्पण करैत छथि पाटलिपुत्रक पवित्र धरती पर आ रति एहिठामक हल्ला-हुच्चड़, मारा-मारी, जिंदाबाद-मुर्दाबादक कनफोड़ा ध्वनि सँ हतप्रभ भेल छगुन्तामे जे पड़ि गेली आ कामदेव सँ आग्रह केलनि जे शीघ्रे पड़ाऊ एतय सँ। रतिपति कामदेव राजपथ पर बहुरंगी झंडा धारण केने 'जिंदाबाद-मुर्दाबाद' करैत श्वेतवसनधारी एहि भारी भीड़ कें देखि स्वयं हतप्रभ छलाह। राजभवनक मुख्य द्वारि पर एकटा भीड़ भरल लाइनमे धक्कामुक्की करैत स्वस्थ श्यामल मुष्टंडा पर पर अपन पुष्पवाण छोड़लनि मुदा, ई की ? युवक ओकरा हाथ सँ झाड़ि लेलक आ तरहत्थी कें पोनसँ पोछि फेर जिंदबाद करय लागल। आब अचंभा रति कें भेलनि, तामसो भेलनि। चोट्टहि पतिक संग युवक लग जाए ओकरा पुछलनि, 

"हे रौ मनुक्ख ! तों जुआन छह, स्वस्थ छह, की तोरा 'काम' सँ कोनो लगाव नहि छौ ? कामवाण तोरा पर कोनो प्रभाव कियै नहि छोड़लक ? कथीक दाबी छौ एते जे तों हमर पुष्पवाणक अपमान करमें ?"

खौंझायल युवा नेता चिचिआइत बाजल, " देखै नै छियै काजमे लागल छी ! अहीलेल तऽ भोरसँ निसाभाग राति धरि छिछियाएल फिरैत छी। लाख दुनमरी काज करैत कहुना कें एमएलए बनलौं। आब एखन मौका छै मंत्री बनबाक तऽ हम अहाँमे लटपटा जाऊ? वाह रे देवता ! एकबेर सप्पत खा लै छी संविधानक आ तकरा बाद हम छीहे आ अहूँ छीहे !"

"ई कोन महत्त्वपूर्ण काजमे एते अस्त-व्यस्त छी औ, अहाँक उमेरमे लोक मस्त रहैए !", पस्त होइत ऋतुराज कहलनि।

"हे यौ ऋतुराज, हम एकैसम शताब्दीक भारतमे रहैत छी,

एखने मोबाइल कें आधारकार्ड सँ लिंक कराके अनलहुँ, विभिन्न कोर्ट सँ एनओसी अनने छी आ आब बैंक खाताकें आधारकार्ड सँ लिंक करेबाक लेल लाइनमे पठौने छी अपन दूत सभकें। हमर पत्नी काल्हिए सँ अपन लिंक सँ जोर लगेने छथिए !ओ अभगला पीएं जे दसे बजे किछु इंतजाम करबा लेल गेल से  एखन धरि फोन तक नहि केलक अछि। आ' अहाँ 'काम', 'प्रेम', 'प्रणय' आदि विषय पर प्रवचन द' रहल छी। भारतक कोनो मूर्ख सँ मूर्ख नौजवान लग समय नहि छैक एहि सबहक लेल। एतय सामान्य लोक कें जीबाक लेल आधारकार्ड जरूरी छै। नेता सबकें सरवाइव करबाक लेल सत्ताक शीर्ष पर बैसल लोकसभ सँ लिंक रखबाक आवश्यकता छै ! आ' हे, एकटा सलाह दियऽ, अहूँ अपन वाणक संपूर्ण स्टॉक कें आधार सँ लिंक करा ने लियऽ तखने ओकर महिमा वा ई कहू जे वैधता आपस आएत ! ई कहैत युवक लाइनमे आगू ससरि गेल।

रति महारानी 'लिंक' शब्दक अर्थमे ओझराएल रहली आ कामदेव ठोहि पाड़िकें कानय लगलाह !

प्रश : जखन सप्पत खाइ बेरमे विद्या साते टा होइ छै तखन मैथिलक लेल तेरहम विद्या की होइ छै?

■ईशनाथ झा

रविवार, 14 जनवरी 2024

राम मन्दिर का 22 जनवरी - 2024 का उद्घाटन

 


 राम मन्दिर का 22 जनवरी 2024 का उद्घाटन और शंकराचार्य का नही सम्मिलित होना विरोध का स्वर नही है  

राम मन्दिर अयोध्या में बनना ऐतिहासिक है। जब मन्दिर का निर्माण हुआ है तो मुर्ति की प्राण प्रतिष्ठा भी होना ही है। 22 जनवरी को ज्योतिषियों के मुताबिक  कई शुभ योग बन रहे हैं। इस तिथि को शुरुआत में तीन शुभ योग सर्वार्थ सिद्धि योग, अमृत सिद्धि योग और रवि योग बन रहे हैं  इसके अतिरिक्त यह  ऐसा दिन है जो राम भक्तों की कुर्बानी को याद दिलाता है।  सनातन धर्म महान इसिलिए भी है कि यहाँ लोगों को अपनी बात कहने की स्वतंत्रता है। एक विषय पर अनेक मत सम्भव है। इस सन्दर्भ मे चार शंकराचार्य द्वारा उसमे भाग नही लेना उचित तो नही लग रहा है परंतु यह आश्चर्य  का विषय नही है। शंकराचार्य ज्ञान परम्परा के सर्वश्रेष्ट व्यक्ति ही नही संस्था हैं। इसको सभी जानते हैं। सम्मान भी करते हैं। सभी शंकराचार्य शास्त्र को सर्वोत्तम मानते हैं  और उसी अनुरुप जीवन जीते हैं। लेकिन उनका 22 जनवरी 2024 को अयोध्या नही जाना न तो सरकार विरोधी और न ही सनातन विरोधी कर्म के रूप मे देखने की जरूरत है। लोग बात को जोड़ तोड़ कर कह रहे हैं। यह उचित नहीं है। जो लोग कल तक शंकराचार्य को गाली दे रहे थे आज उन्हें शंकराचार्य का नही जाने का निर्णय अमोघ अस्त्र के समान लग रहा है। वे उनके हितैषी बन रहे हैं। यह तो अलग ही अवस्था है भाई! 

लोग स्वयं के घर और देवालय मे भी पुर्ण निर्माण से पहले प्रवेश करते रहे हैं। यह नूतन और शास्त्र विरुध्ध कार्य नही रहा है। 

कहता चलूं की राजा अद्वैत है क्योंकि वह एक है। प्रधान मंत्री जनप्रतिनिधि होने के कारण राजा हैं। एक ऐसा राजा जिसका चयन जन्म के आधार पर न होकर कर्म के आधर पर हुआ है। एक ऐसा राजा जो जन जन का प्रतिनिधित्व करता है। अतएव प्रधानमंत्री स्वत: यजमान हो जाते हैं।  उन्हें प्राण प्रतिष्ठा करने का अधिकार स्वत: हो जाता है। सभी शंकराचार्य का यह दायित्व हो जाता है कि अपनी भव्य उपस्थिति से और ज्ञान से यज्ञ को सार्थक करें। एक नैयायिक की तरह देखें कि प्राण प्रतिष्ठा का विधान शास्त्र सम्मत हो रहा है या नही। सभी पूजा, धार्मिक कार्य, देवालय इत्यादि का सम्पादन राजा के द्वारा ही होता रहा है। इसपर राजा का ही अधिकार रहा है। राम ने जब त्रेता युग में राजसीयू यज्ञ किया तो राम ही यजमान थे । वशिष्ठ पुरोहित बने थे न कि यजमान। इस यज्ञ मे पुरोहित तो ब्राह्मण ही है।   ब्राहमण का धर्म ही है पुरोहित होना और सम्पादन को सही तरह से अंजाम देना।                                                           डॉकैलाशकुमारमिश्र                                          

शुक्रवार, 12 जनवरी 2024

 


मैथिली कवि कोकिल विद्यापति केर रचना में शिव पार्वती केर हास्य व्यंग्य केर चर्चा बेसी भेटैत अछि यथा "नित उठि गौरी शिव के मनावथि करू बीघा दूई खेत" अथवा "गौरी दौड़ि दौड़ि कहथिन हे मोरा भंगिया रूसल जाइ" इत्यादि अनेकों रचना लिखलाह।.                                                                एहि हास परिहास केर वातावरण एवं स्थान केर संदर्भ में मधुवनी जिला केर राज राजेश्वरी मन्दिर डोकहर (दुखहर) जे मधुबनी शहर सँ बारह किलोमीटर उत्तर में बरहन बेलाही गाम के निर्जन स्थान में बिन्दुसर पोखैर के कात में अवस्थित अछि। एहि स्थान के शिव पार्वती के रमणीय स्थली के रूप में सेहो जानल जाईत अछि ।एहि ठाम केर शिव पार्वती केर मूर्ति केर भाव भंगिमा आ युगल मुद्रा एहि बात केर प्रत्यक्ष प्रमाण दैत अछि। एहि कारण सँ एहि स्थान केर नामकरण दुखहर राखल गेल जे एहि बात केर परिचायक अछि जे जाहि ठाम स्वयं देवाधिदेव महादेव आ माता पार्वती केर विलास स्थान छैन्ह ओहिठाम कोनो दुःख केर स्थान कोना भेटि सकैत छैक। एहिठाम राज राजेश्वरी के परब्रम्ह के महाशक्ति केर रूप में आदि कालहि सँ पूजा होइत आयल अछि। ऐतिहासिक तथ्य केर अनुसार जखन बुद्ध धर्म केर प्रचार प्रसार ब्राम्हण धर्म सँ प्रतिशोध लेवाक लेल जोर पकड़लकै त मूर्ति केर क्षति पहुंचेवाक आशंका सँ मूर्ति के लग केर चन्द्रभागा नदी में नुका क राखि देल गेल रहैक जे बाद में किछु दिनुका बाद पुनः अपन यथा स्थान स्थापित कऽ देल गेलैक। आई ओ भव्य स्थान श्रद्धालु केर लेल सृष्टि केर प्रलय हारी, करूणामयी, श्रृंगारिक आ ओजस्वी रूप में दुखहर बनि कऽ बिराजमान छैथि आ सतत अपन भक्त केर आशीर्वाद दैत छथिन्ह ।जँ भक्त हिनक दरवार में सत्य आ निश्छल भाव सँ उपस्थित होइत छैथि त हुनकर समस्त दुःख केर अंत आ मनोकामना अवश्य पूर्ण होइत छैन्ह। जय राज राजेश्वरी .

गुरुवार, 11 जनवरी 2024

हमारी खुशी किस में

      एक महिला ने अपनी किचन से सभी पुराने बर्तन निकाले। पुराने डिब्बे, प्लास्टिक के डिब्बे, पुराने डोंगे, कटोरियां, प्याले और थालियां आदि। सब कुछ काफी पुराना हो चुका था।

*फिर सभी पुराने बर्तन उसने एक कोने में रख दिए और नववर्ष पर लाए हुए बर्तन तरीके से रखकर सजा दिए।

*बड़ा ही सुंदर लग रहा था अब किचन। फिर वो सोचने लगी कि अब ये पुराना सामान भंगारवाले‌ को दे दिया तो समझो हो गया काम।

*इतने में उस महिला की कामवाली आ गई। दुपट्टा खोंसकर वो फर्श साफ करने ही वाली थी कि उसकी नजर कोने में पड़े हुए बर्तनों पर गई और बोली - बाप रे! मैडम आज इतने सारे बर्तन घिसने होंगे क्या ?

*और फिर उसका चेहरा जरा तनावग्रस्त हो गया।

*महिला बोली - अरी नहीं! ये सब तो भंगारवाले को देने हैं।

*कामवाली ने जब ये सुना तो उसकी आँखें एक आशा से चमक उठीं और फिर बोली - मैडम! अगर आपको ऐतराज ना हो तो ये एक पतीला मैं ले लूं ? (साथ ही साथ में उसकी आँखों के सामने घर में पड़ा हुआ उसका तलहटी में पतला हुआ और किनारे से चीर पड़ा हुआ इकलौता पतीला नजर आ रहा था।)

*महिला बोली- अरी एक क्यों! जितने भी उस कोने में रखे हैं, तू वो सब कुछ ले जा। उतना ही पसारा कम होगा।

*कामवाली की आँखें फैल गईं - क्या! सब कुछ ? उसे तो जैसे आज नए साल पर अलीबाबा का खजाना ही मिल गया हो।

*फिर उसने अपना काम फटाफट खत्म किया और सभी पतीले, डिब्बे और प्याले वगैरह सब कुछ थैले में भर लिए और बड़े ही उत्साह से अपने घर की ओर निकली।

*आज तो जैसे उसे चार पाँव लग गए थे। घर आते ही उसने पानी भी नहीं पिया और सबसे पहले अपना पुराना और टूटने की कगार पर आया हुआ पतीला और टेढ़ा मेढ़ा चमचा वगैरह सब कुछ एक कोने में जमा किया, और फिर अभी लाया हुआ खजाना (बर्तन) ठीक से जमा दिया।

*आज उसके एक कमरेवाला किचन का कोना भरा पूरा सुंदर दिख रहा था।

*तभी उसकी नजर अपने बहुत पुराने बर्तनों पर पड़ी और फिर खुद से ही बुदबुदाई - अब ये बेकार सामान भंगारवाले को दे दिया तो समझो हो गया काम।

*तभी दरवाजे पर एक भिखारी पानी मांगता हुआ हाथों की अंजुल करके खड़ा था- माँ! पानी दे।

*कामवाली उसके हाथों की अंजुल में पानी देने ही जा रही थी कि उसे अपना पुराना पतीला नजर आ गया और फिर उसने वो पतीला भरकर पानी भिखारी को दे दिया।

*जब पानी पीकर और तृप्त होकर वो भिखारी बर्तन वापिस करने लगा तो कामवाली बोली - फेंक दो कहीं भी।

*वो भिखारी बोला- तुम्हें नहीं चाहिए ? क्या मैं रख लूँ अपने पास ?

*कामवाली बोली - रख लो, और ये बाकी बचे हुए बर्तन भी ले जाओ और फिर उसने जो-जो भी बेकार समझा वो उस भिखारी के झोले में डाल दिया।

*वो भिखारी भी खुश हो गया।

*पानी पीने को पतीला और किसी ने खाने को कुछ दिया तो चावल, सब्जी और दाल आदि लेने के लिए अलग-अलग छोटे-बड़े बर्तन, और कभी मन हुआ कि चम्मच से खाये तो एक टेढ़ा मेढ़ा चम्मच भी था।

*आज ऊसकी फटी झोली भरी भरी दिख रही थी।*

*ये सब क्या है? सुख किसमें माने, ये हर किसी की परिस्थिति पर अवलंबित होता है।

*हमें हमेशा अपने से छोटे को देखकर खुश होना चाहिए कि हमारी स्थिति इससे तो अच्छी है। जबकि हम हमेशा अपनों से बड़ों को देखकर दुखी ही होते हैं और यही हमारे दुख का सबसे बड़ा कारण होता है..!!*