dahej mukt mithila

(एकमात्र संकल्‍प ध्‍यान मे-मिथिला राज्‍य हो संविधान मे) अप्पन गाम घरक ढंग ,अप्पन रहन - सहन के संग,अप्पन गाम-अप्पन बात में अपनेक सब के स्वागत अछि!अपन गाम -अपन घरअप्पन ज्ञान आ अप्पन संस्कारक सँग किछु कहबाक एकटा छोटछिन प्रयास अछि! हरेक मिथिला वाशी ईहा कहैत अछि... छी मैथिल मिथिला करे शंतान, जत्य रही ओ छी मिथिले धाम, याद रखु बस अप्पन गाम - अप्पन बात ,अप्पन मान " जय मैथिल जय मिथिला धाम" "स्वर्ग सं सुन्दर अपन गाम" E-mail: apangaamghar@gmail.com,madankumarthakur@gmail.com mo-9312460150

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

सुपुरुषक पतीक शिक्षा आ कुपुरुष पतीक शिक्षा

 || सुपुरुषक पतीक शिक्षा || 
 || गीत ||
हे     अर्ध       चन्द्र   ,  हे   अर्धागिन
  ग्रही   में  सुख स्वर्गक छवि  राखी  || २

किछु   माय हमर  अनुचित   बजती
बाबु   जँ   हमर   किछुओ    बजता  |
विष  - वचन ,अमृत बुझि पान करब
 बिनु    अपराधहुँ    तारन     करता  ||
प्रति  अंग  अपन प्रतिपल   कोमल
अमृत   मधुसिक्त   अघर   राखी   ||
                         हे अर्ध   चन्द्र ----
उठि      भोरे     आँगन   - घर    अहाँ
दय  वादनि , निपि कय  झल कायब |
थोर      बहुँ   नोने , थोर    बहुँ    तेले
हूलसति    मानस  के  घर   जायब  ||
अधखिलित           अघर         भरल
नहुँये  सँ    मधुर      बचन    भाषी  ||
                        हे  अर्ध  चन्द्र ----
दुख     में   धैरज  , सुख  में   शीतल
आज्ञा      कारी    सदिकाल     रही  |
नैहर     के  सुख  सब  बिसरि अपन
सासुर  में   सागहुँ   खा  कय   रही   ||
एक   प्राण  अधार   प्रिया   प्रियतम
ई "रमण " अहाँक    तखन   साखी

                    हे  अर्ध  चन्द्र ----
 ||  कुपुरुष  पतीक  शिक्षा  || 
|| गीत || 
हे   सूर्य   मुखी  , हे  चन्द्र   मुखी 
     छी घर  अहाँक , जहिना राखी  ||  २ 
ई माय  हमर  जँ  किछु  बजती   
बाबू   जँ  हमर  किछुओ बजता  | 
अहाँ    तारन - मारन  सतत करी 
जहिना रखबैन  , ओहिना रहता  ||  
ई   गौओं    हमरा    वारि     दीय  
हम सतत  अहीँक  रहब साखी || 
                               हे सूर्य -----
अहाँ  क्रोध करी , अहाँ  कलह करी  
हन - हन , पट -पट  सब ठाम करी | 
अहाँ     गारि    पढ़ी  , वे  बात   करी 
अहाँ  नाम   अपन  सब  गाम  करी   || 
सब  वचन  अहाँक  हम  श्रवण करब
छी  मोन   अहाँक   जहिना  भाषी  ||
                                हे सूर्य -----
गहि "रमण " अहाँक  चरणारविन्द
कर   जोरि   कहैछथि   जोरे    सँ  |
 झूठहुँ      बाजब    विश्वास   करब
सब   अहाँक   टपा टप    नोरे  सँ   ||
हम  विमुख  अहाँ  सँ  होयब  कोना
जीवनक   हमर     छी     बैसाखी  ||
                                   हे सूर्य -----
रचित :-
रेवती रमण झा "रमण "
ग्राम - पोस्ट - जोगियारा पतोर
आनन्दपुर , दरभंगा  ,मिथिला
मो 09997313751

कोई टिप्पणी नहीं: