dahej mukt mithila

(एकमात्र संकल्‍प ध्‍यान मे-मिथिला राज्‍य हो संविधान मे) अप्पन गाम घरक ढंग ,अप्पन रहन - सहन के संग,अप्पन गाम-अप्पन बात में अपनेक सब के स्वागत अछि!अपन गाम -अपन घरअप्पन ज्ञान आ अप्पन संस्कारक सँग किछु कहबाक एकटा छोटछिन प्रयास अछि! हरेक मिथिला वाशी ईहा कहैत अछि... छी मैथिल मिथिला करे शंतान, जत्य रही ओ छी मिथिले धाम, याद रखु बस अप्पन गाम - अप्पन बात ,अप्पन मान " जय मैथिल जय मिथिला धाम" "स्वर्ग सं सुन्दर अपन गाम" E-mail: apangaamghar@gmail.com,madankumarthakur@gmail.com mo-9312460150

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बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

अन्हार




हाँ सोचैत की रहैत छी ?
हऽम !
हम सोचैत नहि छी
हम देखैत छी
हम दुनीयाँकेँ बुझैक प्रयत्न कए रहल छी
कि हमहूँ एहि दुनीयाँक हिस्सा छी?
कि हम देशक हिस्सा छी ?
कि हम एहि राजक हिस्सा छी ?
कि हम एहि समाजक हिस्सा छी ?
कि हम अपन परिवारक हिस्सा छी ?
नहि ! नहि ! नहि ! नहि !
तँ फेर हमर अस्तित्व की अछि ?
हम एहिठाम किएक एलहुँ ?
हम एहिठाम किएक छी ?
हम एहिठाम की कए रहल छी?
किछु नहि
पत्ता नहि
नहि जनैत छी
किछु नहि
नहि ! नहि ! नहि ! नहि !
किछु नहि
किछु नहि अर्थात शून्य 
शून्य
अन्हार
नाकामयाबी
अलगाव ।

एहि जिनगीक कोन मोल
जकर किछु सार्थकता नहि
जन्म लेनाइ
अभाबमे पोसेनाइ
सपनाक गरदैन घोटनाइ
माथपर जिमेदारी आ चिन्ताक बोझ
असफलता
शून्यता
फेर एक दिन
सभ चिन्तासँ मुक्त भऽ
लुप्त भऽ जेनाइ
काल्हि
जाहिखन एकटा नव भोर होएत
केकरो मोनमे इआद नहि
केकरो मुँहमे नाम नहि
इतिहासक पन्नामे कथा नहि
फेर एकटा शून्य
घोर अन्हार
अपार अन्हारक साम्राज्य
जाहिठाम
आन कि अपनो सभ इआद नहि राखत ।

की इहे जिनगी छी ?
एकरे नाम जीवन अछि ?
इहे मनुक्खक जीवन पाबैक हेतु
चौरासी लाख योनी पार करए परैक छैक
एहिठाम की भेटल
खाली शून्य
घोर अपार अन्हार
यदि हाँ
इहे जीवन अछि
इहे जीवनक सार अछि
तँ, हे भगवती
हमरापर दया करू
हमरापर कृपा करू
हमरा अहाँक ई जीवन नहि चाही
हमरासँ नीक तँ कीड़ा मकोड़ा
मानलहुँ कि ओकरो लग बड्ड शून्य छैक 
घोर अन्हार छैक
मुदा
अभाब नहि छै
असफलता नहि छै
निराशा नहि छै
चिन्ता नहि छै
माथपर बोझ नहि छै
ओ अपनाकेँ तुक्ष नहि बुझै छै
आर
फेर ओकरा
एकटा नव उच्च जीवन पाबैक आशो तँ छैक ।

हमरा लग की अछि ?
किछु नहि
खाली आर खाली घोर अन्हार
हम जन्म लै छी
आ ओकरा तियाइग कए
एकटा अनन्तमे हरा जाइ छी
काल्हि
हमर नामो धरि नहि रहि जाइए
हे भगवती
कि हमरा सभकेँ
एहने जीवन भोगैक लेल
जीवन देने छी
तँ कृपा कऽ अपन जीवन लए लिअ
हमरा सभकेँ एहेन जीवन नहि चाही
कमसँ कम
हमरा तँ बिल्कुल नहि
हमरापर दया करू भगवती
अपन ई जीवन लऽ लिअ ।
@ जगदानन्द झा ‘मनु’

मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

गाम बदलि रहल अछि


गाम बदलि रहल अछि
समाँग बदलि रहल अछि
छ्नीक सुखक खातीर
लोक चाम बदलि रहल अछि।

गामक फूसक घर
पक्कामे बदलि रहल अछि
शहरक पक्का मकान
टावरमे बदलि रहल अछि।

टीभी रेडिओ
मोबाईलमे बदलि रहल अछि
ब्याहक पबित्र बंधन
लिव इन रिलेशनशिपमे बदलि रहल अछि।

अख़बार आबि गेल नेटपर
चूल्हा गेएशमे बदलि रहल अछि।

पाइ पाइकेँ फरिछोंतमे
भाइ भाइकेँ बदलि रहल अछि
रुपैया नहि आब चौब्बनी अठ्ठनीमे
सिनेह बदलि रहल अछि।

परिभाषा आब सम्बन्धकेँ
खर्चामे बदलि रहल अछि
पिता पुत्रक प्रेम सबहक सोंझा
सराधमे बदलि रहल अछि।

मुखिया बदलि रहल अछि
सरपन्च बदलि रहल अछि
नहि कोनो गामक
समस्या बदलि रहल अछि।

माए कनै छथि एखनो
आँचर तर मुँह नुका कए
अछैते बेटा पुतहु बिनु
नहि हुनक हाथ झरकेनाइ बदलि रहल अछि।

बापक आँखिक नोर
एखनो ताकि रहल अछि
आबि बनेए कियो लाठी
नहि हुनक सपना बदलि रहल अछि।  

@जगदानन्द झा ‘मनु’    

रविवार, 1 दिसंबर 2013

गजल @ जगदानन्द झा 'मनु'


करेजामे अपन हम की बसेने छी
अहाँकेँ नामटा लिख-लिख नुकेने छी

बितैए राति नै  कनिको कटैए दिन
अहाँकेँ बाटमे     पपनी सजेने छी

हमर ठोरक हँसीकेँ    देख नै हँसियौ
अहाँ हँसि लिअ दरद तेँ हम दबेने छी

हमर जीवन अहाँ बिनु नै छलै जीवन
मनुक्खसँ देवता     हमरा बनेने छी

निसा ई गजलमे आँखिक अहीँकेँ ‘मनु’
बुझू नै हम  महग   ताड़ी चढ़ेने छी

(बहरे हजज, मात्रा क्रम – १२२२-१२२२-१२२२)

जगदानन्द झा ‘मनु’                   

शनिवार, 14 सितंबर 2013

भगवानकेँ जे नीक लगनि


बाबा भोलेनाथक विशाल मन्दिर। मुख्य शिवलिंग आ समस्त शिव परिवारक भव्य आ सुन्दर मूर्ति। साँझक समय एक-एक कए भक्त सब अबैत आ बाबाक स्तुति वन्दना करैत जाएत। एकटा चारि बर्खक नेना आबि बाबा दिस धियानसँ देखैत। ताबएतमे एकटा भक्त आबि बाबाक सोंझाँ श्लोक, कर्पुर गौरं करुणावतारं.... सुना कए चलि गेला
दोसर भक्त आबि, नमामी शमसान निर्वा..... सुनाबए लगला। एनाहिते आन आन भक्त सब सेहो किछु ने किछु मन्त्र श्लोक प्राथनासँ बाबा भोलेनाथकेँ मनाबेएमे लागल। ई सब देख सुनि ओहि नेनाक वाल मोन सोचए लागल, हम की सुनाबू ? हमरा तँ किछु नहि अबैत अछि ? कोनो बात नहि एलहुँ तँ किछु नहि किछु सुनाएब तँ जरुर।
ई सोचैत नेना अप्पन दुनू कल जोरि, आँखि मुनि धियानक मुदरामे पढ़ लागल, अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं अः क ख ग घ..........
नेनाकेँ ई पढ़ैत देख पुजारी बाबासँ नहि रहल गेलनि। ओ कनीक काल धियानसँ सुनला बाद नेना सँ पूछि बैसला, बौआ ई अ आ किएक पढ़ि रहल छी ?
जकरा देखू किछु ने किछु मन्त्र पढ़ि कए जाइए, हमरा तँ अओर किछु अबिते नहि अछि, तेँ अ आ पढ़ि रहल छी। भगवानकेँ जे नीक लगनि एहिमे सँ छाँति लेता। 
*****
जगदानन्द झा ‘मनु’  

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

रुबाइ



कर्जा कए कऽ हम जीवन जीव रहल छी
फाटल अपनकेँ कहुना सीब रहल छी
सभ किछु गवा कए ‘मनु’अपन जीवनकेँ
निर्लज भए हम ताड़ी पीब रहल छी   

मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

उगैत सूरज पएर पसारि



उगैत सूरज पएर पसारि 
धरतीक आँगनमे एलै 
लाल रंगक ओढ़नी एकर 
हरीयर खेतमे छिरएलै 

कोंढ़ी सभ मूरी हिला कए 
पंखुड़ीकेँ फैलेलक 
नचि-नचि कए नैन्हेंटा भोंडा 
खुशीकेँ नाच दखेलक    

लए संग अपन साजि बरयाति 
खुशी ओ संग अनने अछि 
संग एकरे उठल चिड़ै सभ 
आर मनुख सभ जगैत अछि 

माए सभ आँचरमे भरि कए 
नेनापर अमृत बरसेलै 
उगैत सूरज पएर पसारि 
धरतीक आँगनमे एलै 

बरदकेँ संग लए हरबाहा 
कन्हापर लादि हर आएल 
गाए महीषकेँ रोमि चरबाहा  
धरतीक आँगनमे बहि आएल 

छोट छोट हाथसँ नेना 
डोड़ी पकैर बकरीकेँ अनलक 
माथ पर ल' क' ढाकी खुरपी 
घसबाहीन झुमति निकलल 

एहन सुन्नर मनभाबक 
दृश्य भोरका कएलक 
उगैत सूरजकेँ त' देखू 
केहएन सुन्नर दुनियाँ बनेलक ।

उगैत सूरज पएर पसारि 
धरतीक आँगनमे एलै ।
***** जगदानन्द झा 'मनु'

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

रुबाइ


मैथिली साहित्यक आँच सुनगैत अछि 
सगरो नव विधाक ज्वला पजरैत अछि 
कोटी नमन जिनकर बिछल जारैन अछि 
विदेहक बारल आगि 'मनु' लहकैत अछि 

शनिवार, 7 जुलाई 2012

मिथिलाक गुणगान



सुनु मिथिला केँ गुणगान अहाँ, हम की कहु अपन मोनें सँ
सभ  किछु तँ   अहाँ जैनते छी मुदा, हम कहैत छी ओरे सँ

उदितमान ई अछि अती  प्राचीन, ज्ञानक  भंडार अछि
ऋषि-मुनि केँ पावन धरती,  महिमा एकर अपार अछि

ड्यौढ़ी-ड्यौढ़ी फूलबारी, आँगन में तुलसी सोभति
कोसी-कमला मध्य वसल ई, भारतकेँ  सुंदर मोती

भक्ती-रस सँ कण-कण डुबल, अछि महिमा एकर अपार
शिव जतए एला चाकर बनि कए, सुनी भक्तकेँ  करुण पुकार

काली विष्णु पूजल जाई छथि, मिथिलाक एके आँगन में
छैक कतौ आन ई सामर्थ कहु, होई जे आँखिक देखने में

एहि धरती सँ जानकी जनमली, श्रीष्टिक करै लेल कल्याण
श्रीराम संग व्याहल गेलि, पतिवर्ताक देलैन उदाहरण महान

आजुक-कईल्हुक बात जुनि पुछू, भ्रस्त बनल अछि दुनियाँ
मुदा मिथिला में एखनो देखूँ, सुरक्षित घर में छथि कनियाँ

माय-बापकेँ  आदर दय छथि, एखनो तक मिथिले वासी
पूज्य मानी पूजा करैत छथि, घर आबए जे कियो सन्यासी

आजुक युग में धर्म बचल अछि, जे  किछु एखनों मिथिले में
आँखिक पैन बचल अछि देखू, जे किछु एखनों मिथिले में

कि कहु आब मिथिलाक महिमा,समावल जाएत नै लेखनी में
हमरा में ओ सामर्थ नहि अछि, बांध सकी जे पाँति में

जगदानन्द झा 'मनु'

मंगलवार, 5 जून 2012

हम मनुख, मनुख छी


अहंकार इश्वर कए भोजन छैक
मनुख कए प्रविर्ती छैक
आ दानब कए पोषक छैक

इश्वर हम भय नहि सकै छी
दानब बनै कए तैयार नहि छी
मनुख बनै कए प्रयाश नहि करैत छी

हम मनुख, मनुख छी
मनुखता सँ खसलहुँ त दानव छी
ऊपर भएलहुँ त देबता छी

जगदानन्द झा 'मनु'  

रविवार, 13 मई 2012

कोना मदर डे हैप्पी ?


आब केहन जमाना आबि गेल
बर्ख में एक्के दिन
माय कए यादि करै छी,
'मदर डे' कए नाम पर
माय कए याद करै छी
की हुनक सुखएल घा कए
काठी कय क' जगाबै छी |

हम बिसैर गेलहुँ
अपन माय कए
मुदा ओ नहि बिसरली,
जाहिखन हुनका भेटलैन्ह
सुन्दर कार्ड 'हैप्पी मदर डे' लिखल
भेलैन्ह करेजा तार-तार
नोर टघैर क'
अपन स्पर्श सँ
गाल कए छुबैत
हुनक करेजा तक चलि गेल
आ करेजा में बंद
महामाय कए कोंढ़ सँ
सोनित में डुबल शव्द निकलल
आह!
की ई हमर ओहे लाल ?
जेकरा पोसलौं खून सँ
पाललहुँ  अपन दूध सँ
अपने सुतलहुँ भिजल में
ओकरा  लगेलहुँ करेज सँ |
आई
चारि बर्ख सँ भेटल नहि
रहि रहल अछि परदेश
अपन  कनियाँ सँग
बिसरि गेल बिधवा माय कए
आई अकस्मात माय यादि  एलैह
ई सुन्दर चिट्ठी (कार्ड) पठेलक
मुदा की लिखल ?
'हैप्पी मदर डे'
बड्ड पैघ शांस लैत
हुनक मन आगु बाजल
जखन मदरे नहि हैप्पी
त' कोना
मदर डे हैप्पी
त' कोना मदर डे हैप्पी ?

जगदानन्द झा 'मनु'


रविवार, 25 मार्च 2012

कविता

एक दिन हमहूँ मरब


एक दिन हमहूँ मरब
दुनियाँ कए सुख-दुख छोइर कए
निश्चिन्त हेवा हेतु
देखै हेतु दुनियाँ में अपन प्रतिमिम्ब
कए ख़ुशी होइए कए दुखी होइए
एक दिन हमहूँ मरब
देखै लेल समाज में
हमर की स्थान छल
देखै लेल किनका ह्रदय में
हमर की स्थान छल

एक दिन हमहूँ मरब
करए लेल अपन पापक हिसाब
हमर पाप सँ कए कुपित छल
कए क्रोधित छल
कए द्रविल-चिंतित छल
कए खुसी छल
कए दुखी-व्यथित छल

एक दिन हमहूँ मरब
परखै हेतु अपन ह्रदय
अपन स्नेही-स्वजनक ह्रदय
अपन मितक ह्रदय
अपन अमितक ह्रदय
*** जगदानंद झा 'मनु'
-------------------------------------------------------------

रविवार, 26 फ़रवरी 2012

गजल-जगदानंद झा 'मनु'

कहलन्हि ओ मंदीर में, नहि पिबू एतए शराब
कोनठाम घर हुनक नहि, पिबू जतए शराब

इ नहि अछि खराप, बदनाम एकरा केने अछि
ओ की बुझत, भेटलै नहि जेकरा कतए शराब

मरलाबादो हम नहि पियासल जाएब स्वर्ग में
जाएब जतए सदिखन भेटए ओतए शराब

मारा-मारि भs रहल अछि जाति-पातिक नाम पर
मेल देखक हुए तs देखू भेटए जतए शराब

सब गोटे कए निमंत्रण सस्नेह मनु दैत अछि
आबि जाए-जाउ सबमिल पियब एतए शराब
*** जगदानन्द झा 'मनु'

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

गीत -जगदानंद झा 'मनु'

भोलेबाबा हौ
खोलबअ केखन अपन द्वार ) -२

हम दुखिया जन्मे कए दुखल
एलहुँ तोहरे द्वार
भोलेबाबा हो - - - - - अपन द्वार

तन दुखिया अछि मन अछि दुखिया
दुखिए जन्म हमार
सुनि महिमां भोले एलहुँ तोरे द्वारे
करबअ केखन हमर उद्धार
भोलेबाबा हो - - - - - अपन द्वार

मुनलह तु अपन नयना
मुनलह हमर कपार
एलहुँ भटकैत,भटकैत तोरे द्वारे
मुनलह किएक अपन केबार

भोलेबाबा हो - - - - - अपन द्वार ) -२

***जगदानन्द झा 'मनु'

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012

लेख : मिथिलामे जाति-पाति

ई मात्र विडंबना कहु वा कोनो अभिशाप, जे राजनैतिक आजादी भेटलाक ६५ वर्ष बादो हम मिथिलाबासी अपन सोचकेँ जाति-पातिसँ ऊपर नै उठा पाबि रहल छी |
मात्र राजनैतिक आजादी ऐ कारणे जे राजनैतिक रूपसँ हम स्वतन्त्र छी परञ्च आर्थिक रूप सँ हम एखनो पराधीन छी | आर्थिक पराधीनता | अर्थात हम अपन इच्छानुसार खर्च नहि कय सकै छी, मने धनक अभाब | हमर मोन होइए अपन बच्चा कए कॉन्वेंट स्कूल मे पढाबी मुदा नहि पढ़ा सकै छी, इ थिक आर्थिक पराधीनता | हमर मोन होइए नीक मकान मे रही मुदा नहि किन सकै छी, इ थिक आर्थिक पराधीनता | हमर मोन होइए हमरो लग मोटर साईकिल, कार हुए, हमरो कनियाँ-बच्चा नीक कपड़ा पहिरथि मुदा नहि, इ थिक आर्थिक पराधीनता |
स्वाधीनता कए ६५ वर्ष बादो आर्थिक पराधीनता किएक ?
की हमरा लग बिद्या कम अछि ?
की हम कोनो राजनेता नहि बनेलहुँ ?
की हम प्राकृतिक रूपेण उपेक्षित छी ?
उपरोक्त सब बात गलती अछि | विद्या मे हम केकरो सँ कम नहि छी | राजनीती कए खेती अपने खेत मे होइए | प्राकृतिक कृपा अपन धरती पर पूर्ण रूपेण अछि |
तखन किएक ? किएक हम स्वाधीनता कए ६५ वर्ष बादो, आर्थिक पराधीनताक जीबन जिबैक लेल बेबस छी |
एखनो बच्चा कए चोकलेट नहि आनि हम कहैत छीयै, दाँत खराप भय जेतौ | कमी चोकलेट मे नहि, कमी हमर जेबी मे अछि |
आ इ आर्थिक पराधीनताक एक मात्र कारन अछि, हम मिथिला बासिक सोचब तरीका |आजुक युग मे जहिखन मनुख चान-तारा पर अपन पैर राखि चुकल अछि, हम मिथिलाबासी एखन तक जाति-पाति कए सोचि सँ ऊपर उठै हेतु तैयार नहि छी |
बाभन-सोलकन्ह कए नाम पर बिबाद | अगरा-पिछरा कए नाम पर बिबाद | ऊँच-नीच कए नाम पर बिबाद |
कोनो काज कए लय क आगु बढ़ू, जेकरा नापसन्द भेल, जाति-पाति कए नाम पर बबाल खड़ा कय देत | आ इ कोनो अशिक्षित नहि बहुत पढ़ल-लिखल वर्गों सँ नहि दूर भय रहल अछि | शिक्षित माननीयव्यक्ति सब चाहे कोनो जातिक हुअए, अपन-अपन जाति कए झंडा लय कऽ आगु आबि जाइत छथि |
यदि हम स्वयं व अपन मिथिला समाज कए विकसित व विकासशील देखए चाहै छी त जाति-पाति कए झंझट सँ निकलि क एक जुट भय आगु बढ़य परत |
एक संगे चलै मे मतभेद स्वभाबिक छै आ ओकरा दुर केनाई निदान्त आबश्यक छै |मुदा ओई मतभेद मे जाति कए बिच मे नहि आनि क व्यक्तिगत आलोचना, समालोचनाकरबाचाहि |
की कोनो गोट सफल व्यक्ति कए ओकर जाति कए नाम सँ जानल जाई छै ? नै, त सफलता कए सीढ़ी पर चलै लेल जाति-पातिक सहारा किएक |
इ जाति-पातिक रस्ता किछु मुठी भरि राजनेताक चालि छैन | हुनकर बात मानि त हम सब अपन विकास छोरि जाति-पाति मे लरैत रहि आ ओ दुस्त राज करैत हमरा सब कए सोधैत रहत |
लेख -जगदानंद झा 'मनु'
('विदेह' १०० म अंक १५ फरबरी २०१२, में प्रकाशित)