dahej mukt mithila

(एकमात्र संकल्‍प ध्‍यान मे-मिथिला राज्‍य हो संविधान मे) अप्पन गाम घरक ढंग ,अप्पन रहन - सहन के संग,अप्पन गाम-अप्पन बात में अपनेक सब के स्वागत अछि!अपन गाम -अपन घरअप्पन ज्ञान आ अप्पन संस्कारक सँग किछु कहबाक एकटा छोटछिन प्रयास अछि! हरेक मिथिला वाशी ईहा कहैत अछि... छी मैथिल मिथिला करे शंतान, जत्य रही ओ छी मिथिले धाम, याद रखु बस अप्पन गाम - अप्पन बात ,अप्पन मान " जय मैथिल जय मिथिला धाम" "स्वर्ग सं सुन्दर अपन गाम" E-mail: apangaamghar@gmail.com,madankumarthakur@gmail.com mo-9312460150

रविवार, 22 अक्तूबर 2017

छैठ


 || छैठ ||  

लू  सजि  सखी घाट लय  ढाकी  
 छैठक     कोसिया          कुरवार  | 
सजल अछि झुण्डक झुण्ड कतार 
कोकिल     कण्डे  सुमधुर    वाणी  
छैठिक    गीत  गाबैथ  मिथिलानी 
नव    अँचार    पर  नाचय   नटुआ 
घुँघरु           के            झनकार || 
                        सजल  अछि -------
जेहन जिनकअछी कबूला पाती 
घाटे  भरल   तेहन  अछि   पाँती 
अस्सी  बरखक  बुढ़ियो  जल में  
कोनियाँ        लेने           ठार  ||  
                     सजल  अछि ---------
ठकु   आ  भुसबा     लड़ू     पेडा 
पान   फूल    फल   पीयर   केरा 
हाथी  ऊपर सजल अछि  दीया 
ढाकी        में         कुसियार  ||  
                     सजल  अछि -------
हे    दिनकर , हे     राणा    मैया  
हमर  कियो  नञि  नाव  खेबैया 
बीच    भवँर   में उबडूब    जीवन 
अहिं        "रमणक "   पतवार  || 
             सजल  अछि -----
 चलू  सजि  ---छैठक  कोसिया ---
                       सजल  अछि -------

रचित - 
रेवती रमण झा "रमण "

शुक्रवार, 20 अक्तूबर 2017

भ्रात - दुतिया

                       
                        ||     भ्रात- दुतिया   ||
                       


  उठि अन्हरौखे   आँगना   नीपलिअई
सब भरदुतिया के विध ओरिएलिअई

भैया अहन कठोर कीय भेलिअई यौ
नै         एलिअई          यौ  ।।
                                  भैया........
मंगितौ  ने  साड़ी,  ने  मंगितौ रुपैया
अबितौ, नयन भरि देखितौ यौ भैया

महल  बुझै  छी, ई  टुटली मरैया के
की    जानि   आहाँ  डेरेलिअई  यौ
नै   एलिअई यौ       ।।              
                                भैया..........

कत  सिनेहे  सॅ  भानस   केलिअई
छाल्ही भरल दूध छाँछ पौरलिअइ
तरल परोड़ , तरल पात कौआ     
तिलकोरो आहाँ लय तरलिअइ यौ
नै एलिअइ यौ।।                      
                              भैया..............

भरि पोख कानि-कानि नोरे नेराओल
नहिरा वियोग कुदिन-दिन गाओल   
उलहन भरैया ननदि सौतिनियाँ।     
दियौरो के ताना सूनलिअई यौ।      
नै एलिअइ यौ।।                         
                         भैया..............

किरण डूबैत धरि बाटे जोहलिअइ
     सरिसो के फूल जेकाँ लोटि खसलिअइ
"रमण" मलान भेलौ यौ भैया          
       माय बिनु नैहर बुझलिअइ यौ              
नै एलिअइ यौ।।                       
                             भैया...........      

रचनाकार


            
रेवती रमण झा " रमण "
गाम- जोगियारा पतोंर दरभंगा ।

फोन - 09997313751.
                         
                   



                       

बुधवार, 18 अक्तूबर 2017

दीयावाती

|| दीयावाती ||

मनुहारी       अति    दिव्य 
सघन  वर  दीपक माला  | 
बाल     वृन्द  बहु  ललित 
चारु    चित चंचल बाला || 
आयल  उतरि  अपवर्ग धरा 
रे, चित   चकित चहुँ ओर  | 
फुल झरी झरि रहल लुभावन  
मन       आनंन्द    विभोर  || 
हुक्का   लोली  बीचे  अड़िपन 
 चमकि  उठल  अच्छी अंगना | 
 मृगनयनी  चहुँ चारु दीया लय 
रून - झुन   बाजल  कंगना || 
सिद्धि  विनायक मंगल दाता  
भक्ति    भाव       स्वीकारु  | 
अन - धन  देवी लक्ष्मी मैया 
"रमणक " दोष  बिसारू || 
लेखक - 
रेवती रमण  झा "रमण" 


मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

दियाबाती गीत

|| दियाबाती  गीत ||   

मंगल    दीप     चहूँ   दिस   साजल 
पग -   पग        पर       अभिराम  | 
चौदह     वरस    बनवास  बिताकय 
आइ      एला       मोर      राम - - || 
                 देखू   आइ  एला --- 

दीपहि      दीप     कतारे      लागल  
चट- दय    जेना   अन्हरिया   भागल 
  जगल जन - जन , पुलकित अछिमन  
 सभतरि         देखू        सुख   - धाम | 
देखू     एला     लखन    सीया    राम  || 
                   देखू  आइ  एला --- 
अड़िपन  उपर   कलश   शुभ  साजल 
ढ़ोल   मृदंग     ख़ुशी    के       बाजल  
 मंगल   गीत   सखी   मिलि   गाओल 
मुदित          अयोध्या            धाम  | 
देखू      एला   लखन  सिया     राम || 
       देखू  आइ  एला --- 
सब       शोक       संतापे       ससरल 
हास्य    विनोदे    सभतरि     पसरल 
"रमण "   मुदित मन नाचय  पुलकित 
शोभा        निरखि              ललाम  | 
देखू      एला   लखन  सिया     राम || 
                    देखू  आइ  एला --- 
रचित -
रेवती रमण झा "रमण "

गुरुवार, 12 अक्तूबर 2017

दियावाती

|| दियावाती || 


चारूकात  चकमक  दीप  जरैया 
जहिना      पसरल    भोर   रे  | 
लक्ष्मी ठारि हँसै छथि  खल-खल 
देखू     अंगना     मोर       रे  || 
पसरल  दीया   कतारे  सभतरि 
परहित    काज   करैया     यौ | 
अपन     गाते  सतत   जराकय 
जग   में  ज्योति  भरैया   यौ || 
अधम - अन्हरिया भागल चटदय 
धरमक    भरल      इजोर     रे  || 
                       लक्ष्मी  ठारि--  देखू   अंगना --
नीपल   आँगन  ,अड़िपन ढोरल 
चौमुख बारि कलश पर साजल  | 
 छितरल  चहुँ दिश  आमक पल्लव 
सिन्दूर    ठोप  पिठारे   लागल  || 
आँगन  अनुपम रचि  मिथिलानी 
लाले      पहिर     पटोर          रे || 
                   लक्ष्मी ठारि-- देखू   अंगना --
एक  दंत   मुख  वक्रतुण्ड  छवि  
गौरी      नन्दन      आबू      ने  | 
दुख    दारिद्रक    हारणी   हे  माँ 
ममता    आबि    देखाबू       ने  || 
अति आनंदक लहरि में टपटप देखल 
"रमणक "    आँखि   में  नोर   रे ||
                          लक्ष्मी ठारि-- देखू   अंगना --
रचित - 

रेवती रमण झा " रमण" 

सोमवार, 2 अक्तूबर 2017

दिल्ली में सभागाछी (वर-बधु परिचय सम्मेलन)

दिल्ली में सभागाछी (वर-बधु परिचय सम्मेलन)
( पंजीकरण केर अंतिम तिथि : 05 अक्टूबर)
विवाह योग्य लड़का आ लड़की के अभिभावक के लेल योग्य वर आ बधु के चयन सभ स' कठिन काज अछि। एहि समस्याक समाधान हेतु 
दिल्ली में अभूतपूर्व ऐतिहासिक कार्यक्रम के आयोजन कायल जा रहल अछि , जाहि में अभिभावक योग्यतानुसार सरलता आ सुगमता स' वर आ वधू के चयन क' सकताह ।
कार्यक्रम में सम्मिलित हेबाक लेल विवाह योग्य संभावित वर आ वधू के परिचय , बॉयोडाटा भेजू । हजारों के संख्या में उपलब्ध 'कथा' में अपना उम्मीदवार लेल योग्य कथा के चयन करू । 05 नवंबर के दिल्ली के हॉज खास क्षेत्र में स्थित 'श्रीफोर्ट सभागार' में आधुनिक सभागाछी में उपस्थित अभिभावक , वर , वधू स' आमने सामने बातचीत करू आ योग्य एवं सफल जोड़ी बनेबाक लेल आगू बढू ।
समस्त मैथिल भाई बन्धु , सखी बहिनपा स' अनुरोध जे एहि महान सामाजिक कार्य के लेल योग्य वर-बधु के बॉयोडाटा तुरंत पठाऊ । परिचय मेल स' भेज सकय छी । सीधा वेबसाइट पर अपलोड क' सकय छी । WhatsApp क' सकयत छी । कोनों प्रकारक जानकारी के लेल फोन क' सकय छी ।
पोस्ट के शेयर अवश्य करी । एहि महान सामाजिक कार्य में हर एक मैथिल स' सहयोग अपेक्षित ।
सुनीत ठाकुर ,
कार्यकारिणी सदस्य, मैथिल समन्वय समिति, दिल्ली । संपर्क सूत्र : 8700615846, 9711117728.
WhatsApp: 9711117728
मुंबई टोलफ्री नं: 18001202714
E-mail: mssmaithil2017@gmail.com
matrimony@maithil.org
Website:www.matrimony.maithil.org

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

देश की पुकार

देश की पुकार 

भारत माता  की बॅटवारा है जिनकी अभिलाषा में 
वो समझेंगे अर्जुन  की गांडीव धर्म की भाषा में। 
फूल अमन के नहीं खिलते, कायरता के माटी में 
नेहरू जी के श्वेत कबूतर मरे पड़े है घाटी में।  
दिल्ली वालो!अपने मन को बुद्ध करो या कुद्ध करो 
काश्मीर को दान करो या गद्दारो से युद्ध करो। 

जेल भरे हम क्यों बैठे है आदमखोर दरिंदो से 
आजादी का दिल घायल है जिनके गोरखधंधो से।  
घाटी में आतंकवाद का कारक बने हुए है जो 
बच्चों की मुस्कानो का संहारक बने हुए है जो। 
उन जहरीली नागों को भी दूध पिलाती है दिल्ली 
मेहमानो जैसी चिकेन बिरियानी खिलाती है दिल्ली। 

जिनके कारण पूरी घाटी जली दुल्हन सी लगती है 
पूनम वाली रात चांदनी,  चंदग्रहण सी लगती है। 
जिनके कारण माँ की बिंदी  दाग दिखाई देती है 
वैष्णो देवी माँ के घर में आग दिखाई देती है। 
उनके पैर बेड़ी जकड़े जाने में देरी क्यूँ है ?
 उनके फन पर ऐड़ी रगड़े जाने में देरी क्यूँ है ?

काश्मीर में एक विदेशी देश दिखाई देता है 
संविधान को ठुकराता परवेज दिखाई देता है। 
वे घाटी में भारत के झंडो को रोज जलाते है 
 सेना पर हमला करते है, खुनी फाग मनाते है। 
हम दिल्ली की ख़ामोशी पर शर्मिदा रह  जाते है 
'भारत  मुर्दाबाद' बोलकर वो जिन्दा कैसे रह जाते है।  
सेना पर पत्थरबाजो  को कोई इतना समझा दो 
ये गाँधी के गाल नहीं है कोई इतना बतला दो। 
दिल्ली वालो! सेना को भी कुछ निर्णय ले लेने दो 
एक बार पत्थर का उत्तर गोली से दे देने दो। 

जब हत्यारे महिमामंडित होते हो, कश्मीर की गलियों में 
शिमला समझौता जलता हो, बंदूकों की नलियों में। 
तो केवल आवश्यकता  है हिम्मत की, ख़ुद्दारी की 
दिल्ली केवल दो  दिन की मोहलत दे दे  तैयारी की। 
 सेना को आदेश थमा दो, घाटी देर नहीं होगी 
जहाँ तिरंगा नहीं मिलेगा, उनकी खैर नहीं होगी। 

अब तो वक्त बदलना सीखो, डरते-डरते जीने का 
दुनिया को अहसास कराओ, छप्पन इंची सीने का। 
राजमहलों के आचरणों की गंध हवा में जाती है 
राजा अगर कायर हो तो बिल्ली भी सिंहो को धमकाती है। 

सैनिक आने प्राण गवाँकर, देश बड़ा कर जाता है 
बलिदानों की बुनियादों पर राष्ट्र खड़ा कर जाता है। 
 जिनको माँ की बलिदानी  और बेटो से प्यार नहीं होगा 
उन्हें तिरंगे को लहराने का अधिकार नहीं होगा। 

भारत एक अखंड राष्ट्र है, सवा सौ करोड़ की ताकत है
कोई हम पर आँख उठा ले, किसकी भला हिमाकत है। 
धरती, अम्बर और समंदर को, यह भाषा समझा दो 
 दुनिया के हर पंच सिकंदर को, यह भाषा समझा दो। 
अब खंडित भारत माँ की तस्वीर नहीं होने वाली 
कश्मीर किसी के अब्बा की जागीर नहीं होने वाली। 


सौजन्य से :-

चन्दन झा 
















शनिवार, 9 सितंबर 2017

हनुमान जी के गीत

हनुमान जी के गीत 
मैथिलि हनुमान चालीसा से 



सुनलउ    सब   पर    ध्यान    धरैछी 
यौ  कपि , हमर ने सुधि  अहाँ  लेलो  | 
क्रन्दन     करि -  करि  केसरी  नंदन 
 निसदिन      नोर      नहय      लऊ ||  
                   सुनलउ - --यौ  कपि--
करुणाकर     कपि   दया  के  सागर 
सबहक़        मुहें        सुनै       छी  | 
नयन   निहारैत    वयस  बीत  गेल 
किऐ    नञि    अहाँ   जनै     छी   || 
सबहक  काज  दौडि   कय   कयलहुँ 
हमर       बिसरि     किय      गेलौ  
               सुनलउ - -- यौ  कपि--
केहन   कठोर   बनल   बैसल   छी 
बुझि      कउ      सब      अंजान  | 
की  हम  दास  अहाँ   के  नञि  छी 
  अतबे          कहु         हनुमान   ||    
पवन       पूत  , हे   गुण   निधान 
हम     कते      निहोरा    कयलौं  
            सुनलउ - --  यौ  कपि--
शंकर   सुवन हे   गगन   विहारी  
फांदि       गेलौ    अहाँ      लंका | 
विद्यासागर  ,  बुधि   के   आगर 
  सभतरि      बाजल            डंका || 
"रमण " व्याथा चित  उझलि देलऊ 
अहाँ     तैयो    नञि      पतिएलो  || 
 सुनलउ - -- यौ  कपि--
रचित -
रेवती रमण झा "रमण "

बुधवार, 6 सितंबर 2017

पितृ तर्पण विधि:

  तर्पण मन्त्र -TARPAN MANTRAS

आवाहन: दोनों हाथों की अनामिका (छोटी तथा बड़ी उँगलियों के बीच की उंगली) में कुश (एक प्रकार की घास) की पवित्री (उंगली में लपेटकर दोनों सिरे ऐंठकर अंगूठी की तरह छल्ला) पहनकर, बाएं कंधे पर सफेद वस्त्र डालकर  दोनों हाथ जोड़कर अपने पूर्वजों को निम्न मन्त्र से आमंत्रित करें 

'ॐ आगच्छन्तु मे पितर एवं ग्रहन्तु जलान्जलिम'  
ॐ हे पितरों! पधारिये तथा जलांजलि ग्रहण कीजिए।  

तर्पण: जल अर्पित करें 
निम्न में से प्रत्येक को 3 बार किसी पवित्र नदी, तालाब, झील या अन्य स्रोत (गंगा / नर्मदा जल पवित्रतम माने गए हैं) के शुद्ध जल में थोडा सा दूध, तिल तथा जावा मिला कर जलांजलि अर्पित करें। 

पिता हेतु  --

(गोत्र नाम) गोत्रे अस्मतपिता पिता का नाम शर्मा वसुरूपस्त्तृप्यतमिदं तिलोदकम (गंगा/नर्मदा जलं वा) तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः तस्मै स्वधा नमः।
------. गोत्र के मेरे पिता श्री वसुरूप में तिल तथा पवित्र जल ग्रहण कर तृप्त हों।  
तस्मै स्वधा नमः तस्मै स्वधा नमः तस्मै स्वधा नमः।

उक्त में अस्मत्पिता के स्थान पर अस्मत्पितामह पढ़ें  --

पिता के नाम के स्थान पर पितामां का नाम लें ----
माता हेतु  तर्पण  - 
(गोत्र नाम) गोत्रे अस्मन्माता माता का नाम देवी वसुरूपास्त्तृप्यतमिदं तिलोदकम (गंगा/नर्मदा जलं वा) 
तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः तस्मै स्वधा नमः।
 ........... गोत्र की मेरी माता श्रीमती ....... देवी वसुरूप में तिल तथा पवित्र जल ग्रहण कर तृप्त हों। तस्मै स्वधा नमः तस्मै स्वधा नमः तस्मै स्वधा नमः। 
निस्संदेह मन्त्र श्रद्धा अभिव्यक्ति का श्रेष्ठ माध्यम हैं किन्तु भावना, सम्मान तथा अनुभूति अन्यतम हैं।

जलांजलि पूर्व दिशा में 16 बार, उत्तर दिशा में 7 बार तथा दक्षिण दिशा में 14 बार अर्पित करें 

______________________________________________________________________________ 
संक्षिप्त पितृ तर्पण विधि:
 पितरोंका तर्पण करनेके पूर्व इस मन्त्र से हाथ जोडकर प्रथम उनका आवाहन करे -
ॐ आगच्छन्तु मे पितर इमं गृह्णन्तु जलान्जलिम ।

अब तिलके साथ तीन-तीन जलान्जलियां दें -
(पिता के लिये)
अमुकगोत्रः अस्मत्पिता अमुक (नाम) शर्मा वसुरूपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं (गंगाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः ।
(माता के लिये)
अमुकगोत्रा अस्मन्माता अमुकी (नाम) देवी वसुरूपा तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्यै स्वधा नमः, तस्यै स्वधा नमः, तस्यै स्वधा नमः ।
जलांजलि पूर्व दिशा में 16 बार, उत्तर दिशा में 7 बार तथा दक्षिण दिशा में 14 बार अर्पित करें 

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

हनुमान जी के आरती

  (हनुमंत पचीसी अहि  लिंक  से पढू आ सुनू )
https://apangaamapanbat.blogspot.in/2017/07/blog-post.html


 हनुमान जी के आरती  

बजरंगबली         के      आरती 
आइ       उतारू     ध्यान    सँ  | 
नञि  बुझलक दुख  हमर कियो 
जे , आइ   कहब   हनुमान सँ  || 
   बजरंगबली के  -- नञि  बुझलक --
 टरल बिकट वर - वर  पथ -कंटक 
                               दया  दृष्टि  जेहि  देलों  यों  | 
                               रघुनन्दन  दुख  भंजन के दुख 
                               काज सुगम  सँ  कयलौ  यौ  || 
                               जा पताल  अहिरावण मारल 
                                बज्र गदा के वान सँ -
                               बजरंगबली के  -- नञि  बुझलक --
                               लखनक प्राणे , पलटि  आनि कय 
                                राम हीया  हुलसइलौ यौ  | 
                                कालक  गाले  जनक  नंदनी 
                                लंका   जाय   छोरयलौं  यौ  || 
                              जहिना  बीसभुज  के निपटयलों 
                               अपनेही बुधि  बल ज्ञान  सँ || 
                               बजरंगबली के  -- नञि  बुझलक --
                               ज्ञान ध्यान रहि , मृत जीवन सन 
                               संत विभीषन छल नरक तल में  | 
                               लंका के  ओ  राजा  बनि  गेल 
                               अहाँक दया सं एक पल में || 
                              "रमणक " काज  सुतारु  ओहिना 
                               अपन कृपा  वरदान सँ  || 
                               बजरंगबली के  -- नञि  बुझलक --
                                         रचित - 
                               रेवती रमण झा "रमण "

सोमवार, 4 सितंबर 2017

हनुमान जी के आरती

 आरती      उतारी   
  यौ  अंजनि के लाला  | 
   राम   नाम  अमृत के 
पिवि  गेलौ प्याला | | 
     आरती  उतारी -- यौ  अंजनि ---
लाल देह लाल ध्वजा , 
लाले   लंगोटा 
लाल वदन  हाथ अछि ,
 लाल अछि  सोंटा 
लाले नयन लाल -
 तिलक गले माला  || 
आरती  उतारी -- यौ  अंजनि ---
दीन  हितकारी 
हे पापक निकंदन 
पवन पूत राम दूत 
केसरिक  नंदन 
अहाँ  सनक  कियो नञि  
एकौ  मतवाला || 
आरती  उतारी -- यौ  अंजनि ---
शंकर सुवन कपि 
चंचल  चारु 
"रमण  " सरण में , यौ 
नयना  निहारु 
कान्धे  जनेऊ  मुंज 
केश घुँघराला  ||
 आरती  उतारी -- यौ  अंजनि ---

रचित - रेवती रमण झा '' रमण "

http://apangaamapanbat.blogspot.in/2016/11/blog-post.html

मैथिलि हनुमान चालीसा अही लिंक सं पढू आ सुनु 

शुक्रवार, 25 अगस्त 2017

चौरचन

पावनि-तिहार: लोक पावनि चौरचन 

(प्रो. पवन कुमार मिश्र)
 

   
मस्त विज्ञजन केँ विदित अछि जे समग्र विश्‍व मे भारत ज्ञान विज्ञान सँ महान तथा जगत्‌ गुरु कऽ उपाधि सँ मण्डित अछि । एतवे टा नहि भारत पूर्व काल मे "सोनाक चिड़िया" मानल जाइत छल एवं ब्रह्माण्डक परम शक्‍ति छल। भूलोकक कोन कथा अन्तरिक्ष लोक मे एतौका राजा शान्ति स्थापित करऽ लेल अपन भुज शक्‍तिक उपयोग करैत छलाह । एकर साक्ष्य अपन पौराणिक कथा ऐतिह्‌य प्रमाणक रुप मे स्थापित अछि ।

      हमर पूर्वज जे आई ऋषि महर्षि नाम सँ जानल जायत छथि हुनक अनुसंधानपरक वेदान्त (उपनिषद्‍) एखनो अकाट्‍य अछि । हुनक कहब छनि काल (समय) एक अछि, अखण्ड अछि, व्यापक (सब ठाम व्याप्त) अछि । महाकवि कालिदास अभिज्ञान शकुन्तलाक मंगलाचरण मे "ये द्वे कालं विधतः" एहि वाक्य द्वारा ऋषि मत केँ स्थापित करैत छथि । जकर भाव अछि व्यवहारिक जगत्‌ मे समयक विभाग सूर्य आओर चन्द्रमा सँ होइछ ।

‘प्रश्नोपनिषद्‍’ मे ऋषिक मतानुसार परम सूक्ष्म तत्त्व "आत्मा" सूर्य छथि तथा सूक्ष्म गन्धादि स्थूल पृथ्वी आदि प्रकृति चन्द्र छथि । एहि दूनूक संयोग सँ जड़ चेतन केँ उत्पत्ति पालन आओर संहार होइछ ।

    आत्यिमिक बौद्धिक उन्‍नति हेतु सूर्यक उपासना कैल जाइछ । जाहि सँ ज्ञान प्राप्त होइछ । ज्ञान छोट ओ पैघ नहि होइछ अपितु सब काल मे समान रहैछ एवं सतत ओ पूर्णताक बोध करवैछ । मुक्‍तिक साधन ज्ञान, आओर मुक्‍त पुरुष केँ साध्यो ज्ञाने अछि । सूर्य सदा सर्वदा एक समान रहैछ । ठीक एकरे विपरीत चन्द्र घटैत बढ़ैत रहैछ । ओ एक कलाक वृद्धि करैत शुक्ल पक्ष मे पूर्ण आओर एक-एक कलाक ह्रास करैत कृष्ण पक्ष मे विलीन भऽ जाय्त छाथि । सम्पत्सर रुप (समय) जे परमेश्‍वर जिनक प्रकृति रुप जे प्रतीक चन्द्र हुनक शुक्ल पक्ष रुप जे विभाग ओ प्राण कहवैछ प्राणक अर्थ भोक्‍ता । कृष्ण पक्ष भोग्य (क्षरण शील वस्तु) ।

     विश्‍वक समस्त ज्योतिषी लोकनि जातकक जन्मपत्री मे सूर्य आओर चन्द्र केँ वलावल केँ अनुसार जातक केर आत्मबल तथा धनधान्य समृद्धिक विचार करैत छथिन्ह । वैज्ञानिक लोकनि अपना शोध मे पओलैन जे चन्द्रमाक पूर्णता आओर ह्रास्क प्रभाव विक्षिप्त (पागल) क विशिष्टता पर पड़ैछ । भारतीय दार्शनिक मनीषी "कोकं कस्त्वं कुत आयातः, का मे जनजी को तात:" अर्थात्‌ हम के छी, अहाँ के छी हमर माता के छथि तथा हमर पिता के छथि इत्यादि प्रश्नक उत्तर मे प्रत्यक्ष सूर्य के पिता (पुरुष) आओर चन्द्रमा के माता (स्त्री) क कल्पना कऽ अनवस्था दोष सं बचैत छथि ।

     अपना देश मे खास कऽ हिन्दू समाज मे जे अवतारवादक कल्पना अछि ताहि मे सूर्य आओर चन्द्रक पूर्णावतार मे वर्णन व्यास्क पिता महर्षि पराशर अपन प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘वृद्ध पराशर’ मे करैत छथि । "रामोऽवतारः सूर्यस्य चन्द्रस्य यदुनायकः" सृ. क्र. २६ अर्थात्‌ सूर्य राम रुप मे आओर चन्द्र कृष्ण रुप मे अवतार ग्रहण केलन्हि ।

       ई दुनू युग पुरुष भारतीय संस्कृति-सभ्यता, आचार-विचार तथा जीवन दर्शनक मेरुद्ण्ड छथि आदर्श छथि । पौराणिक ग्रन्थ तथा काव्य ग्रन्थ केँ मान्य नायक छथि । कवि, कोविद, आलोचक, सभ्य विद्धत्‌ समाजक आदर्श छथि । सामान्यजन हुनका चरित केँ अपना जीवन मे उतारि ऐहिक जीवन के सुखी कऽ परलोक केँ सुन्दर बनाबऽ लेल प्रयत्‍नशील होईत छथि ।

      एहि संसार मे दू प्रकारक मनुष्य वास करै छथि । एकटा प्रवृत्ति मार्गी (प्रेय मार्गी)- गृहस्थ दोसर निवृत्ति मार्गी योगी, सन्यासी । प्रवृत्ति मार्गी-गृहस्थ काञ्चन काया कामिनी चन्द्रमुखी प्रिया धर्मपत्‍नी सँ घर मे स्वर्ग सुख सँ उत्तम सुखक अनुभव करै छथि । ओहि मे कतहु बाधा होइत छनि तँ नरको सँ बदतर दुःख केँ अनुभव करै छथि ।

  कर्मवादक सिद्धान्तक अनुसार सुख-दुःख सुकर्मक फल अछि ई भारतीय कर्मवादक सिद्धान्त विश्‍वक विद्धान स्वीकार करैत छथि । तकरा सँ छुटकाराक उपाय पूर्वज ऋषि-मुनि सुकर्म (पूजा-पाठ) भक्‍ति आओर ज्ञान सँ सम्वलित भऽ कऽ तदनुसार आचरणक आदेश करैत छथिन्ह ।

हम जे काज नहि केलहुँ ओकरो लेल यदि समाज हमरा दोष दिए, प्रत्यक्ष वा परोक्ष मे हमर निन्दा करय एहि दोष "लोक लाक्षना" क निवारण हेतु भादो शुक्ल पक्षक चतुर्थी चन्द्र के आओर ओहि काल मे गणेशक पूजाक उपदेश अछि ।

हिन्दू समाज मे श्री कृष्ण पूर्णावतार परम ब्रह्म परमेश्‍वर मानल छथि । महर्षि पराशर हुनका चन्द्रसँ अवतीर्ण मानैत छथिन्ह । हुनके सँ सम्बन्धित स्कन्दपुराण मे चन्द्रोपाख्यान शीर्षक सँ कथा वर्णित अछि जे निम्नलिखित अछि ।

    नन्दिकेश्‍वर सनत्कुमार सँ कहैत छथिन्ह हे सनत कुमार ! यदि अहाँ अपन शुभक कामना करैत छी तऽ एकाग्रचित सँ चन्द्रोपाख्यान सुनू । पुरुष होथि वा नारी ओ भाद्र शुक्ल चतुर्थीक चन्द्र पूजा करथि । ताहि सँ हुनका मिथ्या कलंक तथा सब प्रकार केँ विघ्नक नाश हेतैन्ह । सनत्कुमार पुछलिन्ह हे ऋषिवर ! ई व्रत कोना पृथ्वी पर आएल से कहु । नन्दकेश्‍वर बजलाह-ई व्रत सर्व प्रथम जगत केर नाथ श्री कृष्ण पृथ्वी पर कैलाह । सनत्कुमार केँ आश्‍चर्य भेलैन्ह षड गुण ऐश्‍वर्य सं सम्पन्‍न सोलहो कला सँ पूर, सृष्टिक कर्त्ता धर्त्ता, ओ केना लोकनिन्दाक पात्र भेलाह । नन्दीकेश्‍वर कहैत छथिन्ह-हे सनत्कुमार । बलराम आओर कृष्ण वसुदेव क पुत्र भऽ पृथ्वी पर वास केलाह । ओ जरासन्धक भय सँ द्वारिका गेलाह ओतऽ विश्‍वकर्मा द्वारा अपन स्त्रीक लेल सोलह हजार तथा यादव सब केँ लेल छप्पन करोड़ घर केँ निर्माण कऽ वास केलाह । ओहि द्वारिका मे उग्र नाम केर यादव केँ दूटा बेटा छलैन्ह सतजित आओर प्रसेन । सतजित समुद्र तट पर जा अनन्य भक्‍ति सँ सूर्यक घोर तपस्या कऽ हुनका प्रसन्‍न केलाह । प्रसन्‍न सूर्य प्रगट भऽ वरदान माँगूऽ कहलथिन्ह सतजित हुनका सँ स्यमन्तक मणिक याचना कयलन्हि । सूर्य मणि दैत कहलथिन्ह हे सतजित ! एकरा पवित्रता पूर्वक धारण करव, अन्यथा अनिष्ट होएत । सतजित ओ मणि लऽ नगर मे प्रवेश करैत विचारऽ लगलाह ई मणि देखि कृष्ण मांगि नहि लेथि । ओ ई मणि अपन भाई प्रसेन के देलथिन्ह । एक दिन प्रंसेन श्री कृष्ण के संग शिकार खेलऽ लेल जंगल गेलाह । जंगल मे ओ पछुआ गेलाह । सिंह हुनका मारि मणि लऽ क चलल तऽ ओकरा जाम्बवान्‌ भालू मारि देलथिन्ह । जाम्बवान्‌ ओ लऽ अपना वील मे प्रवेश कऽ खेलऽ लेल अपना पुत्र केऽ देलथिन्ह ।

    एम्हर कृष्ण अपना संगी साथीक संग द्वारिका ऐलाह । ओहि समूहक लोक सब प्रसेन केँ नहि देखि बाजय लगलाह जे ई पापी कृष्ण मणिक लोभ सँ प्रसेन केँ मारि देलाह । एहि मिथ्या कलंक सँ कृष्ण व्यथित भऽ चुप्पहि प्रसेनक खोज मे जंगल गेलाह । ओतऽ देखलाह प्रदेन मरल छथि । आगू गेलाह तऽ देखलाह एकटा सिंह मरल अछि आगू गेलाह उत्तर एकटा वील देखलाह । ओहि वील मे प्रवेश केलाह । ओ वील अन्धकारमय छलैक । ओकर दूरी १०० योजन यानि ४०० मील छल । कृष्ण अपना तेज सँ अन्धकार के नाश कऽ जखन अंतिम स्थान पर पहुँचलाह तऽ देखैत छथि खूब मजबूत नीक खूब सुन्दर भवन अछि । ओहि मे खूब सुन्दर पालना पर एकटा बच्चा के दायि झुला रहल छैक बच्चा क आँखिक सामने ओ मणि लटकल छैक दायि गवैत छैक-


सिंहः प्रसेन भयधीत, सिंहो जाम्बवता हतः ।



सुकुमारक ! मा रोदीहि, तब ह्‌येषः स्यमन्तकः ॥

         अर्थात्‌ सिंह प्रसेन केँ मारलाह, सिंह जाम्बवान्‌ सँ मारल गेल, ओ बौआ ! जूनि कानू अहींक ई स्यमन्तक मणि अछि । तखनेहि एक अपूर्व सुन्दरी विधाताक अनुपम सृष्टि युवती ओतऽ ऐलीह । ओ कृष्ण केँ देखि काम-ज्वर सँ व्याकुल भऽ गेलीह । ओ बजलीह-हे कमल नेत्र ! ई मणि अहाँ लियऽ आओर तुरत भागि जाउ । जा धरि हमर पिता जाम्बवान्‌ सुतल छथि । श्री कृष्ण प्रसन्‍न भऽ शंख बजा देलथिन्ह । जाम्बवान्‌ उठैत्मात्र युद्ध कर लगलाह । हुनका दुनुक भयंकर बाहु युद्ध २१ दिन तक चलैत रहलन्हि । एम्हर द्वारिका वासी सात दिन धरि कृष्णक प्रतीक्षा कऽ हुनक प्रेतक्रिया सेहो देलथिन्ह । बाइसम दिन जाम्बवान्‌ ई निश्‍चित कऽ कि ई मानव नहि भऽ सकैत छथि । ई अवश्य परमेश्‍वर छथि । ओ युद्ध छोरि हुनक प्रार्थना केलथिन्ह अ अपन कन्या जाम्बवती के अर्पण कऽ देलथिन्ह । भगवान श्री कृश्न मणि लऽ कऽ जाम्ब्वतीक स्म्ग सभा भवन मे आइव जनताक समक्ष सत्जीत के सादर समर्पित कैलाह । सतजीत प्रसन्‍न भऽ अपन पुत्री सत्यभामा कृष्ण केँ सेवा लेल अर्पण कऽ देलथिन्ह ।

      किछुए दिन मे दुरात्मा शतधन्बा नामक एकटा यादव सत्ताजित केँ मारि ओ मणि लऽ लेलक । सत्यभामा सँ ई समाचार सूनि कृष्ण बलराम केँ कहलथिन्ह-हे भ्राता श्री ! ई मणि हमर योग्य अछि । एकर शतधन्वान लेऽ लेलक । ओकरा पकरु । शतधन्वा ई सूनि ओ मणि अक्रूर कें दऽ देलथिन्ह आओर रथ पर चढ़ि दक्षिण दिशा मे भऽ गेलाह । कृष्ण-बलराम १०० योजन धरि ओकर पांछा मारलाह । ओकरा संग मे मणि नहि देखि बलराम कृष्ण केँ फटकारऽ लगलाह, "हे कपटी कृष्ण ! अहाँ लोभी छी ।" कृष्ण केँ लाखों शपथ खेलोपरान्त ओ शान्त नहि भेलाह तथा विदर्भ देश चलि गेलाह । कृष्ण धूरि केँ जहन द्वारिका एलाह तँ लोक सभ फेर कलंक देबऽ लगलैन्ह । ई कृष्ण मणिक लोभ सँ बलराम एहन शुद्ध भाय के फेज छल द्वारिका सँ बाहर कऽ देलाह । अहि मिथ्या कलंक सँ कृष्ण संतप्त रहऽ लगलाह । अहि बीच नारद (ओहि समयक पत्रकार) त्रिभुवन मे घुमैत कृष्ण सँ मिलक लेल ऐलथिन्ह । चिन्तातुर उदास कृष्ण केँ देखि पुछथिन्ह "हे देवेश ! किएक उदास छी ?" कृष्ण कहलथिन्ह, " हे नारद ! हम वेरि वेरि मिथ्यापवाद सँ पीड़ित भऽ रहल छी ।" नारद कहलथिन्ह, "हे देवेश ! अहाँ निश्‍चिते भादो मासक शुक्ल चतुर्थीक चन्द्र देखने होएव तेँ अपने केँ बेरिबेरि मिथ्या कलंक लगैछ । श्री कृष्ण नारद सँ पूछलथिन्ह, "चन्द्र दर्शन सँ किएक ई दोष लगै छैक ।


      नारद जी कहलथिन्ह, "जे अति प्राचीन काल मे चन्द्रमा गणेश जी सँ अभिशप्त भेलाह, अहाँक जे देखताह हुनको मिथ्या कलंक लगतैन्ह । कृष्ण पूछलथिन्ह, "हे मुनिवर ! गणेश जी किऐक चन्द्रमा केँ शाप देलथिन्ह ।" नारद जी कहलथिन्ह, "हे यदुनन्दन ! एक वेरि ब्रह्मा, विष्णु आओर महेश पत्नीक रुप मे अष्ट सिद्धि आओर नवनिधि के गनेश कें अर्पण कऽ प्रार्थना केयथिन्ह । गनेश प्रसन्न भऽ हुनका तीनू कें सृजन, पालन आओर संहार कार्य निर्विघ्न करु ई आशीर्वाद देलथिन्ह । ताहि काल मे सत्य लोक सँ चन्द्रमा धीरे-धीरे नीचाँ आबि अपन सौन्द्र्य मद सँ चूर भऽ गजवदन कें उपहाल केयथिन्ह । गणेश क्रुद्ध भऽ हुनका शाप देलथिन्ह, - "हे चन्द्र ! अहाँ अपन सुन्दरता सँ नितरा रहल छी । आई सँ जे अहाँ केँ देखताह, हुनका मिथ्या कलंक लगतैन्ह । चन्द्रमा कठोर शाप सँ मलीन भऽ जल मे प्रवेश कऽ गेलाह । देवता लोकनि मे हाहाकार भऽ गेल । ओ सब ब्रह्माक पास गेलथिन्ह । ब्रह्मा कहलथिन्ह अहाँ सब गणेशेक जा केँ विनति करु, उएह उपय वतौताह । सव देवता पूछलन्हि-गणेशक दर्शन कोना होयत । ब्रह्मा वजलाह चतुर्थी तिथि केँ गणेश जी के पूजा करु । सब देवता चन्द्रमा सँ कहलथिन्ह । चन्द्रमा चतुर्थीक गणेश पुजा केलाह । गणेश वाल रुप मे प्रकट भऽ दर्शन देलथिन्ह आओर कहलथिन्ह - चन्द्रमा हम प्रसन्‍न छी वरदान माँगू । चन्द्रमा प्रणाम करैत कहलथिन्ह हे सिद्धि विनायक हम शाप मुक्‍त होई, पाप मुक्‍त होई, सभ हमर दर्शन करैथ । गनेश थ बहलाघ हमर शाप व्यर्थ नहि जायत किन्तु शुक्ल पक्ष मे प्रथम उदित अहाँक दर्शन आओर नमन शुभकर रहत तथा भादोक शुक्ल पक्ष मे चतुर्थीक जे अहाँक दर्शन करताह हुनका लोक लान्छना लगतैह । किन्तु यदि ओ सिंहः प्रसेन भवधीत इत्यादि मन्त्र केँ पढ़ि दर्शन करताह तथा हमर पूजा करताह हुनका ओ दोष नहि लगतैन्ह । श्री कृष्ण नारद सँ प्रेरित भऽ एहिव्रतकेँ अनुष्ठान केलाह । तहन ओ लोक कलंक सँ मुक्‍त भेलाह ।

   

 एहि चौठ तिथि आओर चौठ चन्द्र केँ जनमानस पर एहन प्रभाव पड़ल जे आइयो लोक चौठ तिथि केँ किछु नहि करऽ चाहैत छथि । कवि समाजो अपना काव्य मे चौठक चन्द्रमा नीक रुप मे वर्णन नहि करैत छथि । कवि शिरोमणि तुलसी मानसक सुन्दर काण्ड मे मन्दोदरी-रावण संवाद मे मन्दोदरीक मुख सँ अपन उदगार व्यक्‍त करैत छथि - "तजऊ चौथि के चन्द कि नाई" हे रावण । अहाँ सीता केँ चौठक चन्द्र जकाँ त्याग कऽ दियहु । नहि तो लोक निंदा करवैत अहाँक नाश कऽ देतीह ।
       एतऽ ध्यान देवऽक बात इ अछि जे जाहि चन्द्र केँ हम सब आकाश मे घटैत बढ़ैत देखति छी ओ पुरुष रुप मे एक उत्तम दर्शन भाव लेने अछि । जे एहि लेखक विषय नहि अछि । हमर ऋषि मुनि आओर सभ्य समाजक ई ध्येय अछि, मानव जीवन सुखमय हो आओर हर्ष उल्लास मे हुनक जीवन व्यतीत होन्हि । एहि हेतु अनेक लोक पावनि अपनौलन्हि, जाहि मे आवाल वृद्ध प्रसन्‍न भवऽ केँ परिवार समाज राष्ट्र आओर विश्‍व एक आनन्द रुपी सूत्र मे पीरो अब फल जेकाँ रहथि ।

आवास - आदर्श नगर, समस्तीपुर
सभार : मिथिला अरिपन