dahej mukt mithila

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बुधवार, 26 जुलाई 2017

कश्मीर : समस्या और समाधान



 

भारत माता का बॅटवारा है, जिनकी अभिलाषा में,
वे समझेंगे अर्जुन के गांडीव धर्म की भाषा में। 
फूल अमन के नहीं खिलते, कायरता की माटी में,
नेहरू जी श्वेत कबूतर, मरे हुए है घाटी में। 
हिंदुस्तान वालो, अपने मन को बुद्ध करो या कुद्ध करो,
कश्मीर को दान करो या गद्दारो से युद्ध करो। 

         उपरोक्त पंक्तियाँ वर्षो से कश्मीर समस्या रूपी महामारी से त्रस्त हर एक भारतीय के दुखद दिल की व्यथा कथा है। आजादी के बाद  1951 में जब देश में जनगणना हुई  तब भारत की आबादी करीब छत्तीस करोड़ बताई गयी और 2011 के जनगणना के अनुसार तक़रीबन एक अरब इक्कीस करोड़।  तब से लेकर आज तक कितनी सरकार आई और गयी। बीते ६९ सालो में भारत ने करीब-करीब सभी क्षेत्रो में सर्वांगीण विकास सीढियाँ चढ़ते हुए विश्व की सबसे तेज़ गति से उभरती अर्थव्यवस्था  होने का गौरव प्राप्त किया। परन्तु आजादी के बाद इन बीते ६९ सालो में हर एक भारतीय कश्मीर समस्या को जस का तस देख रहा है। कभी एक कदम आगे तो कभी दो कदम पीछे की तर्ज़ पर। 

      अगर हम कश्मीर समस्या के इतिहास की बात करे तो गुलाम भारत को स्वतंत्र करते समय अंग्रेज़ो ने अपनी घटिया कूटनीति से इस 'सोने की चिड़ियाँ ' कहे जाने देश को टुकड़ो में बाँट दिया- एक भारत, दूसरा पाकिस्तान तथा तीसरा राज्यों की स्वतंत्र रियासतें। ब्रिटिश शासन के हटते ही अन्य रियासतों की तरह कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने भी कश्मीर को स्वतंत्र घोषित कर दिया। 

       कश्मीर में मुसलमान बहुल आबादी होने के कारण पाकिस्तान को लालच आ गया। मौका पाकर काबलाईयो की मदद से पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। कश्मीर नरेश स्वतंत्र रहना थे, मगर पाकिस्तान के आक्रमण से डरकर भारत में शामिल हो गए। इस तरह से कश्मीर की रक्षा करना भारत का नैतिक कर्त्तव्य हो गया। फलतः भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरू हो गया। मामला राष्ट्र संघ में गया।  बाद में सयुंक्त राष्ट्र के मध्यस्तता के बाद युद्ध ख़त्म हुआ।  युद्ध समाप्ति के बाद पाकिस्तान ने कश्मीर में जनमत संग्रह की बात उठाई। भारत ने युद्ध विराम रेखा के आधार पर संधि करके समस्या के निराकरण की बात उठाई थी।  मगर पाकिस्तान ऐसे मानने को तैयार नहीं हुआ।  राष्ट्र संघ में बर्षो तक चर्चा चलती रही।  मगर बाद की चर्चा अंतरराष्ट्रीय गुटबंदी के कारण अधूरी ही रही।  एक तरफ जहाँ भारत को रूस का समर्थन मिलता रहा, वही पाकिस्तान को अमेरिका से लगातार सामरिक सहायता मिलती रही।  इन सभी परिस्तिथियों के बीच पिछले ६९ सालो से कश्मीर की समस्या ज्वलंत बनी हुई है। अभी वर्त्तमान में  कश्मीर के तीन चौथाई भाग पर भारत का और एक चौथाई पर पाकिस्तान का कब्ज़ा है। 

          अब अगर कश्मीर की वर्तमान स्थिति पर चर्चा करे तो भारत के द्वारा लगातार चार युद्ध हार जाने के बादजूद पाकिस्तान के द्वारा फैलाये गए आतंकबाद के कारण आज तक शायद ही कोई ऐसा महीना रहा  भारतीय जवान ने अपनी शहादत ना दी हो या निर्दोष नागरिको ने अपनी जान की कुर्बानी ना दी हो।  पिछले ६९ सालो में भारत ने कश्मीर को चार लाख करोड़ प्रत्यक्ष सहायता के रूप में दिया है ताकि स्वर्ग जैसा  सुन्दर कश्मीर पर्यटन के पटल पर सितारा बनकर उभर सके। कश्मीर के लोगो को रोजगार मिले।  कश्मीर के लोग खुशहाल हो।  लेकिन वही ढाक के तीन पात। कश्मीर में कश्मीरियो के रूप में रह रहे पाकिस्तानियो ने ऐसा अभी तक होने नहीं दिया है। एक बात हम पिछले कई बर्षो से नहीं समझ सके है कि पहाड़ की ढलान पर या तो हम ऊपर चढ़ते है या स्वतः  फिसल जाते है।  ढलान पर यथास्थिति जैसे कोई बात नहीं होती है। कश्मीर के मामले में भी कमोवेश हमारा यही हाल  हो रहा है। हम यथास्थिति बनाये रखने के चक्कर में नीचे फिसलते जा रहे है। आखिर कब तक  हमारे सैनिक एवं निर्दोष नागरिक अपने प्राण की आहुति देते रहेंगे। 
               
      अतीत में झांक कर  नेहरू, शास्त्री और इंदिरा की बात करे तो उन्होंने वक्त रहते पाकिस्तान की गर्दन ठीक से नहीं मरोड़ा वर्ना पाकिस्तान अभी तक अपना फन उठाने की  स्थिति में नहीं होता। क्योंकि सवाल तो अब भी वही है जस के तस। आज पैलेट गन की आड़ लेकर पूरी दुनिया में कहता फिर रहा है की भारत कश्मीरियों पर जुल्म ढा रहा है तथा मिलिट्री के दम पर वह कश्मीर पर अवैध कब्ज़ा कर रखा है। 

      मेरे हिसाब से तो कश्मीर समस्या का समाधान थोड़ा मुश्किल जरूर लेकिन सरल है। जैसा कि साफ़ है कि पाकिस्तान आतंकबाद की आड़ में कश्मीर को जलाने का लगातार यत्न करता रहा है। और इससे ज्यादा उनसे कुछ हो भी नहीं सकता है। अतः हमें रणनीति बनाकर कश्मीर में छुपे कश्मीरियों के भेष में जितने पाकिस्तानी बैठे है, उनका मुकाबला करने के लिए पूर्व सैनिको, कश्मीरी पंडितो को तथा अन्य पर्यटन यात्री के रूप में अन्य देशभक्तो को वह बसाना होगा। कहते है कि शांति का मार्ग युद्ध से होकर जाता है और इसके लिए हमें तैयार होकर वह पूर्ण दबंगई दिखलानी होगी। छद्म कश्मीरियों के नाम पर पाकिस्तानियों को जहन्नुम भेजना होगा। कश्मीरी पंडितो सहित अन्य कश्मीरी नागरिको को यह भरोसा दिलाना होगा कि भारत इतना शक्तिशाली है कि वह उनकी रक्षा कर सकता है। 

        जो भी हो, भारत के लिए कश्मीर जीवन-मरण तथा राष्ट्र प्रतिष्ठा का बिषय है। कश्मीर भारत की धर्मनिरपेक्षता की नीति की कसौटी भी है। अतः  भारत किसी भी मूल्य पर कश्मीर का एक  इंच भूभाग भी छोड़ने को तैयार नहीं होगा। भारत का कश्मीर को लेकर विश्व समुदाय तथा पाकिस्तान को सीधा सन्देश है , जिसे मैं इन पंक्तियो के माध्यम से उल्लेखित करना चाहूंगा। 

भारत एक अखंड राष्ट्र है, सवा सौ करोड़ की ताकत है। 
कोई हम पर आँख उठा ले, किसकी भला हिमाकत है। 
धरती, अम्बर और समंदर को, यह भाषा समझा दो। 
 दुनिया के हर पंच सिकंदर को, यह भाषा समझा दो। 
अब खंडित भारत माँ की तस्वीर नहीं होने वाली। 
कश्मीर किसी के अब्बा की जागीर नहीं होने वाली। 

सौजन्य से :-

चन्दन झा 


शनिवार, 22 जुलाई 2017

काँवर गीत , रचित - रेवती रमण झा "रमण"

|| काँवर गीत || 

रचित -
रेवती रमण झा "रमण" 
मभोला     दिगम्बर  जटा   धारी  | 
 वर अढ़रन  ढ़रन   छथि   त्रिपुरारि  || 
  भरि   गंगाजल    लय   कमरथुआ   | 
 सब कियो मिलि कय  गाबै  नचारी  || 
               बमभोला--- वर अढ़रन --
ऑके  -   धथुरा    भाँगक    गोला  | 
प्रेम  सँ   भोग   लगौलनि   भोला  || 
बाघम्बर     तन   माथे    पे   चंदा  |
कंठ     भुजग   उर   विष   धारी  ||
              बमभोला --- वर अढ़रन ---
झर - झर   झहरय  जटा सँ  गंगा  |
भूत   पिशाच  सब  नाचय   नंगा  ||
सोहे   त्रिशूल  वर  मुण्डक  माला  |
हाथ  मेँ   डमरू  बरदक सवारी  ||
               बमभोला--- वर अढ़रन ---


शनिवार, 8 जुलाई 2017

हनुमंत - पचीसी

|| हनुमंत - पचीसी || 
ग्रह गोचर सं परेसान त  अहि हनुमंत - पचीसी  के ११ बार पाठ जरूर करि --- 

        हनुमान   वंदना  
शील  नेह  निधि , विद्या   वारिध
             काल  कुचक्र  कहाँ  छी  
मार्तण्ड   तम रिपु  सूचि  सागर
           शत दल  स्वक्ष  अहाँ छी
कुण्डल  कणक , सुशोभित काने
         वर कच  कुंचित अनमोल  
अरुण तिलक  भाल  मुख रंजित
            पाँड़डिए   अधर   कपोल
अतुलित बल, अगणित  गुण  गरिमा
         नीति   विज्ञानक    सागर  
कनक   गदा   भुज   बज्र  विराजय 
           आभा   कोटि  प्रभाकर  
लाल लंगोटा , ललित अछि कटी
          उन्नत   उर    अविकारी  
  वर   बिस   भुज  रावणअहिरावण
         सब    पर भयलहुँ  भारी  
दीन    मलीने    पतित  पुकारल
        अपन  जानि  दुख  हेरल  
"रमण " कथा ब्यथा  के बुझित हूँ
        यौ  कपि  किया अवडेरल
-:-
|| दोहा || 
संकट  शोक  निकंदनहि , दुष्ट दलन हनुमान | 
अविलम्बही दुख  दूर करू ,बीच भॅवर में प्राण ||  
|| छंद || 

जन्में   रावणक   चालि    उदंड | 
यतन  कुटिल   मति छल प्रचंड  || 
बसल जकर चित नित पर नारि   | 
जत शिव पुजल,गेल  जग  हारि  || 
रंग - विरंग   चारु     परकोट   | 
गरिमा   राजमहल   केर   छोट || 
बचन  कठोरे    कहल    भवानी | 
लीखल भाल वृथा  नञि   वाणी  || 
|| चौपाइ || 
रेखा       लखन    जखन    सिय  पार  |
वर        विपदा     केर    टूटल   पहार ||
तीरे     तरकस     वर   धनुषही  हाथ   | 
रने -       वने     व्याकुल     रघुनाथ  || 
मन   मदान्ध   मति  गति सूचि राख  | 
नत   सीतेहि, अनुचित   जूनि   भाष  || 
झामरे  -  झुर    नयन    जल  - धार  | 
रचल    केहन   विधि  सीय   लिलार || 
मम   जीवनहि      हे   नाथ    अजूर   | 
नञि    विधि   लिखल   मनोरथ  पुर  || 
पवन    पूत   कपि     नाथे    गोहारि  | 
तोरी     बंदि    लंका    पगु      धारि  || 
रचलक    जेहने     ओहन     कपार  | 
 दसमुख    जीवन     भेल      बेकार  || 
रचि     चतुरानन     सभे     अनुकूल  |
भंग  - अंग  , भेल   डुमरिक   फूल  || 
गालक    जोरगर    करमक    छोट  | 
विपत्ति   काल  संग  नञि  एकगोट || 
हाय   -   हाय    लंका    जरी     गेल  | 
रहलइ      वैह  ,जे    धरमक    भेल  || 
अंजनि    पूत     केशरिक       नंदन  | 
शंकर   सुवन    जगत  दुख   भंजन  || 
अतिमहा     अतिलघु     बहु     रूप  | 
जय    बजरंगी     विकटे    स्वरूप   || 
कोटि     सूर्य    सम    ओज   प्रकाश | 
रोम -  रोम      ग्रह   मंगल     वास  || 
तारावलि     जते     तत     बुधि  ज्ञान |
पूँछे  -  भुजंग      ललित     हनुमान || 
महाकाय        बलमहा       महासुख  | 
महाबाहु       नदमहा       कालमुख  || 
एकानन     कपी    गगन      विहारी  | 
यौ      पंचानन        मंगल      कारी  || 
सप्तानन     कपी    बहु  दुख   मोचन | 
दिव्य   दरश   वर   ब्याकुल   लोचन  || 
रूप     एकादस      बिकटे     विशाल  | 
अहाँ    जतय     के     ठोकत    ताल || 
अगिन     बरुण    यम  इन्द्रहि  जतेक | 
अजर - अमर    वर    देलनि  अनेक ||  
सकल    जानि      हर्षित   सीय    भेल | 
सुदिन    आयल   दुर्दिन    दिन   गेल || 
सपत   गदा   केर   अछि   कपि   राज | 
एहि    निर्वल    केर   करियौ    काज  || 
|| दोहा  ||
जे   जपथि  हनुमंत  पचीसी  
सदय    जोरि  जुग    पाणी  | 
शोक    ताप    संताप   दुख
 दूर   करथि   निज   जानि || 
-;-
रचित -
रेवती रमण झा " रमण "
ग्राम - पोस्ट - जोगियारा पतोर
आनन्दपुर , दरभंगा  ,मिथिला
मो 09997313751

शुक्रवार, 23 जून 2017

वरक - परिछन

वरक - परिछन 

जु चलियौ  यौ   दूल्हा ससुर अंगना  | 
नव  साजल   सुमंगल  मंडप  अंगना   || 
                          आजु चलियौ------
परिछन    अयली   सासू     सुनयना   | 
  आजु हियरा जुरायल  निरखि नयना  | |   
                        आजु चलियौ -----
माथे  मणि मौर  , तन शोभे  पिताम्बर  | 
छवि     अवलोकू      नवल    बहिना    || 
                           आजु चलियौ ------
जेहने     धीया  , ओहने   वर   सुन्दर  | 
आजु   भेल   हमरो   सुफल    सपना  || 
                          आजु चलियौ ------
"रमण"  सखी जन  परीछन  चलली  | 
कने  धीरे - धीरे  बाजा  बजारे  बजना 
                         आजु चलियौ------

लेखक -
 रेवती रमन झा "रमण "

बुधवार, 21 जून 2017

कनियाँ परिछन गीत

|| कनियाँ  परिछन  गीत || 


धीरे -  धीरे       चलियो   कनियाँ 
हम  सब   परिछन  अयलों    ना  | 
आबो      बिसरू    अपन  अंगना 
 हमरा    अंगना    अयलों    ना   || 
                    धीरे - धीरे  ------
लाउ  हे कलश जल , चरण पखारू 
अंगना     कनियाँ    अयली   ना   | 
शुभ - शुभ    गाबू   मंगल     चारु 
अंगना     कनियाँ    अयली   ना  || 
                        धीरे - धीरे  ------
  माय के बिसरू  कनियाँ ,बाबू के बिसरू 
हे   सुमिरु   सासू    जी   के   ना   | 
बिसरू        आबो     अपन     नैहर 
अहाँ     सासुर     अयलो     ना     || 
                           धीरे - धीरे  ------
महल अटारी कनियाँ  ,बिसरू भवनमा 
से      चीन्ही     लीय        ना  | 
" रमण "       टुटली         मरैया  
अहाँ      चीन्ही      लीय        ना  || 
                    धीरे - धीरे  ------

लेखक - 
रेवती रमण झा "रमण "

दहेज़ मुक्त मिथिला 60 किलोमीटर के दौड़ में धावक केर संग देलैथ हुनक संगिनी

मंगलवार, 6 जून 2017

लालदाइक चिठ्ठी

||  लालदाइक  चिठ्ठी || 
 रचैता - रेवती रमण झा " रमण "
 लाल दाई हम ई  चिठ्ठी 
लिखि  रहल  छी आमक  गाछी सँ  || 
कलकतिया  केरवी  कृष्ण भोग 
बम्बइ  बिज्जू करपुरिया  पर 
पातक छाया  सँ  फुदकि -फुद्कि 
कोकिल  अछि  अपन अलाप दैत 
कचकि  उठल  मोर ह्रदय अहाँ  बिनू 
ओकर करुण - पिपासी  सँ  || 
               लाल दाई --  लिखि रहल --
पपीहा गबैत , के अछि बुझैत 
ओ  कोन  दर्द मे  अछि  व्याकुल 
की पती  विरह में  पात -पात 
अति विरहाकुल 
दू टूक  करेजी  हमर भेल 
देखि ओकर प्रवल  अभिलाषी सँ || 
                 लाल दाई --  लिखि रहल --
तोता आ मैनाक बिवाद 
अछि चलि  रहल , तोता कहल 
सुन  रे  मैना ,  ई सत्य थीक 
हो नारी  या  पुरुष  जाति 
प्रीत  जोड़ी  , जे लैत  तोरि  
ओ  मानव छली  तँ  नर्क पौत 
मरियो कउ  जायत   जँ  काशी सँ  || 
            लाल दाई --  लिखि रहल --
बुल - बुल  प्रेमक जे हर्ष - विषाद 
की थीक  स्वाद  ?
वर गीत , प्रीत के गाबि  रहल 
सुख पाबि रहल  
 अछि  तरुण  तरुणियाँ  पत - दल  में 
सप्तम स्वर पंचम कल - रव सँ  || 
              लाल दाई --  लिखि रहल --
निम् कदम्ब इमली छाया तर 
बैसल पथ कउ  नित पाँतर  में
अहाँक  कुसल हम हेरि -  हेरि 
सदिखन  पूछैइत 
नित  अहींक  ग्राम - निवासी  सँ || 
            लाल दाई --  लिखि रहल --
                         -:-


बुधवार, 31 मई 2017

बजरंग - बत्तसी मैथिली हनुमान चालीसा से

|| बजरंग - बत्तसी || 

        ग्रह गोचर सं परेसान त  अहि हनुमंत -     बतीसी  के ११ बार पाठ जरूर करि --- 
 ॥ छंद  ॥ 
जय  कपि काल  कष्ट  गरुड़हि   ब्याल- जाल 
केसरीक   नन्दन   दुःख भंजन  त्रिकाल के  । 
पवन   पूत  दूत    राम , सूत  शम्भू  हनुमान  
बज्र  देह  दुष्ट   दलन ,खल  वन  कृषानु के  ॥ 
कृपा   सिन्धु   गुणागार , कपि  एही  करू  पार 
दीन  हीन  हम  मलीन,सुधि  लीय  आविकय । 
"रमण "दास चरण आश ,एकहि चित बिश्वास 
अक्षय  के काल थाकि  गेलौ  दुःख गाबि कय ॥ 
|| दोहा || 
वंदऊ  शत  सुत  केशरी  सुनू   अंजनी  के  लाल  | 
विद्द्या बुधि आरोग्य बल दय  कय  करू निहाल  || 
||  चौपाई || 
जाहि  पंथ  सिय  कपि तंह  जाऊ  | रघुवर   भक्त    नाथे  हर्षाऊ  ॥ 
यतनहि धरु रघुवंशक  लाज । नञि एही सनक कोनो भल काज ॥ 
श्री   रघुनाथहि   जानकी  जान ।  मूर्छित  लखन  आई हनुमान  ॥ 
बज्र  देह   दानव  दुख   भंजन  ।  महा   काल   केसरिक    नंदन  ॥ 
जनम  सुकारथ  अंजनी  लाल । राम  दूत  कय   देलहुँ   कमाल  ॥ 
रंजित  गात  सिंदूर    सुहावन  ।  कुंचित केस कुन्डल मन भावन ॥ 
गगन  विहारी  मारुति  नंदन  । शत -शत कोटि हमर अभिनंदन ॥ 
बाली   दसानन दुहुँ  चलि गेल । जकर   अहाँ  विजयी  वैह   भेल  ॥ 
लीला अहाँ के अछि अपरम्पार ।  अंजनी    लाल    करु  उद्धार   ॥ 
जय लंका विध्वंश  काल मणि  । छमु अपराध सकल दुर्गुन गनि॥
  यमुन   चपल  चित  चारु तरंगे  । जय हनुमंत  सुमति   सुख गंगे ॥  
हे हनुमंत  सकल गुण  सागर  ।  युगहि चारि कपि  कैल उजागर ॥ 
अंजनि   पुत्र  पताल  पुर  गेलौं  । राम   लखन  के  प्राण   बचेलों  ॥ 
पवन   पुत्र  अहाँ   जा  के  लंका । अपन  नाम  के  पिटलों  डंका   ॥ 
यौ  महाबली  बल  कउ  जानल ।अक्षय कुमारक प्राण निकालल ॥ 
हे  रामेष्ट   काज  वर  कयलों  । राम   लखन  सिय  उर  में लेलौ  ॥ 
फाल्गुन  सखा  ज्ञान गुण सार ।  रुद्र    एकादश    कउ  अवतार  ॥ 
हे  पिंगाक्ष  सुमति  सुख  मोदक । तंत्र - मन्त्र  विज्ञान  के  शोधक ॥ 
अमित विक्रम छवि सुरसा जानि । बिकट  लंकिनी  लेल पहचानि ॥ 
उदधि क्रमण गुण शील निधान।अहाँ सनक नञि कियो वुद्धिमान ॥ 
सीता  शोक   विनाशक  गेलहुँ । चिन्ह  मुद्रिका  दुहुँ   दिश  देलहुँ ॥ 
लक्षमण  प्राण   पलटि  देनहार  ।  कपि  संजीवनी  लउलों  पहार ॥ 
दश   ग्रीव दपर्हा  ए कपिराज  ।   रामक  आतुरे   कउलों   काज  ॥ 
कपि   एकानन  ह्यो  पंचानन   |  जय हनुमंत   जयति  सप्तानान || 
यौ महाबली जग  दुख   मोचन  | दीव्य  दरश लय व्याकुल लोचन || 
वर गुण निधान विद्या-बुधि खान |अहाँ सनक नञि कियो हनुमान|| 
बिनु हनुमंत जुगुति  नञि  राम |  बिनु हरि  कृपा  कतय सुखधाम  || 
जतय अहाँ  मंगल तेहि  दुवारि | करुण कथा  कते  कहल पुकारी  || 
  यश  जत  गाऊ   वदन संसार  |  कीर्ति  योग्य नञि पवन कुमार  ||  
केशरी कंत  विपति  वर  भार  |  वेगहि  आबि  रमण   करू  पार  ||
प्रभु मन  बसिया  यौ  बजरंगी | कुमतिक  काल  सुमति के संगी  || 
सुनू कपि कखन हरब दुख मोर | बाटे   जोहि   भेलहुँ  हम   थोर  ||  
॥ दोहा ॥  
प्रात काल  उठि जे  जपथि ,सदय धरथि  चित ध्यान । 
शंकट   क्लेश  विघ्न  सकल  , दूर  करथि   हनुमान  ॥ 

रचैता -
रेवती रमण झा " रमण "
ग्राम - पोस्ट - जोगियारा पतोर
आनन्दपुर , दरभंगा  ,मिथिला
मो 09997313751

सोमवार, 22 मई 2017

बजरंग - बत्तसी

बजरंग - बत्तसी 
             मैथिली हनुमान चालीसा से -



 ॥ छंद  ॥ 
जय  कपि कल  कष्ट  गरुड़हि   ब्याल- जाल 
केसरीक  नन्दन  दुःख भंजन  त्रिकाल के  । 
पवन  पूत  दूत    राम , सूत शम्भू  हनुमान  
बज्र देह दुष्ट   दलन ,खल  वन  कृषानु के  ॥ 
कृपा  सिन्धु   गुणागार , कपि एही करू  पार 
दीन हीन  हम  मलीन,सुधि लीय आविकय । 
"रमण "दास चरण आश ,एकहि चित बिश्वास 
अक्षय  के काल थाकि  गेलौ  दुःख गाबि कय ॥ 
|| दोहा || 
वंदऊ  शत  सुत  केशरी  
सुनू   अंजनी  के  लाल  | 
विद्द्या बुधि आरोग्य बल 
दय  कय  करू निहाल  || 
||  चौपाई || 
जाहि  पंथ  सिय  कपि तंह  जाऊ  | रघुवर   भक्त    नाथे  हर्षाऊ  ॥ 
यतनहि  धरु  रघुवंशक  लाज  । नञि एही सनक कोनो भल काज ॥ 
श्री   रघुनाथहि   जानकी  ज्ञान ।   मूर्छित  लखन  आई हनुमान  ॥ 
बज्र  देह   दानव  दुख   भंजन  ।  महा   काल   केसरिक    नंदन  ॥ 
जनम  सुकरथ  अंजनी  लाल ।  राम  दूत  कय   देलहुँ   कमाल  ॥ 
रंजित  गात  सिंदूर    सुहावन  ।  कुंचित केस कुन्डल मन भावन ॥ 
गगन  विहारी  मारुति  नंदन  । शत -शत कोटि हमर अभिनंदन ॥ 
बाली   दसानन दुहुँ  चलि गेल । जकर   अहाँ  विजयी  वैह   भेल  ॥ 
लीला अहाँ के अछि अपरम्पार ।  अंजनी    लाल    कर    उद्धार   ॥ 
जय लंका विध्वंश  काल मणि  । छमु अपराध सकल दुर्गुन गनि॥
  यमुन चपल  चित  चारु तरंगे  । जय  हनुमंत  सुमित  सुख गंगे ॥  
हे हनुमान सकल गुण  सागर  ।  उगलि  सूर्य जग कैल उजागर ॥ 
अंजनि  पुत्र  पताल  पुर  गेलौं  । राम   लखन  के  प्राण  बचेलों  ॥ 
पवन   पुत्र  अहाँ  जा  के  लंका । अपन  नाम  के  पिटलों  डंका   ॥ 
यौ  महाबली  बल  कउ  जानल ।  अक्षय कुमारक प्राण निकालल ॥ 
हे  रामेष्ट   काज  वर  कयलों  । राम   लखन  सिय  उर  में लेलौ  ॥ 
फाल्गुन  साख  ज्ञान गुण सार ।  रुद्र    एकादश    कउ  अवतार   ॥ 
हे  पिंगाक्ष सुमित सुख मोदक । तंत्र - मन्त्र  विज्ञान  के  शोधक ॥ 
अमित विक्रम छवि सुरसा जानि । बिकट  लंकिनी  लेल पहचानि ॥ 
उदधि क्रमण गुण शील निधान।अहाँ सनक नञि कियो वुद्धिमान ॥ 
सीता  शोक   विनाशक  गेलहुँ । चिन्ह  मुद्रिका  दुहुँ   दिश  देलहुँ ॥ 
लक्षमण  प्राण  पलटि  देनहार ।  कपि  संजीवनी  लउलों  पहार ॥ 
दश   ग्रीव दपर्हा  ए कपिराज  ।  रामक  आतुरे   कउलों   काज  ॥ 
कपि  एकानन  हयो  पंचानन   जय हनुमंत  जयति  सप्तानन  || 
वर्ण सिन्दूर  देह दुख   मोचन  | दीव्य  दरश लय व्याकुल लोचन || 
गुण  निधान कपि मंगल कारी | दुष्ट दलन  जय - जय  त्रिपुरारी || 
बिनु हनुमंत एता  नञि  राम | बिनु हरि  कृपा  कतय सुखधाम  || 
जतय अहाँ  मंगल तेहि  दुवारि | करुण कथा  कते  कहल पुकारी  || 
  यश जत  गाऊ   वदन संसार  |  कीर्ति  योग्य नञि पवन कुमार  ||  
केशरी कंत  विपति  वर  भार  |  वेगहि  आबि  रमण   करू  पार  ||
प्रभु मन  बसिया  यौ  बजरंगी | कुमतिक  काल  सुमति के संगी  || 
सुनू कपि कखन हरब दुख मोर | बाटे   जोहि   भेलहुँ  हम   थोर  ||  
॥ दोहा ॥  
प्रात काल  उठि जे  जपथि ,सदय धराथि  चित ध्यान । 
शंकट   क्लेश  विघ्न  सकल  , दूर  करथि   हनुमान  ॥ 
रचैता -
रेवती रमण झा " रमण "
ग्राम - पोस्ट - जोगियारा पतोर
आनन्दपुर , दरभंगा  ,मिथिला
मो 09997313751