dahej mukt mithila

(एकमात्र संकल्‍प ध्‍यान मे-मिथिला राज्‍य हो संविधान मे) अप्पन गाम घरक ढंग ,अप्पन रहन - सहन के संग,अप्पन गाम-अप्पन बात में अपनेक सब के स्वागत अछि!अपन गाम -अपन घरअप्पन ज्ञान आ अप्पन संस्कारक सँग किछु कहबाक एकटा छोटछिन प्रयास अछि! हरेक मिथिला वाशी ईहा कहैत अछि... छी मैथिल मिथिला करे शंतान, जत्य रही ओ छी मिथिले धाम, याद रखु बस अप्पन गाम - अप्पन बात ,अप्पन मान " जय मैथिल जय मिथिला धाम" "स्वर्ग सं सुन्दर अपन गाम" E-mail: apangaamghar@gmail.com,madankumarthakur@gmail.com mo-9312460150

गुरुवार, 28 अगस्त 2014

चौरचन पावनि

पावनि-तिहार: लोक पावनि चौरचन 

(प्रो. पवन कुमार मिश्र)
 

    समस्त विज्ञजन केँ विदित अछि जे समग्र विश्‍व मे भारत ज्ञान विज्ञान सँ महान तथा जगत्‌ गुरु कऽ उपाधि सँ मण्डित अछि । एतवे टा नहि भारत पूर्व काल मे "सोनाक चिड़िया" मानल जाइत छल एवं ब्रह्माण्डक परम शक्‍ति छल। भूलोकक कोन कथा अन्तरिक्ष लोक मे एतौका राजा शान्ति स्थापित करऽ लेल अपन भुज शक्‍तिक उपयोग करैत छलाह । एकर साक्ष्य अपन पौराणिक कथा ऐतिह्‌य प्रमाणक रुप मे स्थापित अछि ।

      हमर पूर्वज जे आई ऋषि महर्षि नाम सँ जानल जायत छथि हुनक अनुसंधानपरक वेदान्त (उपनिषद्‍) एखनो अकाट्‍य अछि । हुनक कहब छनि काल (समय) एक अछि, अखण्ड अछि, व्यापक (सब ठाम व्याप्त) अछि । महाकवि कालिदास अभिज्ञान शकुन्तलाक मंगलाचरण मे "ये द्वे कालं विधतः" एहि वाक्य द्वारा ऋषि मत केँ स्थापित करैत छथि । जकर भाव अछि व्यवहारिक जगत्‌ मे समयक विभाग सूर्य आओर चन्द्रमा सँ होइछ ।

‘प्रश्नोपनिषद्‍’ मे ऋषिक मतानुसार परम सूक्ष्म तत्त्व "आत्मा" सूर्य छथि तथा सूक्ष्म गन्धादि स्थूल पृथ्वी आदि प्रकृति चन्द्र छथि । एहि दूनूक संयोग सँ जड़ चेतन केँ उत्पत्ति पालन आओर संहार होइछ ।

    आत्यिमिक बौद्धिक उन्‍नति हेतु सूर्यक उपासना कैल जाइछ । जाहि सँ ज्ञान प्राप्त होइछ । ज्ञान छोट ओ पैघ नहि होइछ अपितु सब काल मे समान रहैछ एवं सतत ओ पूर्णताक बोध करवैछ । मुक्‍तिक साधन ज्ञान, आओर मुक्‍त पुरुष केँ साध्यो ज्ञाने अछि । सूर्य सदा सर्वदा एक समान रहैछ । ठीक एकरे विपरीत चन्द्र घटैत बढ़ैत रहैछ । ओ एक कलाक वृद्धि करैत शुक्ल पक्ष मे पूर्ण आओर एक-एक कलाक ह्रास करैत कृष्ण पक्ष मे विलीन भऽ जाय्त छाथि । सम्पत्सर रुप (समय) जे परमेश्‍वर जिनक प्रकृति रुप जे प्रतीक चन्द्र हुनक शुक्ल पक्ष रुप जे विभाग ओ प्राण कहवैछ प्राणक अर्थ भोक्‍ता । कृष्ण पक्ष भोग्य (क्षरण शील वस्तु) ।

     विश्‍वक समस्त ज्योतिषी लोकनि जातकक जन्मपत्री मे सूर्य आओर चन्द्र केँ वलावल केँ अनुसार जातक केर आत्मबल तथा धनधान्य समृद्धिक विचार करैत छथिन्ह । वैज्ञानिक लोकनि अपना शोध मे पओलैन जे चन्द्रमाक पूर्णता आओर ह्रास्क प्रभाव विक्षिप्त (पागल) क विशिष्टता पर पड़ैछ । भारतीय दार्शनिक मनीषी "कोकं कस्त्वं कुत आयातः, का मे जनजी को तात:" अर्थात्‌ हम के छी, अहाँ के छी हमर माता के छथि तथा हमर पिता के छथि इत्यादि प्रश्नक उत्तर मे प्रत्यक्ष सूर्य के पिता (पुरुष) आओर चन्द्रमा के माता (स्त्री) क कल्पना कऽ अनवस्था दोष सं बचैत छथि ।

     अपना देश मे खास कऽ हिन्दू समाज मे जे अवतारवादक कल्पना अछि ताहि मे सूर्य आओर चन्द्रक पूर्णावतार मे वर्णन व्यास्क पिता महर्षि पराशर अपन प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘वृद्ध पराशर’ मे करैत छथि । "रामोऽवतारः सूर्यस्य चन्द्रस्य यदुनायकः" सृ. क्र. २६ अर्थात्‌ सूर्य राम रुप मे आओर चन्द्र कृष्ण रुप मे अवतार ग्रहण केलन्हि ।

       ई दुनू युग पुरुष भारतीय संस्कृति-सभ्यता, आचार-विचार तथा जीवन दर्शनक मेरुद्ण्ड छथि आदर्श छथि । पौराणिक ग्रन्थ तथा काव्य ग्रन्थ केँ मान्य नायक छथि । कवि, कोविद, आलोचक, सभ्य विद्धत्‌ समाजक आदर्श छथि । सामान्यजन हुनका चरित केँ अपना जीवन मे उतारि ऐहिक जीवन के सुखी कऽ परलोक केँ सुन्दर बनाबऽ लेल प्रयत्‍नशील होईत छथि ।

      एहि संसार मे दू प्रकारक मनुष्य वास करै छथि । एकटा प्रवृत्ति मार्गी (प्रेय मार्गी)- गृहस्थ दोसर निवृत्ति मार्गी योगी, सन्यासी । प्रवृत्ति मार्गी-गृहस्थ काञ्चन काया कामिनी चन्द्रमुखी प्रिया धर्मपत्‍नी सँ घर मे स्वर्ग सुख सँ उत्तम सुखक अनुभव करै छथि । ओहि मे कतहु बाधा होइत छनि तँ नरको सँ बदतर दुःख केँ अनुभव करै छथि ।

  कर्मवादक सिद्धान्तक अनुसार सुख-दुःख सुकर्मक फल अछि ई भारतीय कर्मवादक सिद्धान्त विश्‍वक विद्धान स्वीकार करैत छथि । तकरा सँ छुटकाराक उपाय पूर्वज ऋषि-मुनि सुकर्म (पूजा-पाठ) भक्‍ति आओर ज्ञान सँ सम्वलित भऽ कऽ तदनुसार आचरणक आदेश करैत छथिन्ह ।

हम जे काज नहि केलहुँ ओकरो लेल यदि समाज हमरा दोष दिए, प्रत्यक्ष वा परोक्ष मे हमर निन्दा करय एहि दोष "लोक लाक्षना" क निवारण हेतु भादो शुक्ल पक्षक चतुर्थी चन्द्र के आओर ओहि काल मे गणेशक पूजाक उपदेश अछि ।

हिन्दू समाज मे श्री कृष्ण पूर्णावतार परम ब्रह्म परमेश्‍वर मानल छथि । महर्षि पराशर हुनका चन्द्रसँ अवतीर्ण मानैत छथिन्ह । हुनके सँ सम्बन्धित स्कन्दपुराण मे चन्द्रोपाख्यान शीर्षक सँ कथा वर्णित अछि जे निम्नलिखित अछि ।

    नन्दिकेश्‍वर सनत्कुमार सँ कहैत छथिन्ह हे सनत कुमार ! यदि अहाँ अपन शुभक कामना करैत छी तऽ एकाग्रचित सँ चन्द्रोपाख्यान सुनू । पुरुष होथि वा नारी ओ भाद्र शुक्ल चतुर्थीक चन्द्र पूजा करथि । ताहि सँ हुनका मिथ्या कलंक तथा सब प्रकार केँ विघ्नक नाश हेतैन्ह । सनत्कुमार पुछलिन्ह हे ऋषिवर ! ई व्रत कोना पृथ्वी पर आएल से कहु । नन्दकेश्‍वर बजलाह-ई व्रत सर्व प्रथम जगत केर नाथ श्री कृष्ण पृथ्वी पर कैलाह । सनत्कुमार केँ आश्‍चर्य भेलैन्ह षड गुण ऐश्‍वर्य सं सम्पन्‍न सोलहो कला सँ पूर, सृष्टिक कर्त्ता धर्त्ता, ओ केना लोकनिन्दाक पात्र भेलाह । नन्दीकेश्‍वर कहैत छथिन्ह-हे सनत्कुमार । बलराम आओर कृष्ण वसुदेव क पुत्र भऽ पृथ्वी पर वास केलाह । ओ जरासन्धक भय सँ द्वारिका गेलाह ओतऽ विश्‍वकर्मा द्वारा अपन स्त्रीक लेल सोलह हजार तथा यादव सब केँ लेल छप्पन करोड़ घर केँ निर्माण कऽ वास केलाह । ओहि द्वारिका मे उग्र नाम केर यादव केँ दूटा बेटा छलैन्ह सतजित आओर प्रसेन । सतजित समुद्र तट पर जा अनन्य भक्‍ति सँ सूर्यक घोर तपस्या कऽ हुनका प्रसन्‍न केलाह । प्रसन्‍न सूर्य प्रगट भऽ वरदान माँगूऽ कहलथिन्ह सतजित हुनका सँ स्यमन्तक मणिक याचना कयलन्हि । सूर्य मणि दैत कहलथिन्ह हे सतजित ! एकरा पवित्रता पूर्वक धारण करव, अन्यथा अनिष्ट होएत । सतजित ओ मणि लऽ नगर मे प्रवेश करैत विचारऽ लगलाह ई मणि देखि कृष्ण मांगि नहि लेथि । ओ ई मणि अपन भाई प्रसेन के देलथिन्ह । एक दिन प्रंसेन श्री कृष्ण के संग शिकार खेलऽ लेल जंगल गेलाह । जंगल मे ओ पछुआ गेलाह । सिंह हुनका मारि मणि लऽ क चलल तऽ ओकरा जाम्बवान्‌ भालू मारि देलथिन्ह । जाम्बवान्‌ ओ लऽ अपना वील मे प्रवेश कऽ खेलऽ लेल अपना पुत्र केऽ देलथिन्ह ।

    एम्हर कृष्ण अपना संगी साथीक संग द्वारिका ऐलाह । ओहि समूहक लोक सब प्रसेन केँ नहि देखि बाजय लगलाह जे ई पापी कृष्ण मणिक लोभ सँ प्रसेन केँ मारि देलाह । एहि मिथ्या कलंक सँ कृष्ण व्यथित भऽ चुप्पहि प्रसेनक खोज मे जंगल गेलाह । ओतऽ देखलाह प्रदेन मरल छथि । आगू गेलाह तऽ देखलाह एकटा सिंह मरल अछि आगू गेलाह उत्तर एकटा वील देखलाह । ओहि वील मे प्रवेश केलाह । ओ वील अन्धकारमय छलैक । ओकर दूरी १०० योजन यानि ४०० मील छल । कृष्ण अपना तेज सँ अन्धकार के नाश कऽ जखन अंतिम स्थान पर पहुँचलाह तऽ देखैत छथि खूब मजबूत नीक खूब सुन्दर भवन अछि । ओहि मे खूब सुन्दर पालना पर एकटा बच्चा के दायि झुला रहल छैक बच्चा क आँखिक सामने ओ मणि लटकल छैक दायि गवैत छैक-


सिंहः प्रसेन भयधीत, सिंहो जाम्बवता हतः ।


सुकुमारक ! मा रोदीहि, तब ह्‌येषः स्यमन्तकः ॥

         अर्थात्‌ सिंह प्रसेन केँ मारलाह, सिंह जाम्बवान्‌ सँ मारल गेल, ओ बौआ ! जूनि कानू अहींक ई स्यमन्तक मणि अछि । तखनेहि एक अपूर्व सुन्दरी विधाताक अनुपम सृष्टि युवती ओतऽ ऐलीह । ओ कृष्ण केँ देखि काम-ज्वर सँ व्याकुल भऽ गेलीह । ओ बजलीह-हे कमल नेत्र ! ई मणि अहाँ लियऽ आओर तुरत भागि जाउ । जा धरि हमर पिता जाम्बवान्‌ सुतल छथि । श्री कृष्ण प्रसन्‍न भऽ शंख बजा देलथिन्ह । जाम्बवान्‌ उठैत्मात्र युद्ध कर लगलाह । हुनका दुनुक भयंकर बाहु युद्ध २१ दिन तक चलैत रहलन्हि । एम्हर द्वारिका वासी सात दिन धरि कृष्णक प्रतीक्षा कऽ हुनक प्रेतक्रिया सेहो देलथिन्ह । बाइसम दिन जाम्बवान्‌ ई निश्‍चित कऽ कि ई मानव नहि भऽ सकैत छथि । ई अवश्य परमेश्‍वर छथि । ओ युद्ध छोरि हुनक प्रार्थना केलथिन्ह अ अपन कन्या जाम्बवती के अर्पण कऽ देलथिन्ह । भगवान श्री कृश्न मणि लऽ कऽ जाम्ब्वतीक स्म्ग सभा भवन मे आइव जनताक समक्ष सत्जीत के सादर समर्पित कैलाह । सतजीत प्रसन्‍न भऽ अपन पुत्री सत्यभामा कृष्ण केँ सेवा लेल अर्पण कऽ देलथिन्ह ।

      किछुए दिन मे दुरात्मा शतधन्बा नामक एकटा यादव सत्ताजित केँ मारि ओ मणि लऽ लेलक । सत्यभामा सँ ई समाचार सूनि कृष्ण बलराम केँ कहलथिन्ह-हे भ्राता श्री ! ई मणि हमर योग्य अछि । एकर शतधन्वान लेऽ लेलक । ओकरा पकरु । शतधन्वा ई सूनि ओ मणि अक्रूर कें दऽ देलथिन्ह आओर रथ पर चढ़ि दक्षिण दिशा मे भऽ गेलाह । कृष्ण-बलराम १०० योजन धरि ओकर पांछा मारलाह । ओकरा संग मे मणि नहि देखि बलराम कृष्ण केँ फटकारऽ लगलाह, "हे कपटी कृष्ण ! अहाँ लोभी छी ।" कृष्ण केँ लाखों शपथ खेलोपरान्त ओ शान्त नहि भेलाह तथा विदर्भ देश चलि गेलाह । कृष्ण धूरि केँ जहन द्वारिका एलाह तँ लोक सभ फेर कलंक देबऽ लगलैन्ह । ई कृष्ण मणिक लोभ सँ बलराम एहन शुद्ध भाय के फेज छल द्वारिका सँ बाहर कऽ देलाह । अहि मिथ्या कलंक सँ कृष्ण संतप्त रहऽ लगलाह । अहि बीच नारद (ओहि समयक पत्रकार) त्रिभुवन मे घुमैत कृष्ण सँ मिलक लेल ऐलथिन्ह । चिन्तातुर उदास कृष्ण केँ देखि पुछथिन्ह "हे देवेश ! किएक उदास छी ?" कृष्ण कहलथिन्ह, " हे नारद ! हम वेरि वेरि मिथ्यापवाद सँ पीड़ित भऽ रहल छी ।" नारद कहलथिन्ह, "हे देवेश ! अहाँ निश्‍चिते भादो मासक शुक्ल चतुर्थीक चन्द्र देखने होएव तेँ अपने केँ बेरिबेरि मिथ्या कलंक लगैछ । श्री कृष्ण नारद सँ पूछलथिन्ह, "चन्द्र दर्शन सँ किएक ई दोष लगै छैक ।


      नारद जी कहलथिन्ह, "जे अति प्राचीन काल मे चन्द्रमा गणेश जी सँ अभिशप्त भेलाह, अहाँक जे देखताह हुनको मिथ्या कलंक लगतैन्ह । कृष्ण पूछलथिन्ह, "हे मुनिवर ! गणेश जी किऐक चन्द्रमा केँ शाप देलथिन्ह ।" नारद जी कहलथिन्ह, "हे यदुनन्दन ! एक वेरि ब्रह्मा, विष्णु आओर महेश पत्नीक रुप मे अष्ट सिद्धि आओर नवनिधि के गनेश कें अर्पण कऽ प्रार्थना केयथिन्ह । गनेश प्रसन्न भऽ हुनका तीनू कें सृजन, पालन आओर संहार कार्य निर्विघ्न करु ई आशीर्वाद देलथिन्ह । ताहि काल मे सत्य लोक सँ चन्द्रमा धीरे-धीरे नीचाँ आबि अपन सौन्द्र्य मद सँ चूर भऽ गजवदन कें उपहाल केयथिन्ह । गणेश क्रुद्ध भऽ हुनका शाप देलथिन्ह, - "हे चन्द्र ! अहाँ अपन सुन्दरता सँ नितरा रहल छी । आई सँ जे अहाँ केँ देखताह, हुनका मिथ्या कलंक लगतैन्ह । चन्द्रमा कठोर शाप सँ मलीन भऽ जल मे प्रवेश कऽ गेलाह । देवता लोकनि मे हाहाकार भऽ गेल । ओ सब ब्रह्माक पास गेलथिन्ह । ब्रह्मा कहलथिन्ह अहाँ सब गणेशेक जा केँ विनति करु, उएह उपय वतौताह । सव देवता पूछलन्हि-गणेशक दर्शन कोना होयत । ब्रह्मा वजलाह चतुर्थी तिथि केँ गणेश जी के पूजा करु । सब देवता चन्द्रमा सँ कहलथिन्ह । चन्द्रमा चतुर्थीक गणेश पुजा केलाह । गणेश वाल रुप मे प्रकट भऽ दर्शन देलथिन्ह आओर कहलथिन्ह - चन्द्रमा हम प्रसन्‍न छी वरदान माँगू । चन्द्रमा प्रणाम करैत कहलथिन्ह हे सिद्धि विनायक हम शाप मुक्‍त होई, पाप मुक्‍त होई, सभ हमर दर्शन करैथ । गनेश थ बहलाघ हमर शाप व्यर्थ नहि जायत किन्तु शुक्ल पक्ष मे प्रथम उदित अहाँक दर्शन आओर नमन शुभकर रहत तथा भादोक शुक्ल पक्ष मे चतुर्थीक जे अहाँक दर्शन करताह हुनका लोक लान्छना लगतैह । किन्तु यदि ओ सिंहः प्रसेन भवधीत इत्यादि मन्त्र केँ पढ़ि दर्शन करताह तथा हमर पूजा करताह हुनका ओ दोष नहि लगतैन्ह । श्री कृष्ण नारद सँ प्रेरित भऽ एहिव्रतकेँ अनुष्ठान केलाह । तहन ओ लोक कलंक सँ मुक्‍त भेलाह ।

   

 एहि चौठ तिथि आओर चौठ चन्द्र केँ जनमानस पर एहन प्रभाव पड़ल जे आइयो लोक चौठ तिथि केँ किछु नहि करऽ चाहैत छथि । कवि समाजो अपना काव्य मे चौठक चन्द्रमा नीक रुप मे वर्णन नहि करैत छथि । कवि शिरोमणि तुलसी मानसक सुन्दर काण्ड मे मन्दोदरी-रावण संवाद मे मन्दोदरीक मुख सँ अपन उदगार व्यक्‍त करैत छथि - "तजऊ चौथि के चन्द कि नाई" हे रावण । अहाँ सीता केँ चौठक चन्द्र जकाँ त्याग कऽ दियहु । नहि तो लोक निंदा करवैत अहाँक नाश कऽ देतीह ।
       एतऽ ध्यान देवऽक बात इ अछि जे जाहि चन्द्र केँ हम सब आकाश मे घटैत बढ़ैत देखति छी ओ पुरुष रुप मे एक उत्तम दर्शन भाव लेने अछि । जे एहि लेखक विषय नहि अछि । हमर ऋषि मुनि आओर सभ्य समाजक ई ध्येय अछि, मानव जीवन सुखमय हो आओर हर्ष उल्लास मे हुनक जीवन व्यतीत होन्हि । एहि हेतु अनेक लोक पावनि अपनौलन्हि, जाहि मे आवाल वृद्ध प्रसन्‍न भवऽ केँ परिवार समाज राष्ट्र आओर विश्‍व एक आनन्द रुपी सूत्र मे पीरो अब फल जेकाँ रहथि ।

आवास - आदर्श नगर, समस्तीपुर
सभार : मिथिला अरिपन 

रविवार, 24 अगस्त 2014

८३म सगर राति दीप जरय नन्द विलास रायक संयोजकत्व मे भपटियाहीमे ३० अगस्त संध्या ६ बजे सँ ३१ अगस्त भोर ६ बजे धरि आयोजित अछि। ई आयोजन नारी केन्द्रित लघु आ विहनि कथापर आयोजित अछि। अहाँ सादर आमंत्रित छी।

८३म सगर राति दीप जरय नन्द विलास रायक संयोजकत्व मे भपटियाहीमे ३० अगस्त संध्या ६ बजे सँ ३१ अगस्त भोर ६ बजे धरि आयोजित अछि। ई आयोजन नारी केन्द्रित लघु आ विहनि कथापर आयोजित अछि। अहाँ सादर आमंत्रित छी।

विदेह भाषा सम्मान (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो- तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद)

विदेह भाषा सम्मान
(समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान)
२०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह)
२०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास)
२०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह)
२०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो-  तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद)

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

हे मातृभूमि मिथिला शत- शत नमन

हे मातृभूमि मिथिला
शत- शत नमन ,
हे  मिथिला,
शत- शत नमन 
चाही  नै ऊटी ,
नै चाही हमरा शिमला,
अन्तर्द्वन्द के जाल में,
फँसल अछि अपन मिथिला, 
आब नै सहू यौ मैथिल, 
स्वाभिमान पर अछि हमला,
शान्त होऊ हे कोशी, 
शान्त होऊ हे कमला,
माँ जानकी के धाम छी मिथिला 
मंडन - अयाची के  गाम  छी मिथिला ,
हे  मिथिला,
शत- शत नमन-----

Ramanath Jha

विद्यापतिधाम - सहरसा



विद्यापतिधाम - सहरसा

        प्रो. मायानन्द मिश्र स्मृति समारोह - सहरसा मे दर्शन देला मिथिलाक असली जनकरूप 'भोगेन्द्र शर्मा' जी! हिनकर तस्वीर आर हिनकर कठोर तपस्या सँ सृजित 'विद्यापतिधाम' केर तस्वीर अपने सब लेल राखि रहल छी। 

कार्यक्रम केर उद्घोषक श्री किसलय कृष्ण जी सँ हिनक पूर्ण परिचय भेटल, तेकर बाद विशेष परिचय आदरणीय विमल कान्त बाबु केर मुखारवृन्द सँ स्पष्ट भेल - संपूर्ण सभा मे एतेक महत्त्वपूर्ण मुदा अति-साधारण भाव-भंगिमाक संग भोगेन्द्र जी केँ देखि साक्षात् कोनो देवताक दर्शन भऽ रहल छल से बुझलहुँ।

हिनकर परिचय - साधारण मजदूरी सँ अपन जीवन निर्वाह करनिहार एक स्वाभिमानी मिथिला चिन्तक, अयाची, अपन जीवननिर्वाहक अन्य कार्यक अलावे निरन्तर मैथिली लेखन मे रत आ मिथिला तथा मैथिलीक लेल अपन सर्वस्त निछावड करय लेल तैयार व्यक्तित्व केर नाम भेल 'श्री भोगेन्द्र शर्मा'। विभिन्न सभा और स्वाध्याय, श्रुति आधारित मिथिला इतिहास सँ सुनल सुप्रसिद्ध नाम - विद्यापति, सलहेश, लोरिक, दीना-भद्री, गार्गी, भारती, मंडन, अयाची सहित विभिन्न अन्य ऐतिहासिक नाम सँ प्रभावित होइत ठानि लेला जे सहरसा आसपास एकटा एहन कीर्ति करब जे सबहक लेल दर्शनीय आ अनुकरणीय हो। एहि तरहें एक्कहि स्थल पर समस्त मिथिला विभूति केर मूर्ति स्थापित करैत ओहि जगह केर नाम देलनि 'विद्यापतिधाम'। हिनकर दोसर परिचय छन्हि जे फूहर गीत हिन्दी वा भोजपुरी कियो जँ बजा रहल छथि तऽ असगरे आन्दोलन ठाइन दैत छथिन। मात्र मैथिलीक माधुर्य सँ समस्त आवोहवा मे हवन होइत रहबाक चाही। हमर बेर-बेर प्रणाम अछि हिनका!!

जगह लगभग तैयार भऽ गेल छैक। बहुत जल्दी एकर उद्घाटन होमय जा रहल छैक। भोगेन्द्र जी केर एहि समर्पण आ दृढसंकल्प सँ महान कीर्ति करबाक सोच सहरसा, मधेपुरा, सुपौल वा जतय कतहु लोक सुनलनि, केओ प्रभावित होइ सँ नहि बचलाह। हम सब तऽ एहन-एहन असल मिथिला जनक केँ पाबि कृतार्थ भऽ रहल छी। आशा अछि जे एहने स्वसंकल्प केर महान मनिषी लोकनि एक बेर फेर मिथिला केँ पूर्व समृद्ध रूप मे आनि देता।
Pravin Narayan Choudhary 


सोमवार, 11 अगस्त 2014

मिथिला राजयक मांग लेल विशाल रैली : M R NS के तत्वधान में सफल रहल

मिथिला राजयक मांग लेल विशाल रैली : M R NS  के  तत्वधान  में सफल  रहल   

मिथिला राजयक मांग लेल विशाल रैली : M R NS  के  तत्वधान  में सफल  रहल  , रैली  के तयारी  में  कोनो कसर  बांकी  नै बचल   छल , जे उमीदी युवा आंदोलन  कारी  के मन में विस्वास छल से   नै  भ सकल , तयो ,रक्षाबंधन एहन  पर्व छोरी ,मूसलाधार वारिस के  परवाह  नै  करैत , हजारो  के  सांख्य  में  मैथिलि आंदोलन  कारी  ,
   मिथिला  के  रक्षा  लेल जंतर - मंतर  पर पेटकुंनिया द बैसल आ अपन मांग  अधिकार  मँगैत - भीख नै  अधिकार  चाही , हमरा मिथिला राज्य चाही     से नारा बुलंद करैत नवयुबक  आंदोलन  करी  के होसला  मजगूत  केलक ,

      कार्यकर्म के  संयोजक  - नीरज पाठक द्वारा , आ   सभा के  सञ्चालन  कमलेश मिश्रा आ शुतोष झ जी  द्वार कैयल गेल-  जाहि  में  मुख्य अतिथि  बंशीधार  मिश्रा , बिभूति मिश्रा , साबिर अली , सिया राम , मैलोरांग के निर्देशक  आ निर्माता , प्रकाश झा  , मुकेश झा   , सरसवती जिनकर मुख में  सदा विराजमान रहे छथि श्री  सुनील झ पवन , आ संगीत के

सरिता जिनका  लग समयाल  अच्छी  श्री  पवन  नारायण , संग  अनेक  मैथिल  भाई - बंधू , मिथिला राजय   मांग  के लेल  जंतर  - मंतर  पर अवि , म र न स के होसल  मजगूत  करैत  सब  कियो  , अही  आंदोलन  में  शामिल  होइयक से  जिगसा  दियोळन --

गुरुवार, 7 अगस्त 2014

बुधवार, 6 अगस्त 2014

हे प्रभु जी करू ने कोनो उपाय

एलीह जखन धनि प्रथम मिलम लेल
गेली बहुत सिकुचाइ
हे प्रभु जी करू ने कोनो उपाय

ठाढ़ भेलि धनि ,कनिको ने सिहुँकथि
मूर्ति रूप सन मुखहुँ ने बाजथि
आब करू हम कोण उपाय
हे प्रभु जी करू ने कोनो उपाय

कर धरि जोड़- बलजोड़ बैसाओल
कोनो बातक जबाब नहि पाओल
देलहुँ हम घोघ उठाई
हे प्रभु जी करू ने कोनो उपाय 

जखन देखल मनमोहक रूप
फेर पुनि आँजुर झँपलनि रूप
आबो ' दियनु समझाय
हे प्रभु जी करू ने कोनो उपाय


कतेक मनाओल पुनि समझाओल
विधिना लिखल आजु दिन आओल
आबो नहि लजाय
प्रभु जी केलनि सब उपाय
देलनि जनम जनम लेल मिलाय 

एलीह जखन धनि प्रथम मिलम लेल
गेली बहुत सिकुचाइ
हे प्रभु जी करू ने कोनो उपाय

संजय झा "नागदह"

दिनांक ०६/०८/२०१४

मंगलवार, 5 अगस्त 2014

दहेज मुक्त मिथिला - स्मारिका २०१४ केर द्वितीय विमोचन, राजविराज

दहेज मुक्त मिथिला - स्मारिका २०१४ केर द्वितीय विमोचन, राजविराज

दहेज मुक्त मिथिला, नेपाल केर संयोजन मे 'दहेज मुक्त मिथिला - स्मारिका २०१४' केर दोसर विमोचन आइ राजविराज मे सम्पन्न भेल। कार्यक्रमक अध्यक्षता संस्थापक अध्यक्ष प्रवीण नारायण चौधरी तथा प्रमुख आतिथ्य ब्रह्माकुमारी भगवती दीदी, ब्रह्माकुमारी राजयोग केन्द्र, राजविराज केर प्रमुख केर रहल। संस्था मे मैथिली-मिथिला सँ जुडल लगभग हरेक संस्थाक महिला तथा पुरुष केर सुन्दर सहभागिता संग रहल। कार्यक्रम केर आयोजन दहेज मुक्त मिथिला तथा अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद् केर अध्यक्षा श्रीमती करुणा झा जी केर संयोजन मे जिला विकास समिति, राजविराज केर सभागार मे कैल गेल।
कार्यक्रमक उद्घाटन प्रमुख अतिथि केर हाथ सँ दीप्ति प्रज्ज्वलन करैत कैल गेल। तहिना संस्थाक महासचिव श्रीमती साधना झा द्वारा स्वागत भाषण तथा संस्था तथा अभियानक विस्तृत परिचय विमोचन समारोहक अध्यक्षता कय रहला प्रवीण ना. चौधरी द्वारा केलाक बाद प्रमुख अतिथि भगवती दीदी केर हाथ सँ सुसम्पन्न भेल।  कार्यक्रम मे सहभागी नागरिक समाज केर अध्यक्ष श्री थानसिंह भंसाली, बाल कल्याण समिति सँ मंजु श्रेष्ठ, मैथिली साहित्य परिषद् केर अध्यक्ष विवेकानन्द मिश्र, सल्लाहकार हित नारायण दास, मैथिल महासंघ, नेपाल केर अध्यक्ष माननीय विष्णु मंडल, मैथिली साहित्यिक सांस्कृतिक परिषद्सँ श्याम सुन्दर पथिक, प्राध्यापक सुरेन्द्र प्रसाद गुप्ता, प्रा. वन्दना मिश्र, चन्द्रिका यादव, रेणु साह, पिंकी कुमारी झा, नन्दलाल आचार्य, विद्यानन्द यादव बेदर्दी, किशोर कुमार यादव, वरिष्ठ पत्रकार बैद्यनाथ झा, मैथिली साहित्यकर्मी तथा पत्रकार शुभचन्द्र झा, मानव अधिकारकर्मी मनोहर पोखरेल, महिला अधिकारकर्मी कमला भंसाली, आदि केर नीक सहभागिता रहल। शुभकामना संदेशक संग मिथिला समाज सँ दहेजरूपी दानव भगेबाक लेल मात्र सभा आ भाषण टा सँ नहि होयत, एहि लेल कारगर डेग उठेबाक आवश्यकता पर सबहक जोर रहल।
स्मारिका मे रहल त्रुटि पर सेहो प्रखर टिप्पणी करैत भविष्य मे एहेन त्रुटि नहि दोहरेबाक अपेक्षा राखल गेल। मंच संचालन ध्रुव जी द्वारा कैल गेल। कार्यक्रमक बीच मे सहभागी लोकनिक तरफ सँ कोनो तरहक जिज्ञासा तथा संस्थाक कार्यक्रम सम्बन्धी समस्त जानकारी लेबाक लेल खूल्ला मंच पर बहस राखल गेल। सम्बन्धित जानकारी करुणाजी तथा प्रवीण नारायण चौधरी द्वारा समुचित ढंग सँ देल गेल। संगहि, करुणा जी द्वारा दहेज मुक्त मिथिला केर जिम्मेवारी सम्हारबाक लेल उपस्थित वरिष्ठ सदस्यगण, सल्लाहकार तथा कार्यकारिणीक पुनर्गठन लेल आह्वान कैल गेल।प्रमुख अतिथि द्वारा गरिमापूर्ण संबोधन मे नारी सशक्तीकरण तथा आत्मनिर्भरता लेल संस्कार प्रदान करबाक जिम्मेवारी माता-पिताक रहबाक बात पर जोर देल गेल। संगहि, नारी पुरुष प्रधान समाज मे नौकर बनि समय गुदस्त करबाक मानसिकता सँ मुक्ति पाबि अपन परिवार प्रति जिम्मेवारीक वहन करबाक स्वयं मे क्षमता विकास करैथ एहेन प्रेरक संवाद तथा शुभेच्छा देल गेल। तहिना मंजू श्रेष्ठ द्वारा सेहो महिलाकेँ आर्थिक आत्मनिर्भरता पर जोर देबाक लेल आह्वान कैल गेल। नागरिक समाज केर अध्यक्षक तरफ सँ दहेज मुक्त मिथिला अभियान प्रति समर्थन आ अभियानक प्रसार लेल पूर्ण सहयोगक वचन देल गेल।
तहिना श्रीमती भंसाली द्वारा मैथिल समाज संग मारवाडी तथा अन्य समाजक रहन-सहन सेहो घुलल-मिलल रहलाक कारणे वैवाहिक सम्बन्ध लेल जँ लडकीक माँग कैल जाइत अछि तऽ विवाह करबाक लेल तत्परता देखेबाक अनुरोध कैल गेल। कथनी आ करनी मे समानता रखबाक लेल सेहो अनुरोध कैल गेल। मात्र सभा आ भाषण तक दहेज केँ समस्या मानब आ बाद मे फेर सऽ स्वयं दहेजक लोभ मे फँसब, एहि तरहक मिथ्याचार सँ समाजक भलाई संभव नहि होयत से स्पष्ट कैल गेल। तहिना अन्य-अन्य वक्ता लोकनि सेहो अपन विचार तथा दहेज मुक्ति लेल स्वयं संकल्प बेर-बेर दोहरेला। क्रान्ति लेल पहिने अपन घर सँ शुरु करबाक प्रतिबद्धता पर सब कियो जोर देलनि।

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