dahej mukt mithila

(एकमात्र संकल्‍प ध्‍यान मे-मिथिला राज्‍य हो संविधान मे) अप्पन गाम घरक ढंग ,अप्पन रहन - सहन के संग,अप्पन गाम-अप्पन बात में अपनेक सब के स्वागत अछि!अपन गाम -अपन घरअप्पन ज्ञान आ अप्पन संस्कारक सँग किछु कहबाक एकटा छोटछिन प्रयास अछि! हरेक मिथिला वाशी ईहा कहैत अछि... छी मैथिल मिथिला करे शंतान, जत्य रही ओ छी मिथिले धाम, याद रखु बस अप्पन गाम - अप्पन बात ,अप्पन मान " जय मैथिल जय मिथिला धाम" "स्वर्ग सं सुन्दर अपन गाम" E-mail: apangaamghar@gmail.com,madankumarthakur@gmail.com mo-9312460150

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बुधवार, 2 जुलाई 2025

भगवान से तीसरी रोटी क्यों माँगता हूँ?

 रोटी  /भूख 



एक मित्र ने पत्नी के स्वर्ग वास हो जाने के बाद अपने दोस्तों के साथ सुबह शाम पार्क में टहलना और गप्पें मारना, पास के मंदिर में दर्शन करने को अपनी दिनचर्या बना लिया था।

हालांकि घर में उन्हें किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं थी। सभी उनका बहुत ध्यान रखते थे, लेकिन आज सभी दोस्त चुपचाप बैठे थे।

एक दोस्त को वृद्धाश्रम भेजने की बात से सभी दु:खी थे" आप सब हमेशा मुझसे पूछते थे कि मैं भगवान से तीसरी रोटी क्यों माँगता हूँ? आज बतला देता हूँ। "

कमल ने पूछा  "क्या बहू तुम्हें सिर्फ तीन रोटी ही देती है ?"

बड़ी उत्सुकता से एक दोस्त ने पूछा? "नहीं यार! ऐसी कोई बात नहीं है, बहू बहुत अच्छी है।

असल में  "रोटी, चार प्रकार की होती है।"

पहली "सबसे स्वादिष्ट" रोटी "माँ की "ममता" और "वात्सल्य" से भरी हुई। जिससे पेट तो भर जाता है, पर मन कभी नहीं भरता।

एक दोस्त ने कहा, सोलह आने सच, पर शादी के बाद माँ की रोटी कम ही मिलती है।" उन्होंने आगे कहा  "हाँ, वही तो बात है।

दूसरी रोटी पत्नी की होती है जिसमें अपनापन और "समर्पण" भाव होता है जिससे "पेट" और "मन" दोनों भर जाते हैं।", क्या बात कही है यार ?" ऐसा तो हमने कभी सोचा ही नहीं।

फिर तीसरी रोटी किस की होती है?" एक दोस्त ने सवाल किया।

"तीसरी रोटी बहू की होती है जिसमें सिर्फ "कर्तव्य" का भाव होता है जो कुछ कुछ स्वाद भी देती है और पेट भी भर देती है और वृद्धाश्रम की परेशानियों से भी बचाती है", थोड़ी देर के लिए वहाँ चुप्पी छा गई।

"लेकिन ये चौथी रोटी कौन सी होती है ?" मौन तोड़ते हुए एक दोस्त ने पूछा-

"चौथी रोटी नौकरानी की होती है। जिससे ना तो इन्सान का "पेट" भरता है न ही "मन" तृप्त होता है और "स्वाद" की तो कोई गारँटी ही नहीं है", तो फिर हमें क्या करना चाहिये यार?

माँ की हमेशा पूजा करो, पत्नी को सबसे अच्छा दोस्त बना कर जीवन जिओ, बहू को अपनी बेटी समझो और छोटी मोटी ग़लतियाँ नज़रन्दाज़ कर दो, बहु भी खुश रहेगी तो बेटा भी ध्यान रखेगा।

यदि हालात चौथी रोटी तक ले आये तो भगवान का आभार जताओ कि उसने जीवित रखा हुआ है और अब स्वाद पर ध्यान मत दो केवल जीने के लिए थोड़ा कम खाओ ताकि आराम से बुढ़ापा कट जाए। बड़ी खामोशी से दोस्त सोच रहे थे वाकई हम कितने खुशकिस्मत हैं ।

बुधवार, 25 जून 2025

SC/ST/OBC को केसे बरबाद कर दीया

मींयोने SC/ST/OBC को केसे बरबाद कर दीया ?

21 राज्यों में जावेद हबीब के 300 शानदार एयरकंडीशन सैलून खुल गये।


और हिंदु नाई दलित OBC बन के नौकरी खोज रहा।

26 राज्यो सहित 30 देशों में चमड़े के जूते और चप्पलों का कारोबार करने वाली 600 करोड़ की कंपनी मेट्रो शुज के मालिक फराह मलिक अरबपति बन गए

देश विदेश में चमड़ों और जूते चप्पलों का कारोबार करके मिर्जा ट्रेनर्स में मालिक मिर्जा बन्धु अरबपति हो गए ..

और साजिश के तरह कभी दलितों का एकाधिकार वाले चमड़े, जूते चप्पलें बार्बर शॉप आदि वामपंथीयो मुस्लिमो और फर्जी अम्बेडकरवादियों के साजिश से कब दलितों के हाथ से निकलकर मुस्लिमो के हाथ मे चली गयी पता भी नहीं चला..... एक समय खादिम शूज वाले बर्मन परिवार ने इनको अच्छी टक्कर दी थी लेकिन आफताब अंसारी ने उनका अपहरण कर लिया करोड़ो की फिरौती वसूली गयी फिर उन्होंने दशकों तक विस्तार नही किया अब कर रहे है जब इस मार्केट में एकाधिकार हो चुका है....

बैंकर माफिया और उसके पैसों से पैदा किए हुए नमाजवादियों व दलितवादी नेताओं ने हिन्दू नाई से कहा ब्राह्मण जनसंख्या में इतने कम हैं पर सबसे अधिक सत्ता के मजे यही ले रहे हैं।

तुमको सदियों सदियों तक नाई बनाकर रखना चाहते हैं मत करो ये काम।

बच्चों को तो पढ़ाओ लिखाओ सरकारी नौकरी दिलवाओ और सुनो जाति प्रमाण पत्र बनवा लो

कांग्रेस तुमको OBC में जोड़ देगी आरक्षण दे देगी

मौज करो इन ब्राह्मणों पंडितों के चक्कर में मत फंसो।

हिन्दू नाई ने आरक्षण मिलेगा सरकारी नौकरी मिलेगी इसलिए दुकान बंद कर दी शहर चला गया

अपना बड़ा सा घर छोड़ा किराए पर एक कमरे में गुजारा किया बच्चों को गली के अंग्रेजी स्कूल में डाला

जब बच्चे जॉनी जॉनी यस पापा गाते थे हिन्दू नाई सोचता था बच्चे कम से कम IAS तो कर ही जाएँगे, उसने एक फैक्ट्री में 7000 में गार्ड की नौकरी कर ली

जब जब खान्ग्रेसियों और नमाज़वादी नेताओं ने बुलाया धरने प्रदर्शन आंदोलन में गया भी सरकारी नौकरी कितने नाईयों लुहारों बढ़इयों धोबियों को मिल सकेगी

बेटे बेरोजगार घूमने लगे तो घर में झगड़ा बढ़ने लगा।

जो भी हो 20 साल बीत गए बच्चे अब भी बेरोजगार थे।

हिन्दू नाई से रात को सेक्यूरिटी गार्ड की नौकरी होती नहीं थी नींद लग जाती थी नौकरी छूट गयी।

हिन्दू नाई वापस गाँव लौट आया उसने फिर से अपनी बाल काटने की दुकान खोलनी चाही पास के कस्बे में जाकर देखा 20 साल पहले 2 सैलून थे वो भी हिन्दू नाईयों के अब उसी कस्बे में 50 सैलून खुल चुके थे और सारे के सारे सैलून मियों के थे

हिन्दू नाई ने रोजगार छोड़ा

                मियों ने कब्ज़ा कर लिया

हिन्दू बढ़ई ने अपना काम छोड़ा

             मिएँ ने बाजार पर कब्जा कर लिया।

हिन्दू लुहार ने अपना काम छोड़ा

                मियों ने वेल्डिंग की दुकानें खोल कर पूरा बाजार कब्ज़ा लिया

हिन्दू धोबी ने सरकारी नौकरी के चक्कर में कपड़े धोने छोड़े

गाँव के घर घर से परिचय टूटा नाते टूटे

मिएँ ड्राई क्लीन और जीन्स की रंगाई में छा गए।

हिन्दू SC ने जूते बनाने छोड़ दिए

आज अरबों रुपए का चमड़े मांस चर्बी हड्डी और सारा का सारा जूता बाजार मियों के कब्जे में है

मिएँ OBC और SC/ST के पेट पर लात मार रहे हैं

पंडितों का काम पूजा पाठ है पुरोहिताई है

ये काम मिएँ कभी नहीं करेंगे लिख लो।

आरक्षण और सरकारी नौकरी के लालच में कितने लोगों को रोजगार मिला

करोड़ों युवा मैकाले सिस्टम में फंसकर एक डिग्री लेकर सड़क पर घूम रहे हैं

हम हिन्दुओं के पारंपरिक रोजगार इतने बुरे थे क्यो..... ????? 

पूरी प्लानिंग से दलित - सवर्ण में फूट डलवाकर उनको बेरोज़गार बना दिया....

वामपंथी का कमाल.. जरा सोचिये....

सोमवार, 23 जून 2025

अति सुंदर अवश्य पढ़ें

   *स्वर्ग* में सब कुछ हैं लेकिन *मौत* नहीं है, 

*गीता* में सब कुछ हैं लेकिन *झूठ* नहीं है, 

*दुनिया* में सब कुछ हैं लेकिन किसी को *सुकून* नहीं है,    

 और   आज के *इंसान* में सब कुछ हैं लेकिन *सब्र* नहीं है।

*राजा भोज* ने *कवि कालीदास* से *दस सर्वश्रेष्ठ* सवाल किए..  

1- दुनिया में भगवान की *सर्वश्रेष्ठ रचना* क्या है ?

                         उत्तर - *''मां''*

2 - सर्वश्रेष्ठ *फूल* कौन सा है ?

                         उत्तर - *"कपास का फूल"*

3 - सर्वश्र॓ष्ठ *सुगंध* कौनसी है ?

          उत्तर - *वर्षा से भीगी मिट्टी की सुगंध*

4 - सर्वश्र॓ष्ठ *मिठास* कौनसी ?

                        उत्तर - *"वाणी की"*

5 - सर्वश्रेष्ठ *दूध* ?

                        उत्तर - *"मां का"*

6 - सबसे से *काला* क्या है ?

                        उत्तर - *"कलंक"*

7 - सबसे भारी क्या है?

                         उत्तर - *"पाप"*

8 - सबसे *सस्ता* क्या है ?

                         उत्तर -  *"सलाह"*

9 - सबसे *महंगा* क्या है ?

                         उत्तर -  *"सहयोग"*

10 - सबसे *कडवा* क्या है?

                           ऊत्तर - *"सत्य"* 

 अगर मेरे पास एक रुपया है एवं आपके पास भी एक रुपया है और हम एक दूसरे से बदल ले तो दोनों के पास एक एक रुपया ही रहेगा । किंतु  अगर मेरे पास एक  अच्छा विचार है एवं आपके पास एक अच्छा विचार है और दोनों आपस में बदल ले तो दोनों के पास दो दो विचार होंगे ! है न ……!!_

तो अच्छे विचारों का आदान प्रदान जारी रखिये..  और   अपनी मानसिक पूंजी बढ़ाते रहिये ।

मंजिल वही, सोच नई

ऊपर जाने पर एक सवाल ये भी पूँछा जायेगा कि अपनी अँगुलियों के नाम बताओ ।

जवाब:-

अपने हाथ की छोटी उँगली से शुरू करें :-

(1)जल

(2) पथ्वी

(3)आकाश

(4)वायू

(5) अग्नि

ये वो बातें हैं जो बहुत कम लोगों को मालूम होंगी ।

5 जगह हँसना करोड़ो पाप के बराबर है

1. श्मशान में

2. अर्थी के पीछे

3. शोक में

4. मन्दिर में

5. कथा में

सिर्फ 1 बार भेजो बहुत लोग इन पापो से बचेंगे ।।

अकेले हो?

परमात्मा को याद करो ।

परेशान हो?

ग्रँथ पढ़ो ।

उदास हो?

कथाए पढो ।

टेन्शन मे हो?

भगवत गीता पढो ।

फ्री हो?

अच्छी चीजे फोरवार्ड करो

हे परमात्मा हम पर और समस्त प्राणियो पर कृपा करो..

सूचना  - क्या आप जानते हैं ?

हिन्दू ग्रंथ रामायण, गीता, आदि को सुनने,पढ़ने से कैन्सर नहीं होता है बल्कि कैन्सर अगर हो तो वो भी खत्म हो जाता है।

आरती----के दौरान ताली बजाने से

दिल मजबूत होता है ।

ये मेसेज असुर भेजने से रोकेगा मगर आप ऐसा नही होने दे और मेसेज सब नम्बरो को भेजे ।

श्रीमद भगवत गीता पुराण और रामायण ।

💕एक दिन रुक्मणी ने भोजन के बाद,

श्री कृष्ण को दूध पीने को दिया।💕

💕दूध ज्यदा गरम होने के कारण 

श्री कृष्ण के हृदय में लगा💕

और

उनके श्रीमुख से निकला-

" हे राधे ! "💕

💕सुनते ही रुक्मणी बोली-

प्रभु !

ऐसा क्या है राधा जी में,

जो आपकी हर साँस पर उनका ही नाम होता है ?💕

💕मैं भी तो आपसे अपार प्रेम करती हूँ...

फिर भी,

आप हमें नहीं पुकारते !!💕

💕श्री कृष्ण ने कहा -देवी !

आप कभी राधा से मिली हैं ?

और मंद मंद मुस्काने लगे...💕

💕अगले दिन रुक्मणी राधाजी से मिलने उनके महल में पहुंची ।

💕राधाजी के कक्ष के बाहर अत्यंत खूबसूरत स्त्री को देखा...

और,

उनके मुख पर तेज होने कारण उसने सोचा कि-

💕ये ही राधाजी है और उनके चरण छुने लगी !💕

💕तभी वो बोली -आप कौन हैं ?💕

💕 रुक्मणी ने अपना परिचय दिया और आने का कारण बताया...💕

💕तब वो बोली-

मैं तो राधा जी की दासी हूँ।💕

💕राधाजी तो सात द्वार के बाद आपको मिलेंगी !!💕

💕रुक्मणी ने सातो द्वार पार किये...

और,💕

💕हर द्वार पर एक से एक सुन्दर और तेजवान दासी को देख सोच रही थी क़ि-💕

💕अगर उनकी दासियाँ इतनी रूपवान हैं...💕

तो,

राधारानी स्वयं कैसी होंगी ?💕

💕सोचते हुए राधाजी के कक्ष में पहुंची...💕

कक्ष में राधा जी को देखा-

अत्यंत रूपवान तेजस्वी जिसका मुख सूर्य से भी तेज चमक रहा था।💕

रुक्मणी सहसा ही उनके चरणों में गिर पड़ी...

पर,

💕ये क्या राधा जी के पुरे शरीर पर तो छाले पड़े हुए है !

💕रुक्मणी ने पूछा-

देवी आपके  शरीर पे ये छाले कैसे ?

तब राधा जी ने कहा-

देवी !💕

कल आपने कृष्णजी को जो दूध दिया...💕

वो ज्यदा गरम था !

💕जिससे उनके ह्रदय पर छाले पड गए...

और,

उनके ह्रदय में तो सदैव मेरा ही वास होता है..!!👩

💕इसलिए कहा जाता है-

💕बसना हो तो...

'ह्रदय' में बसो किसी के..!👩

'💕दिमाग' में तो..

लोग खुद ही बसा लेते है..!!👩

║प्रेम से कहिये जय श्री राधे  ║

💕ये sms अपने जीवन के अच्छे दोस्तों को भेजो, मुझे भी करना अगर मैं हूँ तो? अगर 6 sms आपको वापिस आये तो 💕

आप यह समझियेगा की आप बहुत भाग्यवान हैं😊जय श्री राधे कृष्णा 🙏

सोमवार, 26 मई 2025

आइये हिन्दू समाज की ओर।

 जो लोग डोनाल्ड ट्रम्प को नायक मानते हुए ईरान पर अमेरिका द्वारा किए गए परमाणु प्रतिष्ठानों पर आक्रमण से आनंदित हो उठे, वे एक मौलिक सत्य को विस्मृत कर बैठे हैं—अमेरिका एक आब्राह्मिक ईसाई मत का अनुयायी राष्ट्र है, जबकि ईरान उसी आब्राह्मिक परम्परा की तीसरी शाखा, इस्लाम के शिया सम्प्रदाय का प्रतिनिधि है। इस्लाम के सुन्नी अनुयायी भी ईरान के प्रति शत्रुता रखते हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह संघर्ष किसी 'न्याय' या 'धर्म' की रक्षा हेतु नहीं, अपितु परस्पर आब्राह्मिक सत्ता-प्रवृत्तियों की टकराहट है।

ये तीनों—यहूदी, ईसाई और मुस्लिम सम्प्रदाय—परस्पर विरोधी होते हुए भी एक-दूसरे की सामर्थ्य, दुर्बलता तथा 'नस' को भलीभाँति पहचानते हैं। इतिहास साक्षी है कि ईसाइयत और इस्लाम के मध्य 'क्रूसेड्स' नामक छः भीषण युद्ध हो चुके हैं। अतः जब इनकी आपसी हिंसा पर हमें आनन्द की अनुभूति होती है, तो यह हमारी वैचारिक अपरिपक्वता का द्योतक है।

यदि हम निरन्तर पश्चिमी अवधारणाओं जैसे—समाजवाद, पूँजीवाद, राष्ट्रवाद, साम्यवाद, तथा तथाकथित दाएँ-बाएँ (Right-Left) पंथों को अपने समाज में आयात करते रहेंगे, तो वह दिन दूर नहीं जब वैश्विक शक्तियाँ हमारे ऊपर भी आर्थिक और सामरिक आघात करेंगी। जिस प्रकार अमेरिका ने रूस के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) को जब्त किया, उसी प्रकार वह भारत की सम्पत्ति को भी अपनी शक्ति से नष्ट अथवा अपहृत कर सकता है।

1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब अधिकांश भारतीयों की आँखों में एक नया राष्ट्र गढ़ने का स्वप्न था — एक ऐसा राष्ट्र जो सहिष्णुता, विविधता और सांस्कृतिक गौरव का प्रतिनिधि हो। परंतु बहुत कम लोगों ने यह समझा कि ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने जाते-जाते केवल एक राजनीतिक विभाजन नहीं किया, बल्कि उन्होंने भारत की सभ्यतागत निरंतरता को तोड़ने के लिए “पाकिस्तान” नामक एक स्थायी संकट को जन्म दिया।

ब्रिटिशों ने यह बात भलीभाँति समझी थी कि भारतवर्ष में यदि कोई शक्ति हज़ार वर्षों तक उनकी चुनौती बनी रही, तो वह थी हिन्दू समाज की सांस्कृतिक जीवटता। और यह भी कि इस हिन्दू समाज को स्थायी रूप से कमज़ोर करना है तो उसके पड़ोस में एक ऐसा राष्ट्र खड़ा करना होगा जो सदैव इस्लामी उन्माद से प्रेरित होकर भारत को अस्थिर करता रहे — और यही था पाकिस्तान का निर्माण। यह केवल मुसलमानों के लिए एक मातृभूमि का गठन नहीं था, बल्कि भारत के भीतर एक अंतहीन अस्थिरता का बीज बोना था।

लेकिन उससे भी अधिक गंभीर भूल थी पं. नेहरू और तत्कालीन नेतृत्व द्वारा सम्पूर्ण जनसंख्या स्थानांतरण को न होने देना। जब पाकिस्तान अपने हिस्से में आए करोड़ों हिन्दुओं और सिखों को या तो जबरन धर्मांतरित कर रहा था या हत्याओं द्वारा खदेड़ रहा था, उस समय भारत में यह आशा की जा रही थी कि मुस्लिम अल्पसंख्यक शांतिपूर्वक रहेंगे — एक ऐसी आशा जो इतिहास और व्यवहार दोनों के विपरीत थी।

उस समय जिन्ना और मुस्लिम लीग स्पष्ट कर चुके थे कि वे धर्म के आधार पर अलग राष्ट्र चाहते हैं। पाकिस्तान बनने का अर्थ था कि भारत हिन्दुओं का राष्ट्र हो — सांस्कृतिक नहीं तो कम से कम राजनीतिक दृष्टि से। किंतु नेहरूवादी नेतृत्व ने “धर्मनिरपेक्षता” की आदर्शवादी सोच के नाम पर यह अवसर गँवा दिया। और आज, उसी ऐतिहासिक भूल का परिणाम है कि भारत के लगभग हर प्रमुख नगर में एक “मिनी पाकिस्तान” जैसी स्थिति उत्पन्न हो चुकी है — जहाँ न केवल जनसंख्या घनत्व का असंतुलन है, अपितु धार्मिक कट्टरता, अलगाववादी मानसिकता और जिहादी राजनीति का प्रसार भी है।

दिल्ली का शाहीन बाग़, मुंबई की भायखला और मुम्ब्रा, बंगलौर का शिवाजीनगर, हैदराबाद का याकूतपुरा, लखनऊ का हुसैनाबाद, कोलकाता का गार्डन रीच — ये केवल भौगोलिक नाम नहीं हैं, ये उन क्षेत्रों के प्रतीक बन चुके हैं जहाँ भारतीय संविधान का नहीं, बल्कि मज़हबी फतवों का शासन चलता है।

यही नहीं, जनसंख्या संतुलन की दृष्टि से देखें तो अनेक जिलों में मुस्लिम बहुलता के कारण प्रशासनिक और सांस्कृतिक दबाव भी बनते जा रहे हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत के 100 से अधिक जिले ऐसे हैं जहाँ मुस्लिम आबादी 25% से अधिक है, और इनमें से कई जिलों में वह 40–50% तक पहुँच चुकी है।

इतिहास इसका साक्षी है कि जहाँ भी किसी मज़हब की जनसंख्या 30% से ऊपर पहुँची है, वहाँ वे क्षेत्र सांप्रदायिक रूप से अस्थिर हुए हैं, और अंततः पाकिस्तान या बांग्लादेश जैसे इस्लामी राष्ट्रों में परिवर्तित हुए हैं।

आज जो "मिनी पाकिस्तान" कहे जाते हैं, वे सिर्फ भीड़-भरे इलाके नहीं हैं — वे भविष्य के संभावित शरिया प्रभुत्व वाले क्षेत्र हैं। वहाँ पुलिस, प्रशासन और राजनीति — तीनों पर मज़हबी दबाव दिखाई देता है। यही कारण है कि पश्चिम बंगाल के कई जिलों में दुर्गा पूजा की अनुमति नहीं मिलती, लेकिन मुहर्रम और ईद पर सड़कों का अतिक्रमण सामान्य माना जाता है।

और जब इन सब तथ्यों के विरुद्ध कोई चेतावनी देता है, तो उसे "घृणा फैलाने वाला", "धर्मांध", या "फ़ासीवादी" करार दिया जाता है — जबकि सच्चाई यह है कि यह चेतावनी देना अब राष्ट्रधर्म बन चुका है।

जब हम किसी मंदिर में आरती करते हैं, जब हम अपने पूर्वजों का श्राद्ध करते हैं, जब कोई कन्या विवाह के बाद ससुराल जाती है, जब कोई साधक जनेऊ धारण करता है — तब शायद ही कोई सोचता हो कि यही वे जीवन-निष्ठाएँ हैं, जिन्हें आज वैश्विक वैचारिक शक्तियाँ “पुरातनपंथी”, “पितृसत्तात्मक” और “प्रतिगामी” घोषित करने में लगी हैं। यह केवल शब्दों का खेल नहीं है — यह एक पूरी सभ्यता को “असहज और अपराधबोध से भरा” बनाने की रणनीति है। और इस रणनीति का नाम है — कल्चरल मार्क्सवाद।

कल्चरल मार्क्सवाद कार्ल मार्क्स के आर्थिक सिद्धांतों से नहीं, बल्कि एंटोनियो ग्राम्शी, थियोडोर अडोर्नो, हर्बर्ट मार्कूज़े जैसे विचारकों से प्रेरित है, जिन्होंने समझा कि किसी भी समाज को केवल क्रांति या हिंसा से नहीं तोड़ा जा सकता — उसके लिए संस्कृति को बदलना पड़ेगा, सोच को उलट देना पड़ेगा, और परंपरा को शर्म का प्रतीक बना देना होगा।

इसी सोच के तहत पश्चिमी विश्वविद्यालयों और मीडिया संस्थानों में Resist – Rebel – Reject (विरोध करो – विद्रोह करो – त्याग दो) का 3R सूत्र तैयार हुआ। यह सूत्र अब भारत के भीतर एक वैचारिक शस्त्र बन चुका है।


Resist (विरोध करो): बच्चों को सिखाओ कि परिवार, धर्म, गुरु-शिष्य परंपरा, त्याग, सतीत्व — ये सब दमनकारी व्यवस्थाएँ हैं।

Rebel (विद्रोह करो): स्त्रियों को अपने परिवार, धर्म और मातृत्व के विरुद्ध खड़ा करो; युवाओं को विवाह संस्था, ब्रह्मचर्य और संयम का उपहास करना सिखाओ।

Reject (त्याग दो): त्याग दो अपनी भाषा, अपनी पूजा-पद्धति, अपने धार्मिक चिह्न, अपने आचार-विचार — और अपना राष्ट्रधर्म।

आज यही “तीन मंत्र” फिल्म, वेब सीरीज़, शिक्षा संस्थानों और सोशल मीडिया के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाए जा रहे हैं। इस प्रक्रिया को "वोकिज़्म" भी कहा जाता है, जहाँ आप अगर अपनी संस्कृति से प्रेम करते हैं तो "रूढ़िवादी", अगर आप अपने धर्म का पालन करते हैं तो "सांप्रदायिक", और अगर आप सनातन मूल्यों की बात करते हैं तो "अंधभक्त" बना दिए जाते हैं।

यही कारण है कि जो हिन्दू युवक अपने धर्म की बात करता है, वह अक्सर आत्मरक्षा की मुद्रा में बोलता है — क्योंकि उसे बचपन से यह सिखाया गया कि “धर्म की बात करना संकीर्णता है”। यह मानसिक गुलामी, मानसिक पराजय का सूक्ष्म रूप है।

हिन्दू समाज को तोड़ने का यह अभियान केवल वैचारिक नहीं, सामाजिक भी है। इस अभियान में वामपंथी शिक्षक, चर्च प्रायोजित एनजीओ, तथाकथित सामाजिक न्यायवादी, और मुस्लिम संगठन एक-दूसरे के पूरक बन चुके हैं। इनका मुख्य लक्ष्य है — हिन्दू समाज को उसकी जाति, लिंग, क्षेत्र और भाषा के आधार पर इतना विभाजित कर देना कि वह कभी भी एक सभ्यता-संगठित शक्ति के रूप में उभर ही न सके।

इस विभाजन की रणनीति साफ़ है:

ब्राह्मणों को ‘शोषक’ घोषित करो, ताकि ज्ञान परंपरा ही नष्ट हो जाए।

क्षत्रियों को सामंती कहकर बहिष्कृत करो, ताकि शौर्य और धर्मरक्षा निषिद्ध बन जाए।

वैश्य वर्ग को पूंजीवादी कहकर दोषी ठहराओ, ताकि आर्थिक शक्ति टूट जाए।

शूद्रों को उकसाकर पूरे धर्म के विरुद्ध खड़ा करो, ताकि समाज में स्थायी विद्वेष बना रहे।

यह वही "वर्ग संघर्ष का मार्क्सवादी मॉडल" है जिसे अब "जातिगत संघर्ष" के रूप में भारत में लागू किया जा रहा है। अंतर बस इतना है कि वर्ग के स्थान पर जाति और पहचान आ गई है, और हथियार की जगह नैरेटिव।

आप यदि ध्यान से देखें तो पायेंगे — भारत में कोई राजनीतिक दल, कोई प्रगतिशील संस्था या कोई वामपंथी बुद्धिजीवी कभी भी ईसाई चर्च या इस्लामी मौलानाओं के पितृसत्तात्मक या रूढ़िवादी रवैये की आलोचना नहीं करता। केवल हिन्दू रीति-रिवाज़ ही उनका निशाना होते हैं। क्यों?

क्योंकि अंतिम लक्ष्य हिन्दू धर्म नहीं, हिन्दू समाज है — और हिन्दू समाज को तोड़ना हो, तो सबसे पहले उसके धर्म को "गिल्टी" बना दो।

सभ्यता तब तक जीवित रहती है, जब तक उसके भीतर संरक्षण की चेतना और प्रतिक्रिया की क्षमता बनी रहती है। और यही दो बातें हैं जो आज भारत और इज़रायल के बीच की सामरिक प्रतिक्रियाओं में एक स्पष्ट अंतर को उजागर करती हैं।

कुछ ही दिन पूर्व कश्मीर की घाटी में आतंकियों ने 26 हिन्दू यात्रियों की निर्मम हत्या की। यह कोई आकस्मिक घटना नहीं थी — यात्रियों से धर्म पूछकर उन्हें गोली मारी गई, जो इस बात का संकेत है कि यह आतंक नहीं, मज़हबी युद्ध था। भारत ने इस पर प्रतिक्रिया दी — लेकिन उस मात्रा और प्रभाव में नहीं, जो एक जागरूक सभ्यता देती है। प्रतिक्रिया सीमित थी, नियंत्रित थी — और प्रतीकात्मक भी।

अब तुलना कीजिए इज़रायल की प्रतिक्रिया से।

2023 में जब हमास आतंकियों ने गाज़ा से हमला किया, सैकड़ों यहूदियों की हत्या की, महिलाओं को अपहृत कर बलात्कार किया और बच्चों को बंधक बना लिया — तो इज़रायल ने पूरे गाज़ा पर जबरदस्त सैन्य प्रहार किया। उन्होंने सिर्फ “बदला” नहीं लिया, बल्कि एक संदेश दिया — कि यहूदी रक्त सस्ता नहीं है, कि हम सभ्यता हैं, और हम अपने हर नागरिक के जीवन के लिए अंतिम साँस तक लड़ सकते हैं।

उन्होंने 13 सौ आतंकियों की हत्या की, 52,000 से अधिक आतंकवादियों को समाप्त किया, और उसके बाद भी ईरान के अंदर घुसकर फोर्डो, नतांज़ और इस्फ़हान जैसे परमाणु केंद्रों को तबाह कर दिया। और आश्चर्य नहीं कि इस सैन्य कार्रवाई में अमेरिका खुलकर इज़रायल के साथ खड़ा रहा, और पाकिस्तान ने भी छुपकर ईरान-विरोधी रणनीति में भागीदारी की, क्योंकि रणनीति केवल वीरता नहीं, चतुराई भी माँगती है।

अब लौटिए भारत की ओर।

जब हमने पुलवामा और उरी के बाद आतंकी ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक की — तो वह वीरता थी, साहस था। परंतु जब पाकिस्तान जवाबी हमला करता है, और भारत रणनीतिक रूप से ऊपर होते हुए भी "युद्धविराम" स्वीकार कर लेता है — तब सवाल उठता है: क्या हम अपने सभ्यता-संघर्ष को इज़रायल जितनी गंभीरता से लेते हैं?

क्या हमारे लिए हिन्दू रक्त का मूल्य कम हो गया है?

क्या हमारे वीरगति प्राप्त सैनिक केवल समाचार की सुर्खियों तक सीमित रह गये हैं?

क्या हमारे शत्रु हमें इतना पढ़ चुके हैं कि जानते हैं — हम दो दिन गुस्सा करेंगे, फिर चुप हो जायेंगे?

असल में समस्या यह नहीं है कि हमारे पास सैन्य शक्ति नहीं है — समस्या यह है कि हम मानसिक और वैचारिक रूप से संगठित नहीं हैं।

इज़रायल का हर नागरिक जानता है कि वह एक यहूदी राष्ट्र की सभ्यता का रक्षक है — भारत का नागरिक आज भी यह तय नहीं कर पाया कि वह हिन्दू है या केवल भारतीय?

हम यह समझ ही नहीं पा रहे कि धर्मनिरपेक्षता की आत्मघाती परिभाषाएँ, और नैतिकतावादी निष्क्रियता — सभ्यता की रक्षा नहीं करतीं, उसे कमजोर करती हैं।

और इस संकोच में हम भूल रहे हैं कि —

> “सभ्यता उन्हीं की रहती है, जो उसे जीते हैं, बचाते हैं और ज़रूरत पड़े तो उसके लिए लड़ते हैं।”

हमारी दुविधा यह है कि हम राजनीतिक रूप से आक्रामक बनने से डरते हैं, कि कहीं हमें असहिष्णु न कह दिया जाए। जबकि सभ्यता का संरक्षण “टॉलरेंस” से नहीं होता, “ट्राइब्स” बनाकर होता है — जैसे यहूदी बने हैं, जैसे मुस्लिम बनते हैं।

इज़रायल की आक्रामकता और भारत की उदारता के बीच यह अंतर केवल भूगोल का नहीं है — यह हमारी मानसिक स्थिति का प्रतिबिम्ब है। और जब तक हम इस अंतर को नहीं समझेंगे, तब तक हम न तो अपने तीर्थयात्रियों की रक्षा कर पाएँगे, न अपने धर्म की, न अपनी संतानों के भविष्य की है 

विश्व इतिहास हमें यह सिखाता है कि जो मज़हब या संस्कृति स्वयं के भीतर एकजुट होती है, वही दीर्घकाल तक टिकती है, और सामर्थ्यशाली बनती है। आज जब हम अब्राह्मिक परंपराओं को देखते हैं — चाहे वह ईसाई हों, यहूदी हों, या मुस्लिम — तो यह बात अत्यंत स्पष्ट रूप से दिखाई देती है कि विविधता के बावजूद उनका मूल चिंतन, लक्ष्य और अस्तित्व-चेतना एक रहती है।

ईसाई विश्व — कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट, ऑर्थोडॉक्स के भेद के बावजूद — "क्रिश्चियन नेशन" की अवधारणा को समर्थन देता है।

इस्लाम — शिया, सुन्नी, वहाबी, देवबंदी जैसे अंतर होने के बावजूद — “उम्मा” की एकता में विश्वास करता है।

यहूदी समाज — लिबरल, हसीदिक, रूढ़िवादी भिन्नताओं के बावजूद — इज़रायल की एकता के लिए समर्पित रहता है।

अब आइये हिन्दू समाज की ओर।

यहाँ हमने "विविधता" को इतना महिमामंडित कर दिया है कि वह विखंडन बन चुकी है।

यहाँ ब्राह्मण और श्रमण, आर्य और अनार्य, वैष्णव और शैव, बौद्ध, जैन, सिख, दलित, पिछड़े, लिंगायत, आर्यसमाजी, सनातनी — सब अपनी अलग पहचान लेकर खड़े हैं, लेकिन "हिन्दू" नाम से कोई एक बौद्धिक, वैचारिक या राजनीतिक चेतना खड़ी नहीं हो पाई है।

सनातन धर्म को यदि किसी प्रतीक में रूपांतरित करना हो, तो उसके लिए वटवृक्ष से अधिक उपयुक्त कुछ नहीं हो सकता। यह वटवृक्ष केवल एक पेड़ नहीं, अपितु भारत की आत्मा का मूर्त रूप है — जिसकी जड़ें अत्यंत गहरी हैं, शाखाएँ असंख्य हैं, और प्रत्येक पत्ता एक परंपरा, एक जीवन दृष्टि, एक साधना का प्रतीक है। यह वटवृक्ष काल के झंझावातों में भी अडिग खड़ा रहा है क्योंकि उसकी जड़ें उस चित्त में धँसी हुई हैं जहाँ वेदों का अनादि स्वर गूँजता है, उपनिषदों का आत्मज्ञान प्रकाशित होता है और लोक की मिट्टी में रची-बसी परंपराएँ जीवित रहती हैं।

यह सनातन वटवृक्ष कोई एक मत नहीं, कोई एक सम्प्रदाय नहीं — वह एक जीता-जागता चेतन तंत्र है, जिसमें ब्राह्मण की वैदिक यज्ञीय परंपरा भी है, और श्रमण की ध्यानशील मौन साधना भी। कहीं शंकराचार्य का अद्वैत है, तो कहीं महावीर का अपरिग्रह। कहीं गीता का कर्मयोग है, तो कहीं बुद्ध का क्षणवाद। यह वैदिक और अवैदिक, शास्त्रीय और लोक, मूर्त और अमूर्त, सगुण और निर्गुण — सबको एकसूत्र में बाँधने वाली वह जीवनदृष्टि है, जिसमें विरोध नहीं, केवल विस्तार है।

किंतु आज एक योजनाबद्ध प्रयास के अंतर्गत इस वटवृक्ष की शाखाओं को एक-दूसरे से काटने का षड्यंत्र चल रहा है। बौद्ध को ब्राह्मण-विरोध का प्रतीक बना दिया गया, जैन को हिन्दू धर्म से पृथक ठहराया गया, सिखों के भीतर अलगाव की आग भड़काई गई, और आदिवासियों को बताया गया कि वे हिन्दू कभी थे ही नहीं। इस सबके पीछे वही विचारधारा सक्रिय है जो हिन्दू समाज को आत्मविस्मृति की ओर ले जाकर उसे सभ्यता विहीन भीड़ में बदल देना चाहती है।

परंतु यह स्मरण रहे — यह सब शाखाएँ उसी सनातन वटवृक्ष की उपज हैं। महावीर, बुद्ध, नाथ, संत, कबीर, गुरु नानक, लिंगायत, सिद्ध — ये सब भारत की आत्मा से जन्मे हैं। इनकी जड़ें इसी भूमि में हैं, इन्हें पोषक तत्व इसी सनातन चेतना से प्राप्त होते हैं। इन्हें जब इस मूल से काटा जाएगा, तो वे भी निर्जीव हो जाएँगे और भारत भी।

यह समय का आह्वान है कि हम अपनी विविधता को पुनः एकता में बदलें। हमें यह समझना होगा कि बौद्ध, जैन, सिख, लिंगायत, सरना, वैष्णव, शैव, शक्त, वेदांती, तांत्रिक — ये सभी हिन्दू हैं, क्योंकि ये सभी इस वटवृक्ष की ही शाखाएँ हैं। इन सबको एक वैचारिक छतरी के नीचे लाना, केवल रणनीतिक आवश्यकता नहीं है — यह सनातन धर्म की आत्मरक्षा का अनिवार्य पथ है।

जिन्होंने मजहब के नाम पर एक किताब, एक पैगंबर और एक पंथ के अनुशासन से वैश्विक सामर्थ्य खड़ी कर ली, उनके सामने भारत जैसी जीवंत और बहुआयामी संस्कृति तब तक टिक नहीं सकती, जब तक वह स्वयं को टुकड़ों में बाँटती रहे। हमें यह स्वीकार करना होगा कि संघर्ष अब केवल बाह्य नहीं, आंतरिक है — आत्म-चेतना बनाम आत्म-त्याग का, स्मृति बनाम विस्मृति का, धर्म बनाम मत का।

यह विखंडन अचानक नहीं हुआ — यह एक सुव्यवस्थित योजना के अंतर्गत पनपा।

पहचान की राजनीति: विभाजन का औज़ार

1960 के दशक से भारत में एक नई राजनीति जन्मी — पहचान की राजनीति, जिसमें व्यक्ति की धार्मिक, जातीय, भाषायी, क्षेत्रीय और लैंगिक पहचान को राष्ट्र, संस्कृति और सनातन से ऊपर रखा गया। इसमें मुख्य भूमिका निभाई वामपंथी विचारकों और चर्च समर्थित संगठनों ने।

इनका उद्देश्य यह था कि हिन्दू समाज को केवल तोड़ा नहीं जाए, बल्कि उसे खुद ही अपनी पहचान से घृणा करने के लिए तैयार किया जाए।

ब्राह्मण को "दमनकारी" बताया गया, ताकि वह धर्मशास्त्र और संस्कृति से दूरी बनाए।

शूद्रों को यह बताया गया कि धर्म ने उन्हें उत्पीड़ित किया, इसलिए धर्म त्याग दो।

आदिवासियों को कहा गया कि तुम हिन्दू हो ही नहीं — "तुम तो प्रकृति पूजक हो, अलग सरना कोड माँगो।"

बौद्ध, जैन और सिख समुदायों को यह सिखाया गया कि उन्हें ब्राह्मणों ने ग्रंथों से मिटा दिया — इसलिए “हिन्दू धर्म तुम्हारा शत्रु है”।

सरना कोड, लिंगायत आंदोलन और चर्च की भूमिका

आज झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में आदिवासी समाज के भीतर “सरना धर्म” को अलग मान्यता दिलाने का आंदोलन चल रहा है। यह कोई आत्मनिर्भर सांस्कृतिक प्रयास नहीं, बल्कि चर्च समर्थित रणनीति है — जिसका उद्देश्य है आदिवासी समाज को हिन्दू धर्म से कानूनी और भावनात्मक रूप से काट देना।

इसी प्रकार कर्नाटक में लिंगायत समुदाय को “हिन्दू नहीं” बल्कि “एक स्वतंत्र धर्म” घोषित करने का षड्यंत्र किया गया। इसके पीछे भी चर्च और कांग्रेस समर्थित बुद्धिजीवी तंत्र सक्रिय था।

बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर ने दलितों को बौद्ध बनाया, परंतु उन्होंने कभी हिन्दू धर्म को विधर्मी या शत्रु नहीं कहा। किंतु आज "दलित बौद्ध विमर्श" के नाम पर युवाओं को ब्राह्मण-विरोधी घृणा सिखाई जा रही है, और यह बताया जा रहा है कि “हिन्दू धर्म उन्हें मानसिक गुलामी में रखता है।” इस विचार को प्रचारित करने के लिए पैसे, मीडिया, फिल्म और अकादमिक जगत में योजनाबद्ध कार्य हो रहा है।

वामपंथी "वर्ग संघर्ष" का नया संस्करण: जातिगत विद्वेष

मार्क्सवाद में "बुर्जुआ बनाम सर्वहारा" का संघर्ष था, परंतु भारत में यह "ब्राह्मण बनाम दलित", "ऊँच-नीच बनाम आरक्षण", "मंदिर बनाम अंधविश्वास" में बदल दिया गया। और ये सब कुछ हुआ — "सामाजिक न्याय", "मानवाधिकार", और "समता" के नाम पर।

आप देखेंगे कि जब-जब कोई सनातन मूल्यों की बात करता है — उसे “मनुवादी”, “ब्राह्मणवादी”, “सामंती” कहकर खारिज किया जाता है। लेकिन यही लोग इस्लामिक कट्टरपंथ या ईसाई मतांतरण पर मौन रहते हैं।

क्यों?

क्योंकि इस पूरे विमर्श का उद्देश्य हिन्दू समाज को आत्मग्लानि में डुबो देना है। ताकि वह न तो अपनी पहचान पर गर्व करे, न अपने धर्म का साहस से पालन करे, और न ही अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए खड़ा हो।

  वामपंथप्रेरित शिक्षण संस्थान अपने पाठ्यक्रमों में नवीन कथानकों की रचना करते हैं, जिनका लक्ष्य हिन्दू समाज को पितृसत्तात्मक एवं ब्राह्मणवादी ठहराकर उसके सांस्कृतिक स्वरूप का विघटन करना होता है। दुर्भाग्यवश, हम स्वयं ब्राह्मण एवं श्रमण परंपराओं, वैदिक एवं अवैदिक दर्शनों को सनातन धर्मरूपी विराट वटवृक्ष की शाखाओं के रूप में स्वीकारने के स्थान पर, उन्हें खण्डित करने का प्रयास करते हैं। हम भिन्नता के बाह्य स्वरूप को देखकर मूल की एकता को नकारते हैं। जबकि सत्य यह है कि समस्त वैदिक, अवैदिक, लोकपरंपराएँ, दार्शनिक दृष्टियाँ – सभी सनातन वटवृक्ष की अभिन्न शाखाएँ हैं।

भाषा, प्रांत, जाति, नस्ल आदि के नाम पर जो संघर्ष और विभाजन खड़े किए जा रहे हैं, उनके मूल में भी अब्राह्मिक मत और उनके पोषक वामपंथी विचारधाराएँ ही हैं। हम एक लक्ष्यविहीन, दिशाहीन समाज की भाँति व्यवहार कर रहे हैं क्योंकि हमें अपने धर्म, उद्देश्य, और कर्तव्यों का बोध ही नहीं है। इसी अज्ञानवश हम अपने शास्त्रों – वेद, उपनिषद, स्मृतियाँ, पुराण और आचारपरंपरा को त्याग कर, आयातित विचारधाराओं का अनुकरण करने लगे हैं।

इस आत्मविस्मृति के कारण हम प्रत्येक युद्ध हारते जा रहे हैं। हमें न स्वधर्म का बोध है, न शत्रुबोध, न ही परिस्थिति की सम्यक् समझ। हम दीर्घकालिक दृष्टि से सोचने की अपेक्षा क्षणिक प्रतिक्रियाओं में उलझे रहते हैं। इसी कारण जब अमेरिका ईरान के परमाणु ठिकानों पर आक्रमण करता है, तब हम हर्षित होते हैं, यह विस्मृत कर कि यदि यही कृत्य भारत के विरुद्ध हो जाए तो क्या होगा?

वस्तुतः हम पिछले पंद्रह शताब्दियों से एक सतत् सभ्यता युद्ध में संलग्न हैं। परन्तु विडम्बना यह है कि हम इस युद्ध को अल्पकालिक राजनैतिक विमर्श के चश्मे से देखते हैं, जबकि इसकी आवश्यकता है एक दूरदर्शी, संगठित, और समर्पित सांस्कृतिक योजना की।

शांति की स्थापना के लिए शक्ति आवश्यक है। यदि हम 'विश्वगुरु' बनने का स्वप्न संजोते हैं, तो हमें आर्थिक, सैन्य, सामाजिक, एवं राजनैतिक शक्तियों में समर्थ होना ही पड़ेगा। हमारे शास्त्रों में वर्णित चार पुरुषार्थ – धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष – को अपने जीवन और समाज के संचालन का आधार बनाना होगा। इन्हीं की आधारभूमि पर हम इस दीर्घकालिक सभ्यता संघर्ष में विजय प्राप्त कर सकते हैं और भारतमाता को परम वैभव के शिखर पर प्रतिष्ठित कर सकते हैं।

Deepak Kumar Dwivedi

मंगलवार, 6 मई 2025

न्यूक्लियर अटैक के दौरान क्या करें पहले से तैयारी कैसे करें ?

 


 भारत सरकार के द्वारा कल 7 मई को देश के सभी राज्यों में मॉकड्रिल करने के निर्देश दिये गये हैं। इसी संदर्भ में न्यूक्लियर अटैक (परमाणु हमले) की स्थिति में जान और स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए त्वरित और सही कदम उठाना अत्यंत आवश्यक है।  यहाँ कुछ महत्वपूर्ण प्रिकॉशन दिए गए हैं जो आपकी और आपके परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद् कर सकते हैं।

 *(1)☢️ न्यूक्लियर अटैक के दौरान क्या करें-* 

➡️ तुरंत सुरक्षित स्थान पर जाएं।

➡️ किसी मजबूत इमारत के अंदर जाएं। ईंट,पत्थर या कंक्रीट से बनी इमारतें रेडिएशन से बेहतर सुरक्षा प्रदान करती हैं।

➡️ खिड़कियों से दूर रहें। खिड़कियों से दूर रहना ब्लास्ट वेव और कांच के टुकड़ों से बचाव करता है। 

 *(2) अंदर जाकर शरण लें (Shelter-in-Place)* 

➡️ तुरंत अंदर जाएं, जितनी जल्दी हो सके किसी इमारत के अंदर चले जाएं।

➡️ बेसमेंट या मध्य भाग में रहें। इमारत के बेसमेंट या मध्य भाग में रहना रेडिएशन से अधिक सुरक्षा प्रदान करता है।

➡️ कम से कम 24 घंटे तक अंदर रहें। रेडियोएक्टिव फॉलआउट के प्रभाव को कम करने के लिए कम से कम 24 घंटे तक अंदर रहें।  

 *(3) रेडिएशन से बचाव के उपाय-* 

➡️ कपड़े बदलें और स्नान करें। यदि आप बाहर थे,तो अंदर आने के बाद तुरंत अपने कपड़े बदलें और बिना कंडीशनर के स्नान करें।

➡️ संक्रमित कपड़ों को सील करें। संक्रमित कपड़ों को प्लास्टिक बैग में सील करके दूसरों से दूर रखें।

➡️ आँख,नाक और मुँह को छूने से बचें। रेडिएशन के संपर्क से बचने के लिए अपने चेहरे को छूने से बचें।  

 *(4)📢☎️ सूचना और संचार* 

➡️ रेडियो या विश्वसनीय स्रोतों से अपडेट प्राप्त करें। सरकारी निर्देशों और आपातकालीन सूचनाओं के लिए बैटरी से चलने वाले रेडियो या अन्य विश्वसनीय स्रोतों का उपयोग करें।

➡️ इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क पर निर्भर न रहें। आपातकालीन स्थिति में ये सेवाएं बाधित हो सकती हैं। 

*🧰पहले से तैयारी कैसे करें* 

➡️ आपातकालीन किट तैयार रखें। जिसमें कम से कम दो सप्ताह का नॉन-पेरिशेबल भोजन, प्रति व्यक्ति प्रतिदिन एक गैलन पानी, फ्लैशलाइट, बैटरियाँ, प्राथमिक चिकित्सा किट, और आवश्यक दवाएँ शामिल हों।

➡️ परिवार के लिए आपातकालीन योजना बनाएं, सुरक्षित स्थानों की पहचान करें, बैठक बिंदु निर्धारित करें, और संचार के वैकल्पिक तरीकों की योजना बनाएं।  

 *⚠️ क्या न करें* 

➡️ बाहर न निकलें, जब तक आधिकारिक रूप से सुरक्षित घोषित न किया जाए, तब तक बाहर न निकलें।

➡️ रेडिएशन से संक्रमित वस्तुओं को न छुएं, संक्रमित वस्तुओं को छूने से बचें और उन्हें सुरक्षित रूप से निप