गुरुवार, 28 सितंबर 2017

देश की पुकार

देश की पुकार 

भारत माता  की बॅटवारा है जिनकी अभिलाषा में 
वो समझेंगे अर्जुन  की गांडीव धर्म की भाषा में। 
फूल अमन के नहीं खिलते, कायरता के माटी में 
नेहरू जी के श्वेत कबूतर मरे पड़े है घाटी में।  
दिल्ली वालो!अपने मन को बुद्ध करो या कुद्ध करो 
काश्मीर को दान करो या गद्दारो से युद्ध करो। 

जेल भरे हम क्यों बैठे है आदमखोर दरिंदो से 
आजादी का दिल घायल है जिनके गोरखधंधो से।  
घाटी में आतंकवाद का कारक बने हुए है जो 
बच्चों की मुस्कानो का संहारक बने हुए है जो। 
उन जहरीली नागों को भी दूध पिलाती है दिल्ली 
मेहमानो जैसी चिकेन बिरियानी खिलाती है दिल्ली। 

जिनके कारण पूरी घाटी जली दुल्हन सी लगती है 
पूनम वाली रात चांदनी,  चंदग्रहण सी लगती है। 
जिनके कारण माँ की बिंदी  दाग दिखाई देती है 
वैष्णो देवी माँ के घर में आग दिखाई देती है। 
उनके पैर बेड़ी जकड़े जाने में देरी क्यूँ है ?
 उनके फन पर ऐड़ी रगड़े जाने में देरी क्यूँ है ?

काश्मीर में एक विदेशी देश दिखाई देता है 
संविधान को ठुकराता परवेज दिखाई देता है। 
वे घाटी में भारत के झंडो को रोज जलाते है 
 सेना पर हमला करते है, खुनी फाग मनाते है। 
हम दिल्ली की ख़ामोशी पर शर्मिदा रह  जाते है 
'भारत  मुर्दाबाद' बोलकर वो जिन्दा कैसे रह जाते है।  
सेना पर पत्थरबाजो  को कोई इतना समझा दो 
ये गाँधी के गाल नहीं है कोई इतना बतला दो। 
दिल्ली वालो! सेना को भी कुछ निर्णय ले लेने दो 
एक बार पत्थर का उत्तर गोली से दे देने दो। 

जब हत्यारे महिमामंडित होते हो, कश्मीर की गलियों में 
शिमला समझौता जलता हो, बंदूकों की नलियों में। 
तो केवल आवश्यकता  है हिम्मत की, ख़ुद्दारी की 
दिल्ली केवल दो  दिन की मोहलत दे दे  तैयारी की। 
 सेना को आदेश थमा दो, घाटी देर नहीं होगी 
जहाँ तिरंगा नहीं मिलेगा, उनकी खैर नहीं होगी। 

अब तो वक्त बदलना सीखो, डरते-डरते जीने का 
दुनिया को अहसास कराओ, छप्पन इंची सीने का। 
राजमहलों के आचरणों की गंध हवा में जाती है 
राजा अगर कायर हो तो बिल्ली भी सिंहो को धमकाती है। 

सैनिक आने प्राण गवाँकर, देश बड़ा कर जाता है 
बलिदानों की बुनियादों पर राष्ट्र खड़ा कर जाता है। 
 जिनको माँ की बलिदानी  और बेटो से प्यार नहीं होगा 
उन्हें तिरंगे को लहराने का अधिकार नहीं होगा। 

भारत एक अखंड राष्ट्र है, सवा सौ करोड़ की ताकत है
कोई हम पर आँख उठा ले, किसकी भला हिमाकत है। 
धरती, अम्बर और समंदर को, यह भाषा समझा दो 
 दुनिया के हर पंच सिकंदर को, यह भाषा समझा दो। 
अब खंडित भारत माँ की तस्वीर नहीं होने वाली 
कश्मीर किसी के अब्बा की जागीर नहीं होने वाली। 


सौजन्य से :-

चन्दन झा 
















शनिवार, 9 सितंबर 2017

हनुमान जी के गीत

हनुमान जी के गीत 
मैथिलि हनुमान चालीसा से 



सुनलउ    सब   पर    ध्यान    धरैछी 
यौ  कपि , हमर ने सुधि  अहाँ  लेलो  | 
क्रन्दन     करि -  करि  केसरी  नंदन 
 निसदिन      नोर      नहय      लऊ ||  
                   सुनलउ - --यौ  कपि--
करुणाकर     कपि   दया  के  सागर 
सबहक़        मुहें        सुनै       छी  | 
नयन   निहारैत    वयस  बीत  गेल 
किऐ    नञि    अहाँ   जनै     छी   || 
सबहक  काज  दौडि   कय   कयलहुँ 
हमर       बिसरि     किय      गेलौ  
               सुनलउ - -- यौ  कपि--
केहन   कठोर   बनल   बैसल   छी 
बुझि      कउ      सब      अंजान  | 
की  हम  दास  अहाँ   के  नञि  छी 
  अतबे          कहु         हनुमान   ||    
पवन       पूत  , हे   गुण   निधान 
हम     कते      निहोरा    कयलौं  
            सुनलउ - --  यौ  कपि--
शंकर   सुवन हे   गगन   विहारी  
फांदि       गेलौ    अहाँ      लंका | 
विद्यासागर  ,  बुधि   के   आगर 
  सभतरि      बाजल            डंका || 
"रमण " व्याथा चित  उझलि देलऊ 
अहाँ     तैयो    नञि      पतिएलो  || 
 सुनलउ - -- यौ  कपि--
रचित -
रेवती रमण झा "रमण "

बुधवार, 6 सितंबर 2017

पितृ तर्पण विधि:

  तर्पण मन्त्र -TARPAN MANTRAS

आवाहन: दोनों हाथों की अनामिका (छोटी तथा बड़ी उँगलियों के बीच की उंगली) में कुश (एक प्रकार की घास) की पवित्री (उंगली में लपेटकर दोनों सिरे ऐंठकर अंगूठी की तरह छल्ला) पहनकर, बाएं कंधे पर सफेद वस्त्र डालकर  दोनों हाथ जोड़कर अपने पूर्वजों को निम्न मन्त्र से आमंत्रित करें 

'ॐ आगच्छन्तु मे पितर एवं ग्रहन्तु जलान्जलिम'  
ॐ हे पितरों! पधारिये तथा जलांजलि ग्रहण कीजिए।  

तर्पण: जल अर्पित करें 
निम्न में से प्रत्येक को 3 बार किसी पवित्र नदी, तालाब, झील या अन्य स्रोत (गंगा / नर्मदा जल पवित्रतम माने गए हैं) के शुद्ध जल में थोडा सा दूध, तिल तथा जावा मिला कर जलांजलि अर्पित करें। 

पिता हेतु  --

(गोत्र नाम) गोत्रे अस्मतपिता पिता का नाम शर्मा वसुरूपस्त्तृप्यतमिदं तिलोदकम (गंगा/नर्मदा जलं वा) तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः तस्मै स्वधा नमः।
------. गोत्र के मेरे पिता श्री वसुरूप में तिल तथा पवित्र जल ग्रहण कर तृप्त हों।  
तस्मै स्वधा नमः तस्मै स्वधा नमः तस्मै स्वधा नमः।

उक्त में अस्मत्पिता के स्थान पर अस्मत्पितामह पढ़ें  --

पिता के नाम के स्थान पर पितामां का नाम लें ----
माता हेतु  तर्पण  - 
(गोत्र नाम) गोत्रे अस्मन्माता माता का नाम देवी वसुरूपास्त्तृप्यतमिदं तिलोदकम (गंगा/नर्मदा जलं वा) 
तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः तस्मै स्वधा नमः।
 ........... गोत्र की मेरी माता श्रीमती ....... देवी वसुरूप में तिल तथा पवित्र जल ग्रहण कर तृप्त हों। तस्मै स्वधा नमः तस्मै स्वधा नमः तस्मै स्वधा नमः। 
निस्संदेह मन्त्र श्रद्धा अभिव्यक्ति का श्रेष्ठ माध्यम हैं किन्तु भावना, सम्मान तथा अनुभूति अन्यतम हैं।

जलांजलि पूर्व दिशा में 16 बार, उत्तर दिशा में 7 बार तथा दक्षिण दिशा में 14 बार अर्पित करें 

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संक्षिप्त पितृ तर्पण विधि:
 पितरोंका तर्पण करनेके पूर्व इस मन्त्र से हाथ जोडकर प्रथम उनका आवाहन करे -
ॐ आगच्छन्तु मे पितर इमं गृह्णन्तु जलान्जलिम ।

अब तिलके साथ तीन-तीन जलान्जलियां दें -
(पिता के लिये)
अमुकगोत्रः अस्मत्पिता अमुक (नाम) शर्मा वसुरूपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं (गंगाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः ।
(माता के लिये)
अमुकगोत्रा अस्मन्माता अमुकी (नाम) देवी वसुरूपा तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्यै स्वधा नमः, तस्यै स्वधा नमः, तस्यै स्वधा नमः ।
जलांजलि पूर्व दिशा में 16 बार, उत्तर दिशा में 7 बार तथा दक्षिण दिशा में 14 बार अर्पित करें 

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

हनुमान जी के आरती

  (हनुमंत पचीसी अहि  लिंक  से पढू आ सुनू )
https://apangaamapanbat.blogspot.in/2017/07/blog-post.html


 हनुमान जी के आरती  

बजरंगबली         के      आरती 
आइ       उतारू     ध्यान    सँ  | 
नञि  बुझलक दुख  हमर कियो 
जे , आइ   कहब   हनुमान सँ  || 
   बजरंगबली के  -- नञि  बुझलक --
 टरल बिकट वर - वर  पथ -कंटक 
                               दया  दृष्टि  जेहि  देलों  यों  | 
                               रघुनन्दन  दुख  भंजन के दुख 
                               काज सुगम  सँ  कयलौ  यौ  || 
                               जा पताल  अहिरावण मारल 
                                बज्र गदा के वान सँ -
                               बजरंगबली के  -- नञि  बुझलक --
                               लखनक प्राणे , पलटि  आनि कय 
                                राम हीया  हुलसइलौ यौ  | 
                                कालक  गाले  जनक  नंदनी 
                                लंका   जाय   छोरयलौं  यौ  || 
                              जहिना  बीसभुज  के निपटयलों 
                               अपनेही बुधि  बल ज्ञान  सँ || 
                               बजरंगबली के  -- नञि  बुझलक --
                               ज्ञान ध्यान रहि , मृत जीवन सन 
                               संत विभीषन छल नरक तल में  | 
                               लंका के  ओ  राजा  बनि  गेल 
                               अहाँक दया सं एक पल में || 
                              "रमणक " काज  सुतारु  ओहिना 
                               अपन कृपा  वरदान सँ  || 
                               बजरंगबली के  -- नञि  बुझलक --
                                         रचित - 
                               रेवती रमण झा "रमण "

सोमवार, 4 सितंबर 2017

हनुमान जी के आरती

 आरती      उतारी   
  यौ  अंजनि के लाला  | 
   राम   नाम  अमृत के 
पिवि  गेलौ प्याला | | 
     आरती  उतारी -- यौ  अंजनि ---
लाल देह लाल ध्वजा , 
लाले   लंगोटा 
लाल वदन  हाथ अछि ,
 लाल अछि  सोंटा 
लाले नयन लाल -
 तिलक गले माला  || 
आरती  उतारी -- यौ  अंजनि ---
दीन  हितकारी 
हे पापक निकंदन 
पवन पूत राम दूत 
केसरिक  नंदन 
अहाँ  सनक  कियो नञि  
एकौ  मतवाला || 
आरती  उतारी -- यौ  अंजनि ---
शंकर सुवन कपि 
चंचल  चारु 
"रमण  " सरण में , यौ 
नयना  निहारु 
कान्धे  जनेऊ  मुंज 
केश घुँघराला  ||
 आरती  उतारी -- यौ  अंजनि ---

रचित - रेवती रमण झा '' रमण "

http://apangaamapanbat.blogspot.in/2016/11/blog-post.html

मैथिलि हनुमान चालीसा अही लिंक सं पढू आ सुनु