रविवार, 2 अगस्त 2015

संगी

मैथली कबिता :-संगी

(संगी)
संगी वयाह होइय जे हरेक दुख,शुखमे संग दैय
अपने ब्यथा जका संगिक बेदना बुझैय संगी!
हमार जिबनक शासक आधा हिशायै संगी!
हरेक कुण्ठा आ पिराके हैश,खेलक बितादैया संगी!
बुइझ नै पवैछी जीवनक हरेक हिशाके,
बुझबाक प्रयत्न करैछी त् हमर जीवनक जान यै संगी!
संगी वयाह होइय जे हरेक दुख,शुखमे संग दैय
अपने ब्यथा जका संगिक बेदना बुझैय संगी!
भाब बिभोर भेनऊ संगिक संग देख,
जिन्दगीक हरेक डेग्पर संगदैय संगी!
अपन जिन्दगीक अन्तिम समयतक संग देबऊ तॊरा,
बिचलित नैहो,अनेको बातक भरोशा दैय संगी!
संगी वयाह होइय जे हरेक दुख,शुखमे संग दैय
अपने ब्यथा जका संगिक बेदना बुझैय संगी!
एक्छन जखन दुर होइछि,सोइच परैछी किछ बात,
कत भेटत् एहन संगी,जे संगदेत सैदखन संगी!
कोना जिबपयात लॊक्शब,सृशटीक एहन रचनामे,
जिन्दगीक हरेक संघर्ष नै झेल्पयात बिना संगी,बिना संगी!
संगी वयाह होइय जे हरेक दुख,शुखमे संग दैय
अपने ब्यथा जका संगिक बेदना बुझैय संगी!!!!!🚩🇮🇳

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