मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

आडंबरी मिथिला आ पूँजी-पलायन


    जमीन्दारी प्रथा जहिया रहल आ अंग्रेजकेँ मालगुजारी तथा रैयत सँ लगान लेबामे भरुवापन्थी देखबैत सामन्ती जमीन्दार बिचोलियागिरी करैत रहल ताहि समयसँ मिथिला समाजमे कतेको तरहक दिखावटीपन प्रवेश केलक से ऐतिहासिक साक्ष्यसँ स्पष्ट अछि। ओ चाहे दरभंगा महाराजा होइथ या फेर तमाम ड्योढि-दरबार चलेनिहार, मुसलमान शासक सँ लैत अंग्रेजी हुकुमत केर सामने नतमस्तक होइत भूमिव्यवस्था संचालन करैत रहला आ गोटेक-आधेक निष्ठावान बनि आम-किसानकेँ जमीनक मालिक मानि ईमानदार सिद्धान्तसँ काज कयलाह, मुदा अधिकांशत: उद्धरण बेईमानी व क्रूरताक देखाइत अछि - ई एक महत्त्वपूर्ण कारण अछि जे आइ मिथिला विपन्न अवस्थामे आ टूटल-बिखडल समाजक संग बिना कोनो अपन वजूद आगू बढि रहल अछि। वर्तमान मिथिलाक किछु भाग नेपाल मे आ किछु भाग भारतमे पडैत अछि, अपन कहि बस पौराणिक इतिहास आ निस्सन्देह एक पूर्ण संस्कृति धरि मिथिलाक अलगे सम्मानपूर्वक स्थापित करैत अछि। 

वर्तमान समयमे दिखावटीपन तथाकथित पैघ वर्ग लेल चरम पर अछि। एहि दिखावाक परिणाम मिथिलाक्षेत्र घोर-विपन्न रहितो बहुत पैघ परिमाणमे पूँजी पलायनकेर कारक बनैत देखा रहल अछि। जन्मसँ मृत्यु धरि मिथिलामे उत्सव मनेबाक, कुलदेवता प्रति समर्पित रहबाक आ मिष्ठान अन्नदान करबाक संग आरो निहित न्युनतम कर्मकाण्डीय व्यवहार अनिवार्य रहल छल। लेकिन आब एहि समस्त व्यवहारमे तथाकथित समृद्ध लोकवर्ग द्वारा किछु बेसिये प्रदर्शनकारी आ अनावश्यक खर्चा सँ भरल व्यवहारसँ समाज पूर्णरूपेण प्रदूषित भऽ गेल अछि, जेकर दुष्परिणाम यैह जे विशाल पूँजी सकारात्मकतामे नहि लगानी भऽ निरर्थक विनाशकारी निर्माणमे मिथिला सँ बाहर ठेला रहल अछि। एखन संछिप्त मे एतबी कहय चाहब (निचाँ देल एक फोटोक आलोकमे), भोजभात हो या दान-दहेज या श्राद्धदान - सब किछु आडंबरी आ खर्चीला बनि गेल अछि, समस्त खर्चा बनियाक दोकानक मार्फत बैंकमे आ बैंकक मार्फत संकलित पूँजी विकासशील वा विकसित राज्यक उद्योग ऋणमे आ फेर हमरा लोकनिक धियापुता ओहि विकासशील-विकसित राज्यमे प्रवासी बनि अपन टैलेन्ट केँ बंधुआ मजदूरक दरपर लीलाम करैत सिट्ठी चूसबाक लेल मजबूर अछि। 




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