शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

यज्ञोपवीत संस्कार के प्रमुख बिंदु:

 


 यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करने का मुख्य मंत्र "ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं..." है। यह मंत्र शरीर को पवित्रता, बल और तेज प्रदान करने के लिए जनेऊ धारण करते समय पढ़ा जाता है। यह एक पवित्र सूत्र है, जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक के रूप में धारण किया जाता है। 

यज्ञोपवीत मंत्र:

ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।

आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥

हिंदी अर्थ:

यज्ञोपवीत अत्यंत पवित्र है, जिसे प्रजापति (ईश्वर) ने स्वाभाविक रूप से सबसे पहले स्थापित किया था। यह आयु को बढ़ाने वाला, अग्रगण्य (श्रेष्ठ), शुभ्र (स्वच्छ) और पवित्र करने वाला है। हे यज्ञोपवीत, मुझमें बल (शक्ति) और तेज (ऊर्जा) प्रदान करो। 

धारण करने की प्रक्रिया (संक्षेप में):

बाय कंधे के ऊपर से और दाएँ हाथ के नीचे से जनेऊ धारण किया जाता है।

इस प्रक्रिया के दौरान ऊपर दिए गए मंत्र का उच्चारण किया जाता है। 

पुरानी जनेऊ उतारने का मंत्र:

ॐ यज्ञोपवीतं पुराणं जरजरं कश्यपोद्भवम्।

त्यजामि ब्रह्मनिर्मितं नित्यं सात्त्वगुणात्मकम्॥

अर्थ: मैं इस पुराने और जर्जर यज्ञोपवीत को त्याग करता हूँ। 

यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार, जिसे उपनयन संस्कार भी कहते हैं, हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार है, जो बालक को ज्ञान, अनुशासन और द्विज (दूसरा जन्म) के रूप में प्रतिष्ठित करता है। यह अनुष्ठान ब्राह्मण (8 वर्ष), क्षत्रिय (11 वर्ष) और वैश्य (12 वर्ष) के लिए होता है, जिसमें गुरु गायत्री मंत्र की दीक्षा देते हैं। 

यज्ञोपवीत संस्कार के प्रमुख बिंदु:

अर्थ और महत्व: 'उपनयन' का अर्थ है 'गुरु या ज्ञान के समीप ले जाना'। यह पवित्र धागा धारण करने के बाद ही बालक को वेदों और विद्या के अध्ययन का अधिकार मिलता था, जिससे उसे 'द्विज' यानी दूसरा जन्म मिला माना जाता है।

तीन सूत्र: जनेऊ में तीन धागे होते हैं, जो ऋषि ऋण, देव ऋण और पितृ ऋण के प्रतीक हैं, जिन्हें धारण करके मनुष्य अपने कर्तव्यों का स्मरण रखता है।

विधि: यह संस्कार एक विद्वान पंडित द्वारा किया जाता है। इसमें मुंडन, गणेश पूजन, हवन, और गायत्री मंत्र का उपदेश मुख्य हैं। जनेऊ को बाएं कंधे के ऊपर और दाईं बांह के नीचे धारण किया जाता है।

उद्देश्य: इस संस्कार के बाद बालक को ब्रह्मचर्य का पालन करना होता था और यह नैतिक जीवन, विद्या अध्ययन व आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है।

परंपरा: यह प्राचीन काल से चली आ रही एक महत्त्वपूर्ण परंपरा है, जो अब सामान्यतः विवाह के पूर्व या कम उम्र में की जाती है। 

यह संस्कार व्यक्ति को अनुशासन, जिम्मेदारी और सात्विक जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है, जो सनातन संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है।

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

शादियों में एक नई रस्म का जन्म हुआ है हल्दी रस्म।

     


 विवाह में हल्दी रस्म या फिजूल खर्ची अमीरों के चक्कर में बेचारा गरीब पीs रहा है  आज कल ग्रामीण परिवेश में होने वाली शादियों में एक नई रस्म का जन्म हुआ है हल्दी रस्म। हल्दी रस्म के दौरान हजारों रूपये खर्च कर के विशेष डेकोरेशन किया जाता है, उस दिन दूल्हा या दुल्हन विशेष पीत (पीले) वस्त्र धारण करते हैं कुछ पूर्व इस हल्दी रस्म का प्रचलन  के ग्रामीण क्षेत्रों में कहीं पर भी देखने को नहीं मिलता था, लेकिन पिछले दो-तीन साल से इसका प्रचलन बहुत तेजी से ग्रामीण क्षेत्र में बढ़ा है। पहले हल्दी की रस्म के पीछे कोई दिखावा नहीं होता था, बल्कि तार्किकता होती थी। पहले ग्रामीण क्षेत्रों में आज की तरह साबुन व शैम्पू नहीं थे और ना ही ब्यूटी पार्लर था।  इसलिए हल्दी के उबटन से घिसघिस कर दूल्हे-दुल्हन के चेहरे व शरीर से मृt चमड़ी और मेल को हटाने, चेहरे को मुलायम और चमकदार बनाने के लिए हल्दी, चंदन, आटा, दूध से तैयार उबटन का प्रयोग करते थे। ताकि दूल्हा-दुल्हन सुंदर लगे। इस काम की जिम्मेदारी घर-परिवार की महिलाओं की थी। लेकिन आजकल की हल्दी रस्म मोडिफाइड, दिखावटी और मंहगी हो गई है। जिसमें हजारों रूपये खर्च कर डेकोरेशन किया जाता है। महंगे पीले वस्त्र पहने जाते है। दूल्हा दुल्हन के घर जाता है और पूरे वातावरण, कार्यक्रम को पीताम्बरी बनाने के भरसक प्रयास किये जाते हैं। यह पीला ड्रामा घर के मुखिया के माथे पर तनाव की लकीरें खींचता है जिससे चिंतामय पसीना टपकता है।

    पुराने समय में जहां कच्ची छतों के नीचे पक्के इरादों के साथ दूल्हा-दुल्हन बिना किसी दिखावे के फेरे लेकर अपना जीवन आनंद के साथ शुरू करते थे, लेकिन आज पक्के इरादे कम और दिखावा और बनावटीपन ज्यादा होने लगा है। 

       आजकल देखने में आ रहा है कि ग्रामीण क्षेत्र में आर्थिक रूप से असक्षम परिवार के लड़के भी इस शहरी बनावटीपन में शामिल होकर परिवार पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ा रहे है। क्योंकि उन्हें अपने छुट भईए नेताओं, वन साइड हेयर कटिंग वाले या लम्बे बालों वाले सिगरेट का धुंआ उड़ाते दोस्तों को अपना ठरका दिखाना होता है। इंस्टाग्राम, फेसबुक आदि के लिए रील बनानी है। बेटे के रील बनाने के चक्कर में बाप की कर्ज़ उतरने में ही रेल बन जाती है।

        ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे घरों में फिजूल खर्ची में पैसा पानी की तरह बहाया जाता है जिनके मां-बाप ने हाड़-तोड़ मेहनत और पसीने की कमाई से पाई-पाई जोड़ कर मकान का ढांचा खड़ा किया लेकिन ये नवयौवन लड़के-लड़कियां बिना समझे अपने मां-बाप की हैसियत से विपरीत जाकर अनावश्यक खर्चा करते हैं। 

        जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं हो उन परिवारों के बच्चों को मां-बाप से जिद्द करके इस तरह की फिजूल खर्ची नहीं करवानी चाहिए। आजकल काफी जगह यह भी देखने को मिलता है कि बच्चे (जिनकी शादी है) मां-बाप से कहते है आप कुछ नहीं जानते, आपको समझ नहीं है, आपकी सोच वही पुरानी अनपढ़ों वाली रहेगी, यह कहते हुए अपने माता-पिता को गंवारू, पिछड़ा, थे तो बौझ्अ बरगा हो कहते हैं। मैं जब भी यह सुनता हूं सोचने को विवश हो जाता हूं, पांव अस्थिर हो जाते हैं। बड़ी चिंता होती हैं कि आज युवा किस दिशा में जा रहे हैं।

      आज किसी को चींटी के पैरों के घूंघरू की आवाज सुनने की फुर्सत नहीं है क्योंकि सब-के-सब फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर पर खुद को बढ़ा-चढ़ाकर कर परोसते हैं, दिखावटीपन की चासनी में आकंठ डूबे हैं 

इस तरह की फिजूलखर्ची वाली रस्म को रोकने का प्रयास करें....!!!